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बुधवार, 15 जुलाई 2020

मासूम शिकायत


सुबह के काम निपटाकर नाश्ता लेकर बैठी थी, एक हाथ में चाय का कप और दूसरे में टीवी. का रिमोट था, टीवी ऑन करने ही जा रही थी कि तभी किसी की आवाज सुनाई दी, डोरबेल की आवाज नही थी, फिर भी लगा शायद सूरज वापस आ गया हो, डाइनिंग टेबल से मेन गेट की तरफ उठी ही थी, कि फिर आवाज आई- अरे आप कही जाओ नही, बाहर कोई नही आया, हम यही हैं, बहुत दिन से हम लोगो को आपसे बात करने थी, मै इधर उधर देखने लगी कि आवाज आ कहाँ से रही है, घर में तो मेरे सिवा कोई है ही नही, बिट्टू स्कूल में है, अमित ऑफिस में, बाऊ जी शुक्ला जी के यहाँ गए हुये हैं और सूरज को पंसारी की दुकान भेजा हुआ है। तभी मेरी नजर चाय पर रखे कप पर पडी- ऐसा लगा जैसे वो कप नहीं कोई छोटा सा लडका है, वो फिर बोला- प्लीज आप यहीं बैठिये, और मेरी बात सुन लीजिये। मै बैठ गयी, मैने कहा , हाँ हांं बताओ न क्या कहना है? उस कपनुमा बच्चे ने कहा- आप कुछ दिन पहले जो नई क्राकरी वाली अलमारी लाई है ना, मुझे वहाँ जाना है, आप रोज मुझे उसी पुरानी अलमारी में बिठा देती हो, जबकि मै कबसे आपके साथ हूँ, और सर जी कल ही जिन नये कप प्लेटों को लाये आपने उनको वो नई वाली अलमारी दे दी। तभी टेबल पर रखे नमकीन के डिब्बे से आवाज आई- आप हमको हमेशा ही बस नमकीन खिला देती हो, कितने सालों से मैने कुछ और खाया ही नही, और कल जब सर जी सुन्दर वाले विलायती डिब्बों को लाये तो आपने तुरन्त उनको महंगे वाले ड्राईफ्रूट्स दे दिये। हम लोगों के साथ ऐसा पक्षपात आप क्यों करती हैं। मेहमानों के सामने भी आप हम लोगों को नहीं जाने देती। हमलोग सुन्दर नही हैं ना, इसीलिये आप ऐसा करती हैं, किसी भी त्योहार में भी आप हम लोगों को पुरानी वाली अलमारी में अन्दर बन्द कर देतीं हैं। क्या हम आपको बिल्कुल भी पसन्द नहीं हैं। तभी उस कप में मुझे सूरज की छवि नजर आने लगी। दो साल पहले मेरी कामवाली की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी, उसके एक यही बच्चा था, पति पहले ही कैंसर से मर चुका था, तो हम और अमित उसको घर ले आए थे, आज करीब दस ग्यारह साल का था, घर के छोटे मोटे काम में मेरी मदद कर देता है। मुझे लगा जैसे परोक्ष रूप से सूरज मुझसे कह रहा हो कि आप हमेशा ही मुझे बिट्टू भइया के पुराने कपडे देती हैं, प्लीज इस दीवाली मुझे भी नये वाले कपडे दे दीजिये न। मै तो आपके बहुत सारे काम करता हूँ ना। प्लीज बताइये, आप दे देंगी ना।

बुधवार, 8 जुलाई 2020

आओ शायरी सीखें- आर. एस. बग्गा जी


आर. एस. बग्गा जी का नाम शायरी एवं गजल के क्षेत्र में आज किसी परिचय का मोहताज नही, और मेरी कलम में इतनी ताकत भी नही कि उनके बारे में लिख सकूं। उनके महान व्यक्तित्व को कलमबद्ध करने कें लिये मेरी ये अल्पमति पर्याप्त नही। फिर भी साहस करके कुछ शब्दों के माध्यम से आप के लिये दो शब्द लिख रही हूँ।
आप एक उम्दा शायर के साथ साथ नेक दिल के मालिक भी हैं। आपको व्यक्तिगत रूप से तो नही जानती किन्तु आपकी गजलों से आपकी शख्शियत बयां होती है। छोटी छोटी सी बातों, जज्बातों, घटनाओं का, आपका मन चिन्तन करता है। खुशमिजाजी का नूर आपके चेहरे को और भी रौशन करता है, और प्रेरणा भी देता है, कि परिस्थितियां कैसी भी हो, खुश रहना स्वयं पर ही निर्भर करता है।
आपके शब्दों में आप-
लाख अटकाओ रोड़े कहां टलूंगा
मैं अपने बनाए रास्तों पे चलूंगा
मुश्किल राह और दूर सही मंज़िल
कभी तो पहुंचूंगा जो चलता रहूंगा
मौजूदा समय में, अक्सर लोग फेसबुक पर यह शिकायत करते रहते है कि – उनकी लिखी कविता या गजल फलां व्यक्ति ने अपने नाम से लिख कर पोस्ट कर दी है, और फिर उसपर एक लम्बे समय तक टीका टिप्पणियों का दौर चलता है, ऐसे मसले पर आप क्या सोचते है के जवाब में आप सिर्फ मुस्कुरा कर कह देते है- चलो अच्छा है, अपना लिखा लोग पसंद करने के साथ साथ वायरल भी कर रहे हैं।
अच्छे शायर होने के साथ साथ आप एक अच्छे गायक भी है। आपको निम्नलिखित लिंक के माध्यम से हमे सुनने का अवसर मिला।
आपकी दो पुस्तकें- “अनछुये अल्फाज और अनछुये अहसास” भी प्रकाशित हो चुकी हैं।


आपकी पुस्तकें
आप कितने अपनेपन के साथ लोगों को अपने साथ जोड लेते हैं, यह हमें आपकी क्लास- “आओ शायरी सीखे- भाग १” में देखने को मिला, जो आपने हाल ही में जूम पर ली, जिसमें करीब सौ लोगों ने भाग लिया। आजके समय में जब लोग थोडा बहुत लिख कर स्वयं को बडा दिखाने की राह में चल रहे है, आप उस भीड से बिल्कुल अलग होकर, लोगों को लिखने के लिये यह कह कर प्रेरित करते हैं, कि शायर तो हम सबके अंदर है, जैसे जमीन के अंदर हर जगह पानी, और यह कह कर हौसला देते हैं कि ” जैसे हम यह नही जानते कि पानी कितनी गहराई में मिलेगा यह ठीक ठीक नही कहा जा सकता उसी तरह ये तो नही बताया जा सकता कि अच्छा शायर कोई कितने दिन में बन सकता है, मगर प्रयास से कोई भी अच्छा शायर बन जरूर सकता है।“
आपने फेसबुक “शायरी के आशिक “ नाम से एक ग्रुप भी बनाया है जिसका उद्देश्य नये गजलकारों को प्रोत्साहन देना है।
फेसबुक पेज - शायरी के आशिक
 आपकी क्लास “ आओ शायरी सीखे – भाग १” के कुछ अंश एवं महत्वपूर्ण बिंद आपके समक्ष आपके ही शब्दों में रखने की कोशिश कर रही हूं।
भाव और शब्द शायरी के दो महत्वपूर्ण अंग हैं।  हाँ भावों की महत्ता शब्दों से कुछ ज्यादा है। वो शायरी अक्सर लोगों का दिल छू लेती है, जिसमें पढने वाले को अपनी ही कहानी अपनी ही बात मिलती है। उसे लगता है कि हाँ वो भी ऐसा ही महसूस करता है। शायरी के लिये कुछ निम्नलिखित जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिये-

1.   अवलोकन (Observation)
2.   साहित्य पठन पाठन( Literature Reading)
3.   दूसरे शायरों को पढना व सुनना(Reading or listening other good poets)
4.   काफिया खोजना
5.   शायरी को जीना(Live the Poetry)
6.   फिल्मी गीतों की धुन पर शायरी 
7.   चित्रों पर आधारित शायरी (shayari on picture)

आप गजल की बारिकियां समझाते हुये
 १.     अवलोकन (Observation)
शायरी लिखने से पहले यह बहुत जरूरी है कि हम अपने आस पास की घटनाओं को गौर से देखें। उनके बारे में कुछ चिन्तन करेण। जैसे सूरज रोज उगता है, रोज डूबता है। एक सामान्य व्यक्ति डूबते सूरज को देख कर सोच सकता है कि ओह सूरज भी डूब गया, कितनी देर हो गयी, आज तो बहुत देर हो गयी, और जल्द से जल्द घर लौटने की कोशिश में कुछ और तेजी से अपने कदाम बढा सकता है।
मगर एक शायर के दिल में कुछ ऐसे ख्याल भी जन्म ले सकते हैं,
“बात अभी बाकी है, शाम अभी बाकी है
अभी न जाओ दूर, अभी तो कहानी बाकी है”
किसी और शायर के जेहन में आ सकता है कि
ऐ बन्दे चूम ले कितना भी आसमां, जाना है तयशुदा
इस रस्मों रिवाज से, ना तू जुदा ना है ये सूरज जुदा
या कोई अपनी शायरी से यह समझा सकता है कि हमे प्रेकॄति के नियमों को समझना चाहिये, उनको मानना चाहिये, जैसे सूरज भी उसके नियम से बंधा है, वो ना उगने से इन्कार करता है न डूबने से । वो नही कह सकता कि आज मन नही है मेरा,आज नही जाना मुझे, या थोडी देर बाद चला जाऊंगा, अभी नींद आ रही है।
कायनात के उसूलों से, कैसा शिकवा कैसी शिकायत
देखिये हर दिन सूरज कर रहा, डूबकर उसकी इबादत
दुनिया में एक चीज, एक घटना, एक दॄश्य को देखने के बहुत सारे नजरिये हो सकते हैं। हम जैसा भाव रखेगे, वैसा हम देख सकेंगें।
इस अनन्त दुनिया में अनन्त चीजें हैं, अनन्त भाव हैं। ये भाव ही हमारे दिमाग में अंकित होते रहते हैं। जो शायरी लिखते समय इनपुट का काम करते हैं।
२.     साहित्य पठन पाठन
अवलोकन के बाद, आता है साहित्य। अगर हम अच्छा लिखना चाहते हैं तो हमे हर दिन पढना भी चाहिए। पढने से नये नये शब्द आपके दिमाग में बसते जाते हैं, और जब हम लिखने बैठते हैं, तब ये शब्द हमे मदद करते हैं। एक अच्छा पाठक ही एक अच्छा शायर बन सकता है। शब्दों के अभाव में भावों को ठीक वैसा ही लिखना मुश्किल हो जाता है, जैसा हम महसूस कर रहे होते हैं।पढने से खुद ब खुद ही हमारा शब्दकोष बढता जाता है, और लिखते समय हमारी शब्द चयन की समस्या धीरे धीरे कम होती जाती है।
३.     दूसरे शायरों को पढना व सुनना
लिखना कोई मैकेनिकल काम नही, यह प्राकॄतिक होना चाहिये। पढने से शायरी हमारे अवचेतन्न मन(subconscious mind) में रहती है। हाँ, लिखते समय हमे इस बात का बेहद ख्याल रखना चाहिये कि हम दूसरे शायरों की नकल या अंदाज न पकडे। हम दूसरे शायरों के लिखे जज्बात ले सकते हैं, शब्द ले सकते हैं, मगर लिखना हमे अपने शब्दों में चाहिये। कही ऐसा न हो कि हमारे लिखने में किसी और की शायरी की स्पष्ट झलक दिखे। ऐसा करने से हमारे लिखे का वजन खुद ब खुद कम हो जाता है। हमे शायरी को जीना सीखना चाहिये। हर समय अपने जेहन में शायरी का मीटर ऑन रखे। जब भी हमारे दिल दिमाग में कोई ख्याल उसको कागज पर या अपने मोबाइल के नोट्पैड में हम लिख ले, फिर समय मिलने पर उसको शायरी मे ढाल ले।
आप अपना एक अनुभव साझा करते हुये कहते हैं- एक बार मै अपने परिवार के साथ समुद्र तट पर घूमने गया। देखा पानी में चांद की छवि पड रही है। तभी बरसों पहले का एक और दॄश्य याद आया जब सडक के किनारे कोई आदमी शराब के नशे में धुत पडा था, और आते जाते लोग उसकी इस हाल में देख कर हंस कर निकल जा रहे थे। इस दोनो घटनाओं को एक साथ जोडकर कुछ यूं लिखा -
“कल शायद फिर सितारों से लडा था,
नशे में धुत चांद समन्द में पडा था”
इसलिये जरूरी नही कि हम जो देखे, जो सोचे, उसको तुरन्त ही शायरी में ढाल ले। कई बार किसी ख्याल को बरसो बरस लग जाते है, शायरी की शक्ल मिलने में।
४.     क़ाफ़िया खोजना
क़ाफ़िया शब्दों का लयबद्ध स्वरूप है। यह शेर के आखिरी शब्द/शब्दों (रदीफ़) से बिल्कुल पहले होते हैं, जिसे हिन्दी में तुकान्त, अंग्रेजी में राइम, कह सकते है। जिसको बोल चाल की भाषा में कहा जा सकता है मिलती जुलती आवाजों वाले शब्द।
जैसे इस गजल में क़ाफ़िया है आया, पाया, आजमाया, बुलाया....
दिल कभी बस में ये आया ही नहीं
चाहता है वो जो पाया ही नहीं
सोच के उनको कहीं हम खो न दें
हम ने उनको आज़माया ही नहीं
वो नहीं आये हमारे मरने पे
कहते हैं उनको बुलाया ही नहीं
मान जाते हम , मनाता जो हमें
उसने फिर हमको मनाया ही नहीं
पास होती ' राज ' दौलत तेरे भी
तूने पर सर को झुकाया ही नहीं

गजल – एक गजल में कम से कम पांच शेर होते हैं, सामान्यतः पांच, सात, नौ हो सकते हैं।
एक शेर दो पंक्ति का होता है। हर दो पंक्ती मे अलग अलग भाव हो सकता है । या यूं कहा जाय कि
हर दो पंक्ति अपने आप मे एक कविता होती है । वो गजल जिसमें हर शेर एक ही विषय पर आधरित होते हैं उसे मुसल्सल गजल कहा जाता है।
इसलिये गजल लिखने की शुरुआत पहले एक शेर से करनी चाहिये। इसके बाद उस शेर के क़ाफ़िये पर ध्यान देना चाहिये, और उससे मिलते जुलते शब्द खोजकर नोट कर लेने चाहिये। जैसे
“कल शायद फिर सितारों से लडा था,
नशे में धुत चांद समन्द में पडा था”
इसमें क़ाफ़िया है- पडा था, तो इससे मिलते जुलते शब्द हो सकते हैं - अडा था, जडा था, चढा था
तो दूसरा शेर लिखा जा सकता है
“जानत था वो जाबाज कि मौत यकीनी है,
फिर भी वो लडने की जिद पर अडा था।“
इस तरह अलग अलग भावों पर अलग अलग शेर लिखे जा सकते हैं।
५.     शायरी को जीना(Live the Poetry)
शायरी एक दो घंटे बैठ कर सोच कर लिखने वाला काम नही, शायरी जीने का अंदाज है। इसे जीवन में शामिल करना चाहिये। अपने लोगों के साथ इसे बांट कर उनकी राय लेनी चाहिये।इससे हम अपने लिखने में सुधार कर सकते हैं

 अपनी रोजमर्रा की बात चीत में हम इसको शामिल कर सकते हैं। समान्य तरीके से हटकर हम अपने बातचीत के ढंग में शायराना अंदाज ला सकते हैं, जैसे अगर हमे अपने किसी दोस्त से कहना हो कि आज मौसम काफी अच्छा है, कुछ हो जाय,

उसे शायरी में ढाल कर कुछ इस तरह भी कहा जा सकता है-
यार मौसम तो आज बेमिसाल है
थोडी थोडी पी जाय क्या ख्याल है
अगर हमे कहना है- बहुत भूख लागी है, कितनी देर में खाना मिलेगा। हम उसी बात को शायरी में पिरो कर कह सकते हैं-
मेरे पेट के चुहे जब मर जायेगे
हुजूर क्या तब आप खाना बनायेगे
आप अगर खाना बना रही हैं और उसमें अभी देर है, तो आप कुछ ऐसे अंदाज से भी कह सकती हैं-  
आपकी भूख तो इकदम जग जाती है
खाना बनाने मे तो देर लग जाती है
इस तरह का अभ्यास शायरी लिखने में काफी मददगार हो सकता है, दूसरा हमारी हिचक भी खुल जाती है।
६.     फिल्मी गीतों की धुन पर शायरी 
हम फिल्मी गीतों की धुन पर भी लिखने की कोशिश कर सकते हैं। जो भी गीत पसंद है उसे सुनिये,
और उसकी धुन को याद रखिये, उसके शब्द भूल जाइये। और फिर उस धुन पर लिखने की कोशिश कीजिए।ऐसा करना हमारे उत्साह को बढा देगा। जैसे
सुहाना सफर और ये मौसम हंसी,
हमे डर है हम खो ना जाये कही
हम लिख सकते है-
वफा गर नही, तो जफा ही सही
खफा गर हैं, तो खफा ही सही
या “बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है “ की धुन पर लिखा जा सकता है-
मुझे तो दर्द से अपने, उबरना ही नही आया
तुझे तकदीर ये अब तक, संवरना ही नही आया
इस तरह से लिखने से आपको लगेगा की आप भी गीत लिख सकते है, आपमे एक अलग ही लेबल का कॉन्फीडेन्स आयगा।
7.    चित्रों पर आधारित शायरी (shayari on picture)
हम गूगल पर कोई भी विषय डाल कर एक ही विषय से सम्बन्धित अलग अलग तरह के चित्र देख सकते हैं, जिनमें अलग अलग भावों को दर्शाया गया हो जैसे

अगर हम गूगल में खोजे – “old memories” तो उपरोक्त चित्र दिख सकता है, इससे हमे old memories से सम्बन्धित बहुत सारे भाव दिख सकते हैं- जैसे बचपन, पुराने दोस्त, पुराना कोई यादगार सामान, पुराने पसंदीदा नज्म, पुरानी कोई याद.......
फिर हम अपने खोजे हुये काफियों में एक एक भाव को पिरो कर कई सारे शेर लिख सकते हैं

आप शायरी लिखने के बिन्दुओं पर चर्चा करने के साथ साथ, नवांकुरों को हिदायत देते हुये कहते है- जहां तक हो सके, राजनीति, या धर्म पर लिखने से बचे। क्योकि ऐसा लिख कर आप जब उस शायरी या गजल को कही पोस्ट करेगें तो कुछ लोग हो सकता है आपकी तारीफ करे, या कुछ लोग आपके लिखे पर विवाद भी कर सकते हैं, जिससे आपकी शायरी का मकसद कही पीछे रह जायगा।
अंत में आप अपनी क्लास समाप्त करने और लोगों के प्रश्नों का उत्तर देने से पहले हौसला अफजाई करते हुये कहते हैं- शायरी किसी की जागीर नही है, इसलिये लिखिये, खूब लिखिये, दिल से लिखिये।

क्षमा – सर जी आपसे बिना अनुमति लिये आपके बारे में कुछ लिखने का साहस इस उम्मीद के साथ कर रही हूँ, कि मेरी त्रुटियों को आप सहर्ष क्षमा कर देंगें।

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

गजल अहसासों की - पहली कडी


चांद की तरह वो अक्सर, बदल जाते हैं।
मतलब अली काम होते निकल जाते हैं॥

स्वाद रिश्तों का कडवा, कहीं हो जाय ना
छोटे मोटे से कंकड, यूं ही निगल जाते है

शौक तिललियों का हमने पाला ही नहीं
बस दुआ सलाम करके निकल जाते हैं

हौसले की पतवार हों, हाथों में जिनके।
तूफानों में भी वो लोग, संभल जाते है॥

वो बिछाते है जाल, दिलकश अदाओं से।
जानते है अच्छे अच्छे, फिसल जाते हैं॥

व्यापार चौराहों पर, बच्चों से ये सोचकर।
मासूमों से सख्तदिल भी, पिघल जाते हैं॥

बारिश की बूंदो में छिपी, बचपन की रवानी।
संग बच्चों के जवांदिल भी, मचल जाते हैं॥

शोर बर्तनों का सुनें, हमारे अडोसी पडोसी।
उससे पहले थोडा मकां से, टहल जाते हैं॥

सोच लो तुम पलाश, सच लिखने से पहले।
बडीं बेरहमी से लोग कलम, कुचल जाते हैं॥

गुरुवार, 25 जून 2020

जाने दो




कह दो जो मन में तेरे, नदियों को बह जाने दो
मत रोक उसे जो जाता है, जो आता है आने दो

दो चार दिनों का मेला है, रुकना है निकलना है
तोडो रस्मों की जंजीरे, उजले कल को आने दो

छोटी छोटी सी बातों में, उलझों ना दुनियादारी में
कदम बढा जग जीतो, जो खोया खो जाने दो

खुशी और गम दोनों में, मेहमां बनकर आते
मत रोको इन अश्कों को, जो बहते है बह जाने दो

उगते सूरज संग दुनिया, डूबे के अपने बेगाने
चलता जा तू मस्ती में, जो जलता है जल जाने दो

क्या कहा, क्यूं कहा, इस हिसाब में भला क्या रखा
भूलों कडवे किस्सो कों, वापसी के कुछ बहाने दो

जीवन इक झूठी माया, मरने से कैसा घबराना है 
क्यूं डर डरकर यूं जीते हो, जो होता है हो जाने दो

मन चाहा मिले अगर, समझ मर्जी खुदाया की
परेशां क्या होना पलाश, रौशन सुबहों को जाने दो

शनिवार, 20 जून 2020

बागबां



रिया और समीर मूवी देखकर लौट रहे थे, कि अचानक रिया की नजर सडक से लगी हुई एक नर्सरी पर पडी। उसे और समीर दोनो को ही पेडों का बहुत शौक था, मगर अभी तक वो एक छोटे से फ्लैट में रहते थे, जिससे पेड पौधे लगाने का अरमान बस सोच ही बन कर रह गया था। उसने समीर से कहा- सुनो, देखो कितने सुन्दर पेड दिख रहे है, ले चलते हैं ना दो चार। समीर- अभी नहीं यार, फिर कभी, और फिर तुम नौकरी करोगी या ये बागवानी करोगी। रिया- प्लीज, ले लेते हैं न, मै कर लूगीं, और फिर घर में अब तो माँ बाबू जी भी है, उनका भी थोडा टाइम कट जाया करेगा।
समीर ने मुड कर देखा, फूल वाकई सुन्दर थे, हंस कर बोला- ठीक है जनाब, वैसे भी मैडम को नाराज करके कहाँ जाऊंगा । नर्सरी में कई सुन्दर सुन्दर फूलों के पेड थे, दोनो, दो चार पेडों का सोच कर गाडी से उतरे थे, मगर अब गाडी में दस पेड थे।
अभी दस- बारह दिन ही बीते थे कि एक एक करके सारे पेड मुरझाने लगे थे। रिया समीर क्या घर के बाकी लोगों की भी खुशी उड गयी थी, समीर की माँ ने कहा- नर्सरी वाले ने तुम दोनो को ठग लिया, तुम लोगों को पेड फूल की कोई पहचान तो है नही, अरे लाना भी था तो एक दो लाते, लाये भी तो एक साथ दस उठा लाये। पिता जी ने कहा- ऐसा करो उस नर्सरी वाले जाकर बताओ, कि उसके सारे पेड मुरझा गये हैं, पैसे तो वो क्या ही वापस करेगा, हो सकता है एक दो पेड दे दे। रिया और समीर ने गुस्से में सारे पेड गाडी में रखकर नर्सरी पहुंचे।
अभी उन्होने मुरझाये हुये पेड दिखाये ही थे कि नर्सरी वाला उन पर नाराज होने लगा- जब आप लोगों को पेड लगाने ही नहीं आते तो ले जाने की क्या जरूरत है, मगर आज कल तो बस लोग फैशन में ले जाते हैं। रिया और समीर उसके इस व्यव्हार से हतप्रभ थे। उन्हे समझ नही आ रहा था कि वो उल्टा उनकी गलती क्यों दे रहा है, शायद वो पैसे वापस न देने पड जाय इस कारण से ऐसा कर रहा है। मगर इससे पहले कि समीर कुछ कहता, उस नर्सरी वाले ने थोडा नरम होते हुये कहा- बेटा, एक बात कहूं, ये पेड ना बिल्कुल बच्चे के समान होते हैं, ये कोई शो पीस नही कि ले गये और सजा दिया। इनको ठीक समय पर खाद पानी देना पडता है, हर पेड की जरूरत अलग अलग होती है, कोई कम पानी लेता है तो कोई ज्यादा, मोटा मोटा बोलूं तो सबकी खुराक अलग होती है। रिया समीर अब कुछ कुछ समझ पा रहे थे।
रिया ने बोला- काका मगर पानी तो हम रोज देते थे, फिर ये सब कैसे मुरझा गये।
नर्सरी वाले काका बोले- बिटिया- दो बाते हो सकती हैं, या तो तुमने खडी धूप में इनको पानी दिया है, या तुमने सीधा इनकी जडों पर कोई केमिकल खाद डाल दी है, जिससे ये सब जल गये।
रिया को याद आया कि पेड जल्दी बडे हो जाय इसलिये उसने पेड लगाने के दूसरे दिन ही उनमें काफी खाद डाल दी थी।
दुखी होते हुये बोली- हाँ काका, वो हमको लगा इससे पेड जल्दी बडे हो जायेगें और खूब सारे फूल देंगें।
नर्सरी वाले काका- यही तो बात है बिटिया, कि हम सब जल्दी जल्दी सब चाहते हैं, पेड लगाने का शौक है तो बागबां बन के देखों। बच्चे की तरह प्यार से पालो पोसों, समय दो, एक जगह से हट कर दूसरी जगह पनपने फलने फूलने में समय लगता है।
वैसे तो पेड बेचने के बाद पेड बेचने वाले की कोई जिम्मेदारी नहीं होती, कि पेड बचा या फला, मगर फिर भी मै तुमको दस तो नही, हाँ पाँच पेड दे देता हूँ, बस इसलिये कि तुम लोग ये मुरझाये हुये पेड लेकर मेरे पास आये, तुम लोगों नें इन्हे उखाड नहीं फेंका, मुझे दिख रह है कि तुम लोगों को पेडों से प्यार है बस ऊपरी शौक नही, ये और बात है कि प्यार करने का तरीका तुम लोग नहीं जानते थे। फिर मुस्कुरा कर बोला- जाओ चुन लो अपनी पसन्द के पेड और बागबां बनना सीखो।

शुक्रवार, 19 जून 2020

आसरा



बेटा, एक बात कहनी थी, जरा इधर तो आओ- मिस्टर माथुर की आवाज में लडखडाहट थी। पापा आपको भी हमेशा मेरे ऑफिस जाते समय ही सारी बातें याद आती हैं, शाम को आता हूँ, तब सुन लूंगा आपकी बातें। विनीता जल्दी करो यार, तुमको पापा के घर छोडता हुआ ऑफिस -चला जाऊंगा। पीछे वाले कमरे से आवाज आई- बस पाँच मिनट रुकिये, आती हूँ। रोहन कुर्सी में बैठकर मोबाइल पर कुछ स्क्रॉल करने लगा। माथुर जी बस मन में ही कह कर रह गये कि बेटा मेरी बात तो एक मिनट की भी नहीं थी। करीब पन्द्रह मिनट बाद विनीता कमरे से निकलकर बोली- अब चलोगे भी या मोबाइल ही देखते रहोगे। पापा आप गेट बन्द कर लीजिये, कह कर दोनो निकल गये।
माथुर जी घर में दीवारों और दीवार में लगी पत्नी की तस्वीर के साथ रह गये। विनीता यूं तो हाउस वाइफ ही थी, मगर अक्सर ही सारा दिन घर से बाहर ही होती थी, कभी अपने मायके, कभी सहेलियों और कभी शॉपिंग पर।
माथुर जी को भी घर पर अकेले रहने की आदत सी हो गयी थी। ना कोई खास जरूरते, ना कोई खास खवाइशें। मिलने वालों में केवल दो मित्र ही बचे थे, उनमें से एक चड्डा जी पिछले चार महीनों से अपने बेटे के पास कनाडा गये हुये थे, हाँ पांडे जी जरूर हर मंगलवार की शाम प्रसाद लेकर आते थे जिससे एक दो घंटा कब निकल जाता पता ही न चलता था। बाकी रोज तो कुछ समय अखबारों के साथ बीतता, कुछ नॉवेल्स के साथ और कुछ समय वो अपनी पत्नी के साथ बिताते थे। पैरालिसिस के अटैक के बाद से उनका अकेले घर से निकल पाना सम्भव ही नहीं था। बस किसी तरह से अपने दैनिक काम वो कर लिया करते थे।
कल बातों बातों में उनकी पत्नी ने एक फरमाइश कर दी थी- घर में उनकी और अपनी एक कलर्ड तस्वीर लगाने की। बात ये थी कि माथुर जी की शादी की तस्वीर श्वेत श्याम थी, और कल माथुर जी बोले- जानती हो लाल साडी में तुम ऐसे लगती थी जैसे रजनीगंधा के फूलों के बीच लाल गुलाब। मगर अब कहाँ इस जनम में तुम्हारी वो छवि देखने को मिलेगी। तभी उनकी पत्नी ने कहा- अरे ये कौन सी बडी बात है- रोहन से कह देना वो हमारी शादी वाली तस्वीर को कलर्ड बनवा लायेगा। फिर देख लेना मुझे जी भर कर इसी जनम में, और कह कर लजा गयीं थी, जैसे आज ही ब्याह कर आईं हों।
आज कई दिन बीत गये थे, मगर रोहन के पास माथुर जी की बात सुनने का वक्त नहीं मिला था। जब भी उनकी पत्नी पूंछती रोहन को फोटो बनने दी या नहीं, तो कह देते अरे भूल गया, कल कह दूंगा। और उनकी पत्नी उलाहना देतीं- आपको तब भी कुछ याद नहीं रहता था और आज भी याद नहीं रहता।
माथुर जी कैसे कहते कि उनके बेटे के पास उनके लिये अब वक्त नही। आज दो महीने हो रहे थे, जब रोहन शाम को बात सुनने की बात कह कर निकल जाता था, और माथुर जी शाम और सुबह की प्रतीक्षा के बीच दिन गुजार देते थे। मगर ना कभी सुबह के दो मिनट निकले ना कभी शाम आई।
आज प्रसाद के साथ साथ पांडे जी ने माथुर जी को एक तस्वीर भी दी, जिसमें तीनो मित्र एक साथ कॉलेज के गेट पर खडे थे। माथुर जी बोले- अरे पांडे जी यह तस्वीर तो चड्डा जी के भाई ने खींची थी ना, आपको कहाँ से मिली और ये तो ब्लैक एंड व्हाइट फोटो थी ना। पांडे जी बोले - हाँ माथुर साहब आप सही कह रहे हो। ये चड्डा जी ने इन्टनेट से बनवा कर भेजी है, एक कॉपी आपके लिये और एक मेरे लिये। माथुर जी के चेहरे पर एक खुशी सी चमक गयी। बोले- पांडे जी क्या आप जानते हो ये इन्टरनेट से फोटो बनवाना? पांडे जी बोले- नही, मै तो नही जानता, हाँ मेरी पोती जरूर जानती है। कहिए बात क्या है? तब उन्होने अपनी शादी की फोटो बनवाने वाली बात कही।
पांडे जी बोले- माथुर जी आपकी फोटो बन गयी समझो, अच्छा मै एक काम करता हूँ, मै आपकी ये ब्लैक एंड व्हाइट वाली ले जाता हूँ और अगले मंगल को आपकी और भाभी जी की नई फोटो लेता आऊंगा।
एक हफ्ते बाद दीवार पर कलर्ड फोटो थी, मगर अभी तक ना रोहन को बात सुनने का समय मिला था, ना उसकी निगाह में रजनीगंधा के बीच कोई गुलाब था। हाँ माथुर जी के पास जरूर अब  ना रोहन से कहने के लिये कोई बात नहीं थी ना ही रोहन का आसरा।

सोमवार, 15 जून 2020

मालूम नही


दिन इक और जिया या गुजरा, मालूम नही
खुद से खुश हूं या खफा खफा, मालूम नही

सांसे घडी घडी देतीं, गवाही जिन्दगी की
कितना जिंदा हूँ कितना मरा, मालूम नही

खरीदी फकीर से कुछ दुआएं, हमने भी
हुआ सौदे में घाटा या नफा, मालूम नहीं

छोड पायल उसने, पैरों में घुंघरू पहने
महज शौक है या इक़्तिज़ा, मालूम नहीं

चल तो रहा बाजार में, बहुत जोर शोर से
ये खोटा सिक्का है या खरा, मालूम नहीं

मासूम निगाहों पर, यूं सब कुछ लुटा
उसने किस किसको है ठगा, मालूम नहीं

कर लिया कुबूल खुशी से, जो भी मिला
रहमत-ए-खुदा है या सजा, मालूम नहीं

नज्में तो उसकी, बहुत पाकीजा लगी
तहखाने दिल में क्या दबा, मालूम नहीं

इलाजे क़ल्ब को बेकरार, है पलाश मगर
हकीमे इलाही को रोग क्या, मालूम नही

क़ल्ब - दिल

इक़्तिज़ा - मजबूरी
इलाही - खुदा

शनिवार, 13 जून 2020

छोड़ भी दे



डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी का हार्दिक आभार, जिन्होने यह गजल पढने के बाद मेरे ब्लाग पर न केवल टिप्पणी के माध्यम से मुझे सुधार बताये बल्कि मेरे अनुरोध पर उन्होने गलज लिखने की मूल्यवान जानकारी भी साझा की। चाचा जी, मेरा मार्गदर्शन करने हेतु आपको मेरा प्रणाम और धन्यवाद। 



चाह आसरों की रखना छोड़ भी दे
सूखे शाखों से लिपटना छोड़ भी दे 

खुश रखना खुद को तेरी जिम्मेदारी
ये रोना धोना सिसकना छोड़ भी दे

चांद का झूला महज किताबी कहानी
जज़्बातों में बहके रहना छोड़ भी दे

होते नहीं ख्वाब ख्यालों से मुकम्मल
लकीरें ताबीजें आजमाना छोड़ भी दे

बेमतलब के रिश्ते हुए गुजरा जमाना
बेमकसद घुलना मिलना छोड़ भी दे

दो पल भी दुनिया नहीं याद करेंगी
तू ख्वाइशें दफन करना छोड़ भी दे

नकाबपोशी का चलन है जोरों पर
खामख्वाह चेहरे पढ़ना छोड़ भी दे

झुकती है दुनिया शोहरतों से पलाश
अब पत्थर नींव का बनना छोड़ भी दे

शुक्रवार, 12 जून 2020

अच्छी नहीं



ये जिन्दगी है, जंग का मैदान नहीं।
हर बात में यूं जीत हार अच्छी नहीं॥

मिलते हैं रिश्तें, बहुत खुशनसीबी से।
बात बात पर ये तकरार अच्छी नहीं॥

मना लो हर दफा, जिनसे तुझे चाहत।
दरम्यां दिलों के ये दीवार अच्छी नहीं॥

अहमियत वक्त की पहचान वक्त पर।
किस्मतों की सदा दरकार अच्छी नहीं॥

ना हाथ बढाओ गर दिल नहीं मिलता।
फरेबी कसमों की फुआर अच्छी नहीं ॥

फिक्रमंदी का दिखावा है किसके लिये।
आवाम कह रही सरकार अच्छी नहीं ॥

जिस दर ना हो कद्र तेरे अरमानों की।
पलाश उस ठौर इज़्तिरार अच्छी नहीं॥

** इज़्तिरार= अकुलाहट
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