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बुधवार, 3 नवंबर 2010

कहाँ है मेरा घर ???


जिस आँगन को लीपा बचपन से , 
हर दीवाली बनायी जहाँ रंगोली ।
जिसकी चौखट पर गेरू लगाया ,
और सजायी गुडिया की डोली ॥

माँ के आँचल मे सोयी और ,
खेली भी खूब मै जी भर ।
पर हर दिन एक बात  सुनी ,
है परायी तू , नही है ये तेरा घर ॥

बचपन से जवानी की दहलीज तक ,
हर रात सजाती रही इक सपना ।
दिखता था मुझे जिसमें वो घर ,
जिसे कहती थी मै घर अपना ॥

आखिर वो दिन भी आया ,
जब बाबुल ने मेरा ब्याह रचाया ।
पर हुयी विदा तब माँ ने कहा,
जा बेटी अब पिया के घर ॥

सच ही कहा था माँ ने ,
वो भी घर नही था मेरा ।
कमी ना थी कोई लेकिन फिर भी ,
कही भी नाम नही था मेरा ॥

धीरे धीरे वक्त गुजरता रहा ,
और बढा मेरा परिवार ।
और हो गया था साथ में ,
मेरे अधिकारों का विस्तार ॥

समझने लगी थी अबतो मै ,
इस घर को अपना ।
मगर इक बार फिर ,
टूटा मेरा सपना ॥

बडा हो गया था बेटा ,
और शादी उसकी हो गयी थी ।
अपने ही घर में एक बार फिर ,
मै परायी हो गयी थी ॥

सारी उम्र तलाशती रही बस ,
मै इक अपना छोटा सा घर ।
मगर सदा ही मिली मुझे ,
बस सूनी सी लम्बी डगर ॥

खत्म होने को है अब तो आया ,
इस जीवन का सफर । 
कोई बता दे मुझको इतना ,
कहाँ है मेरा घर ??
कहाँ है मेरा घर ……………



13 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों घर तेरे है पगली जब जी चाहे जहा रहे
    दुहिता कहलाती है तू दोनों कुल का उद्धार करे

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  2. घर तो अपनों से होता है . ये दुबिधा वाली स्थिति सचमुच पीड़ा दायक होती है . आपने मनोभावों को एकदम सटीक शब्द दिये है , आभार .

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  3. लडकियों का तो दोनों ही घर होता है चाहे वो मायका हो या ससुराल !तभी तो विवाह के पश्चात् अक्सर पति से विवाद होने पर स्त्रिया कहती है की मै मायके चली जाउंगी और यदि पति नाराज हो या दुखी हो तो वह कहा जाये क्योकि रहता तो है मायके में ही !और एक बात यदि बेटे के विवाह के बाद माँ से उसका घर छुटता है तो उसमे भी कही न कही बहु भी एक कारण होती है !वैसे आपकी रचना उम्दा है खासकर आप लेखनी की धनी है!दीपमाला पर्व की बहुत बहुत बधाई हो .............

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  4. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये
    परिवार सदस्यों से और घर उन के बीच प्यार से बनता है . प्यार साथ रहने से बढ़ता है .जहा प्यार नही वहां घर कहाँ ?
    आप की कविता सटीक तरीके से एक नारी की व्यथा को चित्रित करती है .

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  5. सारी उम्र तलाशती रही बस ,
    मै इक अपना छोटा सा घर ।
    मगर सदा ही मिली मुझे ,
    बस सूनी सी लम्बी डगर ॥

    खत्म होने को है अब तो आया ,
    इस जीवन का सफर ।
    कोई बता दे मुझको इतना ,
    कहाँ है मेरा घर ??
    कहाँ है मेरा घर ……………
    is ghumadte mann ko kaun jawab de ...bahut hi achhi rachna ... shubh diwali

    उत्तर देंहटाएं
  6. सारी उम्र तलाशती रही बस ,
    मै इक अपना छोटा सा घर ।
    मगर सदा ही मिली मुझे ,
    बस सूनी सी लम्बी डगर ॥

    Bahut sunder..... DIWALI KI SHUBHKAMNAYEN

    उत्तर देंहटाएं
  7. दीपावली के इस पावन पर्व पर आप सभी को सहृदय ढेर सारी शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  8. सारी उम्र तलाशती रही बस ,
    मै इक अपना छोटा सा घर ।
    मगर सदा ही मिली मुझे ,
    बस सूनी सी लम्बी डगर ॥

    waah ! umda prastuti

    .

    उत्तर देंहटाएं
  9. bahut hi achcha likha hai aapne
    please keep writing

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  10. सुन्दर रचना। बधाई।आपको व आपके परिवार को भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

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  11. बदलते परिवेश मैं,
    निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
    कोई तो है जो हमें जीवित रखे है ,
    जूझने के लिए प्रेरित किये है,
    उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
    हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
    यही शुभकामना!!
    दीप उत्सव की बधाई...........

    उत्तर देंहटाएं
  12. सारी उम्र तलाशती रही बस ,
    मै इक अपना छोटा सा घर ।
    मगर सदा ही मिली मुझे ,
    बस सूनी सी लम्बी डगर ॥

    bahoot sahi kaha aapne..........very nice.

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