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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

प्रतिक्रिया

उस समय लोग बुद्ध को भगवान समझने लगे थे, लोग उनकी बातों को सुनते और उनके कहे अनुसार आचरण करते थे। एक गाँव में एक लकडहारा बुद्ध से ईर्ष्या रखता था, सभी से उनकी बुराई करता, और कहता सब उनकी पूजा करते हैं इसलिये वो शान्त रहते हैं मै जब चाँहू उनसे लडाई कर सकता हूँ उनको क्रोध दिला सकता हूँ।
एक दिन वह खुद को सत्य सिद्ध करने के उद्देश्य से वहाँ गया जहाँ बुद्ध रहते थे। वहाँ उसने देखा कि भगवान बुद्ध तपस्या में लीन हैं। कुछ देर तक तो वह उनकी आंखे खुलने का इन्तजार करता रहा, फिर जब उससे रहा नही गया तो वह बुद्ध के निकट गया और उनके चेहरे पर थूक दिया और फिर कुछ दूर खडा हो गया। वह सोच रहा था कि जरूर मेरे ऐसा करने से वह आंख खोलेंगे और गुस्सा करेगें तब मै उनसे लडाई करूंगा और सारे गाँव वालो को शोर से बुला कर दिखाऊंगा कि बुद्ध को भी क्रोध आता है।
कुछ देर इन्तजार करने के बाद जब बुद्ध ने आंख खोली और अपने अंगवस्त्र से थूक साफ करते हुये बोले- तुम्हे और कुछ कहना है। लकडहारा बडे आश्चर्य में पड गया क्योकि वह ऐसे व्यवहार की कल्पना भी नही कर सकता था। फिर भी लडाई करने के उद्देश्य से गुस्सा करते हुये बोला- मैने आप पर थूका है, आपको गुस्सा नही आ रहा। और आप कह रहे हो और कुछ कहना है।
बुद्ध बोले- हाँ, मैं पूँछ रहा हूँ, तुम कुछ और भी कहना चाहते हो क्या?
लकडहारा कुछ समझ नही पाया कि अब उसको क्या कहन चाहिये, बिना कुछ और कहे वहाँ से चला गया। गाँव आ कर उसने जब लोगो को यह बताया कि आज उसने बुद्ध पर थूका है तो लोगो ने उसे समझाया कि यह उसने बहुत गलत किया है, वो बहुत महान हैं, अब भगवान उसे इसकी सजा देंगें, और भी कई प्रकार से लोगो ने उसको डराया। लोगों की बातें सुनकर वह बहुत डर गया और सारी बारात वह यही सोचता रहा कि सच में उससे कुछ गलत हो गया है, मुझे जाकर माफी मांग लेनी चाहिये, वरना भगवान उसे सजा देंगें।
अगली सुबह वह बहुत जल्दी उठा और बुद्ध के पास गया। बुद्ध तपस्या में लीन थे। वह खडे होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगा। जब बहुत देर हो गयी और बुद्ध ने आँख नही खोली तो वह बुद्ध के पैरों में जा कर गिर गया, उसे अपनी गलती का अहसास था, उसकी आंखों से आँसू निकल पडे। आसुओं के आभास से बुद्ध ने नेत्र खोल दिये और बोले- तुम्हे और कुछ कहना है।
लकडहारा फिर कुछ नही समझ पाया, बोला - आपने कल भी यही कहा था, आज भी यही कह रहे हैं, मैने तो कल भी कुछ नही कहा था, आप पर थूक कर चला गया था, आज भी कुछ नही कहा, बस आपके चरणों में आकर गिर गया। मगर आपने मुझसे कुछ कहा ही नही।
बुद्ध बोले- कल तुम्हे जो भाषा आती थी तुमने उस भाषा में मुझसे बात की थी, और आज भी ऐसा ही किया। तुम मुझसे कुछ्ह कहना चाहते थे, मगर मुझे तो तुमसे कुछ भी नही कहना था।
मै तुम्हारे अनुसार अपना आचरण तय नही कर सकता कि जब तुम चाहो मेरे हदय में तुम्हारे लिये घॄणा हो, जब तुम चाहो मै तुम पर करुणा करूं।
अपने आचरण का निश्चय मैं स्वयं करूंगा, कोई अन्य नही।

सच, हम अक्सर अपने जीवन में प्रतिक्रिया करते हैं, जो जैसा हमसे चाहता है वैसा हम करते हैं। उसमें हमारा निर्णय नही होता। हमारा अपना निर्णय जब होता है तब प्रतिउत्तर होना चाहिये न कि प्रतिक्रिया।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

खाली हो


अल्बर्ट स्मिथ, अमेरिका की एक जानी मानी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर थे। एक बार अपनी क्लास में वह सत्य, ज्ञान और धर्म पर अपना व्याख्यान दे रहे थे। अचानक उन्हे रोकते हुये उनके एक विघार्थी ने कहा- सर आप जो भी कह रहे हैं उसमें भाव नही आ रहा, ऐसा लग रहा है जैसे आप सिर्फ किताबी ज्ञान दे रहे हैं। आपने कभी इसे अनुभव नही किया। कभी आप जापान के सन्त चितोस को सुनियेगा, उनकी बातों में भाव होता है, उनकी हर बात सच लगती है।
अल्बर्ट बहुत ही समझदार और धैर्य वाले व्यक्ति थे, उन्होने विधार्थी की बातों पर विचार किया, और कालेज की छुट्टियों में जापान जाकर चितोस से मिलने का निश्चय किया।
चितोस एक ऊंची पहाडी पर एकान्त में रहते थे। लोगों से उनका पता पूछते पूछते एवं दुर्गम रास्तों से होते अल्बर्ट अन्ततः चितोस की कुटिया तक आ पहुंचे। उन्होने चितोस को आवाज लगाई। दरवाजे पर एक दुर्बल व्यक्ति आया जिसका रंग कुछ काला और चेहरा चेचक के दागों से भरा था, कुल मिलाकर कहा जाय तो वह व्यक्ति पूर्णतः आकर्षणहीन था। अल्बर्ट ने कहा- मुझे चितोस से मिलना है, दरवाजे पर आये व्यक्ति ने विनम्रता से कहा- मेरा नाम ही चितोस है, कहिये मै आपके लिये क्या कर सकता हूँ। यह सुनकर अल्बर्ट को आने का पूरा उश्देश्य ही विफल लगने लगा, वह सोचने लगा क्यो यहाँ आकर समय खराब किया, भला यह बदसूरत सा दिखने वाला, कमजोर सा व्यक्ति मुझे क्या बतायेगा। फिर भी यह सोचकर की कि आ गया हूँ तो पूंछ ही लेता हूँ, अल्बर्ट ने कहा- मै अमेरिका की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र का प्रोफेसर हूँ, मेरे एक विघार्थी ने कहा कि आप जानते है कि सत्य ईश्वर और धर्म क्या है। मुझे जल्दी से बता दो और मै जाऊँ, अभी बहुत दूर वापस जाना है।
चितोस ने कहा- बताता हूँ, पहले आप अन्दर तो आइये, आप बहुत थके हुये से लग रहे है, आइये एक कप चाय पीजिये।
अल्बर्ट ने कहा- नही मै ठीक हूँ, आप बस बता दीजिये, मुझे वापस भी जाना है। मगर पुनः चितोस के आग्रह पर अल्बर्ट अन्दर चले गये, वो अनुभव करने लगे कि वाकई वो थके हैं और एक कप चाय की उन्हे बेहद जरूरत थी।
तभी चितोस चाय की केतली और कप लेकर आ गये। उन्होने अल्बर्ट को कप प्लेट पकडाई और कप में चाय डालने लगे। जब अल्बर्ट ने देखा कि चाय, कप में पूरी तरह भर चुकी है और प्लेट से बस निकलने ही वाली है तो कुछ नाराजगी से बोले- ये क्या, आप देख नही रहे कि कप भर गया है इसमें और चाय नही आ सकती।
चितोस ने कहा- आपने सही कहा,  क्या आपने यहाँ आने से पूर्व ध्यान दिया कि आप खाली नही हैं।

अल्बर्ट भी एक समझदार व्यक्ति थे, वे चितोस की बात का अर्थ समझ गये कि जब हम किसी के पास कुछ सीखने जाय तो मन मे ग्रहण करने का भाव भी होना चाहिये। अल्बर्ट उठ खडे हुये और माफी माँगते हुये बोले- मै जाता हूँ और जब खाली हो जाऊंगा तब आपके पास अपने उत्तर के लिये वापस आऊंगा। चितोस ने उन्हे प्रेमपूर्वक रोका और कहा- मित्र मेरा विश्वास कीजिये आप जब खाली हो जायेंगे, तब आपको मेरे पास आने की आवश्यकता भी नही रहेगी।

सोमवार, 31 जुलाई 2017

पागल कौन ??


एक बहुत बडे वैज्ञानिक थे। एक बार उन्होने पागलो पर शोध करने का निश्चय किया। वो नियम से तीन चार घंटे एक पागलखाने जाते और चुपचाप पागलों के व्यवहार को गौर से देखा करते।
वहाँ उन्होने गौर किया कि दो पागल, जो कभी गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर हुआ करते थे, घंटो आपस में बात किया करते थे। उनकी बातचीत में खास बात यह होती कि जब एक बोलता दूसरा चुप रहता और बडे ध्यान से दूसरे को सुनता और जब पहला चुप होता तो दूसरा बोलता और पहला चुप रह कर उसकी बात सुनता।

वैज्ञानिक को उन दोनो का व्यवहार बहुत अलग लगा। एक दिन वह उन दोनो पागलों के पास गये और बोले- प्रोफेसर साहब, आपसे एक बात पूंछनी थी - मै कई दिनों से देखता हूँ कि आप दोनो जब बात करते हैं तब एक समय में एक ही बोलत है और दूसरा बहुत ध्यान से सुनता है, कोई किसी की बात बीच में कभी नही काटता, ऐसा आप कैसे करते हैं। दोनो मुस्कराये फिर एक पागल प्रोफेसर बोले- यही तो बात करने का उसूल है कि एक बोले और दूसरा सुने इसमें आश्चर्य की क्या बात है। तब वैज्ञानिक जी बोले- नही, इसमें कुछ खास नही मगर मेरे लिये आश्चर्य की बात यह है कि दोनो के बात के विषय अलग अलग होते हैं एक हमेशा गणित की बात करता है और दूसरा हमेशा अंग्रेजी, जब आप एक दूसरे की बात समझते ही नही तो ध्यान से सुनते क्या हैं? 
अब दोनो पागल प्रोफेसर बहुत तेजी से हंसे फिर रुक कर एक ने कहा- अरे महोदय हमे पागल समझा है क्या? मुझे दुनिया में कोई दो व्यक्ति दिखा दो जो सच में एक दूसरे को सुनते हो।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

आईना- मेरा दस्तावेज


कल सुबह 
उठा था
कुछ अलसाया अलसाया सा।
प्रतिदिन की तरह
उठ चुकी थी पत्नी
शायद बनाने गयी थी चाय।
तभी नजर गयी
उस आइने पर
जो इस कमरे में
एक अरसे से
सोता जागता था
मेरे साथ।
जिसने देखा था 
खामोशी से
कदम रखते मुझे
जवानी की दहलीज पर,
जिसने भाँपे थे सबसे पहले
मुझमें हो रहे परिवर्तन,
जिसने सिखाया
खुद से नजरें मिलाना,
जिसने जगाया
मेरा सोया आत्मविश्वास,
जिसे भूल गया
वक्त के साथ।
मगर देखता रहा वो
इस उम्मीद पर
देखूंगा मै
एक दिन।
कल एक बारगी
उसे पहचान न सका
कुछ बदल सा गया था
क्योंकि
निकल आयी कुछ झुर्रियां
उसके चेहरे पर
बाल भी हो गये थे
कुछ पके अधपके से
नजरे मिलते ही
कुछ खिंचता सा गया।
ठीक उसी तरह जैसे
अठ्तीस चालीस साल पहले
खिंचा था
माया को देखकर
कितना स्वाभाविक था
वो खिंचाव
उस चुम्बकीय आकर्षण में
गति थी
मेरे जीवन की
शायद तभी
मेरे अंतःकरण में बसा
हनुमान
राम से शिवभक्त बन
करने लगा था तप
पाने को अपनी गौरा।
अचानक मुझे लगा
जैसे उसके सफेद बालों को
किसी ने रंग दिया
गोदरेज हेयर कलर से
किसी ने अदॄश्य रूप से
लगा कर एंटीरिंकल क्रीम
मिटा दी उसकी झुर्रियां
बन गया वो
मुझसा
जाने कैसे उसे देख
मेरे मन के भाव
प्रौढ से युवा हो गये
धुंधली आँखो में चढ गया
गौगल, चश्में की जगह 
कितने ही स्वर्णिम स्वप्न
तैर गये आंखों में
कुछ परेशानियां भी
उभर आयीं
सपनों को साकार करने की।
तभी महसूस हुआ
एक आत्मीय स्पर्श
जो दे रहा था सम्बल
फिर किसी कोने से
गूंजने लगी
कुछ किलकारियां
जो दे रही थी आधार
जीवन को
हाथों में आ रहा था
कोई छोटा सा हाथ।
तभी अनुभव हुआ
समाहित हो रहे हैं
ये सभी मुझमें
जो जगा रहा था
मेरी सुषुप्त चेतना
दे रहा था खाद पानी
निर्जीव हो चले वॄक्ष को
जिसमें शेष थी
आस
उगने की
नयी कोपलें
मिल गया था वापस
मुझे मेरा बीता कल
जो था
ऊर्जा से
अभिसंचित
दे रहा था प्रेरणा
अन्तिम क्षण तक
जीवन युद्ध में
संघर्ष करने की।
और तभी
बरसों से चिर परिचित
ध्वनि आयी
सुनो सुबह हो गयी है
आओ चाय साथ पीते हैं॥
चल दिया मैं
चाय की दिशा में
देकर वचन
अन्तिम श्वांस तक
साथ निभाने का
अपने अजीज दोस्त
अपने आइने को
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