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शनिवार, 16 मई 2015

दूरसंचार के जाल में समाज


१७ मई , विश्व दूरसंचार दिवस के रूप में मनाया जाता है। आगरा से निकलने वाले अखबार में प्रकाशित इस लेख को आप सबके साथ साझा करते हुये पुष्प सबेरा के एडीटर " श्री प्रकाश शुक्ल जी " की आभारी हूँ, जिहोने मुझे लिखने का मौका दिया।

रोटी कपडा और मकान, कुछ समय पहले तक इन्हे जीवन के तीन स्तम्भों के रूप में देखा जाता था, किन्तु आज इंटरनेट को जीवन के चौथे स्तम्भ के रूप में देखा जा रहा है। इंटरनेट आज हम सभी के जीवन में अपनी एक अहम जगह बना चुका है। आज सुबह की शुरुआत बडों को अभिवादन के साथ नही, फ्रेंड्स को गुड मार्निंग के मैसेज भेजने के साथ होती है। इंटरनेट, दूरसंचार में एक क्रान्ति का युग लेकर आया। निश्चित तौर पर पिछले दो दशकों में दूरसंचार ने जीवन को एक नयी गति दी है, पहले हम जहाँ किसी की खोज खबर पाने के लिये हफ्तों एक पत्र का इंतजार किया करते थे आज स्काइप पर तुरन्त उससे ना सिर्फ बात कर लेते है बल्कि उसके कार्य कलापों को देख भी सकते हैं।
90 के दशक में हम एस. टी. डी. बात करने के लिये रात के दस बजने का इन्तजार किया करते थे, क्योकि रात में काल रेट दिन की तुलना में एक तिहाई हो जाया करता था, आज मोबाइल कम्पनियों ने इस इन्तजार को खत्म कर दिया।
एक समय था जब टेलीग्राम का खर्च शब्दों के हिसाब से आता था, एक संदेश भेजने से पहले भेजने वाले का आधा ध्यान तो शब्द सीमा पर ही रहता था, आज ईमेल पर हम चाहे जितना भी लिखने के लिये मुक्त है।
पहले शहर में नौकरी कर रहा लडका मनीआर्डर से अपने घरवालों को पैसे भेजा पाता था, जरूरत चाहे कितनी जरूरी हो पैसे तो ह्फ्ते दस दिन में ही मिलेगें, आज देश क्या विश्व के किसी भी कोने में बैठा बेटा, एक तरफ फोन पर बात करता है दूसरी तरफ ई-बैकिंग से एकाउंट में पैसे ट्रान्सफर कर देता है।
एक दौर था जब खरीददारी का मतलब था- बाजार जाना और अगर घर आकर सामान अच्छा ना लगे, वापस करना हो तो ढेर सारी टेंशन- पता नही दुकानदार पैसे वापस करेगा कि नही, या वो कोई और सामान लेने को ही कहेगा। मगर आज शॉपिंग के अर्थ बदल गये। आज हम घर बैठे अपना मन पसंद सामान ई-शॉपिंग के जरिये खरीद लेते है और पसंद ना आने पर फ्री वापसी की सुविधा भी।
इतनी सारी सुविधाओं के बाद भी आज हम उतने संतुष्ट नही जितने पहले थे। ये सोचने का विषय है कि क्या कारण है कि सामाजिक ढाँचा कमजोर हो रहा है, संदेदनाये कम हो रही है, मानवता पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है, बचपना अपनी मासूमियत खो रहा है। आज पूरा विश्व जब हर्षोल्लास के साथ विश्व दूरसंचार दिवस मना रहा है, तब यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि ये चिंतन भी करे कि हम इस तकनीक की धारा में सिर्फ बहे जा रहे है, या तकनीक का सोच समझ कर प्रयोग कर रहे हैं।
समय के साथ तकनीक बदलने के साथ साथ सोच और जीने के तरीके दोनो ही बदले। सबसे बडा फायदा जो हुआ वो है समय की बचत। जब संचार का कोई भी माध्यम नही था तब सिर्फ हम मिलकर ही बाते करते थे। मिलने से ना सिर्फ शब्दों का आदान प्रदान होता था, भावनाओं का भी लेन देन होता था। आज हम जब एक मैसेज लिखते है - फीलिंग सैड तो समझ नही आता कि मैसेज भेजने वाला या वाली कितना दुखी है, उसे क्या दुख, क्या परेशानी है। हम पहले जब कही से घूम कर आते थे तब हफ्तों तक उसके चर्चे सुनाया करते थे, आज भी घूमने जाते है मगर जगह को अपनी नजर से बाद में देखते है पहले मोबाइल से फोटो लेकर व्हाट्स एप या फेसबुक पर शेयर करते है। जिसका उद्देश्य अक्सर ये बताना होता है कि हम फलां फलां जगह पर कितने मजे कर रहे हैं।
आज हम एक व्यक्ति से बात करते है तो उसी समय दूसरे से चैटिंग भी कर रहे होते हैं। होली दीवाली में मिलते है तो गले मिलने से पहले फोटो लेना और उसको शेयर करना पहली प्राथमिकता होती है। फोटो ठीक नही आया तो दो तीन बार और गले मिलेगें। इस मिलन में भावनाओं का संचार दूर दूर तक नही होता, क्या यही उद्देश्य था दूर संचार की खोज का?
प्रश्न उठता है तकनीक ने हमारा समय निश्चित तौर पर बचाया फिर भी हर किसी को ये कहते सुना जा सकता है कि यार समय नही है, लाइफ बहुत बिसी हो गयी है, आखिर कहाँ गया हमारा समय, कहाँ हम इसे खर्च कर रहे हैं, कहाँ उलझा लिया है हमने इसे?
आज चाहे बच्चे हो, युवा हो या बुजुर्ग कोई भी इंटरनेट के जाल से अछूता नही। मगर इस जाल मे फंसना या ना फंसना हम पर ही निर्भर करता है। ऑकडे बताते है कि  9 -10 साल के बच्चे जब ऑनलाइन होते हैं तो उनमें से 57 फीसद बच्चों अश्लील दृश्यों को ही देखना पसंद करते है, 38 फीसद बच्चे ऐसे है जो शिक्षा और ज्ञान की चीजें इंटरनेट पर ढूंढ़ते नजर आए और बाकी के 36 फीसद बच्चे जाने.अनजाने अपने आपको इन दृश्यों में गिरफ्त होते नजर आए।
 इंटरनेट एक दुधारी तलवार की तरह है। यहाँ सभी के लिये कुछ न कुछ है ज्ञान का ढेर सारा भंडार है तो मनोरंजन के लिये अश्लील सामाग्री भी उपलब्ध है। बच्चो के लिये नये नये गेम्स है तो हिंसा के नये नये तरीकों की जानकारी भी उपलब्घ है। ये इंटरनेट की खूबी है कि इसका इस्तेमाल करने वाला चाहे कोई भी हो, यह सबके लिए खुला रहता है।  कितनी ही वेब साइट्स पर लिखा होता है कि अट्ठारह बर्ष से कम लोग इसे प्रयोग ना करे मगर कहाँ है वो चेक प्वांट जो यह देख सके कि प्रयोगकर्ता की उम्र क्या है, और उसके लिये साइट नही खुलेगी।
बच्चे समाज का भविष्य होते है, इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम बडे इस बात का आकलन करें कि बच्चे इस नयी तकनीक का कैसे प्रयोग कर रहे है, और सही मायनों में वो आधुनिक बन कर देश की प्रगति का हिस्सा बन सके इसके लिये हमें उनका सही मार्गदर्शन करना होगा। बच्चे अक्सर वही करते है जो हम बडे करते हैं, इसलिये चाहे मोबाइल हो या इंटरनेट इसका प्रयोग हमे भी संयमित होकर ही करना होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आधुनिक प्रौद्योगिकी वाले गैजेटों के अतिशय उपयोग से अभिभावकों और बच्चों के बीच तनावपूर्ण संबंध, सामाजिक जान-पहचान की कमी और साधारण कार्यो में अकुशलता जैसे परिणाम सामने आते हैं। नेशनल इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन के अध्यक्ष जे. रवि कुमार कहते है कि यह सिर्फ किसी बच्चे की नहीं पूरे समाज के लिए एक चिंता का विषय है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके अतिशय उपयोग से होने वाला दुष्प्रभाव पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। अभिभावकों को भी यह समझने की जरूरत है कि उन्हें कितना समय इन गैजेटों के साथ बिताना चाहिए । "बच्चे वही करना चाहते हैं, जो उनके माता-पिता करते हैं. इसलिए जब वे देखते हैं कि उनके माता-पिता घंटों लैपटॉप पर बिताते हैं, तो उनके बच्चे भी वैसा ही करना चाहते हैं।" नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज, बेंगलुरु में क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर मनोज कुमार शर्मा कहते है छोटे बच्चे जहां वीडियो गेम और गेमिंग एप्स पर अधिक ध्यान देते हैं, वहीं किशोरों का मन सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट में अधिक रमता जा रहा है। वो बताते है कि संस्थान के सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी (एसएचयूटी) क्लिनिक को हर सप्ताह देश के दूसरे राज्यों से तीन-चार मेल मिलते हैं।  ये मेल किशोरों के माता-पिता के होते हैं, जो संस्थान की सेवाओं और उससे मिलने वाली मदद के बारे में जानना चाहते हैं। ये माता पिता 14-19 वर्ष की उम्र के ऐसे किशोरों के होते हैं, जो विडियो गेमिंग, मोबाइल, सोशल नेटवर्किंग साइट तथा पोर्नोग्राफी की लत से प्रभावित होते हैं। बच्चों का स्कूलों में प्रदर्शन तथा आचरण बिगड़ने के बाद माता-पिता परामर्श लेने के लिए आगे आते हैं।

आज के युग में बच्चों को पूरी तरह से गैजेटों का उपयोग करने से रोका नहीं जा सकता है। इसके बिना आज पूरी शिक्षा हासिल नहीं की जा सकती है इसलिये चाहे माता पिता हो या विघालय में अध्यापक, दोनो की ही यह जिम्मेदारी बन जाती है कि इंटरनेट का प्रयोग करते बच्चों पर हमेशा अपनी एक नजर बनाये रखे ताकि इन्हे दिशा भ्रमित होने से पहले रोक जा सके। 

यादों के झरोखों से....


यादों के पन्ने, जब कभी खुल जायेगे
आँखे मुंद जायेगीं, आप नजर आयेगें

कसमें जो दी हैं , उन्हे निभाना है
ख्वाबों में भी, नजदीक नही आयेगें

चाँद देखने का शौक, काफुर हुआ
चांदनी पहरे में, कहाँ तुम्हे पायेंगें

बूंदें बारिश की, अंगारो सी लगे
प्यासे मन, अब ना भींग पायेगें

संग चली गयी, चंद लकीरे भी 
हथेलियों में, तेरी छाप सजायेगें

न गुजरेगें उन रस्तों से, जहाँ साथ चले
राहें पूंछेगीं तुम्हे, तो क्या उन्हे बतायेगें

जाते हुये कह तो दिया, ना याद करना
अपने किस्सों में क्या, वो हमे न लायेगें

मंगलवार, 12 मई 2015

सिर्फ हाथों में हाथ..........


सिर्फ हाथों में हाथ, साथ की कहानी नही
खिलते होठ सदा, खुशी की निशानी नही

कुछ तो बात है, मोहब्बत के समन्दर में
यूं ही सारी दुनिया,  इसकी दीवानी नही

गम से दो चार ना हुये, तो जिन्दगी कैसी
जो खतरों से बच के चले, वो जवानी नही

रूठते हो तो रूठ जाओ, ये अदायें है तेरी
ये इश्क आग का दरिया है, सर्द पानी नही

हाले दिल लबों से कहा, तो तुमने क्या सुना
खामोश धडकनों मे क्या, इश्क की रवानी नही

आरजू मोहब्बत की है, तो सिर्फ दिल की सुनिये
ये अनमोल इनायत है , इसका कोई सानी नही

सोमवार, 11 मई 2015

प्रेम गीत -३


किस तरह तुमसे कहे, मेरे जीने का सहारा तुम हो
प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

देख कर तुमको नजरे ठहर गयी तो हम क्या करे
धडकने तेरे नाम से रुकने लगी तो हम क्या करे
जला रहा है जो इस तन मन को वो शरारा तुम हो
प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

तुम मेरे दिल में समा जाओ जैसे जिस्म में रुह बसे
मुझमें मिल जाओ कुछ यूं जैसे खुशबू फूलों मे बसे
हर तरफ छाया है इन नजरों में, वो नजारा तुम हो
प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

जाडे की गुनगुनी धूप सी राहत मिले जब देखूं तुमको
एक हलचल सी उठ जाये जिया में, जब सोचूं तुमको
थके कदमों को जहाँ आराम मिले, वो सहारा तुम हो

प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

शनिवार, 9 मई 2015

माँ- जीवन का पर्याय

आज एक लेखिका के रूप में पहली बार अपने जीवन के सच को, मन की भावनाओं को पन्नों पर उतारने का साहस कर रही हूँ। जब भी कलम चली जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों को, अपने शब्दों की कूंची से रंग कर गढ दी कभी कोई कविता या कहानी। मगर जब बात माँ की हो तब वहाँ ना किसी अलंकार की जरूरत रह जाती है ना किसी रस की। नही जानती कि मेरे इस लेखन को साहित्य समाज कौन सी विधा में डालेगा। 
माँ शब्द जब भी जिव्हा पर आता है, मन में कुछ अलग सा ही अहसास होता है। कुदरत भी जब एक बच्चे को बोलने का हुनर देती है तो सबसे पहला शब्द होता है - म। म अक्षर दुनिया की ना जाने कितनी ही जबानों में माँ पुकारने के लिये प्रयुक्त हुआ। जिसका सीधा सा अर्थ है, माँ सार्वभौमिक है, माँ दिल से निकला शब्द है।

माँ आपसे मुझे ना सिर्फ आप जैसी हू-ब-हू शक्ल मिली बल्कि बहुत सी आदतें और स्वभाव भी पाया है। मै बिल्कुल आप जैसी तो नही बन पायी, मगर कई बार आप जैसा बनने की बचपन में कोशिशे किया करती थी। आपके काम करने के तरीके को कॉपी करती थी। आज जो कुछ भी हम है- वो आपके अथक परिश्रम का ही फल है।
जब घर से पहली बार पढाई के लिये घर से निकली तब आपसे बिछडने के दर्द से ज्यादा घर से बाहर निकलने का उत्साह मन मे था। मगर कुछ ही दिनों में अहसास होने लगा क्या छूट रहा है, तभी तो हर शनिवार खुद-ब- खुद कदम घर की ओर चल पडते थे।
मुझे याद है एक बार जब मैं घर से जा रही थी, आप मेरे लिये पानी की बोतल भर कर लाई और चूंकि बैग पहले से ही खूब भरा था मैने बोतल नही रखी। आपने फिर कहा- बोतल रख लो। मैने कुछ नाराजगी  मे कहा आपको तो कुछ समझ आता ही नही। मै भारी बैग अकेले नही उठा सकती। तभी मैने आपको देखा, आपकी आंखों में आंसूं छलक आये थे, तुरन्त ही मुझे मेरी गलती का अहसास हो चुका था। ट्रेन का समय हो रहा था, मगर मेरे कदम उठ नही रहे थे, कैसे आपको दुखी छोड कर जा सकती थी। तब आपने प्यार से मेरा माथा चूमते हुये कहा- अरे बच्चे तो कभी कभी गलती कर ही देते है।, मै नाराज थोडे हूँ, फिर मेरे हाथों में हमेशा की तरह चंद रुपये पकडाते हुये आशीर्वाद दिया।
मै घर से निकल तो आई मगर एक टीस सी रह गयी, कि आपको मैने दुखी किया, मन मे अपराध बोध हो रहा था कि आपकी भावना को मै आपकी बेटी हो कर नही समझ सकी।
आज इस बात को दसों साल हो गये, मगर जब भी अपने बैग में पानी की बोतल रखती हूँ ऐसा लगता है जैसे आप ही पकडाते हुये कह रही हो- छाया पानी की बोतल रख लो। हर बार मुझे मेरी उस दिन की गलती पर पश्चाताप होता है ये जानते हुये भी कि आपने तो मुझे उसी क्षण माफ कर दिया था।
माँ सच में महान है, इस बात से बडा सच कुछ भी नही। आपसे जितनी भी बार हम अपनी गलतियों की माफी मांगे कम ही है फिर भी आप माफी मांगने से पहले ही हमे माफ कर देती हो।

शुक्रवार, 8 मई 2015

भरम


नामुंकिन सा हुआ जबसे आना, मेरे हाथ मे हाथ तेरा
तेरे अहसास बसते है जर्द हथेली पे,  लकीर बन कर

नही किस्मत में देख पाना अब तो, सूरत भी तेरी
कि हर शक्ल में उभर आते हो तुम, तस्वीर बन कर

यूं तो तन्हाइयां संग रहती है, जिन्दगी के सफर में
तुम भी साथ हो लेते हो राहों में, मेरी तकदीर बनकर

कभी हम भी हुआ करते है , मल्ल्किका - - नूरजहाँ
अब तो खाते हैं ठोकरे दर--दर, इक  फकीर बनकर

इस जमाने में मोहब्बत, भरम के सिवा कुछ् नही
जज्बात नीलाम कर देते हैं लोग झूठे करीब बनकर

जाने कैसे कर बैठी, दिल लगाने की खता, तुम 'पलाश'
निकला वो रकीब जो आया था, कभी नसीब बनकर

बुधवार, 6 मई 2015

नाम तेरा भी आयेगा.....


कह लो हमे पागल भंवरा, पर ये भी जरा सोचिये
फूलों का गर जिक्र हुआ , नाम तेरा भी आयेगा

ना कहना हमसे महफिल मे, कोई गजल कहने को
इस शायर के अल्फाजों मे, नाम तेरा भी आयेगा

चर्चा हुस्न का होगा, शामिल तुम भी हो जाओगे
कत्ल हजारों हो जायेगें , नाम तेरा भी आयेगा

सर्द हवा नाकाफी होगीं, दिल की लगी बुझाने मे
आग लगेगीं जब दिल में, नाम तेरा भी आयेगा


छुप लो चाहे जितना अब, शर्म हया के पर्दों में
जिस रोज कयामत आयेगी, नाम तेरा भी आयेगा

यूं ना बिखेरा कीजिये, जुल्फे दिन के उजालों में
चढे सूरज, जो शाम ढली, नाम तेरा भी आयेगा

अन्जाना कहो या कहो अजनबी, ये तेरी अदायें हैं
नजरें गर पढ ली किसी ने, नाम तेरा भी आयेगा

सजदे में सर झुक जायेगा, मन की मुरादें पाने को
जिक्र तमन्नाओं का होगा, नाम तेरा भी आयेगा


हर खौफ जुदा कर देना, इजहार-ए-मोहब्बत से पहले
अफसाने बनेगे तेरे मेरे, नाम तेरा भी आयेगा

शुक्रवार, 1 मई 2015

प्रेम गीत


दे सकते है तुम्हे क्या, दिल लेके हम तुम्हारा
आज अपनी तमाम सांसे, तेरे नाम मै करती हूँ
इक बात अब तलक जो, तुमसे भी छुपाई है
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

पायल गहने कंगन मोती, सब झूठे से लगे है
अंखियों में ना रुके है , ये काजल भी अब तो
सोचती रहती हूँ हर पल बस, तेरे ही बारे मे
दर्पन मे तुम्ही तुम नजर आने लगे हो हमको
तेरी बेसब्र मोहब्बत का ही मै सिंगार करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

तुम पर ही जिन्दगी की, हर आस अब टिकी है
ना हो यकी जो हम पर, तो पूँछ लो मौसम से
परवाह नही हमको बेदर्द दुनिया की रस्मों की
मर जायेगे बिन तेरे , हम कहते है ये कसम से
दिन रात शामो सुबह तेरा इन्तजार मै करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

ना जाने क्या देखा, क्या पाया तेरी आंखों मे
फिर दिल ही ना चाहा, देखूँ और कोई सूरत
बरसों से थी तमन्ना इस दिल मे कोई आये
मिल कर लगा तुम्ही हो मेरे प्यार की मूरत
तन मन से तुम्हे अपना, स्वीकार मै करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

आज अपनी तमाम सांसे, तेरे नाम मै करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ
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