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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नये साल की शुभकामनाये


नया साल मुबारक सबको 
पूरी हो सबकी अभिलाषाये
जो रह गयी है आशाये अधूरी
वो नव वर्ष में पूरी हो जाये
नये साल की शुभकामनाये .... 

बिछ्डों को अपने मिल जाये
टूटे दिल फिर से जुड जाये
आने वाला साल अपने संग
हर रात दीवाली सी लाये
नये साल की शुभकामनाये ....  

रहे हर देश में  खुशहाली
हाथ रहे  ना कोई खाली
धरा भी हो जाये हरियाली 
ऐसी इक क्रान्ति ले आये 
नये साल की शुभकामनाये ....  

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

नये साल की नयी सुबह आने को है......

नये साल की नयी सुबह आने को है
उम्मीदे फिर नये ख्वाब सजाने को है

सज गये है बाजार फिर से खुशियों के
कुछ नये खरीदार दाम लगाने को है

कैसा रहेगा नया साल आपके लिये
भविष्यवक्ता फिर से ये बताने को है

सुकून लायेगा या कुछ बेरहम धमाके
आज यही फिक्र, बेबस जमाने को है

नये साल की शुभकामनाओ के सहारे
फीके पडे रिश्तों मे चमक आने को है

दामन में सजेगें कुछ और भी सितारे
अधूरे रहे अरमान मंजिल पाने को है

ढल रहा बीते साल का ,सूरज धीरे धीरे
नयी अंगडाई लिये जनवरी आने को है

नये साल की नयी सुबह आने को है
उम्मीदे फिर नये ख्वाब सजाने को है

रविवार, 19 दिसंबर 2010

वो खत के पुरजे



कितना सुहाना दौर हुआ करता था , जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।
                               खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था , तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है , क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी , और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे , जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।
                 पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था , और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता – कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं । 
                                   और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे  । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।
खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय , वरना तो शामत आई समझो ।
                  अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है , हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो ।आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।
                        आज भी  मेरे पास कुछ खत है  जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने)  और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।


आज भी तेरा पहला खत

मेरी इतिहास की किताब में हैं

उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया

मगर खुशबू अब भी पन्नो में है



उसके हर एक शब्द हमारी

प्रेम कहानी बयां करते है 

और तनहाई में मुझे

बीते समय में ले चलते हैं



वो खत मेरी जिन्दगी का

 हिस्सा नही ,जिन्दगी है   

 हर दिन पढने की उसे
  
बढती जाती तृष्णगी है
 

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ऐसा भी कर देते हैं लोग


जब कुछ मिलता नही चर्चा मे बने रहने को |
मासूम से इश्क को फसाद बना देते है लोग ||

जिसको पाने में तमाम उम्र लग जाती है |
उसे पल भर में ही खाक बना देते है लोग ||

बेपनाह प्यार का दावा करते है जिससे|
गुजर जाने पे चंद लम्हों मे भुला देते है लोग ||

समझाती हूँ अक्सर अपने इस नादां दिल को |
मोहब्बत की आड में सब कुछ चुरा लेते है लोग||

तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
और दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||

सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
पलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

अब तो प्रियतम आ जाओ













रजनीगंधा खिली हुयी है
अब तो प्रियतम आ जाओ
चंदा भी सोने को है
अब तो प्रियतम आ जाओ.........

नील गगन के आँचल में
मस्त पवन की खुशबू ने
मिलकर पुष्प लताओं से
राग प्रीत का छेडा है
अब तो प्रियतम आ जाओ............

जुगुनु चमक रहे राहों में
भर लो आ कर बाहों में
बसा लो मेघ से लोचन में
जुदाई का डर सता रहा है
अब तो प्रियतम आ जाओ..............


हर एक पल अब शूल हुआ
मौसम भी प्रतिकूल हुआ
नश्तर सा हर फूल हुआ
सूरज भी आने को है
अब तो प्रियतम आ जाओ ...............

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

वो कहता था ...........












वो कहता था
वो कभी झूठ नही बोलता
किसी को धोखा नही देता
वादे निभाना है उसकी आदत
इश्क को मानता है इबादत

वो कहता था
मेरा इन्तजार करना
मुझपे ऐतबार करना
मै बसता हूँ तेरे दिल में
मुझे कभी बेघर ना करना

वो कहता था
मै चाहे कही भी जाऊँ
कितना भी दूर रहूँ
पर आऊँगा लौट कर
ना जाना मुझे छोड कर

आज भी मै कर रही हूँ
उसका इन्तजार
क्योकि उसने किया था
मुझपे ऐतबार

नही बसाया है किसी को
अपने दिल में
क्योकि नही कर सकती
उसको बेघर

खडी हूँ आज भी
मै उसी मोड पर
बरसो पहले जहाँ
गया था छोड कर
जाने किस पल
वो आ जाय
मुझे ना पाकर
कही घबरा ना जाय

बस चाहती हूँ
एक बार सिर्फ एक बार
आ जाय मेरे पास
कह दे एक बार
तुम क्या चाहती हो

क्योकि हमेशा
वो कहता रहा
बस कहता रहा
और मै सुनती रही

कह ना सकी कभी
मन की बात
वरना आज
वो भी कही
किसी से कहता
वो कहती थी …………..




शनिवार, 4 दिसंबर 2010

एक अधूरा खवाब












एक अधूरा खवाब है मेरा ,
पूरा कर दो तुम कर ।
आँचल मेरा खाली कबसे ,
खुशियाँ भर दो तुम कर......

सावन की बरखा में भी,
ये मन प्यासा प्यासा था ।
इस अत्रप्त सी आत्मा की,
प्यास बुझा दो तुम कर…....

जाने कब से पता नही मै ,
तुझमे ख़ुद को खोज रही ।
एक बार ख़ुद से मुझको ,
मिलवा दो बस तुम कर.......

अगर कही हदय में तेरे ,
स्थान नही है मेरी खातिर ।
माथे पर मै सज़ा जिसे लूँ ,
पग धूल ही दे दो तुम कर ….....

सब कुछ पाया है तुझमे ही ,
फिर क्या चाँहू में ईश्वर से ।
क्या मांगूं मै अपने रब से ,
इतना बतला दो तुम कर...........

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ना जाने क्या सूझा कि













ना जाने क्या सूझा कि ,
दुश्मन से मोहब्बत कर बैठे ।
उनसे दिल को लगाने में ,
अपनो से बगावत कर बैठे ॥

पत्थर से चाहा प्यार और ,
फूलों से शिकायत कर बैठे ।
उडा कर नींदें  आंखो की ,
ख्वाबों की चाहत कर बैठे ॥

खुदा के दर पे ही उनको ,
खुदा कहने की हिमाकत कर बैठे।
उनके नूर से चेहरा को ,
पूनम का चाँद समझ बैठे ॥

अब जब सब टूटे है भ्रम मेरे,
तो सोचे  हम ये क्या कर बैठे ।
उनको पाने की हसरत में ,
हम खुद को ही खो बैठे ॥

ना जाने क्या सूझा कि ,
दुश्मन से मोहब्बत कर बैठे ।।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

बन्धन सांसों का

सावन की पूरनमासी का दिन है । बाहर बरिश हो रही है , बच्चे खेल रहे है । आज के दिन बहने अपने मायके जाती हैं या भाई बहनों की ससुराल आते है । मगर कमली के लिये आज का दिन किसी आम दिन जैसा भी नही था ।  उसके लिये भी सावन है लेकिन आसुओं की बारिश के सामने मौसम की बारिश का अस्तित्व नगण्य सा प्रतीत हो रहा है ।पिछले पाँच साल में शायद ही कोई ऐसा मंदिर बचा था जहाँ उसने ईश्वर से एक औलाद के लिये मन्नत ना मांगी थी । लकिन आज वो अपनी इस दुआ के लिये पछता रही थी । जैसे ही उसने अपनी सास को यह खुशखबरी दी , उसकी सास ने फरमान सुना दिया - बहुरिआ ई घर मा बिटिया ना अइहै ।  उसे अस्पताल जाना है  मगर वो डर रही है । बस बार बार वो यही प्रार्थना कर रही है कि बेटी ना हो , क्योकि वो उसको बचा पाने में सक्षम नही है ।
थोडी देर मे जब वो अस्पताल पहुँची तो जाँच करने के बाद डाक्टर साहिबा ने बताया कि वो दो बच्चो को जन्म देने वाली है - एक बेटा और एक बेटी ।
ईश्वर ने शायद उसकी फरियाद सुन ली थी । और अब उसे क्या करना है यह उसने तय कर लिया । घर आकर उसने अपनी सास से कहा - अम्मा  ई घर मा एक नाही दुई बच्चा आये वाले है - एक बेटवा और एक बिटिआ । औ हम बेटवा का तबही जनम दैबे जब बिटिया भी जनम लेहे । औ जउन दिना तुम बिटिया का मारै की बात करिहो हम तोहार पोता का मार डारब ।
वो जानती थी कि दादी के प्रान पोते में बसे है और बेटे में बेटी के और बेटी में उसके ।
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