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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

व्याकुल मन



क्यो हो रहा इतना व्याकुल मन
ये कैसी उथल - पुथल है मन में
क्यों छा रहा बैचैनी का आलम
आखिर हुआ है क्या इस मन में

सोच रही पर पहुँच ना पाती
उलझी ग्रन्थियों की जड में
कोई अनचाही अन्जानी ताकत
निरंतर क्षीणता ला रही तन में

अखर रहा है व्याकुल हदय को
तेरा पास ना होना इस पल में
समेट ले जो मेरी हर उलझन
इतना सार कहाँ इस अम्बर में

बहती जाती हूँ बस नदिया सी
पीडा समेटे जीवन की लहरों में
पर ये दुर्गम राहें पार ना होती 
वरना खो जाती आ तेरे सागर में

11 टिप्‍पणियां:

  1. विरह की व्याकुलता को कहती सुंदर प्रस्तुति

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  2. बहते जाना,
    कुछ पाने को,
    सहते जाना।

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  3. बहुत खुबसूरत कोमल अहसास और सुंदर शब्द संयोजन.....

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  4. व्याकुल मन की बेचैनी ने सुन्दर रची है रचना ।

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  5. बहती जाती हूँ बस नदिया सी
    पीडा समेटे जीवन की लहरों में
    पर ये दुर्गम राहें पार ना होती
    वरना खो जाती आ तेरे सागर में

    बहुत खुब.

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  6. कल 02/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. बहुत सुन्दर कोमल भाव
    से लिखी मनभावन रचना...
    :-)

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  8. खुबसूरत कोमल अहसास, कविताओं का सुन्दर खजाना है ब्लॉग

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  9. बहुत ही सशक्त उदगार अपर्णा जी ....हर शब्द व्याकुल अपनी पीड़ा कहने को

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