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सोमवार, 5 दिसंबर 2016

कब अच्छा लगता है














घर आंगन छोड के जाना, कब अच्छा लगता है
आँखों से आँसू छलकाना, कब अच्छा लगता है

रोटी की मजबूरी, अक्सर छुडवा देती अपना देश
पराये देश में व्यापार फैलाना कब अच्छा लगता है

माँ के हाथों की खाये बिना, बस पेट ही भरता है
ऑडर देकर सीमित खाना, कब अच्छा लगता है

बेजान रंगी्न शहरों में, फ्रैंडशिप तो मिल जाती है
गली मुहल्ले के यार छोडना, कब अच्छा लगता है

आँख मिचौली, गिल्ली डंडे, सब राह ताकते देहरी पे
खेलों का वीडियो गेम हो जाना, कब अच्छा लगता है

फीके स्वाद सेवइयो के और , बेनूर दीवाली होती है
दूर अपनो से त्योहार मनाना, कब अच्छा लगता है

बेफिक्र ठ्हाके लगते थे, छत पर गर्मी की रातों में
अदब से नाप कर मुस्कराना, कब अच्छा लगता है

नरम बिस्तरों में छुपकर, बचपन सिसक कर रोता है
नन्हे छुटकू को साहब हो जाना, कब अच्छा लगता है

चाचा चौधरी, बिल्लू पिकीं से बनती थी अपनी दुनिया
आप अपनी दुनिया बिखरा देना कब अच्छा लगता है




शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

स्त्री - भोग्या नही भाग्य है


मेरी मुस्कान, कब बन गयी मौन स्वीकृति
वो स्वीकृति जो मैने कभी दी ही नही
वो स्वीकृति जो चाहता था पुरुष
कभी अनजानी लडकी से, कभी अपनी सहकर्मी से
कभी अपनी शिष्या से, कभी जीवनसंगिनी से
खुद से ही गढ लेता है पुरुष
वो परिभाषायें जैसा वो चाहता है
और परिभाषित कर देता है
स्त्री का पहनावा, उसकी चाल ढाल
अधिकारी बन जाता है समाज
आंचल में ट्कने को अनगिनत नाम
हद की पराकाष्ठा को भी पार करते हुये
अपने हिसाब से रच देता है उसका चरित्र
दोषी बन, नजरें छुपाये ताने सुनती है वो
छलनी की जाती है जिसकी अस्मिता 
तार तार हो जाता है सुहागिन बनने का सपना
और लुटेरा छलता रहता है जाने कितने सुहाग
कब समझेगा दम्भी, अभिमानी पुरुष
बल से मिलती है जय, सिर्फ संग्राम में
स्त्री रण नही, दामिनी है मानिनी है,
शक्ति का प्रतीक, जीवन की निशानी है
लाखों वीर्य करते हैं झुक कर निवेदन,
तब कभी किसी एक को मिलती है अनुमति
अपने अस्तित्व को विकसित करने की
स्त्री की पनाह में पलता है, बनता है
स्त्री करती है पल पल रक्षा
देती है अपना रक्त बनाने को तेरा नैन नक्शा
स्त्री स्वयं जया है, अविजित है
पुरुष तो अस्तित्व के लिये ही आश्रित है
उसे आश्रिता कहने की ना कर भूल
ना कर विवश कर कि बन जाय वो शूल
जिस दिन करेगी वो इन्कार बनने से जननी
पुरुष बिन कुछ किये ही मिट जायगा
धरा का अस्तित्व ब्रहमाडं से मिट जायगा
ना होगा पुरुष, ना होगी स्त्री,

हो जायगी एक पत्थर सी पृथ्वी

शनिवार, 17 सितंबर 2016

स्व प्रतिभागी


रोहित का आज आठवीं कक्षा का परिणाम घोषित होना था। पिछले वर्ष वह प्रथम आया था, इस वर्ष भी उसे यही उम्मीद थी। विघालय में प्रतिवर्ष परीक्षा परिणाम घोषित करने के लिये एक बडा आयोजन होता था। जिसमें सभी बच्चों के अभिभावक आमन्त्रित किये जाते थे। किसी कारणवश रोहित के पिता जी आज इस समारोह में नही आ सके थे।
परिणामों की घोषणा हुयी, और उम्मीद के अनुसार, रोहित इस वर्ष भी अपनी कक्षा मे प्रथम स्थान पर रहा। उसे अपने पिता जी के ना आने का दुख हो रहा था।
रोहित आयोजन समाप्त होने का बेसब्री से इन्तजार करने लगा कि कब वो घर पहुचे और कब अपने पिता जी को रिपोर्ट कार्ड दिखा कर उनसे पुरस्कार ले।
घर आते ही उसने पिता जी को जैसे ही अपना रिसल्ट दिखाया, उनके चेहरे पर खुशी की जगह उदासी की लकीरें देख रोहित हैरान हो गया। उसे लगा शायद पिता जी ने मेरा प्रथम स्थान नही देखा। अधीर होते हुये उसने पिता जी से कहा- पापा में इस बार भी फस्ट आया हूँ, यह सुनकर उसके पिता जी ने कहा- रोहित प्रथम नही तुम तो अन्तिम आये हो। रोहित को कुछ समझ नही आ रहा था। फिर भी उसे यकीन था उसके पिता जी यदि यह कह रहे है तो कोई तो बात होगी। बहुत सहज होकर उसने कहा- कैसे पिता जी।
पिता जी ने कहा- रोहित पिछले वर्ष की तुलना में तुम्हारे अंको का प्रतिशत काफी कम है। कक्षा हो या जीवन हमारी प्रतियोगिता स्वयं से होनी चाहिये। तुम अपनी कक्षा में जरूर प्रथम हो तब जब तुम अपने साथ पढने वाले छात्रों को अपना प्रतिभागी समझते हो, किन्तु यदि तुम स्वयं के प्रतिभागी होते हो तुम प्रथम नही आते।
रोहित को समझ आ रहा था कि उसके पिता जी उससे क्या कहना चाह रहे थे।


हम सबको भी हमेशा स्वयं का प्रतियोगी होना चाहिये। दूसरों के साथ की गयी तुलना वास्तविक नही है। और कई बा यही तुलना हमारे लिये ईर्ष्या बन जाती है। स्वयं से की गयी प्रतियोगिता सदैव सकारात्मक परिणाम ही देती है। 
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