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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

Welcome 2017 "आज कोई नवगीत लिखूँ............"


मन कहता इस नववर्ष पर, आज कोई नवबात लिखूँ
भूल के सारे द्वेष सभी से, अपने मन का राग लिखूँ

बीते समय की सात तहों में, कुछ खट्टे कुछ मीठे पल हैं
जिन लम्हों में रोये हँसे, चाहे अनचाहे स्मरणीय कल हैं
सोच रही यादों के वन से, चुनचुन कर उल्लास लिखूँ
भूल के सारे द्वेष सभी से, अपने मन का राग लिखूँ

बदल रहे है लोग अगर तो, इसको सहज स्वीकार करो
निज में बिन कटुता लाये, उन सबका भी आभार करो
भाव जो अलिखित रहे, उनका शब्दों से सत्कार लिखूँ
भूल के सारे द्वेष सभी से, अपने मन का राग लिखूँ

आशा और निराशा साथी, दोनो ही गति अपने मन की
धूप छाँव के खेल खेलती, चंचल बदली हमसे जीवन की
मन की पीडा को कलम बना, औरो की मुस्कान लिखूँ
भूल के सारे द्वेष सभी से, अपने मन का राग लिखूँ

मन कहता इस नववर्ष पर आज कोई नवगीत लिखूँ
भूल के सारे द्वेष सभी से, अपने मन का राग लिखूँ

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

कब अच्छा लगता है














घर आंगन छोड के जाना, कब अच्छा लगता है
आँखों से आँसू छलकाना, कब अच्छा लगता है

रोटी की मजबूरी, अक्सर छुडवा देती अपना देश
पराये देश में व्यापार फैलाना कब अच्छा लगता है

माँ के हाथों की खाये बिना, बस पेट ही भरता है
ऑडर देकर सीमित खाना, कब अच्छा लगता है

बेजान रंगी्न शहरों में, फ्रैंडशिप तो मिल जाती है
गली मुहल्ले के यार छोडना, कब अच्छा लगता है

आँख मिचौली, गिल्ली डंडे, सब राह ताकते देहरी पे
खेलों का वीडियो गेम हो जाना, कब अच्छा लगता है

फीके स्वाद सेवइयो के और , बेनूर दीवाली होती है
दूर अपनो से त्योहार मनाना, कब अच्छा लगता है

बेफिक्र ठ्हाके लगते थे, छत पर गर्मी की रातों में
अदब से नाप कर मुस्कराना, कब अच्छा लगता है

नरम बिस्तरों में छुपकर, बचपन सिसक कर रोता है
नन्हे छुटकू को साहब हो जाना, कब अच्छा लगता है

चाचा चौधरी, बिल्लू पिकीं से बनती थी अपनी दुनिया
आप अपनी दुनिया बिखरा देना कब अच्छा लगता है




शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

स्त्री - भोग्या नही भाग्य है


मेरी मुस्कान, कब बन गयी मौन स्वीकृति
वो स्वीकृति जो मैने कभी दी ही नही
वो स्वीकृति जो चाहता था पुरुष
कभी अनजानी लडकी से, कभी अपनी सहकर्मी से
कभी अपनी शिष्या से, कभी जीवनसंगिनी से
खुद से ही गढ लेता है पुरुष
वो परिभाषायें जैसा वो चाहता है
और परिभाषित कर देता है
स्त्री का पहनावा, उसकी चाल ढाल
अधिकारी बन जाता है समाज
आंचल में ट्कने को अनगिनत नाम
हद की पराकाष्ठा को भी पार करते हुये
अपने हिसाब से रच देता है उसका चरित्र
दोषी बन, नजरें छुपाये ताने सुनती है वो
छलनी की जाती है जिसकी अस्मिता 
तार तार हो जाता है सुहागिन बनने का सपना
और लुटेरा छलता रहता है जाने कितने सुहाग
कब समझेगा दम्भी, अभिमानी पुरुष
बल से मिलती है जय, सिर्फ संग्राम में
स्त्री रण नही, दामिनी है मानिनी है,
शक्ति का प्रतीक, जीवन की निशानी है
लाखों वीर्य करते हैं झुक कर निवेदन,
तब कभी किसी एक को मिलती है अनुमति
अपने अस्तित्व को विकसित करने की
स्त्री की पनाह में पलता है, बनता है
स्त्री करती है पल पल रक्षा
देती है अपना रक्त बनाने को तेरा नैन नक्शा
स्त्री स्वयं जया है, अविजित है
पुरुष तो अस्तित्व के लिये ही आश्रित है
उसे आश्रिता कहने की ना कर भूल
ना कर विवश कर कि बन जाय वो शूल
जिस दिन करेगी वो इन्कार बनने से जननी
पुरुष बिन कुछ किये ही मिट जायगा
धरा का अस्तित्व ब्रहमाडं से मिट जायगा
ना होगा पुरुष, ना होगी स्त्री,

हो जायगी एक पत्थर सी पृथ्वी

शनिवार, 17 सितंबर 2016

स्व प्रतिभागी


रोहित का आज आठवीं कक्षा का परिणाम घोषित होना था। पिछले वर्ष वह प्रथम आया था, इस वर्ष भी उसे यही उम्मीद थी। विघालय में प्रतिवर्ष परीक्षा परिणाम घोषित करने के लिये एक बडा आयोजन होता था। जिसमें सभी बच्चों के अभिभावक आमन्त्रित किये जाते थे। किसी कारणवश रोहित के पिता जी आज इस समारोह में नही आ सके थे।
परिणामों की घोषणा हुयी, और उम्मीद के अनुसार, रोहित इस वर्ष भी अपनी कक्षा मे प्रथम स्थान पर रहा। उसे अपने पिता जी के ना आने का दुख हो रहा था।
रोहित आयोजन समाप्त होने का बेसब्री से इन्तजार करने लगा कि कब वो घर पहुचे और कब अपने पिता जी को रिपोर्ट कार्ड दिखा कर उनसे पुरस्कार ले।
घर आते ही उसने पिता जी को जैसे ही अपना रिसल्ट दिखाया, उनके चेहरे पर खुशी की जगह उदासी की लकीरें देख रोहित हैरान हो गया। उसे लगा शायद पिता जी ने मेरा प्रथम स्थान नही देखा। अधीर होते हुये उसने पिता जी से कहा- पापा में इस बार भी फस्ट आया हूँ, यह सुनकर उसके पिता जी ने कहा- रोहित प्रथम नही तुम तो अन्तिम आये हो। रोहित को कुछ समझ नही आ रहा था। फिर भी उसे यकीन था उसके पिता जी यदि यह कह रहे है तो कोई तो बात होगी। बहुत सहज होकर उसने कहा- कैसे पिता जी।
पिता जी ने कहा- रोहित पिछले वर्ष की तुलना में तुम्हारे अंको का प्रतिशत काफी कम है। कक्षा हो या जीवन हमारी प्रतियोगिता स्वयं से होनी चाहिये। तुम अपनी कक्षा में जरूर प्रथम हो तब जब तुम अपने साथ पढने वाले छात्रों को अपना प्रतिभागी समझते हो, किन्तु यदि तुम स्वयं के प्रतिभागी होते हो तुम प्रथम नही आते।
रोहित को समझ आ रहा था कि उसके पिता जी उससे क्या कहना चाह रहे थे।


हम सबको भी हमेशा स्वयं का प्रतियोगी होना चाहिये। दूसरों के साथ की गयी तुलना वास्तविक नही है। और कई बा यही तुलना हमारे लिये ईर्ष्या बन जाती है। स्वयं से की गयी प्रतियोगिता सदैव सकारात्मक परिणाम ही देती है। 

बुधवार, 7 सितंबर 2016

हिन्दी, हिन्द की आत्मा है



हिन्दी जन जन की भाषा है
हिन्दी विकास की आशा है
हिन्दी में है हिन्द बसा
हिन्दी अपनी परिभाषा है

हम सोच रहे है हिन्दी में
दिल समझे अपना हिन्दी में
फिर क्यो शर्माते फिरते है
जब बोल रहे हम हिन्दी में

कम्प्यूटर के है निकट हिन्दी
हिन्दी है भारत की बिन्दी
हिन्दी है अपनी सौम्य सरल
हिन्दी से है भारत का कल

हिन्दी दिवस अभी तो मनायेगे
कल इंगलिश इंगलिश चिल्लायेगे
हिन्दी मे सब सम्भावित है
हिन्दी सुगम सरल प्रभावित है

हिन्दी को न्याय दिलाने को
इसे विश्व पटल पर लाने को
संकल्प करे सब मिल कर ये

हिन्दी में ही हम काज करें

हिन्दी, हिन्द की आत्मा है

हिन्दी जन जन की भाषा है
हिन्दी विकास की आशा है
हिन्दी में है हिन्द बसा
हिन्दी अपनी परिभाषा है

हम सोच रहे है हिन्दी में
दिल समझे अपना हिन्दी में
फिर क्यो शर्माते फिरते है
जब बोल रहे हम हिन्दी में

कम्प्यूटर के है निकट हिन्दी
हिन्दी है भारत की बिन्दी
हिन्दी है अपनी सौम्य सरल
हिन्दी से है भारत का कल

हिन्दी दिवस अभी तो मनायेगे
कल इंगलिश इंगलिश चिल्लायेगे
हिन्दी मे सब सम्भावित है
हिन्दी सुगम सरल प्रभावित है

हिन्दी को न्याय दिलाने को
इसे विश्व पटल पर लाने को
संकल्प करे सब मिल कर ये

हिन्दी में ही हम काज करें

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

मै किसी की आँख का नूर हूँ............




मै किसी की आँख का नूSर हूँ
मै किसी के दिल का करार हूँ
जो चुरा ले नीदें सुकून ओ चैन
मै वो मचलताSS ख्याSSल हूँ

मै किसी की आँख का नूर हूँ............

ना फिकर मुझे इस बाSSत की
क्या कहे जमाना घडी घडीSS
ना मै सोचता, न समझता हूँ
मै तो करता उसकी ही बन्दिगी
जो रुका रुका है जबाSSन पर
मै वो अनकहाSS सवाSSल हूँ

मै किसी की आँख का नूर हूँ............

तेरी याSSद में जो पल कटेS
हर एक पल लगें मुSद्दतेंSS
है अजब ये इश्क की दास्तां
हर पल बढेंSS मेरी हसरतेंSS
जो सबब किसी के अश्कों का
मै वो सिसकताSS मलाSSल हूँ

मै किसी की आँख का नूर हूँ............

ना हो बेसबर मेरे हमनशींSS
कुछ और कर मुझपर यकींS
तेरे साSथ ही मुझे जीSSना है
तेरे हाSSथ है मेरी जिन्दगीSS
जो लगा दे आग पाSSनी में
मै वो सुलगताSS बवाSSल हूँ

मै किसी की आँख का नूर हूँ............

मै किसी की आँख का नूर हूँ
मै किसी के दिल का करार हूँ
जो चुरा ले नीदें सुकून ओ चैन
मै वो मचलता SSख्याSSल हूँ



शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

तन्हाई मेरी ......................



तन्हा तन्हा सी रहती है तन्हाई मेरी
रात भर जागती रहती है तन्हाई मेरी

खुद में हंसती है कभी, कभी रो लेती है
ख्वाब कुछ बुनती, रहती है तन्हाई मेरी

दो कदम उजालों में कभी, कभी सायों में
शामों सहर सफर में, रहती है तन्हाई मेरी

सुर्खी अख्बार की, कभी खामोश गजल
 कहानी किस्सों में, रहती है तन्हाई मेरी

रूठ जाती कभी, कभी मचल भी जाती है
आजकाल नाराज सी, रहती है तन्हाई मेरी

लोग मिलते है कभी, कभी बिछड जाते हैं
साथ हर पल चलती, रहती है तन्हाई मेरी


मंगलवार, 26 जुलाई 2016

कलाम को सलाम


कलाम एक व्यक्ति नही, सच्चे जीवन का पयार्य हैं। यहाँ कलाम जी के लिये था शब्द का प्रयोग मुझे व्यक्तिगत रूप से न्याय संगत नही लगता। कलाम जी का जीवन के प्रति नजरिया, उनकी उपलब्धियां, उनका देश और कार्य के प्रति समर्पण, उनका सादा जीवन जीने का आचरण, उनका समय प्रबन्धन, उन्हे युग पुरुष बनाता है। कलाम की के जीवन पर कुछ कहने का साहस कर पाना कोई आसान कार्य नही। यदि वे मात्र हमारे राष्ट्रपति होते, सिर्फ एक महान वैज्ञानिक होते, देश प्रेमी होते, सच्चे समाज सेवक होते, तो शायद उनके जीवन को प्रकाशित करना इतना दुष्कर ना होता, किन्तु वह तो अपने आप में एक सम्पूर्ण जीवन की परिभाषा है।
ऐसे व्यक्ति कभी मृत्यु को प्राप्त नही होते, मात्र उनका शरीर देवलीन होता है। कलाम जी के जीवन के अनगिनत ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें से दो चार को भी यदि हम अपने जीवन में आत्मसात कर लें तो हम समाज में एक अनुकरणीय व्यक्ति बन सकते हैं।
साधारण परिवार मगर असाधारण व्यक्तित्व
तमिलनाडु के धनुषकोडी गाँव (रामेश्वरम् ) में एक मध्यमवर्गी मुस्लिम परिवार में १५ अक्टूबर १९३१ को डॉ. अब्दुल कलाम का जन्म हुआ। उनके पिता जैनुलाब्दीन एक साधारण और कम पढ़े-लिखे  व्यक्ति थे। पाँच वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम के पंचायत प्राथमिक विद्यालय में उनका दीक्षा-संस्कार हुआ था। अब्दुल कलाम ने अपनी आरंभिक शिक्षा जारी रखने के लिए अख़बार वितरित करने का कार्य भी किया। वह सदैव अपनी सफलता का श्रेय सर्वप्रथम अपनी माँ को देते थे, उनके अनुसार—“मैं अपने बचपन के दिन नही भूल सकता, मेरे बचपन को निखारने में मेरी माँ का विषेश योगदान है। उन्होने मुझे अच्छे-बुरे को समझने की शिक्षा दी। छात्र जीवन के दौरान जब मैं घर-घर अखबार बाँट कर वापस आता था तो माँ के हाँथ का नाश्ता तैयार मिलता। पढाई के प्रति मेरे रुझान को देखते हुए मेरी माँ ने मेरे लिये छोटा सा लैम्प खरीदा था, जिससे मैं रात को 11 बजे तक पढ सकता था। माँ ने अगर साथ न दिया होता तो मैं यहां तक न पहुचता।“
प्रारम्भिक जीवन में अभाव के बावजूद वे किस तरह राष्ट्रपति के पद तक पहुँचे ये बात हम सभी के लिये प्रेरणास्पद है। उनकी शालीनता, सादगी और सौम्यता किसी महापुरुष से कम नही है। डॉ. कलाम बच्चे हों या युवा, सभी में बहुत लोकप्रिय रहे हैं। अपने सहयोगियों के प्रति घनिष्ठता एवं प्रेमभाव के लिये कुछ लोग उन्हे ‘वेल्डर ऑफ पिपुल’ भी कहते हैं। देश के हर युवक हर बच्चे के प्रेरणा श्रोत हैं। उनका कहना था “ सपने देखना बेहद जरूरी है, लेकिन सपने देखकर ही उसे हासिल नही किया जा सकता। सबसे ज्यादा जरूरी है जिन्दगी में खुद के लिये कोई लक्ष्य तय करना।“ 
कलाम जी के सिद्धान्त
कलाम जी एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक होने के साथ साथ एक कुशल दर्शनशास्त्री भी थे। उनके दर्शन सिद्धान्त बेहद प्रभावशाली हैं। उन्होने जीवन के ११ सिद्धान्त दिये।
1- जो लोग जिम्मेदार, सरल, ईमानदार एवं मेहनती होते हैं, उन्हे ईश्वर द्वारा विशेष सम्मान मिलता है। क्योंकि वे इस धरती पर उसकी श्रेष्ठ रचना हैं।
2- किसी के जीवन में उजाला लाओ।
3- दूसरों का आर्शिवाद प्राप्त करो, माता-पिता की सेवा करो, बङों तथा शिक्षकों का आदर करो, और अपने देश से प्रेम करो इनके बिना जीवन अर्थहीन है।
4- देना सबसे उच्च एवं श्रेष्ठ गुणं है, परन्तु उसे पूर्णता देने के लिये उसके साथ क्षमा भी होनी चाहिये।
5- कम से कम दो गरीब बच्चों को आत्मर्निभर बनाने के लिये उनकी शिक्षा में मदद करो।
6- सरलता और परिश्रम का मार्ग अपनाओ, जो सफलता का एक मात्र रास्ता है।
7- प्रकृति से सिखो जहाँ सब कुछ छिपा है।
8- हमें मुस्कराहट का परिधान जरूर पहनना चाहिये तथा उसे सुरक्षित रखने के लिये हमारी आत्मा को गुणों का परिधान पहनाना चाहिये।
9- समय, धैर्य तथा प्रकृति, सभी प्रकार की पिङाओं को दूर करने और सभी प्रकार के जख्मो को भरने वाले बेहतर चिकित्सक हैं।
10- अपने जीवन में उच्चतम एवं श्रेष्ठ लक्ष्य रखो और उसे प्राप्त करो।
11- प्रत्येक क्षण रचनात्मकता का क्षण है, उसे व्यर्थ मत करो।
 अब्दुल कलाम, सादा जीवन, उच्च विचार तथा कङी मेहनत के उद्देश्य को मानने वाले वो महापुरूष हैं जिन्होने सभी उद्देशों को अपने जीवन में निरंतर जीया भी है। वह सिर्फ भारत के ही नही सम्पूर्ण विश्व के रत्न है। उनके योगदानों के लिये सदैव हम सभी भारतीय उनके ऋणी रहेंगे। यदि हम कलाम जी के दिये हुये सिद्धांन्तों का पालन अपने जीवन में करते हैं तो यही उनको सच्ची श्रद्धांजली होगी।


मंगलवार, 19 जुलाई 2016

आजा साथी, मेघा आये......


आजा साथी, मेघा आये
संग मिलन की घडियां लाये

कब से हमने राह तकी थी
सावन साजन लेकर आये
अब आये तो काहे ऐसे
तिरछी नजर से मोहे डराये
आजा साथी...................

आ यूं भीगो संग मेरे यूं
अपना सावन फिर ना जाये
बूंदों से मिल खेल वो खेले
विरह की अगनी बुझ जाये
आजा साथी...................

तन भी भीगा, मन भी भीगा
भीगी बारिस ने ख्वाब जगाये
भूल के जग के सारे बन्धन
प्रियतम मोहे अंग लगाये
आजा साथी........................

गुरुवार, 30 जून 2016

आज का समाज.............


देखती रहती हूँ गिरते
इन्सान में इन्सान को
सोचती हूँ जा कर कहाँ
रुकेगी ये हैवानियत

शर्म आंखों के किसी 
कोने में भी दिखती नही
गिरते मानवी मूल्य देख 
बढती मेरी हैरानियत

छल बल के दम आदमी
गढता है अस्तित्व को
ऐसे पूज्यनीयोंको देख देख
डर रही शैतानियत

मित्र से तो शत्रु ही 
फिर भले इस बदलते दौर में
मितत्रा की आड में अक्सर,
देखी है बेमानियत

अब तक नही  छोडती है 
पलाश इस आस को
कब तक चलेगा आदमी

छोड कर इन्सानियत

शुक्रवार, 17 जून 2016

प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ..............



कुछ फर्ज निभाने है मुझको, कुछ कर्ज चुकाने हैं मुझको
प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ, बस कुछ पल थोडा  धीर धरो

कुछ बन्धन मुझे पुकार रहे, खुलनी हैं कुछ मन की गाँठे
हर साँस में बसते हो तुम्ही, बस कुछ पल थोडी पीर सहो

कुछ साये तिमिर के घेरे हैं, मन में भय के कुछ पहरे है
ये कोरा मन तेरा ही है , बस कुछ पल हाथों मे अबीर धरो

कुछ बातें अभी अधूरी हैं, कुछ सुननी कहनी है जग से
ऐ मेरे दिल के अटल नखत, न खुद को नभ की भीड कहो

कुछ दहलीजे रोक रही मुझको, कुछ राहें रस्ता देख रही
विस्वास धरे पलकें मूंदें, बस कुछ पल तुम मेरे साथ बढो

कुछ खोने से मन डरता है, कुछ पाने को मन आतुर है
दिल में अजब बवंडर है, बस कुछ पल थोडी शीत सहो

प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ, बस कुछ पल थोडा  धीर धरो

मंगलवार, 7 जून 2016

ढूंढ रहा रह कोई सच................


ढूंढ रहा रह कोई सच, पर छोड ना पाये झूठ के साये
बदलते लोग विघुत गति से, बिन मतलब पास ना आये

झूठी तारीफों के पुल पर, रिश्तों की बिल्डिंग बन जाती
कहते फिरे सच सुनने वाले ही बस हमरे मन को भाये


किसने बनाया सच को कडवा, घोला मीठापन झूठ में
तुम ही बताओ छोड मिठाई, कडवी गोली किसे लुभाये

बदल गया इस कदर जमाना, कहना सच अपराध लगे
सरे बाजार झूठ, सीना ताने अदने सच को रहा डराये

मेडल, पुरस्कार और प्रसंशा, कडपुतलती मक्कारों की
जाने और दिन कैसे कैसे, कैसी प्रगति हम लेकर आये

घर छूटा, छूटा बडों का आदर, स्वतंत्र हुये बेशर्मी को
मार्ड्न बनने की होड कही, पशु से भी ना नीचे ले जाये

अभी वक्त है, वक्त रहते सुधरे, और सुधारे देश दुनिया
अगली पीढी हमें याद कर श्रद्धा से नतमस्तक हो जाये

रविवार, 29 मई 2016

हर मौसम तेरा बनना है


मनमीत मेरे, साथ तेरे, कदम मिला कर चलना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है

जीने को तो जी लेते, बेंमतलब से इस जीवन को
कुछ रोते हसते पा ही लेते, आधे अधूरे सपने को
तेरी नजरों में बस कर , ख्वाब तुम्हारा बनना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है

कैसे बना दिल धीरे धीरे , तेरा दीवाना क्या जानूं
सोच लिया रस्मों रिवाज, दुनिया के मैं ना मानूं
अब हाथों में हाथ लिये, अरमान तुम्हारा बनना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है

मेरे प्यासे तन न पर, जब से पडी छाया तेरी,
खिल गयी मुरझाई कली, फूल बनी काया मेरी
तेरी सांसों को राग बना, संगीत तुम्हारा बनना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है
To watch video click on Palash the Name of Love
https://www.youtube.com/watch?v=xBdA8RaP9Kk

शुक्रवार, 27 मई 2016

क्यों नही बदल रहा...........


कभी कभी लगता है जैसे, कुछ नही बदल रहा
आज भी हर तरफ इंसान, इंसा्न को छल रहा

बातों में सबकी तडप दिखती, है सब बदलने की
कर्मो में चुप चाप सर्प सा, डस लेने को मचल रहा

प्रेम प्रीत की बात करते, थकते नही व्याख्यान में
जाति धर्म की आड में, व्यवस्था को ही निगल रहा

खो गयी शर्मो हया , सूख गया आँखो का पानी
देख कर सुन्दरी, सुरा, आचरण भी फिसल रहा

अत्याचार दुराचार आम हुआ, सभ्यता के दौर मे
चीत्कार, सुन-सुन, पशुओं का दिल भी दहल रहा

छल कपट के मन को ढकते, दिखावटी मुस्कान से
रिश्तों का गर्म लावा, लालची ,बर्फ पर पिघल रहा

धोखे मक्कारी के  खेल मे, उलझा रहे है देश को
गिर- गिर कर भी क्यो नही, ये आदमी संभल रहा

सोमवार, 23 मई 2016

मौसम बदल गया.................. Some times change is painful


जाने लोग बदल गये, या मेरा नजरिया बदल गया
कुछ तो बदला है हवाओं में, कि मौसम बदल गया

कल तक रोये जिसके लिये, उसे पल मे भुला दिया
दो दिन में दिल की धडकने बदली, दिल बदल गया

मंजिल पाने की हसरत में इश्क -ओ- ईमां बदल गये
नजरों में बसा है अब भी कोई, बस चेहरा बदल गया

मुस्कारा लेते है लोग यहाँ,गम देकर किसी अजीज को
दुनिया में मोहब्बत निभाने का, अब दस्तूर बदल गया

जीना गवारां ना था कभी, देखे बिना जिस शख्स को
नाम उसका सुन क्यो आज, चेहरे का रंग बदल गया

मै बदलता तो जहाँ कहता मुझे, जालिम बेदर्द बेवफा
हुस्न ने बदली अदा अपनी तो, जमाना भी बदल गया


दिन रात की उलझन में पलाश, ना उलझा खुद को यूं
लहू का रंग लाल है अब भी, बस रक्तदाब बदल गया

बुधवार, 11 मई 2016

२१ वीं सदी में स्त्री की स्थिति का जिम्मेदार कौन?


हम औरते अक्सर बात करते हैं कि सदियों से मर्द औरतों पर अत्याचार करते आ रहे हैं। स्त्री को प्रताडित किया जा रहा है वगैरह वगैरह…… कभी किसी पुरुष को ये कहते नही सुना गया कि वो भी प्रताडित होता है। आखिर क्या है सच? समाज में आज जो भी स्थिति स्त्री की है क्या उसके लिये सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार है? क्या स्त्री खुद अपनी स्थिति के लिये जिम्मेदार नही?
चाहे एक पढी लिखी लडकी हो, या घरेलू लडकी, चाहे वो स्वयं अपना वर चुने या घर के सदस्य, उसके ख्वाबों में एक ऐसा लडका होता है जो उससे ज्यादा सक्षम हो, ज्यादा आत्मनिर्भर हो। क्यों चाहती है हमेशा अपने से ज्यादा? क्या उसे अपनी क्षमता पर भरोसा नही? क्यों वह समाज में यह बात गर्व से नही कह पाती कि उसे मात्र इक सच्चा और नेक जीवनसाथी चाहिये, उसे उसके स्टेटस, उसके सेलरी पैकेज, उसके बैंक बैलेंस से कोई लेना देना नही।
आदमी जानता है कि एक लडकी उसे तभी पसन्द करेगी जब वो उससे उच्च हो खास कर आर्थिक मामले में, और इसीलिये शेष जीवन वो गर्व करता है, तब स्त्री कहती है कि घर में उसकी उपेक्षा की जाती है। क्यों कोई माँ जब अपनी बहू खोजती है तो अपने पुत्र से ज्यादा योग्य लडकी को बहू के रूप में चुन नही पाती, वो चाहती है कि उसका बेटा किसी भी मामले में अपनी पत्नी से कम ना हो। यानि कि एक स्त्री दूसरी स्त्री को उच्च पदस्त नही देख सकती। एक स्त्री ही समाज मे उस लडकी के चाल चलन पर पहला प्रश्न उठाती है, जब वो काम करके घर देर से आती है या बाहर किसी पुरुष मित्र के साथ घूमती हुयी दिख जाती है। क्यों वह उस लडके के चरित्र पर कोई प्रश्न नही उठाती।
स्त्री दुखी हो तो वह रो सकती है मगर बेचारा पुरुष उसे तो समाज ने रोने का अधिकार भी नही दिया। पति से झगडा हो तो पत्नी का पहला हथियार होता है – मायके जाने की धमकी, मगर पति उसके पास क्या है?  एक आदमी जो रोज घर से बाहर काम के लिये जाता है, मेहनत करता है, कभी कभी साथ लाया हुआ टिफिन भी नही खा पाता, भाग भाग कर लोकल ट्रेन पकडता है, रास्ते में सोचता है कि जाते हुये अभी हुये भिन्डी टमाटर खरीदने है, और घर पहुँचते ही उससे कहा जाता है कि ये क्या आपसे तो ठीक से सब्जी भी नही लायी जाती, ज्रा सी चीज याद नही रहती, खुद से ये भी नही होता कि धनिया मिर्च भी लेते आते। मगर बेचारा आदमी घर की सुख शान्ति बनी रहने के लिये बस मुस्करा कर कह देता है – देवी जी कल ध्यान से लेता आऊंगा। चलो एक कप चाय बना दो।
और यही पुरुष अगर गलती से थकान के कारण या आफिस की परेशानी के कारण गुस्सा हो जाय तो फिर तो घर का माहौल देखने ही वाला होता है। निकल आते है सारे अचूक बाण तरकस से, मै दिन भर काम करती रहूँ, मरती रहूँ, और फिर ये गुस्सा भी देखूँ। चुप चाप पुरुष सुन ले तो बेहतर वरना तो रोना तय ही है। फिर कहाँ खाना कहाँ चाय।
क्यों हम नही समझ पाते पुरुष मन, उसकी परेशानियां, क्यों नही समझ पाते कि वो घर के लिये उतना ही करता है जितना हम स्त्रियां। बहुत सारी बातें है, जिन पर विचार करना होगा। पुरुष सदैव स्त्री को दबाता नही, उसको पूजता भी है, उसका उपकार भी मानता है। और कई बार स्त्री खुद को पुरुष से ऊपर देखने का साहस नही जुटा पाती। पुरुष मन चाहता है एक ऐसी स्त्री जो उसका सम्बल बने, मुश्किल समय में उसे धैर्य दे। हम स्त्रियों को अपने नजरिये में बदलाव लाना होगा। ये बदलाव ही हमारी मजबूत पहचान बनायेगा।  
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