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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

व्याकुल मन



क्यो हो रहा इतना व्याकुल मन
ये कैसी उथल - पुथल है मन में
क्यों छा रहा बैचैनी का आलम
आखिर हुआ है क्या इस मन में

सोच रही पर पहुँच ना पाती
उलझी ग्रन्थियों की जड में
कोई अनचाही अन्जानी ताकत
निरंतर क्षीणता ला रही तन में

अखर रहा है व्याकुल हदय को
तेरा पास ना होना इस पल में
समेट ले जो मेरी हर उलझन
इतना सार कहाँ इस अम्बर में

बहती जाती हूँ बस नदिया सी
पीडा समेटे जीवन की लहरों में
पर ये दुर्गम राहें पार ना होती 
वरना खो जाती आ तेरे सागर में

रविवार, 26 अगस्त 2012

नारी - विश्व समाया है तुझमें



वो चूल्हे की आग में तपते हुये निखरता तेरा रूप
क्या मुकाबला कर सकेगी कोई विश्व सुन्दरी इसका
वो आँचल में बार बार लगना हल्दी, तेल, मसाले
बना देता है मामूली सी साडी में भी तुम्हे अप्सरा

तेरी मदमाती आँखों से लिपटता हल्का हल्का धुँआ
बना देता है और भी मदमस्त तेरे श्याम नयनों को
जब जब तेरे अधरों का स्पर्श पाती है टूटी फुकनी
मन देने लगता है उडान अपनी अधूरी कल्पना को

परोस कर लाती हो पसीने से लथपत चेहरा लिये थाली 
तेरी साधारण सी छवि में भी दिखता अलौकिक देवत्व
अपनी थकान को छुपाकर मुझे झलती हो जब झलना
पूजने लगता हूँ मन ही मन तेरा अनुपम व्यक्तित्व

जब जब देखता हूँ तुम्हे इक पहेली सी लगती हो तुम
तेरे एक कोमल से तन में बसे है ना जाने कितने रूप
बन जाती हो कभी तो तुम ममता की शीतल छाया
कभी तेजस्विनी ऐसी की फीकी पड जाती प्रचंड धूप


गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मृगमरीचिका के पार

सात साल बाद अचानक वो आँखों के सामने यूँ आ जायेगा इस बात की तो कल्पना करना भी रचिता ने छोड दिया था, आज सानिध्य को अपने सामने देखकर उसे अपनी आँखों पर यकीन नही आ रहा था । मगर जिस हालात में वो दोनो एक दूसरे के सामने थे, चाह कर भी कुछ कहे बिना ही एक बार फिर अलग हो गये। रचिता उसे एक बार फिर एक सपना समझ कर भूलने लगी कि एक दिन उसके मेल बाक्स में सानिध्य का मेल आया । उसमें सिर्फ एक ही बात लिखी थी कि वो एक बार उससे बात करना चाहता है, अगर वो भी ऐसा चाहती है तो बस इतना बता दे कि क्या उसने अपना नम्बर बदला तो नही जो उसे वैसे ही याद है जैसे उसे अपना नाम। इन दो लाइनों को पढने के बाद रचिता के सामने बीते वो हर पल सामने आने लगे जिसकी यादों पर भी उसने पर्दा डाल दिया था, और खुद को वह यह समझा चुकी थी कि सिर्फ वो ही हमेशा सानिध्य को प्यार करती थी, मगर आज उसे ऐसा लगने लगा कि जैसे उसके प्यार का इम्तहान पूरा हुआ, वक्त ने ही अचानक उससे उसके सानिध्य को दूर किया था और आज उसको वो सब मिल जायगा जिसका उसको इतने बरसों से इन्तजार था । उसने बस मेल के उत्तर में बस इतना ही लिखा कि जो नम्बर तुम्हे याद है उसे हम कैसे बदल सकते थे।
मेल करने के थोडी ही देर बाद फोन की घंटी बजी, और उसके ही साथ रचिता की धडकने भी ।बात हुयी तो पता चला कि सानिध्य की अपनी पूरी दुनिया है, जिसमें उसकी पत्नी और उसकी बच्ची है, रचिता को बुरा तो नही लगा मगर वो यह सुन कर खुश भी ना हो सकी। मगर वो सानिध्य को दुबारा खोना नही चाहती थी। प्यार ना सही दोस्त बन कर तो वह उससे साथ तो पा ही सकती है, मगर कुछ दिनो बात करने के बाद रचिता को पता चला कि न सानिध्य के मन में भी रचिता के लिये वही भावनायें हैं जो रचिता के मन में थीं । रचिता अपना खोया प्यार पा कर बहुत खुश थी, वह अपने प्यार को पा कर यह भी भूल गयी कि जिस सानिध्य को वह प्यार करती थी, अब वह सानिध्य नही है, वह अब एक पति एक पिता है। मगर कुछ ही दिनों में रचिता को तो अपनी भूल  का अहसास हो गया पर सानिध्य की दीवानगी दिन पर दिन बढने लगी, जब भी रचिता उससे कहती कि वो सिर्फ उसका दोस्त ही है तो वह कहता नही तुम मेरी दोस्त नही मेरा प्यार हो, मेरा पहला प्यार और फिर रचिता उसके प्यार में कब खो जाती ये उसको भी नही पता चलता ।
पर आज रचिता ने निश्चय कर लिया कि वो सानिध्य के प्यार को ढुकरा देगी भले ही उसके लिये उसको अपना प्यारा दोस्त खोना ही पडे।मगर वह रिश्तों की इस उलझन में खुद को और सानिध्य को भी अब और नही उलझने देगी।
फिर तो जब भी सानिध्य का फोन आता वो अपनी पढाई का बहाना बना देती , हफ्तों ना उसको मेल करती ना उसका जवाब ही देती । इस तरह करते करते करीब तीन महीने निकल गये । रचिता को लगने लगा था कि इस तरह से वह सच्चाई से दूर नही रह सकती और ना ही सानिध्य के मन से अपने प्यार को मिटा सकती है ।
आज शाम कालेज से आने के बाद उसने सानिध्य को मेल की " आज हम बहुत खुश है , जब भी समय मिले मुझसे बात करना"। मेल करने के दो मिनट बाद ही सानिध्य का फोन आया ," तो आज मैडम जी को पूरे ९४ दिन बाद फुर्सत मिल गयी हमसे बात करने की, चलो हमारी याद तो आयी, रचिता तुमको मेरी याद नही आती थी क्या , कितनी मेल की तुमको तुमने एक का भी जवाब नही दिया, अरे हाँ अपनी बातों में मै तो भूल ही गया , तुम किसी खुशी की बात कर रही थी, बताओ क्या बात है हम भी तो खुश हों । रचिता ने जैसे ही कहा- सानिध्य मुझे प्यार हो गया है , तो सानिध्य ने कहा हम तो कब से आप से प्यार करते हैं हाँ बस आपसे सुनना चाहते थे, चलो आज आपने मान भी लिया, आज मै कितना खुश हूँ मैं बता नही सकता..... तभी रचिता ने बीच में रोकते हुये कहा- सानिध्य, मुझे प्रतीक सर से प्यार हो गया है । ये क्या कह रही हो रचिता ये कैसे हो सकता है, वो तो तुम्हारे सीनियर है ना, फिर उनका घर है बच्ची है, क्या तुमने कभी कहा उनसे , नही कहा तो कहना भी नही ये गलत है। सोचो उनकी पत्नी उनकी बच्ची को पता चलेगा तो वो तुमको कितना बुरा समझेंगीं । मै ये नही कहता कि तुम गलत हो, यार मान लिया कि फीलिंग्स आ सकती है मगर रचिता अभी अगर तुमने खुद को ना रोका तो बहुत गलत होगा, भावनात्मक रूप से भी और सामाजिक रूप से भी। तुम उनकी इज्जत करती हो ये अच्छी बात है मगर जिस प्यार की बात तुम कर रही हो उसका कोई भविष्य नही । मै कभी तुम्हारा बुरा नही सोचूँगा, और ये तुम भी जानती हूँ इसीलिये कह रहा हूँ । तुमको हो सकता है अभी मेरी बातें अच्छी ना लग रहीं हो , तुमको आज और कुछ दिनों तक थोडा दुःख भी होगा मगर यकीन मानो ये सब उससे बहुत कम होगा जो तुम्हे आगे दिखना पड सकता है अगर तुम प्रतीक के साथ रहती हो ।
तब रचिता ने कहा- सानिध्य यही तो हम कब से तुमको समझाने की कोशिश कर रहे थे कि अब तुम्हारा हमारा एक साथ कोई भविष्य नही, जो प्यार हम तुमको करते थे वो तो उस दिन ही खत्म हो गया था जब तुमने अपनी दुनिया बसा ली थी, मगर जब-जब तुमको समझाने के कोशिश की तुम नही समझे , इसलिये हमे आज तुमसे ये सारा झूठ कहना पडा । सानिध्य हम आठ साल नही मिले तब भी तो तुम खुश थे ना, हाँ कभी कभी मेरी याद आती रही होगी । आज से हम दोनो ही उसी दुनिया में चले जाते है जिसमें पिछले आठ सालों से हम दोनो रह रहे थे।
अलविदा सानिध्य
प्लीज अब हमे ना फोन करना और ना ही मेल करना क्योकि शायद दुबारा मैं भी अपने मन को प्यार की इस मृगमरीचिका से बाहर ना निकाल पाऊँ ।


शनिवार, 11 अगस्त 2012

सभ्य समाज का छुपा सच



आज मै एक ऐसे शख्स से मिली, जो मेरी नजर में खुदा से कम नही मगर समाज उन्हे हिराकत भरी नजर से देखता है, कोई उनके साथ तो क्या आस पास भी नही रहना नही चाहता। आज सुबह जब मैं अपने घर के लॉन में बैढी अखबार पढ़ रही थी कि एक करीब ६० वर्ष की महिला आयी, मुझे लगा कि जरूर पैसे मांगने वाली होगी, मगर नही वो तो काम माँगने आयी थी, मैने कहा- अरे इस उम्र में क्या काम करोगी और मै पाँच रुपये देने लगी, जो अभी थोडी देर पहले टमाटर खरीदने से बचे थे और मैने पल्लू में बाँध लिये थे। कहने लगी - बिटिया कुछ काम पर रख लो, जो चाहे दे देना , मुझ बुढिया को चाहिये भी क्या, बस दो बखत की रोटी। मुझे लगा ये ऐसे पैसे नही लेने वाली मगर ऐसे कैसे काम पर रख ले, वो भी संजय से बिना पूँछे, मैने कहा - अम्मा ऐसा करो इस लॉन की घास निकाल दो। वो काम करने लगी, तो मैने कहा - अम्मा तुम्हारे कोई बेटा बहू नही है क्या जो इस उम्र में ऐसे काम ढूँढ रही हो , तो उसने कहा - अरे ये सब मेरा नसीब कहाँ , जब आज तक घर ही नही मिला तो बेटा तो बडी दूर की बात हो गयी, उसकी इस एक बात ने मेरे मन में हजारों सवाल खडे कर दिये,मैने कहा - आप ऐसा क्यों कह रही हैं, तो वो बोली- अरे हम तो नाच गाना करके कमाने खाने वाली हैं, जब तक उम्र रही हुनर का खाया मगर और अब तो ना उमर का जोर रहा ना पैसे का, दो रोटी के भी लाले पडे हैं, सारी जिन्दगी मेहनत का ही खाया अब भीख माँग कर नही खाया जाता , और मेरा कल जानने के बाद कोई अपने घर में मेरा साया पडने तक को मनहूसियत समझता है। अब तक मैं ये तो समझ गयी थी कि ये कौन है, मगर अब मेरे मन में नये प्रश्न जन्म लेने लगे कि आखिर क्यो इन्होने ये काम किया, मैने कहा अम्मा तो क्या तुम पैदाइशी से इसमें थी या.... मुझे बीच में रोकते हुये और कुछ याद करते हुये बोली - नही नही, पैदा तो मैं बहुत बडे खानदान में हुयी थी, उन दिनों मेरे पिता जी का बडा रुतबा हुआ करता था, हम लोग इलाहाबाद में रहते थे, बनारस गयी थी सबके साथ बाबा बिश्वनाथ के दर्शन करने, वही खो गयी , और ऐसी खोयी कि वापस कभी घर की दहलीज नसीब नही हुयी कहते कहते वो कहीं खो सी गयी, उनकी बात सुनते सुनते मेरी आँखों में पानी आ गया मगर उनकी आँखों मे नमी का कोई नामो निशान ना था, शायद वक्त की मार ने उनके आँसू भी उनसे छीन लिये थे, मैने कहा- तो आप कितनी बडी थी तब, अपना घर नही जानती थी क्या जो वापस नही जा पाई। आसमान की ओर देखते हुये बोली- सब तकदीर के खेल हैं, मैं तब करीब सात या आठ बरस की थी, घर वालों से मेले में अलग हो गयी थी, खडी रो रही थी, कि एक आदमी आया और कहने लगा कि यहाँ मत रो मेरे साथ आओ, उधर की तरफ कैंप लगा है वही सारे खोये बच्चे हैं वहाँ तुम्हारे पिता जी तुमको लेने के लिये आये होंगें, और मैं उअसके साथ चल पडी, ना जाने उसने मुझे क्या सुंघाया, कि जब आँख खुली तो बस अपने सामने तबले और घुंघरू ही देखे, बहुत कोशिश की निकलने की मगर रज्जो को नूरजान बनने से नही बचा पायी, और अचानक उनकी आँखों से पानी की वो धार बह निकली जो शायद बरसों से बादल बन कर कही रुकी हुयी थी, मैं उनके पास चली गयी, अम्मा कुछ बहुत बुरा याद आ गया क्या? तो कहने लगी , बुरा या भला ये तो दुनिया ही जाने, करीब वहाँ आने के तीन साल बाद की बात है, उस दिन जब मैं मुजरा कर रही थी तो सामने एक शख्स को देखा जिसको देखने के बाद मेरे पैर वही जम से गये, दिल जोर से धडकने लगा, और मन में नयी जिन्दगी की आस जाग पडी, पता है वो इन्सान कौन था वो मेरा अपना खून, मेरा भाई था, उस दिन एक पल को लगा कि धरती मैया यही फट जाओ और मैं समा जाऊँ, और दूसरे पल लगा कि शायद ईश्वर को मुझ पर दया आ गयी और मेरा भाई आज राखी का फर्ज निभाने आया है, मगर नही वो तो बस ये कह कर निकल गया कि हम सबने ये मान लिया है कि तुम मर चुकी हो, और तुम भी यही मान लेना, मरे हुये लौट कर नही आया करते।
उस दिन मेरे मन में एक ही बात आयी थी जो आज भी बस सवाल ही है कि जब एक रज्जो नूरजान बन सकती है तो फिर एक नूरजान रज्जो काहे नही बन सकी.............
और मेरे सामने अमीरन और उमरावजान की तस्वीर उभर आयी जो मैने बचपन में देखी थी.........


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