मै नही देती हक किसी को
मुझे जीता या हारा कहने का
मुझे नही होती खुशी
अपनी झूठी तारीफ सुन कर
मुझे तकलीफ भी नही होती
जब बेगाने इंगित करते है कमियां मेरी
मुझे नही मिलती राहत
परायी संत्वनाओं से किसी पल
नही बहते मेरे आंसू
जब खो जाती है मेरी कोई चीज
ऐसा नही मुझे खुशी या गम
महसूस नही होता
रो पडती हूँ देखकर
आंसुओ की आहट माँ की आंखो में
बेबस हो जाती हूँ ये सुनकर
जब वो कहती है
कैद कर लिया है मैने खुद को
घर की चार दीवार में
क्योकि नही दे पाती वो जवाब
जमाने के सवालों का
गुनाह बस उसका है इतना
नही कर पाई है वो हाथ पीले अपनी बिटिया के
नही बेच पाई वो अपने जिगर के टुकडे को
किसी योग्य वर के हाथों में
माँ कैसे यकीन दिलाऊं
मै खुश हूँ तेरे आंचल में
मुझे नही लगती कोई कमी
अपने इस खुशहाल जीवन में
मै खुश नसीब हूँ कि आज भी
मिलती है तेरे हाथ की रोटी
और आ जाती है सुकून की नींद
तेरी जन्नत सी गोद में...............

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