प्रशंसक

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

हाँ याद तेरी आती बडी

 हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी

हर जिद मेरी, खुशी खुशी, पूरी करीं तुमने

सपने मेरे अपने किये जो देखे थे मैनें

अब किससे करे जिद ये बताओ ना बाबू जी, समझाओ न बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी

कहते तो थे, बिटिया नहीं बेटा हूं मै तेरा

रौनक हूं तेरे घर की औ टुकडा हूं मै तेरा

फिर क्यूं तेरे आंगन नही रह पाई बाबू जी, बतलाओ ना बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी


जब रोये कभी झूठ- मूठ, तुमने मनाया

गोदी में बिठाकर, मुझे लड्डू भी खिलाया

है कौन तेरे जैसा दुनिया में बाबू जी, दिखलाओ ना बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी


जन्मी तुम्हारे घर में, रही फिर भी पराई

ससुराल में भी मन की कभी कर नही पाई

आखिर कहाँ अधिकार जताऊं मै बाबू जी, बतलाओ ना बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी
* चित्रों के लिये गूगल का आभार

रविवार, 28 मार्च 2021

अबके होली


अबके होली, ना रंग लगाना

ना टोली बनाना

ये मौसम करोना का है-२

श्याम दूर से ही फाग गाना,

ना मौज मनाना

ये मौसम करोना का है-२

राधे ,मनवा तो माने नही है

हां तोरी बतिया सही है

ये मौसम करोना का है-२

कान्हा पीना नही तुम भंग

ना कीजो हुडदंग

ले ग्वालों को संग

ना पड जाय रंग में भंग

गिरधारी ओ गिरधारी ना यमुना में जाना

ना गोपी बुलाना

ये मौसम करोना का है-२

राधे, मनवा तो माने नही है

हां तोरी बतिया सही है

ये मौसम करोना का है-२

कान्हा दिल में करो ना मलाल

अरे अगले साल

मचेगा धमाल

उडेगा फिर सतरंगी गुलाल

बनवारी, ओ बनवारी जरा घर तो आना

है टीका लगाना

कि मौसम करोना का है-२

राधे, मनवा तो माने नही है

मगर बतिया सही है

ये मौसम करोना का है-२

अबके होली, ना रंग लगाना

ना टोली बनाना

ये मौसम करोना का है-२

बुधवार, 24 मार्च 2021

बात

 


बाते, खिला सकती है, मुरझाई बगिया

बाते दे देती कभी न भरने वाला घाव

सुनी थी माँ से बचपन में एक कहावत

बातन हाथी पाइये, या बातन हाथी पाव

बात का बन भी सकता है बडा बतंगड

बात बात में बन भी जाती उलझी बात

बातों ही बातों में अक्सर जुड जाते दिल

जब बात-बात में बन जाती किसी से बात

हाँ बात के नही होते यूं तो सिर या पैर

मगर निकलती तो दूर तलक जाती बात

कहती पलाश सबसे सौ बात की इक बात

सोच समझ कर सदा कहो किसी से बात

सोमवार, 22 मार्च 2021

नही फायदा यहां समझाने का



अब वक्त नहीं मिलता

लोगों को मिलने मिलाने का

जाने कहां रिवाज गया

हाल पूछने को घर आने का

हो जाती हैं मुलाकातें,

हाथ मिलते हैं गले 

जाने खोया कहां अदब

चाय पर घर बुलाने का

उलझाना सुलझी लटों को

उतारना अरमान पन्नों पर

काश दौर वो लौट आए

तकियों में ख़त छुपाने का

आती नही खुशबू खानों की

अब पडोस के रसोईखानों से

दावतों का बदला चलन, गया

मौसम बिठाकर खिलाने का

अदबो लिहाज पिछडेपन की

निशानियां हुयी हैं जब से

दुआ सलाम गुमनाम हुये

हाय बाय से काम चलाने का

पलभर में गहरा इश्क हुआ

पल में ताल्लुक खत्म हुये

पल में फिर दिल लगा कही

है वक्त नही अश्क बहाने का

सच में आधुनिक हुये है या

जा रहें अंधेरी गर्त में सब

जी पलाश तू अपने लहजे से

नही फायदा यहां समझाने का 

GreenEarth