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रात दिन जलता हूँ दिल की जलन मिटाने को
आँख से गिरता है पानी ये आग बुझाने को
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मुझे मौसम के बदलने की खबर नही होती
कि मै उनके दिल मे रहता हूँ, मकां में नही
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जिन्दगी जीने और काटने का, फर्क बस इतना सा है
तुम साथ हो तो जी लेते हैं, वरना तो ये कटती ही है
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कैसे कह दूं, आसूं ये, बेवजह यूं ही छलके हैं
खामोश नजर के सामने, कुछ टूटा है या छूटा है
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साथ और पास जब 
मिल जाता है तुम्हारा 
मै धरा तुम गगन और
जहाँ चमन बन जाता है।
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आसां था सफर, ख्वाब सच करने का 
कदम कदम पे मुश्किलों का कारवां था
मगर कुछ जिद हमने भी ठान रखी थी
मुश्किलों को फिर कदमों पे आना ही था
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गम और खुशी से परे है जो डगर
उस गली में बनेगा मेरा आशियां
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शब्दो ने दम तोड़ दिया, मौन पर निर्भर हुयी सांसे
प्रेम भी निष्प्राण हुआ जब विश्वास की सिमटी बांहे
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नही बनना मुझे सीता, नही दूंगी परीक्षा अब
प्रमाणित वो करे पहले, कि वो ही राम है मेरे
क्या कहते जब पूछा उसने बताओ कितना प्यार करते हो
हमे मिली फुर्सत प्यार से जो नाप तौल प्यार की करते
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खुदा भले बख्श मुझे, दौलत शौहरत का असबाब 
बस आखिरी सांस निकले सुकून से, ऐसा इंतजाम कर
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चिराग मोहब्बत के जलाना बुरी बात नही
शर्त बस इतनी किसी घर में आग लगे
हाथ थामने से पहले ये भी जरा ख्याल रहे
इज्ज़त आबरू पे कहीं कोई दाग लगे
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हार मान जाऊं ऐसे हौसले हुऐ नही
जश्न जीत का हो ऐसे वक्त मिले नही
फिजां में गर सुकून चैन की हवा नही
मेरी नजर में मुल्क से जयसिंह मिटे नही
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उसका होना समझ आया, उसके जाने के बाद 
उसका होना समझ आया, उसके आने के बाद
जरूरत और जरूरी, दोनो ही थे एक दूजे के लिये, 
फासलों का होना समझ आया, एक होने के बाद
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कुछ छोड गए, कुछ छूट गये
कुछ जाने अनजाने रूठ गये 
कुछ यूं चलता रहा ये सफर
कुछ याद रहे कुछ भूल गये
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कुछ भी कहना फिर बाकी रहा
जब अनकहा भी तुमने पढ लिया
कैसे ठहर जाते तेरे कूचे मे हम
जब हर सहारा तेरी बाहों मे मिला
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मतभेद वही पर उपजतेै, जहाँ हो भावों का अभाव
थोडा समझ में सुधार से, सम्भव सुधरना स्वभाव
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कोई वतन को बेचता है चंद सिक्को के खातिर 
कोई वतन को छोडता है चंद सिक्को की खातिर
कैसी अजब सी हवा हुयी है मेरे वतन की यारो
कोई वतन को तोडता है चंद सिक्को की खातिर
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मत पूछिए मुझसे मेरे मजहब का नाम 
कि अब तक मै आजाद हूं कुछ सकरी दीवारो से
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कुछ दर्दो का आखों से बह निकलना नही अच्छा 
कि देखा है कुछ आँसूओं को, वजह तूफां की बनते
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तेरे नयनो मे बसते ही , पूर्ण विराम हो जाती हू।
स्पर्श तुम्हारा पाते ही, सिंदूरी शाम हो जाती हू
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मोहब्बत दवा है, दुआ है ,इबादत है ,खुदा है
खामखा ही रोग कह, सबने बदनाम किया है

कभी हँसते थे हम भी खुलकर 
वो दिन अब याद आते है
अब तो रोना भी छुप छुप कर
नही मुहाल होता है
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