प्रशंसक

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2019

खास हो गया..... something special happened......

उसके सुर्ख होंठों ने
छुआ जो मेरे नाम को
आम से ये नाम भी
आज खास हो गया

हम वही हैं आज भी
वही लकीरें हाथ में
हाथ आया हाथ में 
नसीब खास हो गया

दिन वही है उग रहा
शाम वो ही ढ्ल रही
डूबे तेरी चाँदनी में
चाँद खास हो गया

वही जमीं वही शहर
वही कदम वही डगर
साथ जब से वो चला
सफर ये खास हो गया

तलाश खत्म हो गयी
ख्यालों का नगर बसा
जुदा हुआ मै भीड से
शख्स खास हो गया

नजर को मेरी तू मिला
असर हुआ है कुछ नया
चमन हुये हो तुम मेरे
भ्रमर मै खास हो गया

शनिवार, 28 सितंबर 2019

क्या होगा


ठहरे हुये पानी में
वो आग लगा देते हैं
बहती हुयी लहरों का
अंजाम भला क्या होगा

झुकती हुयी नजरों से
वो कयामत बुला लेते है
ऊठती हुयी निगाहो का
अंदाज भला क्या होगा

उलझी हुयी जुल्फो से
वो सुबह को शाम करते है
भीगे हुए गेसुओं से
मौसम भला क्या होगा

हल्की सी एक झलक से
वो तारों को रौशन करते हैं
अंजुमन में उनके आने से
चांद का भला क्या होगा

आहट होती है आने की
और बहारें पानी भरती है
ठहरेंगें जब वो गुलशन में
कयामत का भला क्या होगा

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

अच्छी नही



निगाहों को पढने दो
निगाहों की गुफ्तगू
दखलंदाजी जुबान की
हर जगह अच्छी नही

घुलने दो इश्क को
सांसों में इश्क की
बेताबियां हुस्न की
हर जगह अच्छी नही

सुनने दो खामोशी को
खामोशियों की कही
गुस्ताखियां निगाह की
हर जगह अच्छी नही

मचलने दो इशारो को
इशारों की गिरफ्त में
निगेबानियां तहजीब की
हर जगह अच्छी नही

बहने दो ख्यालों को
ख्यालों के समन्दर में
सांकलें रिवायत की
हर जगह अच्छी नही

पडने दो इश्क पर
रौशनी जरा हुस्न की
मौजूदगी चिरागों की
हर जगह अच्छी नही

रुकने दो लम्हों को
रूह के आगोश में
पाबंदियां वक्त की
हर जगह अच्छी नही

तुलने दो अहसासों को 
चाहत के पैमाने में 
नजदीकियां मिजाज की
हर जगह अच्छी नही

कुछ कहो न तुम हमें
चुप रहे हम भी जरा
इश्क पर छींटाकशी
किसी तरह अच्छी नही

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

मै ही, हाँ सिर्फ मै ही हूँ-जिम्मेदार


सोचती हूँ, अब मान ही लूँ
कि मै ही, हाँ सिर्फ मै ही हूँ
जिम्मेदार
मेरे आस पास
घटती हर उन दुर्घटनाओं का
जिनको भले ही कोई उगाये
खरपतवार मै ही हूँ
सच ही तो हैं

आखिर कहाँ है दोषी
वो नजरें
जो किसी एक्स-रे मशीन से कमतर नही
मशीन का तो काम ही है – काम
मुझे खुद ही ओढनी चाहिये
सिर से पांव तक
अभेद्य लौह ओढनी

कहाँ है दोषी
वो अधिकारी
जिसकी पर्सनल असिसटेंट
बनने का नियुक्ति पत्र मैने स्वीकार किया 
पर्सनल का अर्थ समझे बिना
खोजने चाहिये थे मुझे 
पर्सनल के पर्यायवाची

कहाँ है दोषी
वो प्रोफेसर
जिसे मैने ही बनाया था
अपना गाइड
कब कितना कैसे  
किया जायगा गाइड
ये पढना चाहिये था मुझे
यूनिवर्सिटी के अलिखित ऑर्डिनेन्स

कहाँ है दोषी
वो डॉक्टर
जिसे स्पेस्लिस्ट समझ गई थी
अपनी बीमारियों का इलाज लेने
मालूम करने चाहिये थे मुझे
उसके स्पेसलाइजेसन्स

कहाँ है दोषी
वो सारे सम्बन्धी
जो मिल गये मुझे जन्म के साथ
गढने को नित नये सम्बन्ध
सोचना चाहिये था मुझे
आने से पहले इस दुनिया में

तो लेनी ही चाहिये मुझे जिम्मेदारी
क्योकि
दोषी है- माँ
जिसने जन्म दिया
दोषी है- सपने
जिसने पहचान खोजी
दोषी है – आंकाक्षायें
जिसने कुछ करना चाहा
दोषी हैं- वस्त्र
जो अभेद्य नही
दोषी है - समझ
जो नही सीखी चुप रहना 

करती हूँ
आज प्रत्यार्पण और
मांगती हूँ समाज से
संपूर्ण  स्त्री समाज के लिये
उसके दोषो की सजा
मॄत्यु दंड
ताकि गलती से भी
कही किसी तथाकथित 
मासूम निर्दोष पुरुष को
न बना दिया जाय
दोषी
GreenEarth