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सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

हिन्दी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड का योगदान

 


बॉलीवुड और हिंदी एक दूसरे के पर्याय है जब बॉलीवुड की बात होती है तो हमारे मन में एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसने सभी भाषा के क्षेत्रों सीमाओं को तोड़ते हुए हिंदी को जन सुलभ और लोकप्रिय भाषा के पद पर आरूढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई भारतीय सिनेमा जगत को पहली सवाक फिल्म देने वाली 'आलमआरा ' की भाषा हिंदी ही थी । आलम आरा से आरंभ हुई इस यात्रा ने 'हिंदी मीडियम' तक आते-आते अनेकों पड़ावों को पार किया। बॉलीवुड ने हिंदी को कभी विषय वस्तु के रूप में चुना तो कभी भाषिक माध्यम के रूप में अपनाया। 70-80 के दशक में चुपके-चुपके फिल्म ने जनमानस के सम्मुख यह प्रश्न उपस्थित किया कि यदि हम हिंदी भाषा की शास्त्रीयता को ही महत्व देते रहे तो वह एक दिन "जनसामान्य की भाषा" की पदवी खो देगी । इस सदी की बनी हुई आधुनिक फिल्मों जैसे 'इंग्लिश विंग्लिश',' इंग्लिश मीडियम', एवं 'हिंदी मीडियम' ने हिंदी भाषा के महत्व और समाज में आज भी उसके महत्वपूर्ण स्थान की विषय वस्तु को लेकर हिंदी के प्रचार प्रसार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

फिल्म “किसी से न कहना” में एक प्रसंग में जब उत्पल दत्त भाषा और हिन्दी की भारतीय परिवेश में उसकी महत्ता को बताते हुये कहते हैं – “चीन, जापान रूस जर्मनी जैसे देशों नें भाषा के बल पर तरक्की की है, मगर हमारा देश जहाँ हमारी तरक्की का अर्थ है सिर्फ अच्छी अंग्रेजी भाषा जानना। हमे इन देशो से सीखना चाहिये”, तब इतने सटीक संदेश का जो प्रभाव सुन कर, देख कर पडता है शायद ही वह किसी लेख के माध्यम से सम्भव होता। 

हिन्दी की सहयोगी भाषाओं को समावेश करने में बॉलीवुड की भूमिका

बॉलीवुड ने हिन्दी के सरल और व्यव्हारिक स्वरूप को देश के कोने कोने तक पहुंचाने का कार्य बडी सुगमता से किया। हिन्दी भाषा में क्षेत्रीय भाषाओं के समावेश ने हिन्दी को न केवल लोगों के दिलों तक पहुंचाया बल्कि आम लोगों ने स्वतः ही बोली में भी भाषा को आत्मसात भी किया, भले ही वह प्रसिद्ध गाने के माध्यम से होने लगा या प्रसिद्ध डॉयलाग लोगो की बोलचाल में शामिल हुये। 14 मार्च 1934 में जब हिन्दी फिल्मों का सफर शुरू हुआ तो हिन्दी भाषा अपने असली रूप में थी, पर आज पान सिंह तोमर, उड़ता पंजाब, तन्नु वेडस मन्नु, गैंस ऑफ वसेपुर जैसी फिल्मों ने हिन्दी सिनेमा में भाषा के ट्रेंड को बदला और फिल्मों में हिन्दी के साथ ही क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल होने लगा। अब फिल्मों में भारत के अलग-अलग राज्यों के भाषा की सौंधी खुशबू आती है।

फिल्मों के संवाद और विषय चयन के अलावा हिन्दी फिल्मों के गाने भी क्षेत्रीय भाषा और बोली की शब्दावलियों के इस्तेमाल से बनने लगे हैं। जहां हिन्दी सिनेमा में खड़ी बोली का इस्तेमाल किया जाता रहा है उदाहरण के तौर पर पियूष मिश्रा का “आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घड़ी की तुम गुहार दो” जैसे हिन्दी के गीत लिखे। हिन्दी फिल्मों में क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव से हिन्दी का स्तर और समृद्ध रहा है, साथ ही साथ क्षेत्रीय भाषा और बोली भी संरक्षित हो रही है, क्योंकि वो किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नही रहती।

हिन्दी साहित्य और सिनेमा

हमारे मन मस्तिष्क पर पढे हुये से ज्यादा देखी और सुनी हुयी बातों का असर रहता है, पठन में कल्पनाशीलता होती है, जबकि दृश्य या सुनी हुयी बातें यथार्थ के ज्यादा निकट होती हैं। हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्य को चाहे वह उपन्यास हों या कहानियां समय समय पर फिल्मकारों ने उसे जन मानस तक पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। चाहे वह १९६३ में बनी फिल्म गोदान हो, १९९० में बनी गुनाहों का देवता हो, कृष्ण चंदर के उपन्यास पेशावर एक्स्पेस पर आधारित एंव यश चोपडा जी के निर्देसन में बनी वीरजारा हो, अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पर आधारित फिल्म पिंजर हो, या फिर देवदास जिसका कई निर्देशकों ने अलग अलग काल में समाज के अनुसार उसका फिल्मांकन किया।

हिन्दी वैश्वीकरण में बालीवुड की भूमिका

हिन्दी फिल्मों के माध्यम से देश ही नही अपितु विदेशों में भी हिन्दी को प्रोत्साहित किया गया। इस क्रम में राजकपूर की 'आवारा' और 'श्री 420' को बहुत बडा श्रेय जाता है , इन फिल्मों ने अपने समय में रूस में लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए थे। अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, लता मंगेशकर, एवं हिन्दी फिल्मों के अन्य कई कलाकार सारी दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में अपने रंगमंचीय प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर चुके हैं। भारतीय फिल्में और गीत कई देशों में लोकप्रिय हैं। मेहँदी हसन व गुलाम अली (दोनों पाकिस्तानी गजल गायक) के हिन्दी गीत आज भारत में लोकप्रिय हैं। इन सब तथ्यों से हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को सौ प्रतिशत प्रोत्साहन दिया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में हिन्दी और बॉलीवुड की भूमिका

एक समय था जब लोग समझते थे कि हिन्दी रोजगार परक भाषा नही है, हिन्दी लेखन से जुडे लोग या तो जीवन यापन के लिये कोई और कार्य करते थे या फिर जीविका के लिये संघर्ष में उनका जीवन व्यतीत हो जाता था। पिछले दो दशकों ने इस मिथ को कुछ हद तक तोडा है, और इसमें फिल्मों की अहम भूमिका है।

आज चाहे वह हिन्दी फिल्मों के लेखक हों, गीतकार हों, कहानीकार हों, ना केवल वह अच्छा धन अर्जन कर रहे हैं, बल्कि कई नये अवसर भी पैदा हो रहे हैं, जैसे कई विभिन्न विदेशी भाषाओं की फिल्मों का हिन्दी में अनुवाद हो रहा है अवतार, हैरी पॉटर और स्पाइडर मैन जैसी फिल्मों को भी अपने बाजार को विस्तृत करने के लिये भारत में हिन्दी में अनुवाद करके प्रसारित करना फायदे का व्यापार साबित हुआ।आज कई बडी कम्पनियां अपने व्यापार को विस्तार देने के लिये हिन्दी और बॉलीवुड दोनो का सहारा ले रहीं है, जैसे अमेजन एलेक्सा बॉलीवुड के सितारे अमिताभ बच्चन के साथ उनकी आवाज को हिन्दी भाषा में उपयोग करने के लिये प्रतिबंध कर रहा है।

अन्ततः

भाषा के लिहाज से हिंदी के सामने अपनी चुनौतियां हैं, अपना संघर्ष है. लेकिन उसके साथ जब सिनेमा जुड़ता है, तो सफर अपने आप में सुनहरा हो जाता है. कथा, कहानियों और दिलचस्प किरदारों का ऐसा सिलसिला, जिसमें हिंदी सजती है सुरीले गीतों और सुनहरे संगीत के साथ. हिंदी सिनेमा के साथ वो जुबान बन जाती है, जिसके संवाद से सरहदों की लकीरें दरकती नजर आती है। २१वी सदी में, हिंदी की वजह से ही हॉलीवुड में फिल्मी कलाकारों की मांग में अचानक से वृद्धि देखने को मिलता है। वॉलीवुड के सहयोग से आने वाले समय में हिन्दी की व्यापकता का विस्तार अनन्त दिखता है, और नयी पीढी से हिन्दी को सम्मानजनित स्थान मिलना सुनिश्चित है।

2 टिप्‍पणियां:

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