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गुरुवार, 24 नवंबर 2011

कभी कभी.....


कभी कभी भीड भरे मंजर में दिल तनहा रह जाता ,
कभी कभी चाह कर भी मन कुछ कह नही पाता ॥

कभी कभी दूर, बहुत दूर जाने को मन व्याकुल हो जाता,
कभी कभी खुद को भूला देने को, दिल बेकरार हो जाता ॥

कभी कभी बिन बात ही बेवजह ,आसूँ छलक जाता ,
कभी कभी खुद में सिमट के दिल रोने लग जाता ॥

कभी कभी दुनिया मे हर शख्स पराया सा हो जाता,
कभी कभी अपना वजूद भी बेगाना लगने लग जाता ॥

कभी कभी दिल कितना कुछ, चुपके से सह जाता
कभी कभी इक लफ्ज, विषबुझे तीर सा चुभ जाता ॥

कभी कभी लाख कोशिशों पर ,कुछ याद नही आता,
कभी कभी कोई लम्हा, उम्र भर भी भूल नही पाता ॥

कभी कभी इम्तेहां-ए जिन्दगी, खत्म नही होता ,
कभी कभी कोई खुद ही, इक इम्तेहां बन जाता ॥

कभी कभी सब पा कर भी, हाथ खाली रह जाता ,
कभी कभी सब लुटाने पर भी, दामन भर जाता ॥

कभी कभी सावन, निष्ठुर बन आग लगा जाता

कभी कभी तपता रेगिस्तां भी, ना बैरी बन पाता

कभी कभी ख्वाब, इक ख्वाब बन कर रह जाता,

कभी कभी तकदीर से, बहुत ज्यादा मिल जाता ॥

कभी कभी...........................

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

अपना शहर ……


अजनबी शहर में अपना शहर याद आया |
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||

जब देखा गली पे बच्चों को खेलते क्रिकेट,
और फिर अपने ही शीशे के टूटने की आवाज |

अपने बचपन का सुहाना दौर याद आया,
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


मिला सब यहाँ जो मिला ना था अब तक,

इस शहर ने हर सपने को बनाया हकीकत |

हर उडान पे वो पतंग का उडाना याद आया ,
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


घूमा बहुत मैं और देखी भी बहुत दुनिया,

सपनों की नगरी से लगे बहुत से नगर |
पर अपने शहर सा  कोई भी ना शहर पाया,

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


सोचते थे प्यार लोगों से होता है जगह से नही,

समझे तब जब उससे मीलों दूर हम आ बैठे |

उसकी मोहब्बत में खुद को जकडा पाया,

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ...........

रविवार, 13 नवंबर 2011

गलती या लावरवाही - निर्णय पाठक ही करेंगें ......




अपनी बात कहने से पहले आप सभी पाठकों से एक सवाल का उत्तर चाहूंगीं - अखबार में दिनांक का कितना महत्व होता है ?

हम तो यही समझते है कि अखबार तिथि के हिसाब से ही बिकता है , १ तारीख का अखबार २ तारीख को रद्दी बन जाता है , अगर हम कोई पुरानी खबर अखबार में ढूंढना चाह्ते है तो पहले यह ही सोचते है के फलां खबर किस दिन के अखबार में थी । जितना महत्व अखबार में किसी खबर का होता है , उससे कम महत्व उस अखबार में छपी तिथि का भी नही होता ।

अब जरा सोचिये अगर अखबार में तिथि ही गलत पडी हो तो ?
हिन्दुस्तान -भारत का एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक अखबार है । और यह देश ही नही विदेशों में भी पढा जाता है, जिससे की उसकी जिम्मेदारी और अधिक बढ जाती है ।
पिछले तीन दिनों से लगातार हम हिन्दुस्तान(कानपुर) अखबार में देख रहे है कि अखबार बहुत मेहनत और ईमानदारी से खबरें तो छाप रहा है, लेकिन शायद उसके लिये अखबार के पहले पन्ने पर छपने वाली तिथि पर ध्यान जा ही नही रहा । जिसका परिणाम यह हुआ कि मुझे ब्लाग के माध्यम से यह कहना पड रहा है, बहुत कोशिश के बावजूद हमे हिन्दुस्तान(कानपुर) के मुख्य सम्पादक का ई-मेल आई डी नही मिल पाया ,

अब जरा आप लोग भी इन चित्रों को जरा ध्यान से देखिये ...
13 nov 2011 (please see both red box)

14th oct 2011 (please again see both red box)


12th nov 2011
११ नवम्बर के अखबार के मुख्य पृष्ठ का चित्र कुछ कारणों से उपलब्ध नही कर सकी हूँ, किन्तु उस दिन भी यही गलती हुयी है ।

अखबार तिथि अंग्रेजी और हिन्दी दोनो ही हिसाब से छापता है, और ऐसा सभी हिन्दी अखबार करते है । शायद ऐसा करके वो किसी परम्परा को निभाते है । क्या अंग्रेजी हिसाब से सही तिथि का छपना ही पर्याप्त है , तो फिर हिन्दी हिसाब से तिथि को छापने का क्या उद्देश्य है ?

आप सभी सोच रहे होगें कि गलतियां किसी से भी हो सकती है, अखबार से भी यदि हो गयी हो यह कोई बहुत बडी बात तो नही हो जाती । हम आप सभी से पूर्णतः सहमत हैं, किन्तु गलती की पुनरावृत्ति हमारी लावरवाही को दर्शाती है । लगातार तीन दिनों से गलत तिथि का अखबार में छपना अखबार के छपने में कार्यरत पूरी टीम की लापरवाही को ही दिखाता है ।

हम इस ब्लाग के माधयम से हिन्दुस्तान(कानपुर) अखबार के माननीय सम्पादक महोदय से विनम्र निवेदन के साथ यह कहना चाहते है कि कृपया इस विषय पर उचित ध्यान दें और अगले संस्करण में इस भूल सुधार का उल्लेख अवश्य करें ।

उम्मीद करती हूँ अखबार इसको अन्यथा ना लेते हुये अपनी भूल अवश्य स्वीकार करेगा और भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही ना करने का आश्वासन भी देगा ।

हिन्दुस्तान की पाठिका एवं शुभचिन्तक

सोमवार, 7 नवंबर 2011

अन्जाना गुनाह


मुझे नही मालूम की इसे प्यार कहा जाय , दीवानापन कहे या दिल की नादानी, मगर कभी कभी किसी को एक झलक देख कर ही हम उसे अपना दिल दे बैठते है , कभी कभी हम बिना कुछ जाने समझे ही लाखों सपने बुनने लगते हैं , और फिर जब उन सपनों के आसमां से हकीकत की जमीं पर आते हैं सब कुछ जानते हुये भी दिल कुछ समझना ही नही चाहता .........

अन्जाने में आज हमसे इक गुनाह हो गया ,

उनकी इजाजत के बिना उनसे प्यार हो गया

वो छुपाते रहे खुद को रेशमीं चिलमन में,

मगर मेरी नजरों को उनका दीदार हो गया

कल तक हसँते थे हीर मजनूं की दास्तां पे,

नाम अपना भी दीवानों में अब शुमार हो गया

गुजरते गुजरते मोहब्बत के साहिलों से दिल,

इश्क के दरिया में डूबने को बेकरार हो गया

ना नाम ही जाना , ना पता ही घर के उनका,

बस इस मोड से गुजरने का इन्तजार हो गया

उनकी नजरों ने नजर भर भी ना देखा हमको,

उन्हे भी प्यार है हमसे, ये हमे ऐतबार हो गया

इक हसीं सी हँसी ही सुनी, आज तलक उनकी,

हम समझने लगे मोहब्बत का इकरार हो गया

वो जो आये कुछ देर से किसी और के साथ,

गुल खिलने से पहले ही गुलशन उजाड हो गया
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