प्रशंसक

गूगल अनुसरणकर्ता

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ऐसा भी कर देते हैं लोग


जब कुछ मिलता नही चर्चा मे बने रहने को |
मासूम से इश्क को फसाद बना देते है लोग ||

जिसको पाने में तमाम उम्र लग जाती है |
उसे पल भर में ही खाक बना देते है लोग ||

बेपनाह प्यार का दावा करते है जिससे|
गुजर जाने पे चंद लम्हों मे भुला देते है लोग ||

समझाती हूँ अक्सर अपने इस नादां दिल को |
मोहब्बत की आड में सब कुछ चुरा लेते है लोग||

तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
और दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||

सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
पलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||

29 टिप्‍पणियां:

  1. सच्ची हकीकत बयान की है इस रचना में ...शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  2. तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
    और दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||
    बेहतरीन गजल। हर शेर में वजन है। कभी वक्त मिले तो हमें भी पढ़े। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जिसको पाने में तमाम उम्र लग जाती है |
    उसे पल भर में ही खाक बना देते है लोग ||

    समाज को सच का आइना दिखाती सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. समझाती हूँ अक्सर अपने इस नादां दिल को |
    मोहब्बत की आड में सब कुछ चुरा लेते है लोग||

    उफ़ ये रूमानी शेर

    उत्तर देंहटाएं
  5. हकीकत बयान की है सुन्दर रचना..शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .

    http://charchamanch.uchcharan.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. लाजवाब मुझे तो बेहद पसंद आई

    उत्तर देंहटाएं
  8. ऐसा लग रहा है कि गजल की 'शेप' में आपने अपने भाव को कहने की कोशिश की है . इस विधा के शास्त्र को उर्दू वाले बेहतर जानते होंगे , सो शिल्प पर कुछ नहीं कह सकूंगा !

    हाँ , आपकी कविता के भावों से गुजरते हुए जिगर मुरादाबादी के शेर जरूर याद आये -

    '' इक लफ़्ज़े-मोहब्बत का अदना सा फ़साना है
    सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है !
    ------------------------------------
    हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
    रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है ! ''
    - - - सघन - सात्विक अनुभूतियाँ फैलें या नहीं , पर फसाद ( आपकी कविता की दूसरी पंक्ति में आया है ) जरूर जमाने भर का फैलाव ले लेता है ! फिर तो सच वही सच : 'रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है ' ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर ग़ज़ल और वास्तव में हकीकत भी.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  10. सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
    पलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||
    दर्द भरे भाव अच्छी रचना ..........

    उत्तर देंहटाएं
  11. जब कुछ मिलता नही चर्चा मे बने रहने को |
    मासूम से इश्क को फसाद बना देते है लोग ||

    अब कुछ तो फसाद होना ही चाहिए ...आदत होती है ..बिना बात फसाद बनाने की

    उत्तर देंहटाएं
  12. तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
    और दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||


    बहुत खुब

    उत्तर देंहटाएं
  13. लोगो की ऐसी की तैसी ,
    मैं तो यही मानता हू , इन को ठेंगे पर रखना चाहिए तभी ये सही रहते है .
    जो इसे मानते है उन के ख्वाब कोई नही छीन सकता है

    उत्तर देंहटाएं
  14. बेशक महत्वपूर्ण विषय पर उत्तम विचार से सजी सुंदर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  15. pahlee vaar hee aana huaa aapke blog par bahut prabhavit huee lekhan pratibha se.
    samaj kee mansikta ko bahut sahajta se aapne samne rakha....
    aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत खूब ...
    लोग तो लोग हैं ये फसाना बनाने में माहिर हैं

    उत्तर देंहटाएं
  17. समाज को सच का आइना दिखाती सुन्दर रचना |बहुत सुंदर|

    उत्तर देंहटाएं
  18. सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
    पलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||

    कटु सत्य को दर्शाती एक सशक्त प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  19. ये जो मुहब्बत है ये उनका है काम............सच है .....शब्ज पत्तो में छिपे रहते हैं चेहरे उनके पेड़ तो हमसे भी ज्यादा उदास होते हैं ....

    उत्तर देंहटाएं

आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

GreenEarth