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बुधवार, 19 जून 2019

कोशिश का मूल्यांकन


मधुर अपने विघालय का एक सीधा सादा, होनहार छात्र और माता पिता का आज्ञाकारी बेटा था, इसी वर्ष उसके पिता अपने परिवार सहित गाँव से शहर नौकरी के लिये आये थे। जब उसके पिता को अपने साथ काम करने वाले लोगो से पता चला कि सिटी मॉन्टेसरी लखनऊ के चुनिंदा विघालयों में से है तो उन्होने मधुर का दाखिला वहीं कराने का निश्चय किया। शायद मधुर का भाग्य प्रबल था या उसके पिता की इच्छा शक्ति, मधुर की माँ को जहाँ बर्तन सफाई का काम मिला वह सिटी मॉन्टेसरी की प्रधानाचार्या का घर था। एक दिन जब दोनो पति – पत्नी ने उनसे हाथ जोड कर विनम्र निवेदन किय तो उन्होने कहा- वृंदा, वैसे तो दाखिले का फार्म भरने की तारीख निकल चुकी है मगर मै फिर भी तुम्हारे बेटे के लिये फार्म दे दूंगी मगर यहाँ केवल फार्म भरने से दाखिला नही मिलता, उसके लिये इम्तेहान पास करना होता है। अगर तुम्हारा बेटा वो इम्तेहान पास कर लेता है तभी उसको दाखिला मिलेगा। और फिर वृंदा के पति को तरफ देखते हुये बोली, कल सुबह स्कूल आ जाना, मै फार्म दिला दूंगी।
उस रात पति पत्नी दोनो ही स्वप्न लोक में विचरण करते रहे क्योंकि ना तो वहाँ जाने के लिये कोई टिकट लेनी पडती है और न ही गति का बंधन होता हैं, मधुर के माता पिता भी आकांक्षाओ के रथ पर सवार हो अपने बेटे के उज्जवल भविषय की कल्पना करने लगे किन्तु मधुर छोटा होते हुये भी हकीकत से परिचित था, वह जानता था कि यह कोई आसान काम नही था, और उससे शाम को घर आते ही पिता जी ने कहा था - बच्चा सात रोज है, खूब मन लगा के पढ लेओ, मैडम जी के स्कूल में दाखिला मिल गया तो जिन्दगी बन जाई। भले ही उसने सिटी मॉन्टेसरी का नाम नही सुना था मगर उसे पता था कि गांव के मुखिया जी का लडका जिसे सारे गाँव में सबसे तेज मना जाता था उसे पिछले साल मुखिया जी ने शहर के स्कूल में दाखिले के लिये पूरे छः महीने कोचिंग कराई थी, मगर फिर भी उसे कही दाखिला नही मिला था, और फिर उसे वही गाँव के स्कूल में भर्ती कराया गया था। फिर भी मधुर ने हार न मानने का निश्चय करते हुये अपनी पढाई शुरु की। वह अपने माता पिता की कोशिश को व्यर्थ जाने नही दे सकता था।
परीक्षा देने के बाद मधुर कुछ कुछ आश्वस्त तो था किन्तु पूर्णतया विश्वस्त नही। अक्सर वह अपनी माँ के साथ ही चला जाता था, व घरों में काम करते माँ का यथासम्भव हाथ बटाता था। परीक्षा के बाद का एक एक दिन सब लोग गिन गिन कर काट रहे थे। उसकी माँ रोज सोचती की आज बडी मैडम से वह पूछेगी कि परिणाम कब आया, मगर फिर सोचती कि कही उनको बुरा न लगे, वो जब आयगा तो खुद ही बता देंगी। आज जब वॄंदा काम करके घर जाने लगी तो अरुन्धती ने रोकते हुये कहा- वॄंदा आज तुम्हारे मधुर का रिजल्ट आ गया। बडी उत्सुकता से वॄंदा बोली मैडम जी मिल जायगा न मधुर को दाखिला। वॄंदा की आंखों में उभर आयी चमक को देखकर प्रिन्सिपल मैडम जो विघालय में एक तेज तर्राक, और हदयहीना महिला समझी जाती थी, यह साहस नही कर पा रही थी कि कैसे मै इस माँ और बच्चे की आशाओं के दिये को अपने निर्मम उत्तर से बुझा दूँ। तभी उस अनपढ वॄंदा को समझ आ गया कि उसके सपनों के पंख कट चुके है, बहुत धीरे से अपने बेटे के सर पर हाथ सहलाती हुयी बोली- मैडम जी क्या बहुत खराब परचा किया था मेरे बेटे ने। नही वॄंदा खराब नही किया था, तुम्हारा बेटा होशियार है, मगर हम अपने स्कूल के नियम नही तोड सकते, मघुर को परीक्षा में जितने नम्बर चाहिये था, उसमे एक नम्बर कम रह गया। तुम चिन्ता मत करो, मै किसी और स्कूल मे तुम्हारे बेटे का दाखिला करवा दूंगी। मधुर चुपचाप खडा बाते सुन रहा था, उसका मन भी निराश हो गया था, इस बात से नही कि वह परीक्षा पास नही कर सका था , उसे इस बात पर खेद हो रहा था कि उसने अपने माता पिता की कोशिश बेकार कर दी, तभी उसकी आंखे चमक उठी, वह प्रिन्सिपल मैडम थोडा निकट जा कर बोला- मैडम जी क्या आप एक नम्बर मेरी कोशिश को भी नही दे सकती। अरुन्धती उस बच्चे की बात का मतलब न समझ पाई- बोली बेटा कोशिश तो सभी बच्चे करते है न, मगर नम्बर तो कॉपी में लिखने के मिलते है न।
मधुर ने भी जैसे आखिरी तक हार न मानने का निश्चय कर लिया था- बोला जी मैडम जी आप सही कह रही है, मगर बहुत सारे बच्चों ने तो इस इम्तेहान के लिये कोचिंग की थी, उनमे से कई बहुत से अच्छे स्कूलों से पढकर भी आये थे, और मैडम जी अगर मै गाँव से एक महीने पहले भी आ जाता न, तो मै सच कहता हूँ, मै और अच्छे नम्बर ले कर आता। और फिर बिल्कुल रुआसा सा होकर बोला- मैडम जी मेरे पास तो पढने के लिये अच्छी वाली किताबे भी नही थी।
अरुन्धती अब तक समझ चुकी थी कि ये नन्हा सा मधुर उसे वो बात समझा चुका था जो वह स्वयं अपने जीवन के पचपन बर्षो से भी नही समझ सकी थी।
बस इतना बोली- वॄंदा तुहारा बच्चा वाकई होनहार भी है और समझदार भी, और ऐसे बच्चे को मै जरूर अपने स्कूल में पढाउंगी।

शुक्रवार, 14 जून 2019

बचपन



जीवन की आपाधापी में
बरसों के आने जाने में
बहुत कुछ बदलता है लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है
बदल जाते है, रंग खुशी के
बदल जाते है, संग सभी के 
बदल जाते है, चेहरे मोहरे
बदल जाते है, मन भी थोडे
मौसम के आने जाने में
जमानों के गुजर जाने में
दिन रात बदलते है लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है
बदल जाते है, रिश्ते नाते
बदल जाते है, दहजीज दुआरे
बदल जाते है,किस्मत के तारे
बदल जाते है, ख्वाब भी सारे
लोगो के आने जाने में
दुनिया के ताने बाने में
बदल जाते है रास्ते लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है
जीवन की आपाधापी में
बरसों के आने जाने में
बहुत कुछ बदलता है लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है

शुक्रवार, 7 जून 2019

ऊष्मा


आज एक बार फिर लिखने बैठा हूं। एक समय था जब लिखे बिना तो नींद ही नही आती थी। प्यार भी कितनी अजीब  चीज है। किसी को शायर बना देता है किसी को काफिर और एक मै था, मेरे जैसे ठीक ठाक कवि के हाथ से ऐसे कलम छूटी कि आज करीब तीस साल बाद उसे छू रहा हूं।  यूं ही एक दिन मैं एक गजल लिखने की कोशिश कर रहा था, और मुझे दिखा ही नही कि वसू कबसे आ कर बैठी है, वो आई भी और चली भी गयी। अगले दिन जब मै उससे कालेज में मिला तो उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था।और मै समझ नही पा रहा था कि वो किस बात पर अपनी नाराजगी दिखा रही थी, क्योकि मेरे हिसाब से मै कल उसका इंतजार करता रहा था, और वो आई नही थी। करीब एक हफ्ते तक उसकी नाराजगी खत्म न हुयी। मुझे लगा शायद किसी बात के कारन ही वो उस दिन मिलने भी नही आई, मुझे अपनी भूलने की आदत मालूम थी। इसलिये मै उससे किसी बहस में न उलझता था। अंत में बहुत मिन्नते करने के बाद उसने कहा- तुम या तो मुझे चुन लो या अपनी कलम को, फिर रो पडी और बोली अपने लिखने में तुम मुझे देखना तक भूल गये। ये भूल गये कि तुम मेरा इंतजार कर रहे थे तो फिर कैसे यकीन कर लू कि शादी के बाद अपनी जिम्मेदारियां याद रखोगे।छोटी सी मेरी गलती को उसने बहुत संजीदगी से लिया था, मै जाता था ये उसके प्रेम का ही रूप था। मैने उसे अपनी कलम देते हुये कहा- वसू आज से मेरे हाथों को सिर्फ तुम्हारे हाथ की जरूरत है। इन तीस सालों में कितनी ही बार वसू ने मुझे लिखने को कहा, किसी नाराजगी  के कारण नही मगर  मेरा कभी मन ही न किया, लिखने का। मुझे जिन्दगी भर इस बात पर अफसोस होता रहा कि जो गजल मै उसे खुश करने के लिये लिख रहा था वो उसके आसुओं की वजह बनी थी। मैने अपने अंदर के कवि को मारा नही था, बल्कि वो खुद ब खुद मेरे पास से चला गया था, जैसे तपती रेत में पानी गायब हो जाता है, वसू के प्रेम की ऊष्मा मे मुझे यह याद भी न रहा कि मेरा और कलम का कोई संबंध भी था।
मगर अपनी जिंदगी के आखिरी पल तक शायद बसू को भी ये बात सालती रही कि उसकी नाराजगी ने मेरी अंदर के कवि को दफन कर दिया, तभी उसने इस दुनिया से जाने से पहले मेरे हाथ मे वही कलम देते हुये कहा- नीरज मै जानती हूं तुम मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करते हो, मगर अब मेरे हाथो मे तुम्हारा हाथ थामने की सामर्थ्य नही बची। वादा करो मेरे बाद अपने हाथो मे इस कलम को मेरी जगह दोगे।
मै चाह्ती हूं तुम वो गजल पूरी करो जो तीस साल पहले अधूरी रह गयी थी। समय रहा तो इसी जहां में नही तो उस जहां से तुमको पढूंगी।
आज कहने को तो हाथ मे कलम है मगर हाथ अभी भी वसू की ऊष्मा महसूस कर रहा है।

रविवार, 7 अप्रैल 2019

मतदान करने से पहले कीजिये- थोडा होमवर्क



रितेशः ये बताओ इलेक्शन में वोटिंग करने के लिये छुट्टी अप्लाई की या नही?
संजीवः नही, क्यों तुम जा रहे हो क्या? मै तो नही जा रहा। अरे मेरे एक वोट ना डालने से क्या किसी की जीत या हार बदल जायगी। और फिर वोट के लिये क्यो करे एक सी. एल बेकार और क्यों करे आने जाने का खर्च। 
रितेशः हाँ, हो सकता है मेरे एक वोट डालने से कुछ भी बदले, मगर फिर भी ये बताओ क्या तुम सौ प्रतिशत विश्वास के साथ यह कह सकते हो कि तुम्हारे वोट डालने से कुछ भी नही बदलेगा?
संजीवः थोडा रुक कर सोचते हुये, हम्म कुछ हद तक तुम ठीक कह रहे हो, मगर इर भी यार कौन करे इतनी भाग दौड वो भी वोट डालने के लिये, वीकेंड के आस पास होता तो सोच भी लेता, बडा हैक्टिक हो जायगा।
प्रखर जो कैंटीन में रितेश और संजीव के साथ ही लंच कर रहा था, अपना टिफिन बाक्स पैक करते हुये बोलाअच्छा रितेश ये बताओ कि क्या तुमने वोट डालने के लिये तैयारी की है या बस यूं हे जा रहे हो?
रितेशः तैयारी, कैसी तैयारी मै कुछ समझा नही, अगर तुम ट्रैवल प्लानिंग के रिफरेन्स में बोल रहे हो तो नही,अभी तो नही किया, एक दो दिन में करा लूंगा।
प्रखरः नही, मै ट्रैवल प्लानिंग के लिये नही बोल रहा, मेरा मतलब है कि किसे वोट डालोगे ये सोचा है?
रितेशः इसमें सोचने वाली क्या बात है, मेरी फैमिली में सभी लोग हमेशा से एक ही पार्टी को वोट देते आये हैं उसी को इस बार भी दूंगा।
प्रखरः तब तो मेरा ख्याल है कि संजीव के वोट डालने और तुम्हारे डालने में कोई खास फर्क नही।
रितेशः (कुछ थोडी सी तल्ख आवाज में) क्या मतलब तुम्हारा, मै कुछ समझा नही।
प्रखरः एक बात बताओ तुम्हारे दादा जी ने जिस पार्टी को वोट दिया, उसी को हमेशा से तुम्हारे पिता जी वोट देते है , है ना
रितेशः हाँ
प्रखरः और उसी पार्टी को तुम्हारी मम्मी, तुम और घर के सारे लोग वोट देते हो।
रितेशः हाँ, तो इसमे गलत क्या है?
प्रखरः मगर अब मुझे ये बताओ, तुम्हारे दादा जी ने जिस व्यक्ति को वोट दिया क्या उसे ही तुम्हारे पिता जी और आज तुम उसी व्यक्ति को वोट देने जा रहे हो?
रितेशः ये कैसा मजाक हुआ? दादा जी के समय में जो चुनाव लडा, वो तो अब जीवित भी नही, और पिता जी ने जिसे वोट दिया वो भी अलग अलग लोग थे। लोग तो समय के साथ बदलते रहते है। भाई साफ साफ बोलो कहना क्या चाह रहे हो?
प्रखरः मै सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि माना ्यह जरूरी नही कि हमारे वोट से किसी पार्टी की सरकार बने या  बने है, मगर हमारे क्षेत्र में विकास के लिये डायरेक्टली वो व्यक्ति जिम्मेदार है जो हमारे क्षेत्र से चुनाव लडता है, वो ऐसा व्यक्ति होता है जो हमारे क्षेत्र की समस्याओ को सरकार तक पहुँचाने की कडी होता है, हमे अपना वोट डालने से पहले ये जरूर देखना और परखना चाहिये कि जितने भी लोग हमारे क्षेत्र की सीट से उम्मीद्वार है उनमे सबसे ज्यादा योग्य व्यक्ति कौन है, कौन हमारी समस्याओं के लिये संवेदनशील है, उनका हमारे लोगों के साथ कितना जुडाव है, वर्तमान सरकार द्वारा दी गयी कौन कौन सी और कितनी योजनाओं को सुचारू रूप से चलाने में उसने अपनी कितनी सहभागिता दी है। वर्तमान समय में जो सांसद हो उसके कार्यकाल के किये हुये कामों का आकलन करो। मै ये नही कहता कि पार्टी के पाँच सालो के कामों का आकलन या तुलना मत करो, वो भी करो। मगर सापेक्ष रूप से क्षेत्रीय विकास के लिये व्यक्ति की उसके चरित्र की उसकी योग्यता की ज्यादा आवश्यकता है।
माना पार्टी की जीत सरकार तय करती है, तो हर पार्टी के मैनीफेस्टों को भी देखना चाहिये, मगर सही व्यक्ति को जिता कर संसद तक पहुँचाना हमारी पहली जिम्मेदारी है। और अगर हमे लगता है कि कोई भी उम्मीदवार हमारी कसौटी पर नही उतर रहा तो नोटा का विकल्प भी हम चुन सकते है। 
हमारे वोट में इतनी ताकत भी है कि हम पार्टियों को मजबूर कर सकते है कि वह योग्य व्यक्तियों को ही टिकट दे। यदि पार्टी सही व्यक्तियों को ही टिकट दे, तो व्यक्ति की जीत के साथ साथ परोक्ष रूप से उस पार्टी की जीत तय हो ही जाती है।
रितेशः मै समझ गया तुम क्या कहना चाहते हो, सिम्पली यही कि वोट डालने से पहले थोडा होमवर्क कर लेना चाहिये।
प्रखरः थोडा मुस्कुरा कर, हाँ यही कहना चाह रहा था।
रितेशः मगर यार एक बात बता मै तो ये नही जानता कि हमारे क्षेत्र से कौन कौन उम्मीदवार है और इस समय कौन उस सीट से सांसद है।
प्रखरः क्या यार ये कौन सा मुश्किल काम है आज कल हर सांसद के कामो का लेखा जोखा बडी आसानी से नेट पर देखा जा सकता है, और तुम्हारे क्षेत्र से कौन कौन उम्मीदवार है, ये डाटा चुनाव आयोग सारे उम्मीदवारो के नाम तय होने के बाद नेट पर पब्लिश करता रहता है।
रितेशः वाह यार ये तो अच्छी बात कही तुमने। चलो ठीक है, मै तुम्हारी बात मान लेता हूँ
प्रखरः संजीव तुम्हारा क्या ख्याल है? क्या तुम जाओगे वोट डालने। वैसे एक और बात बताऊँ, वोट डालने के लिये स्पेशल लीव मिलती है, कोई संस्थान ये छुट्टी देने से मना नही कर सकता, तो  डोन्ट वरी की एक सी. एल चली जायगी।
संजीवः ठीक है मेरे भाई वादा रहा, मै भी अपना वोट डालूंगा, और वो भी विद होमवर्क
रितेशः ये बात हुयी , चलो फटाफट अपना काम खत्म करते है, फिर थोडा मुस्कुराते हुये और फिर अब तो होमवर्क भी तो करना है।

तो आप अपना वोट विद होमवर्क देंगे या विदआउट
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