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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नये साल की शुभकामनाये


नया साल मुबारक सबको 
पूरी हो सबकी अभिलाषाये
जो रह गयी है आशाये अधूरी
वो नव वर्ष में पूरी हो जाये
नये साल की शुभकामनाये .... 

बिछ्डों को अपने मिल जाये
टूटे दिल फिर से जुड जाये
आने वाला साल अपने संग
हर रात दीवाली सी लाये
नये साल की शुभकामनाये ....  

रहे हर देश में  खुशहाली
हाथ रहे  ना कोई खाली
धरा भी हो जाये हरियाली 
ऐसी इक क्रान्ति ले आये 
नये साल की शुभकामनाये ....  

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

नये साल की नयी सुबह आने को है......

नये साल की नयी सुबह आने को है
उम्मीदे फिर नये ख्वाब सजाने को है

सज गये है बाजार फिर से खुशियों के
कुछ नये खरीदार दाम लगाने को है

कैसा रहेगा नया साल आपके लिये
भविष्यवक्ता फिर से ये बताने को है

सुकून लायेगा या कुछ बेरहम धमाके
आज यही फिक्र, बेबस जमाने को है

नये साल की शुभकामनाओ के सहारे
फीके पडे रिश्तों मे चमक आने को है

दामन में सजेगें कुछ और भी सितारे
अधूरे रहे अरमान मंजिल पाने को है

ढल रहा बीते साल का ,सूरज धीरे धीरे
नयी अंगडाई लिये जनवरी आने को है

नये साल की नयी सुबह आने को है
उम्मीदे फिर नये ख्वाब सजाने को है

रविवार, 19 दिसंबर 2010

वो खत के पुरजे



कितना सुहाना दौर हुआ करता था , जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।
                               खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था , तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है , क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी , और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे , जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।
                 पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था , और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता – कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं । 
                                   और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे  । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।
खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय , वरना तो शामत आई समझो ।
                  अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है , हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो ।आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।
                        आज भी  मेरे पास कुछ खत है  जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने)  और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।


आज भी तेरा पहला खत

मेरी इतिहास की किताब में हैं

उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया

मगर खुशबू अब भी पन्नो में है



उसके हर एक शब्द हमारी

प्रेम कहानी बयां करते है 

और तनहाई में मुझे

बीते समय में ले चलते हैं



वो खत मेरी जिन्दगी का

 हिस्सा नही ,जिन्दगी है   

 हर दिन पढने की उसे
  
बढती जाती तृष्णगी है
 

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ऐसा भी कर देते हैं लोग


जब कुछ मिलता नही चर्चा मे बने रहने को |
मासूम से इश्क को फसाद बना देते है लोग ||

जिसको पाने में तमाम उम्र लग जाती है |
उसे पल भर में ही खाक बना देते है लोग ||

बेपनाह प्यार का दावा करते है जिससे|
गुजर जाने पे चंद लम्हों मे भुला देते है लोग ||

समझाती हूँ अक्सर अपने इस नादां दिल को |
मोहब्बत की आड में सब कुछ चुरा लेते है लोग||

तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
और दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||

सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
पलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

अब तो प्रियतम आ जाओ













रजनीगंधा खिली हुयी है
अब तो प्रियतम आ जाओ
चंदा भी सोने को है
अब तो प्रियतम आ जाओ.........

नील गगन के आँचल में
मस्त पवन की खुशबू ने
मिलकर पुष्प लताओं से
राग प्रीत का छेडा है
अब तो प्रियतम आ जाओ............

जुगुनु चमक रहे राहों में
भर लो आ कर बाहों में
बसा लो मेघ से लोचन में
जुदाई का डर सता रहा है
अब तो प्रियतम आ जाओ..............


हर एक पल अब शूल हुआ
मौसम भी प्रतिकूल हुआ
नश्तर सा हर फूल हुआ
सूरज भी आने को है
अब तो प्रियतम आ जाओ ...............

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

वो कहता था ...........












वो कहता था
वो कभी झूठ नही बोलता
किसी को धोखा नही देता
वादे निभाना है उसकी आदत
इश्क को मानता है इबादत

वो कहता था
मेरा इन्तजार करना
मुझपे ऐतबार करना
मै बसता हूँ तेरे दिल में
मुझे कभी बेघर ना करना

वो कहता था
मै चाहे कही भी जाऊँ
कितना भी दूर रहूँ
पर आऊँगा लौट कर
ना जाना मुझे छोड कर

आज भी मै कर रही हूँ
उसका इन्तजार
क्योकि उसने किया था
मुझपे ऐतबार

नही बसाया है किसी को
अपने दिल में
क्योकि नही कर सकती
उसको बेघर

खडी हूँ आज भी
मै उसी मोड पर
बरसो पहले जहाँ
गया था छोड कर
जाने किस पल
वो आ जाय
मुझे ना पाकर
कही घबरा ना जाय

बस चाहती हूँ
एक बार सिर्फ एक बार
आ जाय मेरे पास
कह दे एक बार
तुम क्या चाहती हो

क्योकि हमेशा
वो कहता रहा
बस कहता रहा
और मै सुनती रही

कह ना सकी कभी
मन की बात
वरना आज
वो भी कही
किसी से कहता
वो कहती थी …………..




शनिवार, 4 दिसंबर 2010

एक अधूरा खवाब












एक अधूरा खवाब है मेरा ,
पूरा कर दो तुम कर ।
आँचल मेरा खाली कबसे ,
खुशियाँ भर दो तुम कर......

सावन की बरखा में भी,
ये मन प्यासा प्यासा था ।
इस अत्रप्त सी आत्मा की,
प्यास बुझा दो तुम कर…....

जाने कब से पता नही मै ,
तुझमे ख़ुद को खोज रही ।
एक बार ख़ुद से मुझको ,
मिलवा दो बस तुम कर.......

अगर कही हदय में तेरे ,
स्थान नही है मेरी खातिर ।
माथे पर मै सज़ा जिसे लूँ ,
पग धूल ही दे दो तुम कर ….....

सब कुछ पाया है तुझमे ही ,
फिर क्या चाँहू में ईश्वर से ।
क्या मांगूं मै अपने रब से ,
इतना बतला दो तुम कर...........

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ना जाने क्या सूझा कि













ना जाने क्या सूझा कि ,
दुश्मन से मोहब्बत कर बैठे ।
उनसे दिल को लगाने में ,
अपनो से बगावत कर बैठे ॥

पत्थर से चाहा प्यार और ,
फूलों से शिकायत कर बैठे ।
उडा कर नींदें  आंखो की ,
ख्वाबों की चाहत कर बैठे ॥

खुदा के दर पे ही उनको ,
खुदा कहने की हिमाकत कर बैठे।
उनके नूर से चेहरा को ,
पूनम का चाँद समझ बैठे ॥

अब जब सब टूटे है भ्रम मेरे,
तो सोचे  हम ये क्या कर बैठे ।
उनको पाने की हसरत में ,
हम खुद को ही खो बैठे ॥

ना जाने क्या सूझा कि ,
दुश्मन से मोहब्बत कर बैठे ।।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

बन्धन सांसों का

सावन की पूरनमासी का दिन है । बाहर बरिश हो रही है , बच्चे खेल रहे है । आज के दिन बहने अपने मायके जाती हैं या भाई बहनों की ससुराल आते है । मगर कमली के लिये आज का दिन किसी आम दिन जैसा भी नही था ।  उसके लिये भी सावन है लेकिन आसुओं की बारिश के सामने मौसम की बारिश का अस्तित्व नगण्य सा प्रतीत हो रहा है ।पिछले पाँच साल में शायद ही कोई ऐसा मंदिर बचा था जहाँ उसने ईश्वर से एक औलाद के लिये मन्नत ना मांगी थी । लकिन आज वो अपनी इस दुआ के लिये पछता रही थी । जैसे ही उसने अपनी सास को यह खुशखबरी दी , उसकी सास ने फरमान सुना दिया - बहुरिआ ई घर मा बिटिया ना अइहै ।  उसे अस्पताल जाना है  मगर वो डर रही है । बस बार बार वो यही प्रार्थना कर रही है कि बेटी ना हो , क्योकि वो उसको बचा पाने में सक्षम नही है ।
थोडी देर मे जब वो अस्पताल पहुँची तो जाँच करने के बाद डाक्टर साहिबा ने बताया कि वो दो बच्चो को जन्म देने वाली है - एक बेटा और एक बेटी ।
ईश्वर ने शायद उसकी फरियाद सुन ली थी । और अब उसे क्या करना है यह उसने तय कर लिया । घर आकर उसने अपनी सास से कहा - अम्मा  ई घर मा एक नाही दुई बच्चा आये वाले है - एक बेटवा और एक बिटिआ । औ हम बेटवा का तबही जनम दैबे जब बिटिया भी जनम लेहे । औ जउन दिना तुम बिटिया का मारै की बात करिहो हम तोहार पोता का मार डारब ।
वो जानती थी कि दादी के प्रान पोते में बसे है और बेटे में बेटी के और बेटी में उसके ।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

क्या इसी को कहते हैं श्रद्धांजलि ?


कल थी दिनांक २६ नवम्बर २०१० , कल से ठीक दो साल पहले देश में जो कुछ भी हुआ वह नही होना चाहिये था । कितने मासूम बेगुनाह लोग मारे गये शायद इसकी ठीक ठीक गणना सरकार ने दो सालों में कर ली होगी । ऐसा मै इसलिये कह रही हूँ क्योकिं मरने वालों को मुआवजे दिये गये होंगे (भले ही वो कागज पर ही दिये गये हों) । जितना दुख मुझे तब इस घटना को अखबार के पहले पन्ने पर पढ कर हुआ था उससे भी कही ज्यादा दुख आज हुआ क्योकि आज अखबार के मुख्य पृष्ठ पर हमारे देश के प्रधानमंत्री जी ने जो बयान दिया वो कुछ इस प्रकार था------
"इन हमलों में मरने वालो को उनके परिजनों के साथ समूचा देश याद कर रहा है हम संकल्प करते हैं कि मानवता के खिलाफ इस अपराध के गुनहगारों को सजा दिलाने की कोशिश को तेज करेंगें ।"
बीते दो वर्षों में सरकार सिर्फ यह तय कर पाई कि हम कोशिश को तेज करेंगें।
क्या सरकार को अपनी कोशिशों का लेखा जोखा नही देना चाहिये था ? क्या सरकार को नही चाहिये था कि मरने वालों के परिजनों के कुछ हाल ही ले लेते ? क्या वाकई सरकार को ऐसी घटनाओं के होने पर दुख होता है ,या सिर्फ सरकार बचाने की चिंता में ही उलझी रहती है । और विरोधी इसे मात्र एक अवसर के रूप में देखते हैं 

आज कल sms का भी अजीब सा प्रचलन चला है कल ही मेरे पास एक sms आया 
 "as today is 26/11, please wear white cloths for peace in the memory of all those who lost their lives last year in mumbai terr. attck and forward it to at least 15 people. " 
मुझे यह बिल्कुल समझ नही आया कि सफेद कपडे पहनना और १५ लोगों को यह भेजना  कैसे उन लोगो के लिये मददगार होगा जिनको मेरी सच्ची मदद का एक छोटा सा कदम , उनकी जिन्दगी बदल सकता है या बेहतर कर सकता है 
यदि आप पाठ्कों को कुछ समझ आता हो तो कृपया मुझे बताने का कष्ट करें ।
हम तो बस ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि देश में सदा अमन चैन बनाये रक्खे ताकि हमारे नेताओं को श्रद्धांजलि देने की परम्परा ना निभानी पडे ।
चाहे दो आंसू भी आँखो में
मेरे जाने पर ना लाना ,
मेरी शहादत का चर्चा भी
चाहे कभी जुबां पर मत लाना ।
गर मन हो कभी तेरा 
मुझे याद कर लेने का ,
किसी गरीब दुखियारे को
बस दो रोटी तुम दे देना ॥

बुधवार, 24 नवंबर 2010

काश

ये उन सभी लोगो के लिये है जो काश शब्द का प्रयोग करते है , काश अच्छा शब्द है किन्तु तब जब इसे हम भविष्य बनाने के लिये प्रयोग करें ,क्यो कि समय निकलने के बाद जब जब हम इसको बोलते है ,  तो हमेशा ये एक टीस के साथ ही आता है । 
काश  ……







जीवन के हर मोड पर ,
चुप रही ना होती ।
अनगिनत ताड्नायें ,
 सही ना होती ।

जाने कितनी बार  ,
किया खुद पर अत्याचार ।
और आँखो से छीना ,
स्वप्न देखने का अधिकार ।
काश मै
दिन या रात कभी भी ,
एक तो ख्वाब बुनती ।
कभी तो अपने मन की,
आवाज मै सुनती ।

अपना सब कुछ ,
ना करती अर्पण ।
तो शायद ना बिखरता ,
मेरा मन दर्पण ।
काश  मै
अपना भी कोई ,
जहाँ में अस्तित्व बनाती ।
अपने नाम को भी ,
थोडा सम्मान दिलाती  

खामोशी को ना  ,
समझती मै आदर्श ।
किसी पल तो करती,
किसी से तर्क – वितर्क ।
काश मै
अपनी जुबां पर ,
दो शब्द ही ले आती ।
अपने मन की कथा को ,
कोई तो रूप दे पाती ।
काश ……..

रविवार, 21 नवंबर 2010

प्रत्युत्तर्


वो  मालॅ में बम लगाने ही जा रहा था कि घर से फोन आया , उसने फोन उठाया ही था कि भाई का फोन आने लगा, उसने घर का फोन काट कर भाई से बात की । उधर से आवाज आई – ठीक १२ बजकर ५ मिनट पर रिमोट दबा देना । कोई भूल नही होनी चाहिये । जी भाई कोई गलती नही होगी । और गलती करने का तो सवाल भी तो नही उठता था , आखिर इसके लिये उसे पूरे ५० लाख मिल रहे थे । बस आज रात ही  तो उसे यहाँ से बहुत दूर अपने बीवी बच्चे को लेकर जाना था । फिर कोई अच्छा सा काम शुरु करना था । घडी पर ठीक १२ ;०५ हो गया था , उसके रिमोट दबाते ही सैकडों लोग मौत की नींद सो गये । फिर फोन बजा , आवाज आई– बहुत खूब , अब तुम  अपनी जिन्दगी जी लो। पैसे तुम्हारे घर पहुँच जायेंगें ।वह घर आ गया , और टी. वी. खोल कर की हुयी बर्बादी का मंजर देखने लगा । टी. वी. खोलते ही उसे जो पहली तस्वीर दिखी वो उसकी बीवी की थी जिसके हाथ में अभी भी अपने बच्चे के हाथ का टुकडा था । और उसका हर सपना एक ही पल में हमेशा के लिये सिर्फ सपना ही बन कर रह गया ।शायद नियति  ने उसे हर उत्तर दे दिया था ।
औरों का जला आशियां
तो लगा रौशनी हुयी कहीं ,
कम से कम अपने घर का
अंधियारा तो मिट गया  
पल भर में ही आयी
धुंये के साथ ये खबर ,
तेरे ही गुलशन का
हर इक फूल उजड गया ॥

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

एक ब्लाग इंसानियत के नाम

पिछले कुछ दिनों में हम कुछ ऐसे ब्लाग्स पर गये जहाँ किसी एक धर्म विशेष ने अपने को महान और सर्वश्रेष्ठ बताया । महान बताना कोई गलत बात नही , मगर बाकी दूसरों को गलत या कम बता कर अपने को अच्छा बताना , ये किसी बुद्धमत्ता का सूचक नही ।
मुझे तो ऐसा लगा जैसे ब्लाग जगत पर कोई धर्म युद्ध सा चल रहा है । टिप्पणी का उपयोग एक दूसरे पर छींटाकसी के लिये हुआ । शायद यह तो ब्लागिंग का उद्देश्य नही होना चाहिये । कम से कम कोई तो जगह बची रहनी चाहिये जो वैचारिक प्रदूषण से मुक्त हो । और अगर हमें किसी धर्म की बात करनी ही है तो फिर हमें एक ऐसा धर्म चुनना होगा जो वैश्विक है - इंसानियत का धर्म । और मुझे लगता है कि किसी को मेरी इस बात से असहमति नही होगी कि इंसानियत का धर्म सर्वश्रेष्ठ नही  । हम सभी का यह कर्तव्य होना चाहिये कि हम कुछ ऐसा लिखे जिससे जो लोग भी इससे विमुख हो रहे है उन्हे सही मायने में एक सत्य मार्ग मिले । क्यों कि

बुरा कोई मजहब नही , बुरा नही कोई धर्म ,
अगर कुछ सुधारना है तो वो हैं बुरे हमारे कर्म ॥
समझ सको तो समझ लो वेद कुरान का मर्म ,
ना करो ऐसा काम के इंसानियत को आये शर्म ॥

रविवार, 14 नवंबर 2010

पहलू जिन्दगी के

बात कुछ भी हो ,उनका जिक्र हो ही जाता है ।
याद करने का बहाना बन ही जाता है ॥


वो भले हमसे कुछ कहे ,या खामोश रहे ।
नजरों से उनकी प्यार छलक ही जाता है ॥


राहें कितनी भी मुश्किल हो ,हौसले हो अगर ।
मंजिलों का पता राहों से निकल ही आता है ॥


लाख चाहें न किसी से ,हम मिलना तो क्या  ।
जिनसे मिलना हो वो निगाहों में आ ही जाता है ॥


कोशिश करते हैं लाख ,खुश रहने की मगर ।
उदास दिल हो तो आसूँ छलक ही जाता है ॥


चाहे कितना भी संभल के ,कोई फूल चुने ।
कोई कितना भी बचे कांटा चुभ ही जाता है ॥


क्या होगा तकदीर पे ,रोने से रात दिन ।
हाथ की लकीरों को कोई मिटा नही पाता है ।।

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

खूबसूरत साजिश


सुहासिनी अस्पताल जा चुकी थी, मै भी आफिस जाने के लिये तैयार हो रहा था कि मुझे चक्कर आने लगा । इधर काफी दिनों से थोडा सा भी काम करने से ऐसा हो रहा था । सुहसिनी मुझे कुछ दवाइयां दे देती थी ।सोचा कि सुहासिनी के मेडिकल रूम से वो दवा ले लेता हूँ । दवाई की दराज खोलते ही मुझे मेरी मेडिकल रिपोर्ट दिखाई दी , मुझे कैंसर था । रिपोर्ट पढते पढते मेरी नजर वही रक्खी सुहासिनी की डायरी पर पडी । डायरी पर लिखे शब्दों ने तो मेरे चारो तरफ अंधेरा सा कर दिया था । सुहासिनी शादी से पहले जानती थी कि मुझे कैंसर है ,और मेरी उम्र बहुत कम ही बची थी । और इसीलिये उसने मुझसे शादी की थी कि मेरे जाने के बाद मेरी सारी दौलत और जायजाद उसकी हो जायगी । और ये सब केवल उसकी अपनी  सोच नही थी , इस साजिश में मेरा वो दोस्त शामिल था जो तब से मेरे साथ था जब से मैने दुनिया को जानना शुरु किया था । उन दोनो को सिर्फ उस दिन का इन्तजार था मेरी मृत्यु का । मेरी जाते ही उनको अपना घर बसाना था । 
                                                      एक तरफ शशांक जिस पर मै खुद से ज्यादा भरोसा था और दूसरी तरफ थी सुहासिनी जिसे मैने जिन्दगी माना था , उन दोनो ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया मुझे समझ नही आ रहा था । मै एक बिखरे पत्ते की तरह जमीन पर गिर पडा । तभी मुझे एक आवाज सुनाई दी । उन दोनो ने तुम्हारे साथ छल नही किया , तुमको तो जिन्दगी दी है , आखिर रक्त कैंसर तुमको कितने दिन की जिन्दगी देता साल या दो साल । मरना तो तय ही था ना । बचपन मे माँ और पिता जी को खोने के बाद  इस पैसे के सिवा मेरे पास था ही क्या ? प्यार क्या होता है ये तो मैने सुहासिनी से ही जाना था ,शशांक ने हमेशा हर मुश्किल में मेरा साथ निभाया । और अगर यह सच भी हो कि दोनो ने तुम्हारे खिलाफ कोई साजिश तुम्हारी दौलत पाने के लिये की थी तो भी जाते जाते मुझे वो हर खुशी दी थी जिसके लिये मै तरसता था । फिर दौलत तो मेरे जाने के बाद किसी ना किसी को तो मिलती ही । ये आवाज मेरे मन की ही थी । अब मेरे मन में कोई शोक नही था । मैने एक बार फिर से डायरी में लिखे शब्द पढे " शशांक मुझे मालूम है कि तुम मुझे प्यार करते हो लेकिन आकाश अब कुछ ही दिन का मेहमान है , इसलिये मै आकाश से शादी कर रही हूँ मै खुश हूँ कि ये केवल मेरा नही हमारा निर्णय है ,आखिर कुछ ही दिनों की बात है  " मै खुश था कि मेरे दोस्त और पत्नी ने मेरे खिलाफ इतनी खूबसूरत साजिश की थी । अब मै खुशी से मरने के लिये और बाकी बची जिन्दगी खुशी से जीने के लिये तैयार था ।

सोमवार, 8 नवंबर 2010

वापसी


जिस तरह चिडिया दिन भर घूमने के बाद अपने घोसले में लौट कर आती है वैसे ही मै भी लौट रहा था , मगर मै एक या दो दिन बाद नही , करीब ३५ साल बाद लौटा था अपने घोसले की तस्वीर तक धुंधली सी हो गयी थी एक मन में डर भी था कि मेरे वो अपने जिनको एक दिन मै छोड कर शहर गया था , वो मुझको पहचानेंगे भी या नही बस मन में ऐसे ही ढेरों सवाल और एक आशा की किरण साथ लिये मैं वापस रहा था जिस गली , जिस गाँव को अपनों को मैने तरक्की के लिये छोडा था , आज भी जब मै लौट रहा था तो हाथ खाली ही थे जिसको जीवनसंगिनी बनाने के लिये मैने अपनों को छोडा था , आज वो भी मुझे छोड कर जा चुकी थी उस दिन मैने खुद को यह सोच कर समझा लिया था कि ये तो कटु सत्य है कि हर किसी को एक दिन जाना ही है और फिर बेटा तो है ही , उसके साथ रह कर बाकी की उम्र कट जायगी जिस दिन मै रिटायर हो कर अपने आफिस से लौटा घर कर पता चल गया कि अब मै घर से भी रिटायर हो गया हूँ खाने के लिये दो रोटी की कमी तो नही थी मगर एक बूँद प्यार और सम्मान की नसीब नही थी और जब अपमान कराते कराते मन भर गया और आँखो से आंसू निकल पडे तो याद वो घर आया जिसके आंगन ने मुझे चलना सिखाया था
आज मै उनके पास लौट रहा हूँ जिनका मैने अपमान किया था और मन चाहता है कि बस जाते  ही सब मुझे गले से लगा लें सब वैसा ही हो जैसा मै छोड कर गया था नही जानता मेरी वापसी सही है या गलत , मेरी वापसी किसी को अच्छी लगेगी भी या नही मगर चिडिया अपना घोसला छोड कर आखिर जाये भी तो जाये कहाँ ??
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