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बुधवार, 13 सितंबर 2017

हमसाया भाग -३




हमसाया भाग १
हमसाया भाग २

गतांक से आगे
सारी रात तरह तरह के खयालों सपनों में खोते मेरी रात बीती। कब मुझे नींद आयी ये मुझे भी नही पता, मगर नींद थी इतनी गहरी कि मै ये भी भूल गया कि मै घर पर नही ट्रेन में हूँ, ट्रेन पुने स्टेशन आ चुकी थी और राधिका मुझे आवाज दे रही थी।
हडबडा कर मैं उठा और फटाफट सामान उतारने लगा तो धीरे से राधिका बोली- आप परेशान न हो, ये आखिरी स्टेशन है, नींद से अचानक से उठने के कारण शायद मै अपने सपनों से वास्तविक दुनिया में पूरी से वापस नही आ पाया था।
सामान उठाने के दौरान अहसास हुआ कि माँ बाबू जी ने कितना सारा सामान बाँध दिया था, कुली को आवाज देने ही वाला था कि विजय मामा अपने लडके यश के साथ आते दिखे।
विजय मामा हमारी छोटी चाची के सबसे छोटे भाई है। पिछले दस बारह साल से पूने आकर रहने लगे हैं, उनके तीन लडके और दो लडकियाँ है, यश उनका मंझला बेटा है । मुझसे दो चार साल की ही छोटाई या बडाई होगी। हाँ अगर माँ से पूछता तो वो तो उसका जनम साल क्या दिन तिथि तक सब बता देती। जाने कैसे माँ को सभी के जनम शादी मरण सबकी दिन तिथि याद रहती है। फला सन ७२ में चढते पूस की चतुर्दशी को हुआ था, या फला की शादी सन ७० में उतरते जेठ की एकादशी को थी। मुझे तो अपने तीनो भाइयों की बर्थ डेट  और माँ बाबू जी की शादी की सालगिरह के  अलावा आज तक कोई तारीख याद नही रह पायी । मगर हाँ अब दो और तारीखे याद रखनी होंगी- राधिका का जनमदिन और अपनी शादी की तारीख, सुना है अगर ये दोनो तारीखे अगर कोई शादीशुदा आदमी भूल जाय तो अक्सर ये लडाई झगडे का मुद्दा तक बन जाता है। सो लडाई से बेहतर है कि मै दो और तारीखे ही याद कर लूं।
अब तक मामा जी पास आ चुके थे आते ही बोले- अरे आनन्द बेटा, ज्यादा देर तो नही हुयी, दरअसल सुबह ही जीजा जी का फोन आया था कि तुम आ रहे हो, निकल तो मै तुरन्त ही पडा था मगर रास्ते में पेट्रोल भराने में जरा देर लग गयी।

मै झुक कर मामा जी के पैर छूने लगा तो उन्होने हाथ रोक लिया- बोले अरे अरे ये क्या तुम तो मेरे मान्य हो, भला मान्यों से भी कही पैर छुआये जाते हैं। इसी बीच राधिका झुक कर मामा जी के पैर छुते हुये बोली- मामा जी आशीर्वाद दीजिये कि हम लोग सुखी रहे।राधिका की बात में इतना अपनापन था कि जैसे मेरे नही वो उसके ही सगे मामा हो। शायद राधिका के इसी स्नेहभाव के कारण मामा जी उसको नही रोक सके और उसके सिर पर हाथ रखते हुये बोले- बेटा तुम दोनो खूब सुखी रहो। फिर मेरी तरफ देख कर बोले- आनन्द बहुत भाग्यवान हो जो तुम्हे ऐसी गुणवती दुल्हन मिली है, फिर यश की तरफ देखते हुये बोले-  यश बेटा भैया भाभी के पैर छुओ। उनकी इस बात ने यह तय कर दिया कि यश उमर में कुछ तो छोटा जरूर है । खैर इस सदाचार के बीच ही यश ने हमे याद दिलाया कि हम लोग प्लेटफार्म पर है और हमे घर भी चलना चाहिये। यश की इस बात पर मामा जी खूब जोर से हंस पडे और बोले हाँ हाँ चलो सामान उठाओ, आओ बहू चलो घर चले, फिर यश के साथ गाडी में सामान रखवा हम चारो मामा जी के साथ घर की तरफ चल दिये। 
क्रमशः

सोमवार, 11 सितंबर 2017

स्पर्श और स्त्री



स्पर्श
जिसमें निहित है  
निर्मांण की कल्पना
या विनाश का षणयंत्र
बराबर मात्रा में
स्पर्श
एक ऐसा इन्टरफेस
जिसमें इनपुट तो एक ही होता है
मगर बदलते रहते हैं आउट्पुट
कभी बन जाता है भक्ति
तो कभी द्या 
कभी भर जाता है मन
स्नेह के भाव से
कभी जग जाती है 
सुषुप्त प्रेम की तॄष्णा
और कभी
छटपटा जाता है मन
जल विहीन मीन सा
स्पर्श
एक ऐसी शक्ति
जिसमें जीवन भी है
और मॄत्यु जितना भय भी
जो रच सकता है प्रेम का महाकाव्य
या बन सकता है विषैला सर्प
स्पर्श
जो कभी तैरा जाता हैं
अनगिनत सपने
कभी कर देता है
 हौसलों का संचार
थके मन में
कभी बन जाता है
आशीष
और कभी देता है आहट 
किसी अवांछनीय विनाश की
स्पर्श
कभी बन जाता है
विश्वास 
जीवन पर्यन्त साथ निभाने का
कभी दे जाता है 
अहसास
जो कहता है "मै हूँ ना"
तुम बस आगे बढो
स्पर्श
एक ऐसा अक्षररहित शब्द
जो कह देता है
हर वो बात जिसे
कोटि शब्द समूहों के युग्म भी नही कह पाते
स्पर्श 
एक ऐसी पहेली
जिसे सुलझा लेती है
स्त्री
क्षण के न्यूनतम भाग जितने समय में
जान लेती है
स्पर्श करने वाले का
इतिहास
और तय कर देती है
उसका चैरित्रिक भूगोल
निश्चित कर लेती है
दूरी या निकटता
और रच देती है अध्याय
सम्बन्धों की सम्भावना या असम्भावना का

शनिवार, 9 सितंबर 2017

चंद अशरार जिन्दगी के नाम


मोहताज हों क्यूं भला किसी की पसंदगी के
जीने के लिये मुझे मेरा मुरीद होना चाहिये

संवरना निखरना नहीं मेरा किसी के लिये
आइने में मुझे सूरत मेरी बोलती चाहिये

जीना औरो के दम मुंकिन नही मेरे लिये
हौसला गिरके उठने का खुदमें मुझे चाहिये

खुशियों के किले बनाये क्यों किसी कांधे पे
मुस्कुराने के लिये बेफिर्की दिल की चाहिये

नही बढाना मुझे कद मेरा चंद ओहदों से
मेरी नजरों में मुझे मेरी अहमियत चाहिये

लोग आते है जाते है ये दस्तूर दुनिया का
शौक सफर का रखते हैं मकां नही चाहिये

बयां हो न सकेगा हाल दिल का लफ्जों से
इश्क के दरिया को सिर्फ शोख लहर चाहिये

न कर सकेंगें एहतराम मोहब्बत का जुगनू
ये वो शय है जिसे पतंगे सा जिगर चाहिये

खुशबू गुलाब की रूह तक भी बस सकती है 

सलीका कांटों को सहेजने का सिर्फ चाहिये

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

हमसाया भाग -२


गतांक १ से आगे..........

सच कहूं तो अभी तक ठीक से राधिका को देखा भी नही था, इस बात का पता तब चला जब ट्रेन गाँव से बीस तीस किलोमीटर दूर निकल आने पर मैने कहा- चाहो तो ये घूंघट कम या हटा सकती हो, गाँव से हम लोग बहुत दूर निकल आये हैं, दरअसल मुझे राधिका का ख्याल आने लगा हो ऐसा नही था, बल्कि मुझे इस बात पर शर्म सी आ रही थी कि पूरे डिब्बे में केवल राधिका ही थी जो लम्बे से घूंघट में थी, बाकी औरते सामान्य रूप से या तो सिर पर थोडा पल्लू रखे थी य वो भी नही के बराबर था। मगर हाँ जब राधिका का चेहरा दिखा तो मै उसके चहरे से अपनी नजर फेरना भूल सा गया, वो तो चाय वाले की आवाज पर बगल में बैठे अंकल टाइप व्वक्ति नें कहा- बेटा जरा चाय तो पकडा दो, ऐसा लगा जैसे मै किसी दूसरी ही दुनिया में चला गया था, मगर राधिका इस पूरे प्रकरण से बेखबर अपनी चूडियों में उलझी हुयी थी।
राधिका सच में रूप में हजारो नही लाखों में एक थी, ये मेरा ही मानना नही था, डिब्बे में बैठे लोगो की निगाहें कह रही थीं। सहसा मुझे लगा जैसे उसने घूंघट हटा कर ठीक नही किया। भली भाँति जानता था कि मैने ही उसे ऐसा करने को कहा था फिर भी अनावश्यक रूप से मुझे राधिका पर गुस्सा आने लगा। मै सोचने लगा कि मैने घूंघट उससे घूंघट कम करने या हटाने को कहा था, वो कम भी तो कर सकती थी, मगर उसने तो पूरी तरह से हटा ही दिया। क्या उसको समझ नही आ रहा कि गिद्ध जैसी नजरें उसे देख रहीं हैं। क्या इतनी नासमझ है, पिता जी ने बहुत तारीफ की थी इसकी समझदारी की।
मुझे खुद समझ नही आ रहा था कि मेरे मन में ये क्रोध क्यो आ रहा था, जिस लडकी से मेरा विवाह मेरी मर्जी के खिलाफ हुआ क्यो मुझे उससे ये अपेक्षा हो रही है वो मेरी भावनाओं का ख्याल रखे।
तभी जाने क्या हुआ- राधिका नें फिर से घूंघट कर लिया, हाँ पहले की अपेक्षा चेहरा पूरा ढका नही था, अब तक कई लोकल स्टेशन गुजर चुके थे, सो लोकल भीड का चढना उतरना भी कम हो गया था।
मेरे मन नें फिर से नयी करवट लेना शुरु किया- राधिका को देखने को मन व्याकुल होने लगा। और एक बार फिर उस पर गुस्सा आने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे बदला ले रही हो, कि इतने दिन घर पर रह कर जिससे बात करना तो दूर एक नजर उठा कर देखा भी नही, तो अब उसे मै भी देखने का कोई अधिकार नही दूंगी। बडा अजीब सा सफर था, हमसफर थे, मगर अनजाने से सहयात्री से भी ज्यादा।
उसी घूंघट की ओट में रहते हुये राधिका नें रात का खाना खाया, और सो गयी और तरह तरह के ख्यालों और सपनों में गोते खाते मेरी रात बीती। 

क्रमशः .............
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