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गुरुवार, 30 जून 2016

आज का समाज.............


देखती रहती हूँ गिरते
इन्सान में इन्सान को
सोचती हूँ जा कर कहाँ
रुकेगी ये हैवानियत

शर्म आंखों के किसी 
कोने में भी दिखती नही
गिरते मानवी मूल्य देख 
बढती मेरी हैरानियत

छल बल के दम आदमी
गढता है अस्तित्व को
ऐसे पूज्यनीयोंको देख देख
डर रही शैतानियत

मित्र से तो शत्रु ही 
फिर भले इस बदलते दौर में
मितत्रा की आड में अक्सर,
देखी है बेमानियत

अब तक नही  छोडती है 
पलाश इस आस को
कब तक चलेगा आदमी

छोड कर इन्सानियत

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-07-2016) को "बरसो बदरवा" (चर्चा अंक-2391) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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