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रविवार, 19 सितंबर 2021

दो चोटी वाली



राहुल आज जब स्कूल से लौटा तो बहुत अनमना सा दिखाई दे रहा था, रोज की तरह आते ही ना तो उसने मम्मी से खाने के बारे में पूंछा और ना ही अपने स्कूल की कोई बात की। बस सीधा आकर बैग और जूते उतार सोफे पर उल्टा लेट गया। राधिका के मन में थोडी चिंता हुयी। ममता भरे हाथ से उसका सिर अपनी गोद में लेते हुये बोली- क्या हुआ राहुल, दोस्तों से कुछ झगडा हुया क्या या टीचर से किसी बात पर डांट पडी। 

राहुल मां की गोद से अपना सिर फिर से सोफे पर रखते हुये बोला- नही मां कोई बात नहीं। बस ऐसे ही।

मां अपने व्याकुल होते मन को समेटते हुये फिर लाड से बोली तो फिर क्या हुआ मेरे लाल को, अच्छा चल बात बाद में बता देना, तुम हाथ मुंह धुल लो, मै तेरा खाना लगाती हूं।

नहीं मां मुझे भूख नहीं, कह कर राहुल दीवाल की तरफ मुंह घुमा लेट गया।

अब तो हर मां की तरह राधिका भी समझ गयी कि बात कुछ ऐसी है जिससे उसके बच्चे का मन अंदर तक दुखी है।

राहुल का चेहरा अपनी तरफ करती हुयी बोली- राहुल बोलो ना बेटा, मेरी कोई बात तुमको अच्छी नहीं लगी क्या, सच सच बता क्या हुआ आज स्कूल मेंं ?

राहुल भी आखिर कितनी देर बात मन में रख पाता, आखिर था तो अभी दस ग्यारह वर्ष का बालक ही।

रुआसा सा हो बोला- मम्मी मैं आपकी सारी बात मानता हूं ना

राधिका- हां, तू तो मेरा बहुत अच्छा बेटा है।

राहुल् - मां, अगर मै आपसे कुछ कहूं तो आप मान जायेंगीं क्या?

राधिका को लगा शायद के राहुल कहीं कोई बडी चीज की डिमांड तो नहीं करने वाला, पता लगे वो प्रॉमिस तो कर दे मगर पूरी ना कर सके, तब राहुल को और दुख होगा।

बच्चे को कई बार जब मां कोई चीज नहीं देती तो पिता से कह लेते हैं या पिता कोई जिद पूरी नहीं करते तो किसी तरह मां कर देती है, मगर राहुल की तो मां भी वही है और पिता भी वही।

किस्मत ने रुष्ट हो कर राहुल के अबोधपन में ही उसके पिता को उससे दूर कर दिया था। शायद सॄष्टि रचयिता की कहीं कुछ कृपा थी जो राहुल के पिता एक सरकारी विभाग में क्लर्क थे, जिनके जाने के बाद राधिका को जीपनयापन की कटु कठिनाइयों का सामना नहीं करना पडा था, मगर वह अपने बच्चे की हर अभिलाषा पूरी करने में समर्थ हो ऐसा भी नहीं था। 

यही सब सोच उसने कहा- तेरी मां के लिये संभव होगा तो क्यूं नही मानेगी अपने बेटे की बात।

राहुल अब तक सोफे से उठकर बैठ चुका था

सिर नीचे किये हुये धीरे से बोला- मम्मी आप ना ये दो चोटियां ना किया कीजिये, आपको नहीं पता सब लोग अपने घर को दो चोटी वाली का घर, और मुझे दो चोटी वाली का बेटा कहते हैं, मम्मी मुझे ये सुनना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।

राधिका मोहल्ले वालों के अपने प्रति इस संबोधन से अनभिज्ञ हो ऐसा नही था किंतु यह शब्द राहुल भी सुनता होगा और उसका मन दुखी भी हो सकता है यह बात क्यों उसके संज्ञान में स्वतः ही नहीं आई, इसका उसे दुःख हो रहा था।

उसने कहा- अरे बस इतनी सी बात थी क्या जिसके लिये मेरा बेटा इतना दुखी था। मै तो सोच रही थी कुछ बडी सी बात होगी जिसके लिये मेरा समझदार बेटा परेशान हो रहा है।

राहुल स्कूल से आते समय यही सोच सोच कर परेशान था कि वो यह बात अपनी मम्मी से कैसे कहेगा, कहीं उनको मेरी बात से दुख ना हो। मगर मम्मी तो जरा भी परेशान नहीं हुई।

राधिका की बात से वह सामान्य हो चुका था- थोडा चहकते हुये बोला- आपको मेरी बात बुरी नहीं लगी मां।

राधिका- अपने बच्चे की बात भला मां को बुरी भी लग सकती है क्या, मगर हां अगर अब फटाफट तुमने खाना नहीं खाया तो मां जरूर नाराज हो जायगी।

राहुल- मै बस अभी आया मां

खाना खिलाने के उपरांत, राधिका नें राहुल को सुला दिया। शाम को जब राहुल सो कर उठा तो देखा ड्रांइग रूम में राधिका कुछ पढने में व्यस्त थी और सामने मेज पर कुछ एलबम और कुछ पत्रर खे हुये थे।

राहुल- क्या पढ रही हो मां, और ये एलबम कौन से हैं?

राधिका - आओ आज तुमको वो पत्र दिखाती हूं, जो तुम्हारे पिता जी ने मुझे शादी से पहले लिखे थे।

राहुल ने अपने हाथ में पत्र ले लिया। पत्र का पहला शब्द था- मेरी प्रिय दो चोटी वाली

तभी राधिका ने एक दूसरा पत्र राहुल को पकडाया

राहुल ने पढा उसमें भी पहला शब्द यही लिखा था

अब तो एक एक कर राहुल खुद ही और पत्र उत्सुकतावश उठाता और पढता गया।

सभी में यही शब्द पहला शब्द था।

तब राधिका ने प्यार से राहुल के सिर पर हाथ फेरते हुये, अपने हाथ में ली एक तस्वीर उसे दिखाई जिसमें वो और राहुल के पिता जी थे, उसमें भी उसकी मां ने दो चोटियां कीं थी।

तब राधिका बोली- राहुल पता है- तुम्हारे पापा और मै, एक साथ पढते थे, जब पहली बार तुम्हारे पापा ने मुझे देखा तब भी मैने दो चोटियां की थी।

तुम्हारे पापा को मेरा दो चोटियां करना बहुत पसंद था।

फिर जब तुम्हारे पापा मुझे शादी करके अपने साथ ले आये,  तब मै दो की जगह एक चोटी करने लगी, जैसे सभी लोग करते हैं, तब तुम्हारे पापा ने मुझसे कहा- मुझे तुम्हारा दो चोटियां करना ही पसंद है, तुम यही किया करो,

तब मैने कहाँ - कल आस पास के लोग ही आपको चिढायेंगे वो जा रहा है दो चोटी वाली का पति तब अच्छा लगेगा आपको।

तब तुम्हारे पापा ने कहा- मुझे इस बात की कभी चिंता नहीं कि लोग क्या कहते हैं, हमे एक दूसरे की खुशी का ख्याल रखना चाहिये बस। लोगों का क्या है, उनको ये बात नही मिलेगी, तो कोई और बात ढूंढ लेंगें। और हम जब किसी की बात पर ध्यान देते हैं, तभी दुख होता है, तो इसलिये मै ऐसी बातों पर ध्यान ही नहीं देता। 

और तबसे ना कभी तुम्हारे पापा ने ये ध्यान दिया ना हमने कि लोग क्या कहते हैं, मगर मुझे कभी ये ख्याल ही नही आया, कि मेरा नन्हा सा बच्चा इस बात के कारण इतना दुखी हो रहा है। 

अबसे फिर कभी इतना परेशान मत होना, जो बात हो तुरंत बता देना।

चलो अब स्कूल का होमवर्क करा देती हूं फिर खाना खायेंगें। 

अगली सुबह जब राधिका ऑफिस के लिये तैयार हो रही थी, राहुल उठकर उसके कमरे में आया, उसने देखा राधिका ने एक चोटी की हुयी थी। 

आकर मां के गले लग गया, और बोला मम्मी पापा बिल्कुल सही कहते थे- आप दो चोटी में ही अच्छी लगती हो, प्लीज अबसे वही कीजियेगा।

थोडा मुस्कुराते हुये राधिका ने कहा- अच्छा, और फिर तुम्हारे दोस्त.........

तुरंत राहुल ने कल पापा वाला वाक्य अक्षरशः दुहरा दिया- मुझे इस बात की कभी चिंता नहीं कि लोग क्या कहते हैं, हमे एक दूसरे की खुशी का ख्याल रखना चाहिये बस।

राधिका ने कस कर अपने बडे होते राहुल को हदय से लगा लिया, और अश्रुधारा को रोकने का असफल प्रयास करने लगी।

शनिवार, 18 सितंबर 2021

कौन जाने

 

दुआयें कब असर दिखायें, ये कौन जाने

कहर आहों का क्या ढाये, ये कौन जाने

रश्क करते हैं लोग, जिनके मुकद्दरों पर

दर्द कितने उनके दामन में, ये कौन जाने

झूम रही लौ अलमस्त, संग मस्त हवाओं के

उम्र चिराग की मगर कितनी, ये कौन जाने

वादा तो कर दिया उसने, साथ चलने का

वक्त ए राह क्या रंग दिखाये, ये कौन जाने

मुस्कुराते चेहरे अक्सर, हिजाब से ही लगे

जख्म कितने दफन दिल में, ये कौन जाने

दुश्मनों से भी मिला करिये जरा दोस्ती से

सांप आस्तीन से कब निकलें, ये कौन जाने

ख्वाब देख लो मगर, उसका चर्चा न करो

दिल कितने खाक हो जाय, ये कौन जाने

मोहब्बत कुछ नही, है जिंदगी का जुआ

मांझी पार लगाये या डुबाये,ये कौन जाने

ना डूब यूं, गमो फिक्र के सागर में पलाश

लहर कौन सी खुशी दे जाये, ये कौन जाने

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

किसे पता

 


मंजिल अभी और दूर कितनी, किसे पता है

मिलेंगें राह में कांटें या कलियां, किसे पता है

फर्ज मुसाफिर का सिर्फ चलते चले जाना

मिले किसे मोड, हमसफर, किसे पता है

दिये जला दिये राह में, भूले भटकों के लिये

कितनी उम्र मगर चिराग की, किसे पता है

कसूर किस्मतों का या कमीं कोशिशों में

सिवा तेरे वजह शिकस्त की किसे पता है

दिखा रहा है खौफ, मासूमों मजलूमों को

खुद भी है वो डरा डरा मगर किसे पता है

ख्वामखाह घुलता आदम, फिक्रे जिंदगी में

होनी कब किस करवट बैठे, किसे पता है

बुलंदियों के खातिर ये खूनो खराबा कैसा

ढल जाये सूरज किस घडी, किसे पता है

पलाश करती नहीं भरोसा, बंद आंखों से

शक्लो सूरत जयचंद की भला किसे पता है

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

कितनी आसानी से

 


कितनी आसानी से कह दिया उसने

आखिर क्या किया ,आपने मेरे लिए

जो भी किया,वो तो सब करते हैं

आज अगर मैं कुछ हूं

तो वो है परिणाम,

मेरी मेहनत का

मेरे पुरुषार्थ का

मेरे भाग्य का

या फिर मेरे पुण्य कर्मो का

मैं चुपचाप सुन रहा हूं

इसलिये नहीं कि नहीं कुछ भी

मेरे पास कहने को

नहीं चाहता मैं कोई

तर्क कुतर्क

नहीं चाहता मैं

बलपूर्वक बोना, भावनाओं के बीज

भावशून्य पथरीले रेगिस्तान में

मैं हूं धरा के अंत: स्थल में,बैठा बीज

बोलना मेरा धर्म है, ना ही स्वभाव

फिर चंचल शाखाओं को

समझाया भी तो नहीं जा सकता

हां समय अवश्य पढ़ा देता है

हर किसी को सच का पाठ

कल उस शाख पर भी 

खिलेंगें पुष्प, उगेंगें फल,

फिर जन्म लेगा बीज

फिर वो खो कर अपना अस्तित्व

जन्म देगा एक वृक्ष को |

इतनी ही आसानी से

चंचल, चपल शाखाओं द्वारा

फिर दोहराया जायेगा

यही प्रश्न

आखिर क्या किया,आपने मेरे लिए ?

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