हर रोज की तरह आज भी
शाम ढलते ही
रात आयी
धीरे धीरे
अपनी मुट्ठी बन्द किये
बडी बेसब्री से मिली उससे
कुछ न सूझा
बस गले लगा लिया
फिर धीरे से
पास जाकर कान में पूछा
क्या लाई हो
आज मेरे लिए
नींद या ख्वाब .........
रात चुप रही
कुछ भी न बोली
उसकी चुप ने
मुझे बेचैन कर दिया
मैने कहा -
कुछ तो कहो
क्या हुआ
आखिर क्यो हो परेशान
रास्ते में कुछ हुआ क्या
फिर कोई मिला क्या
अंधेरों का फायदा उठाने वाला
हौले से मेरे कंधे पर हाथ रख
रात कुछ गम्भीरता से बोली
नही कोई मिला तो नही
मगर
मै देख रही हूँ
सो रहे है लोग जागते हुए भी
सो गई है इंसान मेंं इन्सानियत
सो गया है उसका स्वाभिमान
सो गयी है नेक नियत
सो गया है देश समाज के लिये प्रेम
भाग रहे है सब सपनो के पीछे
सोते सोते
कैसे लाऊं ऐसे मे
मै नींद और ख्वाब
गर मैने भी सुला दिया सबको
तो सुलाना पडेगा ये देश
सदा सदा के लिए
जहाँ नही होगी गुंजाइश
ख्वाबों की
कि ख्वाब पूरा करने को तो
पडेगा जागना
इसलिए नही लाई कुछ भी
आज तेरे लिए
चलो आओ मेरे साथ
जगाए सोए लोगो को
ताकि हो सके सपने पूरे
उन लोगो के
जो सो गए हसते हसते
सदा के लिए
अपने प्यारे भारत की
सुकून की नींद और ख्वाब के लिए



