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शनिवार, 19 जनवरी 2019

गुलाबी इश्क के पन्ने



वो महीन गुलाबी
इश्क के पन्ने
और उन पर लिखी
मोहब्बत की आयतें
बेशकीमती हीरे सी
रखी है सहेज कर
यादों की रुमाली
चादर की तहों में
वो पन्ने जिनमें
अल्फाज नही
लिखे हैं सिर्फ
नर्म गर्म अहसास
हर दिन पढती और
लिखती रहती हूं`
कुछ न कुछ
तुम्हारी ही जबान में
सच कितना आसान होता है
बयां करना 
मन में उमडते जज्बात
अहसासों की जुबां मे
एक और बडी प्यारी सी 
खूबसूरती है इसमें
नही करना होता 
किसी को इन्तजार
किसी के चुप होने का
न कोई गुंजाइश होती
ना समझी की
ना ही आडे आती है
लफ्जों की दीवार
दोनो खमोशी से
एक ही पल में
कहते सुनते और 
लिखते रहते हैं
गुलाबी इश्क के पन्ने
अहसासों की जुबानी

रविवार, 2 दिसंबर 2018

बडा आदमी



बचपन से एक ही सपना था, बडा होकर विदेश जाऊंगा, खूब पैसा कमा कर मै भी बडा आदमी बनूंगा।बचपन से बडा होने तक बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ बदला मगर बडा आदमी बनने की परिभाषा नही बदली। और इसी ललक ने मुझे विदेश में अच्छी नौकरी अच्छा पैसा दिलाया। आज जब यदा कदा अपने देश वापस आता हूँ तो लोगो की आंखो में जो अपनी छवि दिखाई देती है, वो अहसास दिला जाती है कि मै अब थोडा थोडा बडा आदमी बन रहा हूँ। इस बार वापसी के समय माँ बाबू जी की आंखों में मै साफ साफ पढ रहा था कि बेटा बहुत बन लिये बडे आदमी कुछ दिन इन बूढी हड्डियों के लिये बडे बेटे बन जाओ, मगर वापस आते आते और बडे बनने की धुन के सामने बहुत जल्दी वो अनकहे शब्द धुंधले पड गये। धीरे धीरे जीवन फिर से रफ्तार पकड चुका था, दिसम्बर का फर्स्ट वीक चल रहा था, बहुत सारा काम निपटाना था क्योंकि फिर लम्बी छुट्टियां थी, आज सुबह से काम में व्यस्त था, थोडा सर मे भारीपन सा महसूस कर रहा था सो डेविड को काम आगे कन्टून्यू करने को बोलकर मै कैंटीन चला गया। आज मधुर छुट्टी पर था सो अकेले ही चाय का कप ले एक कार्नर सीट पर बैठ गया। तभी कुछ दूर पर बैठे लोगो की बातें जो अस्पष्ट थी सुनाई दी, वो कह रहे थे-
अच्छा ही किया सरकार ने, जो योग्यता के आधार पर दूसरे लोगो को अपने देश में नही रुकने देगें, अब तो बहुत से लोगों को जाना ही होगा, वैसे भी ये लोग सिर्फ पैसा कमाने यहाँ आते है, दूसरे ने बोला- यार ये बताओ इंडिया में योग्य लोगों को पैसा कमाने के साधनों की कमी है क्या? तभी एक अन्य बोला- मुझे तो लगता है इन लोगो को अपने यहाँ इज्जत तभी मिलती है जब ये हमारे देश में काम करते हैं। और यार इसमें अपना और अपने देश का ही तो फायदा है, यहाँ टिके रहने के लिये ये और मेहनत करेंगे, और हमारे देश की और तरक्की होगी। तभी पहला वाला बोला- ह्म्म वो तो है मगर सोचो कि जो लोग यहाँ से निकाले जायेंगे उन्हे न तो उनके देश में पैसा मिलेगा न इज्जत, जिसके लिये बेचारे सब छोड कर आते है और बस अपनी तसल्ली के लिये बोलते रहते है आई लव माई इंडिया, हाउ पुअर दीस पीपुल, और कह कर सब हंसने लगे। मै चाह कर भी उन्हे कोई जवाब नही दे पा रहा था, क्योकि मै खुद कुछ समय से इसी डर में जी रहा था कि क्या इस देश के हिसाब से मै योग्य व्यक्ति हूं या या किसी भी दिन अयोग्य साबित कर निकाल दिया जाऊंगा।
मगर चाय खत्म करते करते मैं यह समझ पा रहा था कि बडा आदमी बनने की जो परिभाषा मैने समझी थी वो कितनी गलत थी, चाय का कप टेबल पर छोडते हुये मैंने निश्चय कर लिया था कि अब मुझे माता पिता का बडा बेटा और अपने देश के लिये बडा आदमी बनना है।



मंगलवार, 27 नवंबर 2018

वो फरिश्ते कम ही होते है.........


बहुत दूर तलक साथ दे,
वो रिश्ते कम ही होते हैं
औरों के लिये भी जियें
वो अपने कम ही होते हैं

दिखती तो हैं कई चेहरों में
कुछ अपनेपन की फिकर
बिन कहे दर्द दिल के सिये
वो अपने कम ही होते है

धूम करने को महफिल में
बहुत से है तराने, लेकिन
बुझे दिल की रौशनाई बने
वो नगमे कम ही होते हैं

जी कर भी तमाम उम्र
तलाश अधूरी सी, अबतक
मुकम्मल जिन्दगी कर दे
वो लमहे कम ही होते हैं

कामयाबी पे मिलते है गले
बेगाने भी अपनो की तरह
सख्त राहों में हमकदम बने
वो फरिश्ते कम ही होते है

रविवार, 18 नवंबर 2018

परची



सलिल और अनीता की शादी को करीब आठ साल हो चुके थे किन्तु आंगन आज तक सूना था, कोई ऐसा डॉक्टर नही बचा था जिन्हे दिखाया न गया हो, कोई ऐसा मन्दिर नही था जहाँ मन्नत न मांगी गयी हो। जब सभी आशाओं ने दम तोड दिया तब दम्पति ने एक बच्चा गोद देने का निश्चय किया। आज इसी उद्देश्य से दोनो "अपना घर" अनाथाश्रम में आये थे। इस अनाथाश्रम में करीब पचास साठ बच्चे थे, अनाथाश्रम की संचालिका इरा ने उन्हे बच्चों से मिलवाया, दोनो कुछ समय बच्चों के साथ समय बिता यह कह कर वापस आ गये कि आपको दो चार दिनों में बताते है कि हम किस बच्चे को गोद लेंगें।
करीब एक हफ्ते बाद वह बच्चा लेने के लिये वापस अपना घर आये। उन्होने एक बच्चा जो करीब चार साल का था उसको लेने का निश्चय किया था। उन्होने संचालिका इरा से कहा- हम लोग करीब एक हफ्ते पहले आये थे, बच्चे देखकर गये थे, हम दोनो ने काफी सोचा और फिर रोहित को ले जाने का निश्चय किया है, आप हमे बच्चा लेने का प्रासेस बता दीजिये।  
इरा ने कहा- माफ कीजिये हम आपको रोहित क्या अपने किसी भी बच्चे को नही दे सकते। सलिल और अनीता ये सुनकर हैरान थे, अनीता ने कहा- नही दे सकते, हम आपका मतलब नही समझे, पिछले हफ्ते तो आपने कुछ नही कहा था, आखिर क्यों नही दे सकती।
इरा ने कहा- मै उन लोगों को बच्चा नही देती जो बच्चे को देखकर या सोच समझकर ले जाते है, मेरे बच्चे कोई वस्तु नही। मै ऐसे किसी भी माता पिता को अपना बच्चा नही सौंपती। शायद आपने हमारे बारे में सुना नही है, यहाँ जब कोई माता पिता बच्चा लेने आते है तो हम सारे बच्चों के नाम की परचियों में से एक परची चुनने को उन्हे कहते हैं, हमारे यहाँ बच्चों का चुनाव करने का प्रावधान नही है, अनीता जी, ममता का न रूप होता है न रंग, न उम्र होती है न धर्म। फिर थोडा रुक कर इरा जी ने अनीता को प्रश्नात्मक निगाह से देखते हुये कहा - ममता और जरूरत के अन्तर को तो आप भी समझती होंगी। मेरे बच्चे किसी की जरूरत को पूरा करने के लिये नही, हाँ ममता के आकांक्षी जरूर हैं, और हम अपने बच्चों को सही हाथों में सौपने के प्रति बेहद सावधान रहते हैं। मेरे अनाथाश्रम का नाम यूं ही अपना घर नही, वास्तव में ये मेरे बच्चों का अपना घर है।
इरा जी को सुनकर  सलिल और अनीता को अपनी भूल का अहसास हो चुका था। इरा जी से माफी मांगते हुये अनीता ने विनम्र स्वर में कहा- हम अपनी सोच पर शर्मिन्दा है, आपने आज जो सिखाया है, वो हमे आजीवन याद रहेगा, मै बस आप्आसे विनती कराती हूँ अपनी बगिया का एक फूल हमें सौंप दीजिये, हम आपको विश्वास दिलाते हैं आपके फूल को आपसा ही प्यार देंगे। प्लीज हमे माफ कर दीजिये, कहकर अनीता ने इरा जी के सामने अपना आंचल फैला दिया, इरा जी भी एक अनुभवी सेवानिवॄत्त प्राध्यापिका थी,  व्यक्ति को परखने में उनसे चूक होने का प्रश्न ही नही था। उन्होने अनीता को गले  लगा लिया और मुस्कुराते हुये बोली- आओ चुन लो एक परची और पूरा करो बच्चा गोद लेने का प्रॉसेस।
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