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शनिवार, 7 नवंबर 2015

कुछ ऐसे मनाये दीवाली


खुशियों में सभी रंग जाये ,आओ ऐसे मनायें दीवाली |
चंदा भी धरा पर जाये ,आओ ऐसे मनायें दीवाली ||

बहुत जलाये दीप सभी ने ,मिटा ना अब तक अंधियारा |
गले मिले हर साल मगर ,ना मिला दिलों का गलियारा ||
 नेह की चिंगारी से जला दें ,दुश्मनी जो बरसों से पाली |
खुशियों में सभी रंग जाये , आओ ऐसे मनायें दीवाली ||

धन दौलत की चमक धमक में हमने खोया अपनों को |
लक्ष्मी को पूजा लेकिन ना मान दिया गृहलक्ष्मी को ||
दो पल सोचो आखिर क्या, हम सबसे कहती दीवाली |
खुशियों में सभी रंग जाये आओ ऐसे मनायें दीवाली ||

गगन मंडल में चमके तारे, घर घर दीपों की माला
लगा्कर लडी पटाखों की, तू फिरता होकर मतवाला
तेरी खुशी ने अम्बर की,  चादर काली कर डाली
खुशियों में सभी रंग जाये , आओ ऐसे मनायें दीवाली ||

अधूरी चमक है दीपों की, अधूरे दीवाले के अर्थ हैं
आडम्बर से रौशन जहाँ, मानवता के लिये व्यर्थ है
कुछ काम करें यूं मिलकर, सार्थक हो जाय दीवाली
खुशियों में सभी रंग जाये , आओ ऐसे मनायें दीवाली ||

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

छोटी सी हिम्मत


मार डालो साले को, मार डालो। भरी बाजार में देखते ही देखते चंद लोगो ने पीट पीट कर एक व्यक्ति को मार डाला। सबके देखते देखते वो लोग जो पीटने में सबसे आगे थे, भीड से निकल कर हवा की तरह गायब हो चुके थे। कुछ ही देर में बाजार का पूरा माहौल ही बदल गया था। एक जिंदा इन्सान अब लाश बन चुका था। ना कोई उसे जीते जी बचाने आया था, ना मरने के बाद उसके पास जाने की हिम्मत कर रहा था। तभी किसी ने बढे ही दार्शनिक भाव से कहा- जाने कौन था, लगता है कोई अपनी दुश्मनी निभा गया। मै भी उस भीड का हिस्सा थी। सभी के जैसे मै भी मूकदर्शक बनी सब देख रही थी। मै भी भीड की तरह  ही सोच रही थी – सच में लगता है या तो ये कोई चोर उचक्का होगा या किसी ने दुश्मनी मे मार डाला होगा। वैसे देखने में तो ठीक ठाक घर का लग रहा था मगर देखने से कहाँ किसी के बारे में कुछ कहा जा सकता है। तभी मेरे मन ने मुझे धिक्कारा – अरू, क्या ये समय ये सब सोचने का है, कोई भी हो, मुंकिन है कि कही इसकी कोई सांस बची हो। क्या तुम भी इन सारे सोये हुये लोगो जैसी ही हो। भीड मत बनो। अगले ही पल मेरे कदम एकाएक उस व्यक्ति कहूँ या लाश की ओर बढ गये थे। मन उसके जीवित होने के लिये दुआयें करने लगा था। उसके शरीर के जख्मों का दर्द मुझे महसूस होने लगा था।

आज इस घटना को करीब तीन साल गुजर चुके, मगर आज भी वो व्यक्ति जब मेरे घर आता है, उस दिन की घटना चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने आ जाती है। और अंततः मन खुशी से भर जाता है कि मेरी छोटी सी हिम्मत एक जीवन को मृत्यु के द्वार से खींच लायी। 

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

स्वयं की खोज- A Discovery for Self


बहुत दिनों से सोच रही थी कि कुछ दिन के लिये कही घूम आऊं, मगर न तो अविजीत को ऑफिस से छुट्टियां मिल पा रहीं थीं और ना ही माँ जी की तबियत इतनी अच्छी थी कि उन्हे छोड कर जा सकती। कहने को तो शादी को अभी एक साल ही हुआ था मगर लगता था जैसे बरसों से इस दहलीज से बंधी हुयी हूँ। शादी से पहले तो जब मन आता था छुट्टी ले लेती थी। साल में दो तीन बार तो घूमना हो ही जाता था, कभी घर वालों के साथ तो कभी दोस्तों के। शादी के बाद नौकरी के साथ साथ छुट्टी लेने की आजादी भी जाती रही। कहाँ मिलती है छुट्टी हम घर संभालने वाली औरतों को। बचपन से लिखने पढने का तो ऐसा शौक था कि पापा ने घर में मेरे लिये एक लाइब्रेरी ही बनवा दी थी। शादी से पहले, सनडे की दोपहर मेरी लाइब्रेरी में ही बीतती थी। रेहाना, कहने भर को ही काम वाली थी, सारे घर पर उसका हुकुम चलता था। जब मायके जाती तो कहती- बीबी जी कहो तो आपकी ये किताबे आपकी ससुराल पहुंचा दे, यहाँ तो किताबें अब धूल ही खाती हैं, और मैं हँस कर कह देती, अरे! रेहाना बेगम अब तो हम भी तुम से ही हो गये हैं, वहाँ भी किताबें अब धूल ही खायेंगीं।
शादी की सौगात में मुझे मिला था – एक लाडला देवर जिसका मेरे बगैर कोई काम ना चलता था, माँ जैसी सांस जिनका बस चलता तो मुझे पल भर को नजरों से ओझल ना होने देती और पति जिनका पहला जीवनसाथी था – उनका काम। यूँ तो महीने में दो तीन टूर उनके हो ही जाते थे, मगर मुझे कभी साथ ले जाने की शायद उन्होने कल्पना भी नही की थी। अगर कभी मैं कह देती कि इस बार मुझे भी साथ लेते चलो तो कह देते- क्या करोगी चल कर मै दिन भर काम और शाम को पार्टीज में बिजी रहूंगा, और तुम बोर होती रहोगी।
कहने को कोई दुःख ना था, मगर शायद इन जिम्मेदारियों के बीच मैं खुद को खोती जा रही थी। एक अजीब सा भय मन को घेरने लगा था। महीनों हो जाते थे अपना नाम सुने, कभी कभी सोचती कही एक दिन मै खुद अपना नाम ही ना भूल जाऊं।
कभी सोचती कि आखिर मेरे बिना कैसे चलता था ये घर, क्या दो चार दिन अब नही चल सकता। क्यो कोई मेरे मन को जानने की कोशिश नही करता। मुझे काम करने या गॄहस्थी संभालने से कोई गुरेज ना था, बस खुद को खो देने से डरती थी।  
आज अचानक सफाई करते करते जब मुझे एक पुराना अखबार मिला, जिसमे मेरी कहानी छपी थी, तो एक बार फिर से मन व्याकुल हो उठा। शादी के बाद बस यही एक कहानी लिखी थी| सभी ने तारीफ जरूर की थी मगर प्रोत्साहन कभी किसी से ना मिला।
सफाई करते करते मन की धुंध भी साफ हो रही थी। मैने खुद को खुद में खोजने का निश्चय। किसी से अपेक्षा करने से बेहतर था मै स्वयं ही स्वयं की अपेक्षायें पूरी करूं। मुझे स्वयं के लिये समय निकालना ही होगा। कुछ पल खुद को देने ही होंगे।

आज अपने जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत कर रही हूँ, इस आशा के साथ की अपनों से भले ही प्रोत्साहन मिले ना मिले, मगर स्वयं को दुबारा जरूर पा रही हूँ। 

शनिवार, 15 अगस्त 2015

आजादी


रात के बारह बजने का संदेश घंटाघर पर लगी घडी के घंटे की आवाज ने दे दिया। आज शहर की सडकों पर पुलिस की गस्त बढा दे गयी थी। कल पन्द्रह अगस्त थी। अभी चार दिन पहले ही शहर में दो जगह बम ब्लास्ट हुये थे। सौभाग्य से दो चार जाने ही गयीं थी। प्रशासन को पूरी आशंका थी कि आज की रात कुछ गडबड हो सकती थी। रीति की आंखों में नींद दूर दूर तक नही थी। उसका पति भी पुलिस विभाग में था। वो अपनी ड्यूटी के प्रति कितना समर्पित है ये तो वो नही जानती थी, मगर उसके प्रति वो समर्पित तो क्या, उसके लिये एक दैत्य से कम ना था। शादी के चार सालों में वो कितनी बार पिट चुकी थी, ये गिनती करना तो उसने बहुत पहले ही छोड दिया था। निर्धनता उसका सबसे बडा दोष था। दो रोटी और एक छत के लिये , वो सब कुछ चुपचाप सहन कर लेती थी, मगर अब सब्र का बाँध भी टूट रहा था। वो आजादी चाहती थी, मगर आजाद होकर जाती कहाँ? विदाई के समय ही उसकी विधवा माँ ने कहा था - रीति तेरा घर तो बस गया बस अब तेरी दोनो बहनों को उनका ससुराल मिल जाय तो मै अपनी जिम्मेदारियों से आजाद हो जाऊंगी। ऐसे में भला कैसे वो अपनी माँ को अपनी विपत्तियां बताकर चिन्ता के जाल में उलझाती। आज की रात उसने फैसला कर लिया था कि सुबह होने से पहले वो आजाद हो जायगी। कमरे की छत पर लटके पंखे को बार बार देखती, हर बार पूरी हिम्मत जुटाती मगर उस पर झूल जाने का साहस ना जुटा पाती। तभी उसके कानों में कई बरस पहले उसकी एक अध्यापक के कहे शब्द गूंज उठे- आजादी सबसे प्यारी चीज है। देश की युवा पीढी आजाद देश में सांस ले सके , इसके लिये लाखों ने अपनी जान हसते हसते दे दी। अब इस आजादी को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।आजादी का मतलब है- अन्याय से आजादी, सोच की आजादी।
रीति जिस साडी को हाथ में लिये पंखे पर डालने के लिये बैठी थी, वही छोडकर उठ खडी हुयी। हाथों में अपनी डिग्रियां और कुछ रुपये लेकर घर से बाहर निकल आयी, अपने नये आकाश की तलाश में जिसमे वो आजादी की सांस ले सकेगी।


मंगलवार, 4 अगस्त 2015

महिला आरक्षण बिल - सच या स्वप्न


स्त्री और पुरुष- समाज की दो इकाई, जिनसे मिलकर बनता है समाज। समाज की कल्पना के साथ ही आते है कुछ नियम, कुछ कानून, जो आवश्यक होते है समाज को सुचरु रुप से चलाने के लिये । जिस तरह से एक घर की पूर्णता तभी सम्भव है जब उसमें स्त्री और पुरुष दोनो की ही सहभागिता हो , उसी प्रकार आदर्श सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिये  दोनो ही इकाइयों का बराबर अनुपात मे सहभागी होना आवश्यक है ।
एक तरफ जहाँ देश में विभिन्न मंचो से स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने की बात की जाती है, उसी देश में ३३% आरक्षण की क्या प्रासंगिकता है। यह एक बहुत अहम विषय है, जिस पर खुले मन से विचार और विवेचना होनी चाहिये। ये सोचना होगा कि किन लोगो ने महिलाओ को ३३% आरक्षण देने की बात की पहल की। क्या वास्तव में देश में आरक्षण लागू किये बिना महिलाओं की स्थिति मे सुधार असंभव है। इसके लिये हमे थोडा सा अपने राजनीतिज्ञों के कथनों और कार्यकलापों के बीच के अनुपात की सूक्ष्मता से व्याख्या करनी होगी। पिछले एक दशक में देश, दो बार लोकसभा, करीब द्स बारह विधान सभा के चुनावों को देख चुका है। यदि छोटी और मझले कद की पार्टियों को छोड दे, और राजनीति मे बडा कद रखने वाली राजनीतिक पार्टियों को देखे, तो कुछ मुख्य बिन्दु हमारे सामने आते हैः
·         ज्यादातर जिन महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गये, वो या तो पहले से राजनीति में अपना अहम स्थान रखती थी, या धुरंधर राजनीतिज्ञों के परिवार से थी।
·         किसी भी पार्टी ने ३३ % तो क्या २० % भी महिला उम्मीदवारों को टिकट नही दिये।
·         किसी नये महिला उम्मीदवार पर वोटरो का भी भरोसा कम होता है।
उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि आज देश को आरक्षण लागू करने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि वो महिलाओं की सोच, उनकी कार्यक्षमता, उनकी कार्यशैली पर अपना विश्वास बनाये।
महिला आरक्षण की त्रासदी
देश में महिलायें, देश आजाद होने के बाद से ही प्रतिनिधित्व की लडाई लड रही है। करीब दो दशक पहले यह हमारे सामने महिला आरक्षण बिल के रूप मे सामने आया। ऐसा नही कि यह बिल को केवल महिलाओं का ही समर्थन प्राप्त था, पुरुष प्रधान राजनीतिज्ञ सामने से तो हमेशा ही बिल के पास होने की वकालत करते रहे किन्तु मंशा हमेशा यही रही कि उसके राजनीतिक स्थान मे महिलाओं का कम से कम प्रवेश हो। १९९६ से देवेगौडा जी के कार्यकाल से लेकर आज तक करीब १० बार यह विधेयक संसद पटल पर रखा गया , और हर बार शोर शराबे मे साथ ही इस बिल का विरोध कर दिया गया। कभी भी एक स्वस्थ बहस का माहौल नही बना। किसी ने यह तर्क नही दिये कि क्यो इस बिल को पारित नही होना चाहिये।
ऐसा नही कि केवल भारतीय महिलायें ही राजनीति मे अपना स्थान बनाने के लिये संघर्षरत हैं, विश्व के ज्यादातर सभी देशो की लगभग यही स्थिति है। आखिर क्या है इस विडम्बना का समाधान? जब सोच ही स्वच्छ और निरपेक्ष नही है तो समस्याओ का उल्मूलन एक स्वप्न मात्र ही है।
महिला आरक्षण की आवश्यकता
बहुत से लोगो का यह सोचना हो सकता है कि आखिर महिला आरक्षण की जरूरत क्यों है। क्यो राजनीति में महिलाओ की अधिक भागीदारी आवश्यक है?
आजादी के शुरुआती दौर में देश मे बहुत सी समस्याये थी, महिलाये और पुरुष दोनो अपने अपने स्तर से देश को उन्नत करने की कोशिश कर रहे थे। मगर इस समके बीच एक और समस्या जन्म ले रही थी। पुरुष राजनीतिज्ञ चाहता था कि देश की बागडोर सदैव उअसके ही हाथ रहे। घर की चार दीवारों मे बन्द स्त्री को वह अपने बराबर देख पाने का हौसला नही कर पा रहा था। धीरे धीरे उसके बढते साहस ने महिलाओं की राजनीति मे भूमिका को हाशिये पर ला कर खडा कर दिया। एक लम्बे अरसे से यह महसूस किया जाने लगा कि मानसिकता को बदलना लगभग मुश्किल सा ही है, इसे सिर्फ कानून या आरक्षण से सहारे ही सुधारा जा सकता है।
·         आकडें बताते है कि राजनीति मे पुरुषों के भ्रष्टाचारी होने का अनुपात महिलाओं से कई गुना भी ज्यादा है। जिससे साफ अर्थ निकलता है कि महिलाये स्वच्छ राजनीतिक वातावरण देने में पुरुषों से ज्यादा सक्षम है।
·         महिलाओं की त्याग और समर्पण की भावनाओं पर प्रश्न चिन्ह नही लगाया जा सकता।
·        
संसाधनों का इस्तेमाल भी महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक बेहतर ढंग से करती हैं। पंचायत राज संस्थानों में 'महिला सरपंच' के लिए स्थान बनाते समय इन्हीं मुद्दों पर गंभीरता से विचार हुआ था। अब संवैधानिक संस्थानों के लिए भी ऐसी व्यवस्था की जरूरत महसूस हो रही है।

फिलहाल १६वीं लोकसभा में महिलाओं की बढती संख्या एक शुभसंकेत के रूप मे देखी जा सकती है। और भविष्य में महिला बिल की स्वप्न कथा को हकीकत की धरा पर देखने की उम्मीदे करना एक दिवा स्वप्न नही होगा। 

शुक्रवार, 5 जून 2015

रिस्टोरेशन...............


सर्दी की छुट्टियां चल रही थी। दुनिया में शायद ही कोई हो जिसे छुट्टियों का इन्तजार ना होता हो, मगर मेरे लिये ये बोझ सी ही होती थीं, जिन्हे बस यदा कदा काटना होता था। तीन दिन से सूरज देवता ने भी दर्शन नही दिये थे, जैसे वो भी इस ठंड में बादलों की रजाई में दुबक कर सो रहे थे। ड्राइंग रूम में बैठी अखबार पढ रही थी तभी लगा जैसे खिडकी से झांकती हुयी धूप मुझे लॉन में आने का निमंत्रण दे रही है। लता एक कप चाय बना कर बाहर ही ले आ, पता नही कितनी देर के लिये निकली है ये धूप, ठंड से तो लगता है हाथ पैर में जान ही नही है, कहते हुये मै धूप में पडी कुऱसी पर बैठ गयी ।
लता चाय दे कर फिर अपने काम में लग गयी थी और मैं एक शिवानी का नॉवेल चौदह फेरे पढने लगी थी। तभी लता ने आवाज दी – दीदी रोटी सेंक दूं या थोडी देर में खायेंगी। कभी दो बजे से पहले खाती हूं क्या? तुम्हारा सारा काम हो गय क्या? तुमको भूख लगी है तो खा लो मै बाद में खाऊंगी। क्या दीदी दो तो कब के बज गये, उसके कहते ही मैने रूम में सामने लगी घडी पर सरसरी सी नजर दौडाई, सच में दो तो कब के बज चुके थे, शायद शिवानी जी को पढते पढते मुझे समय का पता ही ना चला था। मन ही मन खुद की गलती का अहसास करते हुये मैने थोडा प्यार से कहा- लता तुम खा लो मेरे लिये बना कर रख दो, मै थोडी देर में खा लूंगी। ना दीदी अभी हमको भी भूख नही। मै यही आ कर स्वेटर बुन लेती हूँ तब तक आप अपनी ये किताब भी पूरी कर लीजिये।
मैं दुबारा से नॉवेल में डूब गयी। और लता अपने काम में। पढते पढते मेरी नजर लता पर गयी, वो एक पुराने स्वेटर को उधेड रही थी। मैने कहा लता ये क्या कर रही हो – तुमको तो राजू के जन्म्दिन के लिये स्वेटर बनाना था ना, पुरानी ऊन से बनाओगी क्या? अरे मुझसे कह देती मैं कल बाजार से नयी ऊन ला देती।
अरे नही दीदी, इसकी क्या जरूरत है, ये स्वेटर राजू को अब नही होता और कई जगह से फट भी गया है। इसको उधेड कर ऊन को भाप दे कर उसकी गन्दगी साफ हो जायगी, यही एकदम नयी सी लगने लगेगी। फिर इस बार कोई नयी सी डिजाय्न डाल दूंगी। बिल्कुल नयी ऊन जैसा बन जायगा ये भी।
अच्छा मगर इसमें जो पचासों गांठ लगाओगी तब, मेरे कहते ही वो बोली, अरे दीदी गांठ तो पीछे रहेंगी ना, देखियेगा तब पूरा तैयार होगा तो आप भी नही पहचान सकोगी कि ये पुरानी जोड्दार ऊन से बना है।
सही ही तो कह रही थी लता। मैं ही मूरख थी जो पिछले तीन सालों से अपने हर रिश्ते को थोडी थोडी उलझनों के कारण तोडती आ रही थी। कब से मन में बना कर रखा है उन टूटे रिश्तों का गोला जिसमें कितनी ही खट्टी मीठी बातें है। क्यों नही निकाल देती कडवी बातों को मन से जैसे लता बीच बीच में तोड कर निकाल देती है कमजोर बेकार ऊन को जो बुनाई को कमजोर बना सकती है। क्यों नही कर रही थी कोशिश रिश्तों को फिर से बुनने की। क्यों नही बुन सकती मै फिर से आकाश के साथ अपना रिश्ता। क्या प्यार की ऊष्मा में नही उड सकती वो कडवाहटें जो हम दोनो के मन में बैठ गयी है? क्या मन में बनी चंद गांठो को छुपाया या मिटाया नही जा सकता?
अब और इन्तजार नही करूंगी। बुनना मेरा धर्म भी है और कर्तव्य भी। हाँ मुझे भी बुनना होगा अपने रिश्ते का स्वेटर उसी पुरानी ऊन को लेकर नयी आशाओं की डिजायन के साथ। 
* Restoration - पुनरनिर्माण

शनिवार, 16 मई 2015

दूरसंचार के जाल में समाज


१७ मई , विश्व दूरसंचार दिवस के रूप में मनाया जाता है। आगरा से निकलने वाले अखबार में प्रकाशित इस लेख को आप सबके साथ साझा करते हुये पुष्प सबेरा के एडीटर " श्री प्रकाश शुक्ल जी " की आभारी हूँ, जिहोने मुझे लिखने का मौका दिया।

रोटी कपडा और मकान, कुछ समय पहले तक इन्हे जीवन के तीन स्तम्भों के रूप में देखा जाता था, किन्तु आज इंटरनेट को जीवन के चौथे स्तम्भ के रूप में देखा जा रहा है। इंटरनेट आज हम सभी के जीवन में अपनी एक अहम जगह बना चुका है। आज सुबह की शुरुआत बडों को अभिवादन के साथ नही, फ्रेंड्स को गुड मार्निंग के मैसेज भेजने के साथ होती है। इंटरनेट, दूरसंचार में एक क्रान्ति का युग लेकर आया। निश्चित तौर पर पिछले दो दशकों में दूरसंचार ने जीवन को एक नयी गति दी है, पहले हम जहाँ किसी की खोज खबर पाने के लिये हफ्तों एक पत्र का इंतजार किया करते थे आज स्काइप पर तुरन्त उससे ना सिर्फ बात कर लेते है बल्कि उसके कार्य कलापों को देख भी सकते हैं।
90 के दशक में हम एस. टी. डी. बात करने के लिये रात के दस बजने का इन्तजार किया करते थे, क्योकि रात में काल रेट दिन की तुलना में एक तिहाई हो जाया करता था, आज मोबाइल कम्पनियों ने इस इन्तजार को खत्म कर दिया।
एक समय था जब टेलीग्राम का खर्च शब्दों के हिसाब से आता था, एक संदेश भेजने से पहले भेजने वाले का आधा ध्यान तो शब्द सीमा पर ही रहता था, आज ईमेल पर हम चाहे जितना भी लिखने के लिये मुक्त है।
पहले शहर में नौकरी कर रहा लडका मनीआर्डर से अपने घरवालों को पैसे भेजा पाता था, जरूरत चाहे कितनी जरूरी हो पैसे तो ह्फ्ते दस दिन में ही मिलेगें, आज देश क्या विश्व के किसी भी कोने में बैठा बेटा, एक तरफ फोन पर बात करता है दूसरी तरफ ई-बैकिंग से एकाउंट में पैसे ट्रान्सफर कर देता है।
एक दौर था जब खरीददारी का मतलब था- बाजार जाना और अगर घर आकर सामान अच्छा ना लगे, वापस करना हो तो ढेर सारी टेंशन- पता नही दुकानदार पैसे वापस करेगा कि नही, या वो कोई और सामान लेने को ही कहेगा। मगर आज शॉपिंग के अर्थ बदल गये। आज हम घर बैठे अपना मन पसंद सामान ई-शॉपिंग के जरिये खरीद लेते है और पसंद ना आने पर फ्री वापसी की सुविधा भी।
इतनी सारी सुविधाओं के बाद भी आज हम उतने संतुष्ट नही जितने पहले थे। ये सोचने का विषय है कि क्या कारण है कि सामाजिक ढाँचा कमजोर हो रहा है, संदेदनाये कम हो रही है, मानवता पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है, बचपना अपनी मासूमियत खो रहा है। आज पूरा विश्व जब हर्षोल्लास के साथ विश्व दूरसंचार दिवस मना रहा है, तब यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि ये चिंतन भी करे कि हम इस तकनीक की धारा में सिर्फ बहे जा रहे है, या तकनीक का सोच समझ कर प्रयोग कर रहे हैं।
समय के साथ तकनीक बदलने के साथ साथ सोच और जीने के तरीके दोनो ही बदले। सबसे बडा फायदा जो हुआ वो है समय की बचत। जब संचार का कोई भी माध्यम नही था तब सिर्फ हम मिलकर ही बाते करते थे। मिलने से ना सिर्फ शब्दों का आदान प्रदान होता था, भावनाओं का भी लेन देन होता था। आज हम जब एक मैसेज लिखते है - फीलिंग सैड तो समझ नही आता कि मैसेज भेजने वाला या वाली कितना दुखी है, उसे क्या दुख, क्या परेशानी है। हम पहले जब कही से घूम कर आते थे तब हफ्तों तक उसके चर्चे सुनाया करते थे, आज भी घूमने जाते है मगर जगह को अपनी नजर से बाद में देखते है पहले मोबाइल से फोटो लेकर व्हाट्स एप या फेसबुक पर शेयर करते है। जिसका उद्देश्य अक्सर ये बताना होता है कि हम फलां फलां जगह पर कितने मजे कर रहे हैं।
आज हम एक व्यक्ति से बात करते है तो उसी समय दूसरे से चैटिंग भी कर रहे होते हैं। होली दीवाली में मिलते है तो गले मिलने से पहले फोटो लेना और उसको शेयर करना पहली प्राथमिकता होती है। फोटो ठीक नही आया तो दो तीन बार और गले मिलेगें। इस मिलन में भावनाओं का संचार दूर दूर तक नही होता, क्या यही उद्देश्य था दूर संचार की खोज का?
प्रश्न उठता है तकनीक ने हमारा समय निश्चित तौर पर बचाया फिर भी हर किसी को ये कहते सुना जा सकता है कि यार समय नही है, लाइफ बहुत बिसी हो गयी है, आखिर कहाँ गया हमारा समय, कहाँ हम इसे खर्च कर रहे हैं, कहाँ उलझा लिया है हमने इसे?
आज चाहे बच्चे हो, युवा हो या बुजुर्ग कोई भी इंटरनेट के जाल से अछूता नही। मगर इस जाल मे फंसना या ना फंसना हम पर ही निर्भर करता है। ऑकडे बताते है कि  9 -10 साल के बच्चे जब ऑनलाइन होते हैं तो उनमें से 57 फीसद बच्चों अश्लील दृश्यों को ही देखना पसंद करते है, 38 फीसद बच्चे ऐसे है जो शिक्षा और ज्ञान की चीजें इंटरनेट पर ढूंढ़ते नजर आए और बाकी के 36 फीसद बच्चे जाने.अनजाने अपने आपको इन दृश्यों में गिरफ्त होते नजर आए।
 इंटरनेट एक दुधारी तलवार की तरह है। यहाँ सभी के लिये कुछ न कुछ है ज्ञान का ढेर सारा भंडार है तो मनोरंजन के लिये अश्लील सामाग्री भी उपलब्ध है। बच्चो के लिये नये नये गेम्स है तो हिंसा के नये नये तरीकों की जानकारी भी उपलब्घ है। ये इंटरनेट की खूबी है कि इसका इस्तेमाल करने वाला चाहे कोई भी हो, यह सबके लिए खुला रहता है।  कितनी ही वेब साइट्स पर लिखा होता है कि अट्ठारह बर्ष से कम लोग इसे प्रयोग ना करे मगर कहाँ है वो चेक प्वांट जो यह देख सके कि प्रयोगकर्ता की उम्र क्या है, और उसके लिये साइट नही खुलेगी।
बच्चे समाज का भविष्य होते है, इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम बडे इस बात का आकलन करें कि बच्चे इस नयी तकनीक का कैसे प्रयोग कर रहे है, और सही मायनों में वो आधुनिक बन कर देश की प्रगति का हिस्सा बन सके इसके लिये हमें उनका सही मार्गदर्शन करना होगा। बच्चे अक्सर वही करते है जो हम बडे करते हैं, इसलिये चाहे मोबाइल हो या इंटरनेट इसका प्रयोग हमे भी संयमित होकर ही करना होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आधुनिक प्रौद्योगिकी वाले गैजेटों के अतिशय उपयोग से अभिभावकों और बच्चों के बीच तनावपूर्ण संबंध, सामाजिक जान-पहचान की कमी और साधारण कार्यो में अकुशलता जैसे परिणाम सामने आते हैं। नेशनल इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन के अध्यक्ष जे. रवि कुमार कहते है कि यह सिर्फ किसी बच्चे की नहीं पूरे समाज के लिए एक चिंता का विषय है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके अतिशय उपयोग से होने वाला दुष्प्रभाव पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। अभिभावकों को भी यह समझने की जरूरत है कि उन्हें कितना समय इन गैजेटों के साथ बिताना चाहिए । "बच्चे वही करना चाहते हैं, जो उनके माता-पिता करते हैं. इसलिए जब वे देखते हैं कि उनके माता-पिता घंटों लैपटॉप पर बिताते हैं, तो उनके बच्चे भी वैसा ही करना चाहते हैं।" नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज, बेंगलुरु में क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर मनोज कुमार शर्मा कहते है छोटे बच्चे जहां वीडियो गेम और गेमिंग एप्स पर अधिक ध्यान देते हैं, वहीं किशोरों का मन सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट में अधिक रमता जा रहा है। वो बताते है कि संस्थान के सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी (एसएचयूटी) क्लिनिक को हर सप्ताह देश के दूसरे राज्यों से तीन-चार मेल मिलते हैं।  ये मेल किशोरों के माता-पिता के होते हैं, जो संस्थान की सेवाओं और उससे मिलने वाली मदद के बारे में जानना चाहते हैं। ये माता पिता 14-19 वर्ष की उम्र के ऐसे किशोरों के होते हैं, जो विडियो गेमिंग, मोबाइल, सोशल नेटवर्किंग साइट तथा पोर्नोग्राफी की लत से प्रभावित होते हैं। बच्चों का स्कूलों में प्रदर्शन तथा आचरण बिगड़ने के बाद माता-पिता परामर्श लेने के लिए आगे आते हैं।

आज के युग में बच्चों को पूरी तरह से गैजेटों का उपयोग करने से रोका नहीं जा सकता है। इसके बिना आज पूरी शिक्षा हासिल नहीं की जा सकती है इसलिये चाहे माता पिता हो या विघालय में अध्यापक, दोनो की ही यह जिम्मेदारी बन जाती है कि इंटरनेट का प्रयोग करते बच्चों पर हमेशा अपनी एक नजर बनाये रखे ताकि इन्हे दिशा भ्रमित होने से पहले रोक जा सके। 

यादों के झरोखों से....


यादों के पन्ने, जब कभी खुल जायेगे
आँखे मुंद जायेगीं, आप नजर आयेगें

कसमें जो दी हैं , उन्हे निभाना है
ख्वाबों में भी, नजदीक नही आयेगें

चाँद देखने का शौक, काफुर हुआ
चांदनी पहरे में, कहाँ तुम्हे पायेंगें

बूंदें बारिश की, अंगारो सी लगे
प्यासे मन, अब ना भींग पायेगें

संग चली गयी, चंद लकीरे भी 
हथेलियों में, तेरी छाप सजायेगें

न गुजरेगें उन रस्तों से, जहाँ साथ चले
राहें पूंछेगीं तुम्हे, तो क्या उन्हे बतायेगें

जाते हुये कह तो दिया, ना याद करना
अपने किस्सों में क्या, वो हमे न लायेगें

मंगलवार, 12 मई 2015

सिर्फ हाथों में हाथ..........


सिर्फ हाथों में हाथ, साथ की कहानी नही
खिलते होठ सदा, खुशी की निशानी नही

कुछ तो बात है, मोहब्बत के समन्दर में
यूं ही सारी दुनिया,  इसकी दीवानी नही

गम से दो चार ना हुये, तो जिन्दगी कैसी
जो खतरों से बच के चले, वो जवानी नही

रूठते हो तो रूठ जाओ, ये अदायें है तेरी
ये इश्क आग का दरिया है, सर्द पानी नही

हाले दिल लबों से कहा, तो तुमने क्या सुना
खामोश धडकनों मे क्या, इश्क की रवानी नही

आरजू मोहब्बत की है, तो सिर्फ दिल की सुनिये
ये अनमोल इनायत है , इसका कोई सानी नही

सोमवार, 11 मई 2015

प्रेम गीत -३


किस तरह तुमसे कहे, मेरे जीने का सहारा तुम हो
प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

देख कर तुमको नजरे ठहर गयी तो हम क्या करे
धडकने तेरे नाम से रुकने लगी तो हम क्या करे
जला रहा है जो इस तन मन को वो शरारा तुम हो
प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

तुम मेरे दिल में समा जाओ जैसे जिस्म में रुह बसे
मुझमें मिल जाओ कुछ यूं जैसे खुशबू फूलों मे बसे
हर तरफ छाया है इन नजरों में, वो नजारा तुम हो
प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

जाडे की गुनगुनी धूप सी राहत मिले जब देखूं तुमको
एक हलचल सी उठ जाये जिया में, जब सोचूं तुमको
थके कदमों को जहाँ आराम मिले, वो सहारा तुम हो

प्यार महसूस किया जब दिल ने, वो इशारा तुम हो

शनिवार, 9 मई 2015

माँ- जीवन का पर्याय

आज एक लेखिका के रूप में पहली बार अपने जीवन के सच को, मन की भावनाओं को पन्नों पर उतारने का साहस कर रही हूँ। जब भी कलम चली जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों को, अपने शब्दों की कूंची से रंग कर गढ दी कभी कोई कविता या कहानी। मगर जब बात माँ की हो तब वहाँ ना किसी अलंकार की जरूरत रह जाती है ना किसी रस की। नही जानती कि मेरे इस लेखन को साहित्य समाज कौन सी विधा में डालेगा। 
माँ शब्द जब भी जिव्हा पर आता है, मन में कुछ अलग सा ही अहसास होता है। कुदरत भी जब एक बच्चे को बोलने का हुनर देती है तो सबसे पहला शब्द होता है - म। म अक्षर दुनिया की ना जाने कितनी ही जबानों में माँ पुकारने के लिये प्रयुक्त हुआ। जिसका सीधा सा अर्थ है, माँ सार्वभौमिक है, माँ दिल से निकला शब्द है।

माँ आपसे मुझे ना सिर्फ आप जैसी हू-ब-हू शक्ल मिली बल्कि बहुत सी आदतें और स्वभाव भी पाया है। मै बिल्कुल आप जैसी तो नही बन पायी, मगर कई बार आप जैसा बनने की बचपन में कोशिशे किया करती थी। आपके काम करने के तरीके को कॉपी करती थी। आज जो कुछ भी हम है- वो आपके अथक परिश्रम का ही फल है।
जब घर से पहली बार पढाई के लिये घर से निकली तब आपसे बिछडने के दर्द से ज्यादा घर से बाहर निकलने का उत्साह मन मे था। मगर कुछ ही दिनों में अहसास होने लगा क्या छूट रहा है, तभी तो हर शनिवार खुद-ब- खुद कदम घर की ओर चल पडते थे।
मुझे याद है एक बार जब मैं घर से जा रही थी, आप मेरे लिये पानी की बोतल भर कर लाई और चूंकि बैग पहले से ही खूब भरा था मैने बोतल नही रखी। आपने फिर कहा- बोतल रख लो। मैने कुछ नाराजगी  मे कहा आपको तो कुछ समझ आता ही नही। मै भारी बैग अकेले नही उठा सकती। तभी मैने आपको देखा, आपकी आंखों में आंसूं छलक आये थे, तुरन्त ही मुझे मेरी गलती का अहसास हो चुका था। ट्रेन का समय हो रहा था, मगर मेरे कदम उठ नही रहे थे, कैसे आपको दुखी छोड कर जा सकती थी। तब आपने प्यार से मेरा माथा चूमते हुये कहा- अरे बच्चे तो कभी कभी गलती कर ही देते है।, मै नाराज थोडे हूँ, फिर मेरे हाथों में हमेशा की तरह चंद रुपये पकडाते हुये आशीर्वाद दिया।
मै घर से निकल तो आई मगर एक टीस सी रह गयी, कि आपको मैने दुखी किया, मन मे अपराध बोध हो रहा था कि आपकी भावना को मै आपकी बेटी हो कर नही समझ सकी।
आज इस बात को दसों साल हो गये, मगर जब भी अपने बैग में पानी की बोतल रखती हूँ ऐसा लगता है जैसे आप ही पकडाते हुये कह रही हो- छाया पानी की बोतल रख लो। हर बार मुझे मेरी उस दिन की गलती पर पश्चाताप होता है ये जानते हुये भी कि आपने तो मुझे उसी क्षण माफ कर दिया था।
माँ सच में महान है, इस बात से बडा सच कुछ भी नही। आपसे जितनी भी बार हम अपनी गलतियों की माफी मांगे कम ही है फिर भी आप माफी मांगने से पहले ही हमे माफ कर देती हो।

शुक्रवार, 8 मई 2015

भरम


नामुंकिन सा हुआ जबसे आना, मेरे हाथ मे हाथ तेरा
तेरे अहसास बसते है जर्द हथेली पे,  लकीर बन कर

नही किस्मत में देख पाना अब तो, सूरत भी तेरी
कि हर शक्ल में उभर आते हो तुम, तस्वीर बन कर

यूं तो तन्हाइयां संग रहती है, जिन्दगी के सफर में
तुम भी साथ हो लेते हो राहों में, मेरी तकदीर बनकर

कभी हम भी हुआ करते है , मल्ल्किका - - नूरजहाँ
अब तो खाते हैं ठोकरे दर--दर, इक  फकीर बनकर

इस जमाने में मोहब्बत, भरम के सिवा कुछ् नही
जज्बात नीलाम कर देते हैं लोग झूठे करीब बनकर

जाने कैसे कर बैठी, दिल लगाने की खता, तुम 'पलाश'
निकला वो रकीब जो आया था, कभी नसीब बनकर

बुधवार, 6 मई 2015

नाम तेरा भी आयेगा.....


कह लो हमे पागल भंवरा, पर ये भी जरा सोचिये
फूलों का गर जिक्र हुआ , नाम तेरा भी आयेगा

ना कहना हमसे महफिल मे, कोई गजल कहने को
इस शायर के अल्फाजों मे, नाम तेरा भी आयेगा

चर्चा हुस्न का होगा, शामिल तुम भी हो जाओगे
कत्ल हजारों हो जायेगें , नाम तेरा भी आयेगा

सर्द हवा नाकाफी होगीं, दिल की लगी बुझाने मे
आग लगेगीं जब दिल में, नाम तेरा भी आयेगा


छुप लो चाहे जितना अब, शर्म हया के पर्दों में
जिस रोज कयामत आयेगी, नाम तेरा भी आयेगा

यूं ना बिखेरा कीजिये, जुल्फे दिन के उजालों में
चढे सूरज, जो शाम ढली, नाम तेरा भी आयेगा

अन्जाना कहो या कहो अजनबी, ये तेरी अदायें हैं
नजरें गर पढ ली किसी ने, नाम तेरा भी आयेगा

सजदे में सर झुक जायेगा, मन की मुरादें पाने को
जिक्र तमन्नाओं का होगा, नाम तेरा भी आयेगा


हर खौफ जुदा कर देना, इजहार-ए-मोहब्बत से पहले
अफसाने बनेगे तेरे मेरे, नाम तेरा भी आयेगा

शुक्रवार, 1 मई 2015

प्रेम गीत


दे सकते है तुम्हे क्या, दिल लेके हम तुम्हारा
आज अपनी तमाम सांसे, तेरे नाम मै करती हूँ
इक बात अब तलक जो, तुमसे भी छुपाई है
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

पायल गहने कंगन मोती, सब झूठे से लगे है
अंखियों में ना रुके है , ये काजल भी अब तो
सोचती रहती हूँ हर पल बस, तेरे ही बारे मे
दर्पन मे तुम्ही तुम नजर आने लगे हो हमको
तेरी बेसब्र मोहब्बत का ही मै सिंगार करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

तुम पर ही जिन्दगी की, हर आस अब टिकी है
ना हो यकी जो हम पर, तो पूँछ लो मौसम से
परवाह नही हमको बेदर्द दुनिया की रस्मों की
मर जायेगे बिन तेरे , हम कहते है ये कसम से
दिन रात शामो सुबह तेरा इन्तजार मै करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

ना जाने क्या देखा, क्या पाया तेरी आंखों मे
फिर दिल ही ना चाहा, देखूँ और कोई सूरत
बरसों से थी तमन्ना इस दिल मे कोई आये
मिल कर लगा तुम्ही हो मेरे प्यार की मूरत
तन मन से तुम्हे अपना, स्वीकार मै करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ

आज अपनी तमाम सांसे, तेरे नाम मै करती हूँ
कहती हूँ आज सबसे, तुमसे प्यार मै करती हूँ
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