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बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

एक दीवाली ऐसी भी


दिल्ली की पाशॅ कालोनी मयूर बिहार से सटी हुयी है, राधे की झोपडी। पूरी कालोनी दुल्हन सी सजी हुयी है । और ठीक चिराग तले अंधेरा की कहावत को चरित्रार्थ कर रही थी उसकी छोटी सी झोपडी जिसमें सारी दुनिया का अंधकार समाया हुआ था । राधे और सुखमयी की दीवाली तब शुरु होती थी जब सारी कालोनी त्योहार मना कर थक कर सो जाती थी , तब रात ढले दोनो कालोनी की गलियों में निकलते और बुझी हयी मकान पर लगी मोमबत्ती , दिये बिनते , पटाखों के बिखरे हुये कागजों में बिन जले पटाखे और आधी जली छुछुरियां ढूँढने की कोशिश करते । आज भी जब पूरी कालोनी दीवाली के जश्न में डूबी हुयी थी, सुखमयी अपने दोनो बच्चों को ये कह कर सुला रही थी , कि अभी तुम लोग सो जाओ, जब ये इन सब लोगों के पटाखे खत्म हो जायेगे तब हम लोग पटाखे छुडायेगें, दिये जलायेगें, अभी तो लक्ष्मी जी भी किस किस के घर जायेगी, मगर तब जब सिर्फ अपने घर में दिये जलेगे तो अपने ही घर आ कर रुकेंगीं । मगर क्या पता था कि आज की रात उनको ऐसी भी दीवाली नसीब नही होगी। वो अपनी गली से निकल कर सडकों पर अपने बच्चो की दीवाली ढूँढ ही रहे थे , कि तभी सुखमयी की नजर एक मकान की बालकनी पर रखे बिन जले अनार पर पड गयी , उसे लगा जैसे उसने अपने बच्चों के लिये कोई खजाना देख लिया, आज ही तो दिन में , मुनेर(उसके छोटे लडके) ने कहा था अम्मा इस बार एक अनार ला देना ना , अम्मा उसमे बहुत सारा उजाला होता है ,और उससे  तारे भी निकलते है । उसने अभी अनार उठाया ही था कि मकान के अंदर से एक आदमी चिल्लाया चोर चोर , उसका शोर मचाना था कि मकान के सभी लोग निकल आये , शोर सुन कर मोहल्ले वाले भी जमा हो गये , और देखते ही देखते भीड ने उन्हे अपने जश्न का एक और साधन समझ उनको लहूलुहान कर डाला । उस भीड में एक भी व्यक्ति उसकी बात सुनने वाला ना था , या शायद उस गरीब की आवाज में इतना दम नही था जो उन रहीसों के कानों तक जा पाती ।
भीड उस पर अपना जोर दिखाती रही और मकान की मुडेर पर रखा अनार बेबसी से सब देखता रहा, और सोचता रहा कि काश वो मुनेर के घर जा पाता, और उस मासूम को कुछ खुशियां दे पाता ..........



दीप जल रहे है गली गली
आंगन आंगन सजी रंगोली
हर मन मे खिले खुशहाली
आओ ऐसे मनाये दीवाली

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

अह्सास की आवाज


दो घडी गुजारी थी मोहब्बत में कभी ,

बैचैन हुआ था ये दिल भी कभी,
 
अह्सासों के आगोश में हम भी खोये थे कभी,

जिन्दगी खूबसूरत सी लगी थी कभी,

वक्त को थमते देखा था कभी,

जमीं आसमां मे मिलते नजर आयी थी कभी,

तपती धूप भी भली लगी थी कभी,

इन होठों पे मुस्कान खिली थी कभी,

दुआओं के लिये हाथ उठे थे कभी,

हर रंग में इश्क बसा लगता था कभी

तनहाई भी ना तन्हा लगती थी कभी

इक नाम ही जुबां पे रहता था कभी

सब कुछ वैसा ही तो है आज भी मगर

तेरे होने ना होने का फर्क साफ नजर आता है

कहती नही किसी से , और कहूँ भी तो क्यों

जब तेरे सिवा कौन मुझको समझ पाता है

धूप की तपिश आज भी महसूस नही होती

हर रंग में तेरा प्यार नजर आता है

वक्त वही थम गया सा लगता है

तेरे अह्सास में ही दिल खोया रहता है

लोग कहते है दुनिया हर पल बदलती रहती है

मुझे तो कुछ भी बदला नजर नही आता

कल भी तुम ही रहते थे निगाहों में मेरी

आज भी नजरों को सिर्फ तू ही नजर आता है
सिर्फ तू ही नजर आता है ..................




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