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सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

पलाश के दोहे.........


सत्कर्मो की अग्नि मे, जब तपती मानुष देह |
काम क्रोध होते भस्म,  मिलती प्रभु की नेह ||


सच्चा धन बस प्रेम है, बाकी जग मे सब झूठ |

खर्च होय से बढत जाय, ना खर्च से जाय छूट ||

साथी वही जो साथ दे, रहे भले कभी साथ |
साथ से एकला तो भला, ना भला बाँह का नाग ||


वृद्ध जनों का आशीष है, सत्कर्मो का परिणाम |

श्रम बिन जामे घास ही, ना लगे बाग मे आम ||

भूल से भी हो भूल तो, बिन भूले भूल लो मान |
जलती बाती अभिमान की, बढे दिये का मान||


जब मोह घटे सामान से, और बढे परस्पर नेह |

सुख समृद्धि सम्बन्ध फिर, न तजे आपका गेह ||


मन का कहा बिन तोल ही, जो करता सारे काज |
चार दिन की हो चाँदनी, फिर लम्बी काली रात ||

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

अपने लिये


जाने कितनी रातें इस उधेड बुन में काट दी कि अपनी आज की स्थिति को अपनी नियति मान ही लूँ और परिस्थितियों से समझौता कर लूं   या फिर जिन्दगी को कम से कम उस स्थिति में तो लेकर आऊँ जहां पर उसे जिन्दगी तो कहा जा सके। लोगो के घरों के बर्तन घिसते घिसते शायद मेरे हाथो की लकीरें भी घिस चुकी थी। कभी सोचती और रोती कि आखिर मेरी तकदीर में है क्या? और जब रो कर चित्त शान्त होता तो सोचने लग जाती कि आखिर क्या लिख सकती हूँ अपनी तकदीर में?
बचपन से आज तक जो मिला उसको पूरे मन से स्वीकार किया्। काम को मैने उस तरह से लिया जैसे बच्चे खेल को लेते है। गन्दे बर्तन, झाडू, पोछा ये मेरे प्रिय खिलौने थे या बना दिये गये थे। बचपन पार कर जब जवानी कि दहलीज पर पहुंची तो उससे बहुत पहले यौवन का मौसम मेरे जीवन में एक आभासी झोके सा आकर जा चुका था। मेरे साथ की सहेलियां जब अपने भावी पति के सपने सजाती थी उस समय मैं, घर में दो वक्त की रोटी के जुगाड मे उलझी थी।
शादी मेरे जीवन के कोई त्योहार नही स्थानान्तरण की तरह आयी थी। सामान्यतः लोग कहेगें इसमे नया क्या है, शादी के बाद हर लडकी का घर बदलता है । मगर मेरे लिये ये मायके से  ससुराल जाना नही था, बदला था मेरा काम करने का घर। शादी के पहले – बिजली वाले सक्सेना जी का घर था, एक मोटे हलवाई का घर था और एक था मेरी टीचर दीदी का घर। और अब मेरे पास थे- चक्की वाले गुप्ता जी, एक वर्मा जी का घर, जिनके पागल बेटे से मुझे डर लगता था या उसे मुझसे कह नही सकती मगर रोज ही जाने से पहले सोचती थी - "हे राम वो सो रहा हो और मै काम निपटा कर निकल लूँ"। मुँह दिखायी में मुझे ये दो घर मिले थे। शायद हम जैसी लडकियों को यही मिलता होगा, शायद मेरी माँ और मेरी सास को भी यही मिला होगा, इसलिये ना मै खुश थी ना दुखी।
ना कोई बडी ख्वाइश थी ना कोई चाहत, ना जाने कहाँ से एक दिन खुद के बारे में सोच बैठी, बस यही से सब बदल गया। उस दिन मै वर्मा जी के घर से काम करके लौटी तो हाथ मे था महीने भर का पैसा और ऊपर से दिये गये १०० रुपये। कल उनके पागल बेटे का जनम दिन था, तो न्योछावर किया गया पैसा, अलाय बलाय सहित मेरे हाथ में दे दिया गया था। कहना मुश्किल था कि मै फायदे मे थी या नुकसान में। बहुत दिन से एक लिपिस्टिक का मन था सो खरीद लिया, और पूरे मन से रात में लगा कर पति के सामने आयी, इस उल्लास के साथ की आज की रात बहुत प्यार भरी होगी, मगर नही जानती थी कि पूनम की रात को एक पल मे अमावस मे बना देने की कला पति के पास होती है। आरोपो के सिलसिलो से छलनी हुये सीने को अगर कोई देख पाता तो निश्चित रूप से होठों पर लगी लाली नही हदय की पीडा का रंग नजर आता। मेरा पति जो कल तक मुझे सब कुछ समझता था , आज मुझे कितने ही अपशब्दों के अलंकारों से सजा चुका था। वो पति जिसे हर रात मैं परमेश्वर समझ कर उसके तन से शराब की आती दुर्गन्ध को भी उसका प्रसाद समझ कर माथे सजा लेती थी। मैने भी निश्चय कर लिया था कि किसी भी ऐसे प्रश्न का उत्तर नही दूँगी जिसको सुनने से मै इन्कार कर सकती हूँ, धीरे धीरे प्रश्नो की तीव्र और तीखी बौछार होती गयी और अन्ततः शब्दों के बाण जब पति देवता के लिये काफी नही रहे तो उसने प्रहार का विकल्प चुन लिया। भला कौन था यहाँ मेरी रक्षा को जब रक्षक ही भक्षक बन गया था, सो मै इसे भी प्रसाद की तरह स्वीकर करती गयी।
रो धोकर इस उम्मीद के साथ रात बीती कि हर रात का एक सबेरा होता है, शायद कल सब ठीक हो जायगा। मगर पति की कठोरता के बाद अभी शेष थी वक्त की निष्ठुरता। कितनी ही मनगढन्त कहानियां बना ली गयी थी मुझे चरित्रहीन सिद्ध करने के लिये और फिर दया का पात्र बनाते हुये मुझे घर पर रहने की अनुमति दी थी मगर पत्नी शब्द अब सिर्फ मेरी मांग मे सिन्दूर तक सीमित हो गया। पति के वक्षस्थल की नयी अधिकारिणी अब आ चुकी थी। उसको भले ही मुँह दिखायी मे दो घर मिले थे मगर उन घरों का जिम्मा मेरे ही पास आया था। मुझमें अब और शक्ति नही बची थी। स्त्री हो या पुरुष वह यही चाहता है कि उसका जीवनसाथी सदैव उसे प्रेम करे, उसके साथ रहे, विवाह का सम्बन्ध तन का कम मन का ज्यादा होता है, मन में किसी और की छाया का विचार मात्र ही उसे विचलित कर देता है। और यहाँ तो तन मन दोनो से ही मुझे पद्च्युत कर दिया गया था। अब मेरे पास दो ही रास्ते शेष थे - घर छोडूं या दुनिया। मेरे निर्णय से फर्क किसी को नही पडने वाला था। मगर, मै लाख दुख मिलने के बाद भी अपनी शाख से अलग नही होना चाहती थी।
इसी द्वन्द में जाने कितनी राते काट चुकी हूँ, हर रात सोचती हूँ कि कल भोर से पहले मै इस घर से दूर अपनी एक दुनिया बसाने की यात्रा शुरु कर दूंगी। पर मन हमेशा मेरे पैरो मे बेडिया डाल देती।

मगर आज अन्ततः, आज मैने अपनी नयी यात्रा शुरु कर दी, अपनो के बिना अपने लिये। अब ठीक किया या गलत नही जानती, बस इतना जानती हूँ किसी को दुःख नही दे रही अपने को सुखी करने के लिये..................

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

मातृभाषा की शिक्षा संस्कार में उपयोगिता एवं महत्व


मातृभाषा को समझने से पहले समझना होगा भाषा को, भाषा किसे कहते हैं? विचारों और भावनाओं को आदान प्रदान करने का माध्यम है भाषा। विचारों की अभिव्यक्ति कभी शब्दों के द्वारा की जा सकती है कभी सांकेतिक। इस प्रकार से भाषा को दो रूपों मे समझा जा सकता है। प्रकृति में भाषा का प्रयोग केवल मनुष्य मात्र ही नही करते, वरन पशु , पक्षी, यहाँ तक की नदी, झरने, हवा सभी की अपनी एक भाषा है। सुनने समझने की शक्ति रखने वाले मनुष्य शब्दो की भाषा का प्रयोग करते हैं जबकि सांकेतिक भाषा का प्रयोग वह करते हैं जिनमें समझने की तो शक्ति होती है मगर सुनने की क्षमता का अभाव होता है। बहुत सी भाषा के जानकार लोगों के अनुसार जन्म के साथ ही, एक शिशु जिस प्रथम शब्द का उच्चारण करता है वह है माँ, इससे यह समझा जा सकता है कि दुनिया की ज्यादातर हर भाषा में या तो यह शब्द उपलब्ध है या यह पूर्ण रूप से एक प्राकृतिक शब्द है। वो भाषा जिसे सुन कर व्यक्ति विचारों की अभिव्यक्ति करना सीखता है, वह उस व्यक्ति की मातृभाषा कहलाती है। इस बात से यह अभिप्राय निकलता है कि किसी भी विचार या तथ्य को सबसे अधिक सुगमता से किसी व्यक्ति को उसकी मातृभाषा में समझाया जा सकता है। भारत एक विविधताओं का देश है। यहाँ बहुत सी संस्कॄतियों का संगम है। संस्कॄति और मातॄभाषा का बहुत निकट सम्बन्ध है। संस्कॄति के आदान प्रदान में भाषा की अहम भूमिका है। भारत के संविधान में भी भाषा को बहुत आदर का स्थान प्राप्त है। संविधान मे २२ भाषाओं को स्थान दिया गया है जो देश के विभिन्न प्रदेशों में बोली जाता हैं। शिक्षा में भाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। ज्ञान का माध्यम यदि मातॄभाषा हो तो विषय को आसानी समझा जा सकता है किन्तु आज हमारे देश में मातृभाषा को किस तरह जबान से, चलन से, गायब कर अंग्रेजी को मातृभाषा बना दिये जाने की पूरी कोशिश की जा रही है।
आज यह सिध्द हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के विकास में ज्यादा सहयोगी है। अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक परिवेश से आये विघार्थियों में किसी भी विषय को समझने की क्षमता समान नहीं होती। अंग्रेजी में पढ़ाए जाने पर उनके लिये यह एक अतिरिक्त समस्या बन जाती है – विषय ज्ञान के साथ भाषा का ज्ञान। भाषा सीखना अच्छी बात है और लाभदायक भी है। भाषा हमें नये समाज और संसार से जोडती है। लेकिन मातृभाषा की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से बलपूर्वक हटा कर अन्य भाषाओं को विशेष स्थान देना निश्चित ही उचित नही।
जापान, रूस जर्मनी जैसे देश आज हम सबके लिये उदाहरण है जिन्होने भाषा की शक्ति से ही स्वयं को विश्व पटल पर स्थापित किया। अक्सर देखा जा सकता है छात्र छत्तीस नहीं समझते मगर थर्टीसिक्स बोलो तो समझ जाते हैं। नवासी और उन्यासी में तो बडे बडे लोग अक्सर सोच में पड जाते हैं। किसी भी भाषा से शब्दों का लेन देन कोई गलत नही। हिन्दी में उर्दू, फारसी, संस्कृत सहित कई लोकभाषाओं के बहुत सारे शब्द हैं जिनका बहुत से जानकार भी आज विभेद नही कर पाते उदाहरण के लिये – आवाज, शुरुआत, दौरा इत्यादि। अंग्रेजी के भी ढेरों शब्द हैं। डेली, रेलगाड़ी, रोड, टाईम शब्द हिन्दी के हो गए हैं। ई-मेल, इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटॉप, फेसबुक आदि शब्द हिन्दी में चल निकले।  धन अर्जन के लिये यदि हम दूसरे प्रान्त या देश जाते हैं तो वहाँ के लोगो के साथ सम्बन्ध पूर्वक जीने के लिये उनकी भाषा को सीखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये। लेकिन उसके लिये अपनी मातृभाषा को छोड देना किसी भी परिस्थिति में सम्मान जनक नही।
आज विश्व में मातृभाषा के महत्व को समझा गया है। शायद तभी २१ फरवरी को विश्व मातृभाषा देवस के रूप में स्थापित किया गया।  मातॄभाषा मानव से मानव को जोडने का सबसे सुगम साधन है। हमे केवल अपनी ही नही वरन सेभी की मातॄभाषा का सम्मान करना चाहिये जिससे एक सुदॄढ और स्वस्थ समाज की स्थापना की जा सके।
** चित्र के लिये गूगल का आभार 

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

गुनाह



माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हम कल ही यहाँ से चल देंगें है, इससे तो बहुत भला है अपना इंडिया। हम आ रहे हैं माँ। कहते हुये राधिका का फोन कट चुका था। मगर अनुसुइया जी के सामने तीन महीने पहले का दृश्य एक बार फिर से घूम गया।
राधिका अनुसुइया जी की एक मात्र संतान थी, उन्हे पालन पोषण में कभी इस बात पर विचार भी नही आया कि यह पुत्र है या पुत्री। लम्बे समय से वैधव्य का दंश झेल रही अनुसुइया जी के लिये वह जीविका का सहारा थी यह कहना गलत ही था किन्तु भावनात्मक रूप से वह उस पर पूर्ण निर्भर थीं।
दो साल पहले उन्होने राधिका की शादी बहुत धूम धाम से अपने ही समाज के एक प्रतिष्ठित परिवार में की थी। उनका मानना था कि विवाह करने के लिये दो चीजों का मेल खाना बहुत जरूरी है- एक लडके लडकी की कुंडली और दूसरा – लडके लडकी का कार्यक्षेत्र। विवेक, राधिका की ही तरह पेशे से डक्टर था।
दोनो की खुश गृहस्थी को देख वह सन्तुष्ट थी। विवेक भी घर का दामाद ना होकर बेटा ही था।  कोई एक पाँच छः महीने पहले राधिका के परिचित में कोई सउदी अरब चला गया था, प्रेक्टिस करने के लिये। उस दिन से तो राधिका के सिर पर भी सउदी जाने का भूत चढ गया था। पहले तो विवेक ने उसे खूब समझाया कि हम लोग यहाँ बहुत खुश हैं, सभी अपने हैं यहाँ और फिर माँ के लिये  तुम्हारे सिवा उनका कौन हैं, वगैरह वगैरह। मगर राधिका तो जैसे अपनी ही धुन में थी। एक दिन विवेक राधिका के साथ अनुसुइया जी के घर आया, और सारी स्थिति से अवगत कराया। माँ ने भी अपनी यथाशक्ति उसको समझाने की कोशिश की मगर राधिका टस से मस ना हुयी  और बोली- माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हमे जितनी जल्दी हो यहाँ से चल देना चाहिये, विवेक हमने सारी तैयारी कर ली है और प्लीज माँ की चिन्ता तुम मत करो, मै सब कर लूंगी। और वैसे भी मैं माँ पर डिपेंड हूँ, माँ मुझ पर नही क्यो माँ ठीक कहा ना , कहते हुये उसने लाड से माँ की गोद में अपना सिर रख दिया। अनुसुइया जी ने भी प्यार से उसका माथा चूमते हुये कहा – हाँ बेटा ये बिल्कुल ठीक कह रही है। तुम लोग मेरे लिये क्यो परेशान होते हो। आज कल के जमाने में क्या मुंबई क्या सउदी सब बराबर है। अनुसुइया जी जानती थी कि उसकी पुत्री किसी भी तरह मानने वाली नही मगर वो भविष्य भी साफ साफ देख पा रहीं थीं, फिर भी उन्होने चलते समय समझाने की अपनी एक आखिरी कोशिश की थी, किन्तु शायद राधिका के कान शब्द तो सुन सकते थे मगर शब्दों के पीछे छिपे भावों को समझने के सारे दरवाजे वो बन्द कर चुकी थी।
मन ना होते हुये भी विवेक राधिका के साथ एक हफ्ते के भीतर ही सउदी चला गया। राधिका की बातें सुनसुन कर वो खुश थीं कि अच्छा हुआ उन्होने अपनी बेटी का मन नही मारा। मगर कुछ ही दिन बाद सब धीरे धीरे बदलने लगा। राधिका वहाँ पर महिलाओं की स्थिति से रोज दो चार हो रही थी। मगर खुद को समझा लेती थी कि मुझे इन सबसे क्या। मेरे पास मेरा काम है, मेरा घर है और इस सबसे बढ कर हर परिस्थिति में साथ देने वाला उसका पति विवेक है। वो अक्सर खुद ये विवेक से कहती- विवेक आप ही मेरी माँ को मना सकते थे, अगर आप साथ न देते तो तो मां      कभी आने नही देतीं।
मगर तीन दिन पहले जो हुआ उसके बाद राधिका किसी भी तरह जल्द से जल्द अपने देश आने को व्याकुल होने लगी। दरअसल, तीन दिन पहले राधिका के पास एक महिला आई थी, अपने गर्भ का पता करने। एक बार में राधिका ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो वह गिडगिडा कर बोली- आप मेरी जान बचा सकती हैं, अगर मेरे गर्भ में लडकी हुयी तो मेरे शौहर मुझे मार देंगे। उसकी बात सुन कर मेरे मन में कुछ आता इससे पहले वह बोली – अगर ये लडकी हुयी तो मैं इसे जन्म नही दूंगी। कुछ भी करके इसको दुनिया में नही आने दूंगी। मै हैरान थी कि क्या कोई माँ ऐसी भी हो सकती है? मैने उससे डॉट कर कहा – तुमको शर्म नही आती, तौबा करो, तुमको ऐसा गुनाह करने से डर नही लगता, कुछ तो अपने खुदा का खौफ करो। तुरन्त निकल जाओ यहाँ से वरना मै पुलिस को बुला दूंगी। वो रो रो कर कहने लगी – हमको पता है हम कोई गुनाह नही कर रहे, हम बेगुनाह है। मैं लगभग चीख सी पडी और उसको तुरन्त जाने को कहा। थोडी देर बाद मेरी नजर पास ही खडी एक नर्स पर पडी, ठीक से तो नही कह सकती कि वो अभी आयी थी या उसने मेरी उसकी बातें सुनी थी। रात को घर जाने से पहले वह मेरे पास आकर बोली- मैडम आप उसकी जान बचा सकती थी। मैने कहा- समीरा बी आप ये कह रही हैं ,सुना था आपने वो क्या कह रही थी। थोडी संजीदा होते हुये समीरा बोली- आप यहाँ के बारे में कितना जानती हैं, ये औरत जिसको अपना शौहर कह रही थी दरअसल वो उसका शौहर है ही नही, वो है लडकियों का सौदागर, ये दूसरे दूसरे मुल्कों से मजलूम लडकियों को जाता है, उनसे निकाह करता है, और फिर अगर लडका हुआ तो ठीक अगर लडकी हुयी तो, औरत को मार दिया और लडकी को अनाथाश्रम के रास्ते उसको अनाथ बताते हुये पहुँचा दिया बाजार। मैडम जी वो जानती थी कि अगर बेटी हुयी तो उसकी जिन्दगी में मरना तो तय है, चाहे जन्म से पहले मरे या जन्म के बाद रोज मर मर कर जिये और एक दिन फिर उसी की तरह किसी लडकी को जन्म देकर मर जाय।
रात भर मैं परेशान रही ये सोच कर कि मैने सही किया या गलत, क्या उसका औरत होना कुसूर था? क्या वो यहाँ से भाग नही सकती? क्या वो पुलिस की मदद नही ले सकती थी? बडी मुश्किल से सो पायी थी उस रात। सुबह देर से नींद खुली, विवेक अस्पताल जा चुके थे, मेरा सिर भारी हो रहा था, सोचा एक कप चाय पी लेती हूँ, चाय बना कर टेलीविजन ऑन किया, न्यूज का जो सीन मेरी आँखों के सामने था उसे देखकर हाथ में आ गयी मेज को अगर कस कर पकड ना लिया होता तो चक्कर खा कर गिर ही जाती। बीच बाजार में दो लोगों ने, पुलिस वालों की मौजूदगी में एक महिला का सरेआम कत्ल कर दिया था। न्यूज वाले बता रहे थे, उस पर अपने गर्भ में पल रही लडकी को मारने का इल्जाम था। और इसी कत्ल की उसे सजा दी गयी थी।

मेरी आँखो के सामने उसकी गिडगिडाती तस्वीर घूम रही थी जो रो रो कर रह रही थी- मैडम जी मैं बेगुनाह हूँ। तभी राधिका को माँ की याद आयी- बेटी माना अपने देश में पैसा खूब नही पर मान बहुत है। दूसरे ही पल उसके हाथ में मोबाइल था जो माँ के नम्बर को स्क्रॉल रह रहा था। 


* Image is referred from google.  and story is based on imaginations, if something match with any reality then it will be a purely coincidence.  my aim is not to heart anyone.

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

बहारें फिर आयेंगी


क्या होगा कुरेदने से, स्मृतियों के पल
कुछ दबी आंधियां, तूफान बन जायेंगी

जितना भी तय करेंगें, वो बीता सफर
वापसी में तय हैं, कडवाहटें भी आयेंगी

याद ना कर उसे, जो दर्द का कारन था
आप उम्र भर उसे, माफ न कर पायेंगी

कुछ कदमों की आहटें हैं, प्रतीक्षा से परे
अतिथि सा भी उसे, स्वागत न दे पायेंगी

जीवन नही, सिर्फ स्वप्न पूर्ण करने को
कुछ बातें हमेशा ही, अधूरी रह जायेंगी

खुश रहने का तरीका, सुझाती है पलाश
पतझड को कर विदा, बहारें फिर आयेंगी

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

मेरे शब्द, मेरी कही

नही चाहत मुझे, किसी तारीफ के पुलिन्दे की
हम वो सोना हैं जो, तपती आग में निखरता है

क्या मिटाओगे उसे, जो खुद को मिटा बैठा है
हम वो मिट्टी हैं जो, बीज को फसल करता है

कठिन नही समझना मुझे, कोशिश तो करिये
हम वो पन्ना हैं जो, तेरा ही कहा लिखता है

नही लगता साथ टूटने में, पलभर का समय
हम वो रिश्ता है जो, काँच सा दिल रखता है

मेरी क्षमताओं को परखना, कुछ तो कम करिये
हम वो किनारा हैं जो, लहरों पे नजर रखता है

न खोजना मुझे गहरे सागर में, मोती की तरह
हम वो धागा है जो, मोतियों में छुपा रहता है

बहुत आसां है मुझे अपनाकर, अपना कर लेना
हम वो पानी हैं जो, हर रंग को ओढ लेता है
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