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गुरुवार, 7 जून 2018

अंतिम विदा



सोचा न था कभी मैने
होगा कष्टकारी इतना
उनसे अंतिम विदा लेना
उनसे दूर चले जाना

अब जब जाने की वेला में
बस दो क्षण ही शेष रहे
जीवन के कुछ स्वर्णिम पल
इन आंखों में तैर रहे

गुस्से में अक्सर कह देता था
अब साथ नही रहना मुझको
हे ईश्वर मुझ पर दया करो
अब अपने पास बुला भी लो

उधर द्वार पर यमदूत मुझे
ले जाने को आतुर दिखते
इधर शोकाकुल पत्नी के 
नैनों से निर्झर नीर बहे

है याद मुझे वो दिन आता
जब बिछडे थे हम भगदड में
और बच्चे सी रो वो बोली थी
न छोडना कभी अब जीवन में

हे ईश्वर तुम ही मदद करो
न साथ मेरा, उसका तोडो
हम जन्मों जन्मों के साथी है
यूं विरह में न, उसको छोडो

अंतिम इच्छा समझ मेरी
अंतिम मुझ पर उपकार करो
मै आधा हूं, आधी वो है
दोनो पर अपना हाथ धरो
दोनो पर अपना हाथ धरो

बुधवार, 6 जून 2018

अजनबी हूं




पल दो पल के लिये आया हूं, तेरे शहर में यारों
कुछ ऐसा बोकर जाऊंगा, तुम्हे याद बहुत आऊंगा

कई चेरहे कुछ फीके, कुछ उदास नजर आते है
मुस्कुरा सके दो पल, ऐसी बात दे कर जाऊंगा

माना अजनबी हूं अभी, मगर यकीं है मुझको
जाते हुये रोकोगे, ऐसे जज्बात सी कर जाऊंगा

तेरे दिल के कई जख्म, मुझे मेरे जैसे ही लगे
कुछ सुकूं में आये तू, ऐसी सौगात देकर जाऊंगा

सिलसिले मोहब्बत के, बने न बने कोई गम नही
आरजू मिलने की हो, वो मुलाकात देकर जाऊंगा

यूं तो हक नही मुझे, तुमपर कोई हक जताने का
मुझे मजहब में न टांकना, ये फरियाद करके जाऊंगा

सोमवार, 4 जून 2018

तैयारी


सुबह उठने के साथ
करने लगती हूं तैयारी
घर छोडने की
हाथ मुंह धुलते धुलते
वही उतार कर रख देते हूं
मन की थकन
जो नही मिटी सो कर भी
बैग पैक करते करते
पैक कर देती हूं
रात बीती सारी बातें
तकिये के नीचे धीरे से
धर देते हूं सारी चिन्तायें ये कह कर
शाम को फिर मिलूंगी तुमसे
तब तक तुम थोडा आराम कर लो
रसोई में टिफिन लगाते चाय बनाते
नोट करती जाती हूं
डिब्बे कनस्तरों की डिमांड
ऊपर की रैक में रखा
चाय की पत्ती का डिब्बा कहता है
याद है न शाम को मेरे लिये कुछ लाना है
वरना शाम को मुझसे न कहना
सर दर्द हो रहा है
तभी बगल में बैठा
चीनी का डिब्बा भी बोल पडता है
मै भी हूं, मुझे भी मत भूलना
सबकी बाते नोट करते करते
तैयार होकर दरवाजे से निकलते पैर
रूक जाते है
दिल कहता है
एक बार और देख तो लूं
अपने जिगर के टुकडे को
जो रो धोकर  चुका है
आया की गोद में है
और टकटकी लगाये कह रहा है मुझसे
क्यो जाती हो मां रोज यूं मुझे छोडकर
कुछ भी तो नही चाहिये मुझे
तुम्हारे दूध और गोद से सिवा
और मै उसकी बेबसी और अपनी मजबूरी को
वही दरवाजे पर रख चल देती हूं
उसकी और अपनी जरूरतें पूरी करने
की पेट ममता नही समझता
और मां के साथ पिता की भूमिका भी निभानी है
अपनी लाडले केलिए


गुरुवार, 31 मई 2018

हो जाये तो अच्छा


न हँसने का दिल
न रोने का मन
कुछ गुमसुम सी
गुजर जाये तो अच्छा
न दोस्ती का नाता
न बैर का रिश्ता
कुछ अजनबी ही
रह जायें तो अच्छा
न गर्म दोपहर
न स्याह रात
कुछ ठंडी शामे भी
मिल जाये तो अच्छा
न जीने की तमन्ना
न मरने की ख्वाइश
जिन्दगी कुछ यूँ ही
बीत जाये तो अच्छा
न मिलने की आरजू
न खोने की कसक
वक्त कही खुद ही
ठहर जाये तो अच्छा
न गुरुर का नशा
न कमतर का गम
उम्र कुछ दरिया सी
बहती जाये तो अच्छा
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