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रविवार, 14 नवंबर 2010

पहलू जिन्दगी के

बात कुछ भी हो ,उनका जिक्र हो ही जाता है ।
याद करने का बहाना बन ही जाता है ॥


वो भले हमसे कुछ कहे ,या खामोश रहे ।
नजरों से उनकी प्यार छलक ही जाता है ॥


राहें कितनी भी मुश्किल हो ,हौसले हो अगर ।
मंजिलों का पता राहों से निकल ही आता है ॥


लाख चाहें न किसी से ,हम मिलना तो क्या  ।
जिनसे मिलना हो वो निगाहों में आ ही जाता है ॥


कोशिश करते हैं लाख ,खुश रहने की मगर ।
उदास दिल हो तो आसूँ छलक ही जाता है ॥


चाहे कितना भी संभल के ,कोई फूल चुने ।
कोई कितना भी बचे कांटा चुभ ही जाता है ॥


क्या होगा तकदीर पे ,रोने से रात दिन ।
हाथ की लकीरों को कोई मिटा नही पाता है ।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. क्या होगा तकदीर पे ,रोने से रात दिन ।
    हाथ की लकीरों को कोई मिटा नही पाता है ।।
    अपर्णा जी हम हाथ की लकीरों के भरोसे तो नहीं बैठ सकते ना. अच्छी अभिव्यक्ति .

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  2. बहुत खूब... बस पीले रंग में लिखा समझ नहीं आया... कृपया दूसरे रंग के साथ पोस्ट करें...

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  3. चाहे कितना भी संभल के ,कोई फूल चुने ।
    कोई कितना भी बचे कांटा चुभ ही जाता है ॥

    प्रभावशाली पंक्तियां। बहुत खूब लिखा है आपने...बधाई।

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  4. राहें कितनी भी मुश्किल हो ,हौसले हो अगर ।
    मंजिलों का पता राहों से निकल ही आता है ॥


    सौ आने सच...सुंदर रचना..बधाई

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  5. चाहे कितना भी संभल के ,कोई फूल चुने ।
    कोई कितना भी बचे कांटा चुभ ही जाता है ॥

    खूबसूरत रचना ...

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  6. राहें कितनी भी मुश्किल हो ,हौसले हो अगर ।
    मंजिलों का पता राहों से निकल ही आता है ॥

    बहुत खूब....सुंदर रचना

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  7. सुन्दर रचना ,
    सहमत हू इस कविता की पत्येक पंक्ति से
    इस सुन्दर रचना के लिए आप को बधाई

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  8. अनमोल पलों को खोकर हम
    कुछ नश्वर चीजे पाते है
    और उस पर मान जताते है
    यह अभिमान छणिक है बंधू
    समय का कौन ठिकाना है
    जो मंगल गीत बना उसको
    निश्चित मातम बन जाना है.
    ज़िंदगी के तमाम पहलुओं को समेटती रचना ................

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  9. क्या होगा तकदीर पे ,रोने से रात दिन ।
    हाथ की लकीरों को कोई मिटा नही पाता है ।।

    बहुत ही सत्य बात कहीं है आपने इन पंक्तियों के माध्यम से.

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  10. आपकी ये रचना बहुत अच्छी है.
    आपके ब्लॉग पर आकार भी बहुत ख़ुशी हुई .
    आपकी दूसरी पोस्ट भी पढ़ी ...बहुत उम्दा लिखती हैं आप.
    आपको शुभकामनाएँ.......................

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  11. बहुत ही अच्छा लिखा है ...बधाई....

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  12. जो यादो में,दिल की गहराइयो में,साँसों में बसा हो उसे हर पल हर छण हम अपने आस पास पाते है........अच्छी रचना !

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  13. "वो भले हमसे कुछ कहे ,या खामोश रहे ।
    नजरों से उनकी प्यार छलक ही जाता है ॥"

    पलाश जी, मालूम है ऐसा क्यों होता है,क्योंकि :-

    ख़ामोशी भी ज़बान होती है.

    कुँवर कुसुमेश
    blog:kunwarkusumesh.blogspot.com

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  14. किसकी बात करें-आपकी प्रस्‍तुति की या आपकी रचनाओं की। सब ही तो आनन्‍ददायक हैं।

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  15. आप हमारी पोस्ट पर आयी हमारी विरह वेदना पढ़ी..

    हमारी पीठ थपथपायी, हमारे दर्द को मरहम मिल गया ..

    Thanks

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  16. ज़ोर आज़माते रहिये,
    धीरे-धीरे निखर जाओगे!
    अपनों से बतियाते रहो,
    नहीं तो बिखर जाओगे!!

    अच्छा प्रयास है !

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  17. क्या होगा तकदीर पे ,रोने से रात दिन ।
    हाथ की लकीरों को कोई मिटा नही पाता है
    lakin in hatho se bahut kuch sunder banaya ja sakata hai.
    bahut sunder.

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  18. जो प्रारब्ध में है उसे अपने सद्कर्म द्वारा अशुभ को भी शुभ में बदला जा सकता है.वैसे सही भवव्यक्ति है.

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आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

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