प्रशंसक

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

हिन्दी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड का योगदान

 


बॉलीवुड और हिंदी एक दूसरे के पर्याय है जब बॉलीवुड की बात होती है तो हमारे मन में एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसने सभी भाषा के क्षेत्रों सीमाओं को तोड़ते हुए हिंदी को जन सुलभ और लोकप्रिय भाषा के पद पर आरूढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई भारतीय सिनेमा जगत को पहली सवाक फिल्म देने वाली 'आलमआरा ' की भाषा हिंदी ही थी । आलम आरा से आरंभ हुई इस यात्रा ने 'हिंदी मीडियम' तक आते-आते अनेकों पड़ावों को पार किया। बॉलीवुड ने हिंदी को कभी विषय वस्तु के रूप में चुना तो कभी भाषिक माध्यम के रूप में अपनाया। 70-80 के दशक में चुपके-चुपके फिल्म ने जनमानस के सम्मुख यह प्रश्न उपस्थित किया कि यदि हम हिंदी भाषा की शास्त्रीयता को ही महत्व देते रहे तो वह एक दिन "जनसामान्य की भाषा" की पदवी खो देगी । इस सदी की बनी हुई आधुनिक फिल्मों जैसे 'इंग्लिश विंग्लिश',' इंग्लिश मीडियम', एवं 'हिंदी मीडियम' ने हिंदी भाषा के महत्व और समाज में आज भी उसके महत्वपूर्ण स्थान की विषय वस्तु को लेकर हिंदी के प्रचार प्रसार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

फिल्म “किसी से न कहना” में एक प्रसंग में जब उत्पल दत्त भाषा और हिन्दी की भारतीय परिवेश में उसकी महत्ता को बताते हुये कहते हैं – “चीन, जापान रूस जर्मनी जैसे देशों नें भाषा के बल पर तरक्की की है, मगर हमारा देश जहाँ हमारी तरक्की का अर्थ है सिर्फ अच्छी अंग्रेजी भाषा जानना। हमे इन देशो से सीखना चाहिये”, तब इतने सटीक संदेश का जो प्रभाव सुन कर, देख कर पडता है शायद ही वह किसी लेख के माध्यम से सम्भव होता। 

हिन्दी की सहयोगी भाषाओं को समावेश करने में बॉलीवुड की भूमिका

बॉलीवुड ने हिन्दी के सरल और व्यव्हारिक स्वरूप को देश के कोने कोने तक पहुंचाने का कार्य बडी सुगमता से किया। हिन्दी भाषा में क्षेत्रीय भाषाओं के समावेश ने हिन्दी को न केवल लोगों के दिलों तक पहुंचाया बल्कि आम लोगों ने स्वतः ही बोली में भी भाषा को आत्मसात भी किया, भले ही वह प्रसिद्ध गाने के माध्यम से होने लगा या प्रसिद्ध डॉयलाग लोगो की बोलचाल में शामिल हुये। 14 मार्च 1934 में जब हिन्दी फिल्मों का सफर शुरू हुआ तो हिन्दी भाषा अपने असली रूप में थी, पर आज पान सिंह तोमर, उड़ता पंजाब, तन्नु वेडस मन्नु, गैंस ऑफ वसेपुर जैसी फिल्मों ने हिन्दी सिनेमा में भाषा के ट्रेंड को बदला और फिल्मों में हिन्दी के साथ ही क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल होने लगा। अब फिल्मों में भारत के अलग-अलग राज्यों के भाषा की सौंधी खुशबू आती है।

फिल्मों के संवाद और विषय चयन के अलावा हिन्दी फिल्मों के गाने भी क्षेत्रीय भाषा और बोली की शब्दावलियों के इस्तेमाल से बनने लगे हैं। जहां हिन्दी सिनेमा में खड़ी बोली का इस्तेमाल किया जाता रहा है उदाहरण के तौर पर पियूष मिश्रा का “आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घड़ी की तुम गुहार दो” जैसे हिन्दी के गीत लिखे। हिन्दी फिल्मों में क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव से हिन्दी का स्तर और समृद्ध रहा है, साथ ही साथ क्षेत्रीय भाषा और बोली भी संरक्षित हो रही है, क्योंकि वो किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नही रहती।

हिन्दी साहित्य और सिनेमा

हमारे मन मस्तिष्क पर पढे हुये से ज्यादा देखी और सुनी हुयी बातों का असर रहता है, पठन में कल्पनाशीलता होती है, जबकि दृश्य या सुनी हुयी बातें यथार्थ के ज्यादा निकट होती हैं। हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्य को चाहे वह उपन्यास हों या कहानियां समय समय पर फिल्मकारों ने उसे जन मानस तक पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। चाहे वह १९६३ में बनी फिल्म गोदान हो, १९९० में बनी गुनाहों का देवता हो, कृष्ण चंदर के उपन्यास पेशावर एक्स्पेस पर आधारित एंव यश चोपडा जी के निर्देसन में बनी वीरजारा हो, अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पर आधारित फिल्म पिंजर हो, या फिर देवदास जिसका कई निर्देशकों ने अलग अलग काल में समाज के अनुसार उसका फिल्मांकन किया।

हिन्दी वैश्वीकरण में बालीवुड की भूमिका

हिन्दी फिल्मों के माध्यम से देश ही नही अपितु विदेशों में भी हिन्दी को प्रोत्साहित किया गया। इस क्रम में राजकपूर की 'आवारा' और 'श्री 420' को बहुत बडा श्रेय जाता है , इन फिल्मों ने अपने समय में रूस में लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए थे। अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, लता मंगेशकर, एवं हिन्दी फिल्मों के अन्य कई कलाकार सारी दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में अपने रंगमंचीय प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर चुके हैं। भारतीय फिल्में और गीत कई देशों में लोकप्रिय हैं। मेहँदी हसन व गुलाम अली (दोनों पाकिस्तानी गजल गायक) के हिन्दी गीत आज भारत में लोकप्रिय हैं। इन सब तथ्यों से हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को सौ प्रतिशत प्रोत्साहन दिया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में हिन्दी और बॉलीवुड की भूमिका

एक समय था जब लोग समझते थे कि हिन्दी रोजगार परक भाषा नही है, हिन्दी लेखन से जुडे लोग या तो जीवन यापन के लिये कोई और कार्य करते थे या फिर जीविका के लिये संघर्ष में उनका जीवन व्यतीत हो जाता था। पिछले दो दशकों ने इस मिथ को कुछ हद तक तोडा है, और इसमें फिल्मों की अहम भूमिका है।

आज चाहे वह हिन्दी फिल्मों के लेखक हों, गीतकार हों, कहानीकार हों, ना केवल वह अच्छा धन अर्जन कर रहे हैं, बल्कि कई नये अवसर भी पैदा हो रहे हैं, जैसे कई विभिन्न विदेशी भाषाओं की फिल्मों का हिन्दी में अनुवाद हो रहा है अवतार, हैरी पॉटर और स्पाइडर मैन जैसी फिल्मों को भी अपने बाजार को विस्तृत करने के लिये भारत में हिन्दी में अनुवाद करके प्रसारित करना फायदे का व्यापार साबित हुआ।आज कई बडी कम्पनियां अपने व्यापार को विस्तार देने के लिये हिन्दी और बॉलीवुड दोनो का सहारा ले रहीं है, जैसे अमेजन एलेक्सा बॉलीवुड के सितारे अमिताभ बच्चन के साथ उनकी आवाज को हिन्दी भाषा में उपयोग करने के लिये प्रतिबंध कर रहा है।

अन्ततः

भाषा के लिहाज से हिंदी के सामने अपनी चुनौतियां हैं, अपना संघर्ष है. लेकिन उसके साथ जब सिनेमा जुड़ता है, तो सफर अपने आप में सुनहरा हो जाता है. कथा, कहानियों और दिलचस्प किरदारों का ऐसा सिलसिला, जिसमें हिंदी सजती है सुरीले गीतों और सुनहरे संगीत के साथ. हिंदी सिनेमा के साथ वो जुबान बन जाती है, जिसके संवाद से सरहदों की लकीरें दरकती नजर आती है। २१वी सदी में, हिंदी की वजह से ही हॉलीवुड में फिल्मी कलाकारों की मांग में अचानक से वृद्धि देखने को मिलता है। वॉलीवुड के सहयोग से आने वाले समय में हिन्दी की व्यापकता का विस्तार अनन्त दिखता है, और नयी पीढी से हिन्दी को सम्मानजनित स्थान मिलना सुनिश्चित है।

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

प्रेम पृथाएं


 माँ, भाभी, बहन को देखकर

कुंवारेपन से ही देखने लगती है

स्वप्न

जब वो भी करेगी व्रत

अपने पति के लिये

होते ही सुहागन

करने लगती है कामना

सुहाग के अमर होने की

सहर्ष सप्रेम

बुनती है कवच

दीर्घायु का

सौभाग्य का

समृद्धि का

कभी पुत्र 

कभी पति 

कभी परिवार के लिए

करती है उपवास

कभी बिना अन्न के

कभी बिना जल के

कभी चौथ कभी तीज

कभी अष्टमी कभी दूज का

सम्पूर्ण समर्पण से

पूजन से अर्चन से

करती है कामना

अपनों के लिए

मगर उन अपनों में

सम्मिलित नहीं है

पुत्री माँ या बहन 

समाज ने बड़ी सरलता से

कर दिया विभाजित

व्रत का भार स्त्री और

व्रत का फल पुरुष में

पूछना चाहती हूं 

समाज के रचयिताओं से

क्या स्त्री नहीं है

दीर्घायु की अधिकारिणी

क्या पुरुष का पल्लवित होना ही

है पर्याप्त समाज के लिए

क्या जन्म जन्मांतर तक

स्त्री को ही चाहिए साथ

पति, पुत्र या पिता का

क्या नहीं बन सकता

तीन सौ पैंसठ दिन में

कम से कम एक दिन

जब करे पुरुष

व्रत पूजन अर्चन

पत्नी, मां, या बहन के

सौभाग्य की कामना के लिए

उनकी दीर्घायु के लिए

क्या देख सकता है

कभी कोई एक पुरुष

स्वप्न

कोई ऐसा व्रत रखने का

शायद पृथाओ में जकडे हैं दोनो

स्वीकार लिया है दोनो ने ही

अपना अपना भाग

गौरी ही करेगी तप महादेव के लिये

हाँ क्योकि

हर पुरुष नही हो सकता महादेव

जो करेगा तप गौरा के लिये

पता नहीं फिर होगा कैसे

पूरा स्वप्न हर गौरा का

जन्मजन्मान्तर तक पाने का

अपने इस जन्म के शिव को

सोमवार, 28 सितंबर 2020

ई-संवेदनाएं

मै आज चुपचाप देख रही हूँ, अपनों को, अपनों की प्रतिक्रियाओं को। आज ना मेरे मोबाइल की घंटी नही बज रही है ना ही मेरी डोर बेल, हाँ सुबह से कोई सौ सवा सौ नोटीफिकेसन्स आ चुके हैं, मेरे फेसबुक, ट्वीटर, इन्स्टाग्राम पर भी लगातार कुछ मैसेजेस आ रहे हैं। मेरे आस पास दो चार मानव आकार के लोग दिख तो रहे हैं मगर उनमें से किसी को यह याद नही मुझे इस समय क्या दिया जाना चाहिए? वैसे तो मेरे लिये अब किसी भी चीज का कोई मायने नहीं बचा, मगर फिर भी ना जाने क्यों ये कमबख्त भावनाएं अभी भी मेरा साथ नहीं छोड रहीं। घर के किसी कोने से कोई रोने की आवाज अभी तक नहीं सुनाई दी, हाँ मेरे व्हाट्स एप पर आंसूं की नदियां जरूर बह चुकी हैं, मगर दिल कहाँ ऐसी नदियों से भीगता है। लोग उन लोगों को सांत्वना दे रहे हैं, जिनके लिये ये फालतू से भी ज्यादा फालतू चीज है। मेरी आखिरी फोटो पर अब तक के सबसे ज्यादा लाइक आ चुके हैं, पता नहीं इसे मै अपनी किस्मत समझूं, कि लोग इस वर्चुअल संसार में मुझे इतना प्यार करते थे, या ये समझूं कि मेरा जाना लोगों को इतना पसन्द आ रहा है। मुझे याद आ रहा है वो दिन जब मेरे दादा जी पंचतत्व में लीन हुये थे, ना जाने कहाँ कहाँ से लोग उनके दर्शन के लिये आ रहे थे, जिन्हे पहले कभी नही देखा था, वो भी आज दिख रहे थे, आंखों की नमी स्पष्ट रूप से कह रही थी कि वह कितने ही हदयों में विराजमान थे, कोई उन्हे पिता सदृश्य देख रहा था, तो कोई मित्र, कोई शिष्य समान उनकी चरण रज ले रहा था तो कोई अपने आदर्श का अभिवादन नम अश्रुओं से कर रहा था। मेरा आंगन मेरे आज के घर से भी बडा था, मगर वहाँ भी पैर रखने की जगह न थी, और आज मेरे इस टूबीएच के फ्लैट में आकाश सा विस्तार था, जिसमें आधुनिक सभी सामान मौजूद थे, सिर्फ अभाव था तो उस पिछडे मानव का जो कभी संदेवनाओं से परिपूर्ण था। तभी मेरे सिरहाने पर किसी हाथ की अनुभूति हुई, मुझे आतुरता हुई यह जानने की कि यह कौन मेरा अपना है, जिसे यह पता है कि मुझे इस समय इस अनुभूति की कितनी आवश्यकता थी, नजर उठाकर देखा, मेरे सिरहाने मेरा ही अविष्कृत रोबोट नम आंखे लिये खडा है, उसके दूसरे हाथ में गंगाजल की बोतल है ।वो मौन खडा मुझे बतला रहा है कि तुम्हारा अविष्कार असफल नहीं हुआ, मुझमें वो सभी संवेदनाएं है जो एक पिछडे इन्सान में हुआ करती थी, और जो आज के आधुनिक मानव में लगभग शून्य हो चली हैं। मैने प्रसन्नता से अन्तिम बार आंखें मूंद ली, मन संतोष से परिपूर्ण था कि मैने भावनाओं को संसार से समाप्त नहीं होने दिया, संवेदना विस्थापन के इस अविष्कार के लिये बहुत सम्भव है आने वाले समय में कोई असंवेदनशील व्यक्ति मुझे नोबेल पुरस्कार भी दे ही दे।

शनिवार, 12 सितंबर 2020

आत्महत्या (रोकथाम ?) में फिल्मों की भूमिका

 

आज से पहले मैने ना इस दिवस के बारे में सुना था, ना ही पढा था, किंतु जब अखबार में इस दिवस के बारे में पढा तो कुछ सोचने पर मजबूर अवश्य हो गयी। कई सारी घटनाएं याद आने लगी, खास कर कई फिल्मी हस्तियों( दिव्या भारती, जिया खान, इंदर कुमार, कुशल पंजाबी जैसे कई नाम इसमें शामिल हैं) का नाम और कई सारी फिल्में(चौदवी का चांद, एक दूजे के लिये, मोहब्ब्तें, सिंघम, हम दिल दे चुके सनम, छिछोरे, मसान जैसी सफल फिल्में) जिनमें किरदार जीवन की किसी समस्या को कारण बनाकर आत्महत्या कर लेते हैं, आश्चर्य की बात तो यह लगती है कि फिल्मों का इस तरह फिल्मांकन किया जाता है कि दर्शकों को भी लगता है कि यही एक मात्र समस्या का हल था, अभिनेता या अभिनेत्री का फिल्म में ऐसा करना दुखद तो लगता है मगर गलत नही लगता। दर्शक उसके माता पिता, या आस पास के दिखाये समाज या खलनायक या परिस्थितियों को पूरी तरह से दोष देता हुआ, उस किरदार को पूरी तरह न्यायसंगत ठहराता हुआ सहानुभूति देता हुआ कहता है- बेचारा और करता ही क्या? या फिर इसे कहते है कि प्यार के लिये उसने जान दे दी। कुछ इस तरह हमारी फिल्में सच्चे प्यार की परिभाषा हर काल में गढती रहीं हैं। जिसका परिणाम ये होता है कि एक सामान्य व्यक्ति भी अपने प्रेमी या प्रेमिका से पूंछ उठता है कि क्या वो उसके लिये प्यार में जान दे सकता है? फिल्म वीरजारा में जब जारा( प्रीती जिंटा) अपनी मां (किरण खेर) से पूछंती है कि क्या अब्बा जी आपके लिये अपनी जान दे सकते हैं और वो एक मिनट को चुप होकर बात का कुछ घुमा कर जवाब देती हैं, तब जारा कहती है कि वो एक ऐसे शख्स को जानती है जो उसके लिये जान दे सकता है। फिल्म में कुछ ना दिखाते हुये भी दर्शकों तक स्वतः ही यह संदेश पहुंचता है कि जारा के पिता (जहांगीर हयात खान) को उसकी मां से सच्ची मोहब्बत नही, और जारा के लिये वीर एक सच्चा प्रेमी है। सुनने और देखने में यह बहुत अच्छा लगता है। यह दॄश्य एक तरफ जहांगीर हयात की छवि को प्रेम के दुश्मन के रूप मे गढता है वही उसकी मां(मरियम हयात) को एक मजबूर पत्नी के रूप में दिखाया जाता हैं, और फिल्म के नायक वीर की छवि और मजबूती से उभरती है।

किंतु अगर हकीकत की पृष्ठभूमि में देखे तो क्या सच्चे प्रेम के लिये, मर जाने का दृढ निश्चय ही दो लोगों के मध्य पनपे प्रेम को सच्चे प्रेम की मुहर दे सकता है।

इसी तरह सन २००० में एक फिल्म आई थी, मोहब्बतें जिसमें मेघा (ऐश्वर्या राय बच्चन) इसलिये आत्महत्या कर लेती हैं क्योकि वह ना तो अपने पिता नारायन शास्त्री(अमिताभ बच्चन) को दुखी देख सकती है और ना ही अपने प्रेमी राज आर्यन(शाहरुख खान) के बिना रह सकती है। ऐसा लगता है कि जब भी कोई पिता बच्चों के प्रेम के खिलाफ हो तो मेघा की तरह ही निर्णय करना चाहिये, यही एकमात्र रास्ता है अपने पिता को खुशी और प्रेमी के साथ मरने के बाद हमेशा के लिये रहने का। फिल्म के कई दॄश्यों में मेघा की रूह राज के पास आती भी है। राज बाकी की जिंदगी मेघा को अपने पास महसूस करते हुये गुजारता है और उसे अपने जीवन में किसी की जरूरत भी नही होती, क्योंकि नायक का प्रेम तभी सच्चा सिद्ध हो सकता है। नारायन शास्त्री की छवि खलनायक के बहुत करीब नजर आती है।

ऐसी एक नही कई फिल्में हैं जिनमें किरदार आत्महत्या करते हैं, और वह आत्महत्या फिल्म में किसी न किसी तरह न्याय पूर्ण दिखाई जाती है। जैसे १९६० में आई फिल्म चौदहवी का चांद (फिल्म इतिहास में एक मील का पत्थर) में नवाब साहब (रहमान) फिल्म के अंत में हीरा खा कर फिल्म का त्रिकोण खत्म करते हैं, और अभी हाल में ही आई फिल्म छिछोरे जिसमें ऐनी का बेटा इसलिये आत्महत्या करने की कोशिश करता है क्योकिं उसका पिता एक सफल आई. आई. टियन है और वह स्वयं उसके इंट्रेंस एक्साम में नाकामयाब हो जाता है।

मसान में एक किरदार समाज के डर से आत्महत्या कर लेता है तो सिंघम में पुलिस इंस्पेकटर अपने ऊपर लगे गलत आरोपों के दबाव में आ कर आत्महत्या कर लेता है। हम दिल दे चुके सनम में नायिका नायक (सलमान खान) से ना मिल पाने के कारण आत्महत्या की कोशिश करते हुये पर्दे पर अपने प्रेम की गहराई को प्रमाणित करती है, तो कयामत से कयामत तक में राज (आमिर खान) आत्महत्या इसलिये कर लेता है क्योकिं रश्मि (जूही चावला) के जीवित ना रहने पर इक सच्चे प्रेमी का यह फर्ज है कि प्रेम को सच्चा प्रमाणित करने के लिये वह भी तुरंत अपने जीवन का त्याग कर दे। फिल्म एक दूजे के लिये तो इससे कहीं आगे निकलती दिखती है जिसमें नायक मृत्यु के करीब होने की स्थिति में नायिका को लेकर समुद्र में कूदते हुये हमेशा के लिये दूसरी दुनिया में एक दूजे के हो जाने को इंगित करता है, और फिल्म के टाइटल एक दूजे के लिये को सही प्रमाणित करता है।

सवाल उठता है कि क्या समाज में एक सामान्य व्यक्ति को अपने प्रेम को सच्चा सिद्ध करने के लिये ऐसे ही आदर्श देने चाहिये?

क्या परीक्षा में असफल होने पर बच्चों को आत्महत्या करने जैसे गलत कदम उठाते हुये अपने मानसिक दबाव का प्रदर्शन करना चाहिये?

क्या आत्महत्या को कठिन परिस्थितियों का हल मानना चाहिये?

क्या सामाजिक भय से छुटकारा पाने के लिये आत्महत्या करना उचित मान लेना चाहिये?  

क्या गरीबी या बेरोजगारी की परिस्थिति के लिये समाज को जिम्मेदार ठहरा कर आत्महत्या का विकल्प तलाश लेना चाहिये?

अगर उपरोक्त सभी प्रश्नों का उत्तर नहीं है तो हमारी फिल्में अपनी कहानी में आत्महत्या जैसी कायराना गतिविधि को अपनी फिल्मों में स्थान क्यों देती हैं? क्यों ऐसे चरित्रों का चित्राकंन फिल्म के मुख्य नायक नायिकायें करती है? हर देश काल में हर समाज फिल्मों से, नायक, नायिकाओं से ना केवल आकर्षित होता है बल्कि कई बार अपना आदर्श भी बना लेता है।

क्या हमारे फिल्म निर्माता, निर्देशक, कहानीकार, नायक, नायिकाये बाकई इस पहलू से अनभिज्ञ हैं कि पर्दे पर निभाये गये चरित्रों का जन मानस और खास कर युवा वर्ग पर क्या प्रभाव पडता है या उनके लिये व्यापार ही महत्वपूर्ण है, फिर चाहे वह किसी भी कीमत पर हो। जो समाज उनको धन, शोहरत, सुविधायें देता है, उस समाज में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नकारात्मक संदेश को प्रसारित करना वैसा ही हो सकता है जैसे थाली में छेद करना।

हमारे मीडिया, हमारे फिल्मकारों, हमारी सरकार, सेंसर बोर्ड और इन सबसे बढकर स्वयं समाज को अपने अपने स्तर पर जिम्मेदारी लेनी चाहिये। हमें ऐसे किरदारों को नायक नही, एक हारे हुये व्यक्ति की तरह देखना चाहिये। यदि हम अपने बच्चों को ऐसी फिल्में दिखाते हैं, तो हम बडो का ऐसे चरित्रों पर चर्चा करनी चाहिये और यह संदेश देना चाहिये कि उस किरदार को ऐसा नही करना चाहिये था, उस परिस्थिति में वह जीवित रह कर परिस्थितियों से संघर्ष करने और उन पर जीत पाने का संदेश भी दे सकता था। जिस तरह से आज युवा वर्ग में आत्महत्या करने की पॄवत्ति पनप रही है, हमारे सेंसर बोर्ड को भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता आज के समय में प्रासंगिक हो जाती है कि आत्महत्या जैसे कार्यों को यदि फिल्म में दर्शाया जाय तो उसके किरदार को नायक नही, एक कमजोर एक हारे हुये व्यक्ति के रूप में दिखाये। वो यह दिखाये कि वह किरदार जीने की कोशिश कर सकता था, वह यह दिखाये कि उसके बाद उसकी समस्यायें हल नही होती वरन उसका सामना उसके परिवार वालों को करना पडता है, वो यह दिखाये कि नायक या नायिका के आत्महत्या करने के बाद नायक/ नायिका उसकी याद में पूरा जीवन नही जीते, उनका जीवन कुछ समय के बाद सामान्य भी होता है, उनके जीवन को गति भी मिलती है और उनका बिछडा साथी मात्र एक याद बन कर कर जाता है। शायद फिल्मों में दिखाया गया यथार्थ हमारे युवाओं को कुछ राह दिखा सकें, जीवन को कठिन परिस्थितियों में भी जीने की प्रेरणा दे सके और सच्चे प्रेम की परिभाषा मरने नही जीने में है यह स्थापित कर सके।

ऐसे में याद आती है सन १९७१ में आई राजेश खन्ना द्वारा अभिनीत फिल्म आनंद, जिसमें नायक आनंद सहगल यह जानते हुये भी कि उसे एक ऐसी बीमारी है जिसके कारण वह छः महीने से ज्यादा नही जी पायगा फिर भी वह पूरी जिंदाजिली से कहता है – बाबू मोशाय जब तक जिंदा हूं, मरा नही। आज समाज को ह्रिकेश मुखर्जी जैसे महान डायरेक्टर की बहुत आवश्यकता है जो समाज को सकारात्मक संदेश दे सकें, ऐसी फिल्में दे सके जिनसे एक हारा हुआ व्यक्ति भी प्रेरणा ले सके, पुनः जीने की उर्जा दे सके।

GreenEarth