मासूम से इश्क को फसाद बना देते है लोग ||
जिसको पाने में तमाम उम्र लग जाती है |
उसे पल भर में ही खाक बना देते है लोग ||
बेपनाह प्यार का दावा करते है जिससे|
गुजर जाने पे चंद लम्हों मे भुला देते है लोग ||
समझाती हूँ अक्सर अपने इस नादां दिल को |
मोहब्बत की आड में सब कुछ चुरा लेते है लोग||
तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
और दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||
सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
पलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||
कुछ तो लोग कहेंगे!
जवाब देंहटाएं............
सच्ची हकीकत बयान की है इस रचना में ...शुभकामनायें !
जवाब देंहटाएंतनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
जवाब देंहटाएंऔर दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||
बेहतरीन गजल। हर शेर में वजन है। कभी वक्त मिले तो हमें भी पढ़े। धन्यवाद।
जिसको पाने में तमाम उम्र लग जाती है |
जवाब देंहटाएंउसे पल भर में ही खाक बना देते है लोग ||
समाज को सच का आइना दिखाती सुन्दर रचना
समझाती हूँ अक्सर अपने इस नादां दिल को |
जवाब देंहटाएंमोहब्बत की आड में सब कुछ चुरा लेते है लोग||
उफ़ ये रूमानी शेर
हकीकत बयान की है सुन्दर रचना..शुभकामनायें
जवाब देंहटाएंवाकई सत्य है... हर एक शे’अर में..
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना।बधाई।
जवाब देंहटाएंबेरहम दुनिया।
जवाब देंहटाएंहाय रे जालिम दुनिया ;)...
जवाब देंहटाएंब्लॉगिंग: ये रोग बड़ा है जालिम
सत्य है...
जवाब देंहटाएंसार्थक अभिव्यक्ति!
लाजवाब मुझे तो बेहद पसंद आई
जवाब देंहटाएंऐसा लग रहा है कि गजल की 'शेप' में आपने अपने भाव को कहने की कोशिश की है . इस विधा के शास्त्र को उर्दू वाले बेहतर जानते होंगे , सो शिल्प पर कुछ नहीं कह सकूंगा !
जवाब देंहटाएंहाँ , आपकी कविता के भावों से गुजरते हुए जिगर मुरादाबादी के शेर जरूर याद आये -
'' इक लफ़्ज़े-मोहब्बत का अदना सा फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है !
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हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है ! ''
- - - सघन - सात्विक अनुभूतियाँ फैलें या नहीं , पर फसाद ( आपकी कविता की दूसरी पंक्ति में आया है ) जरूर जमाने भर का फैलाव ले लेता है ! फिर तो सच वही सच : 'रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है ' ! आभार !
sundar panktiyan
जवाब देंहटाएंsachai ko baya karti...behad sundar...badhai ho
जवाब देंहटाएंवाह जी बढ़िया है
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर ग़ज़ल और वास्तव में हकीकत भी.
जवाब देंहटाएंसादर
सब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
जवाब देंहटाएंपलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||
दर्द भरे भाव अच्छी रचना ..........
जब कुछ मिलता नही चर्चा मे बने रहने को |
जवाब देंहटाएंमासूम से इश्क को फसाद बना देते है लोग ||
अब कुछ तो फसाद होना ही चाहिए ...आदत होती है ..बिना बात फसाद बनाने की
तनहा रहना भी खटकता है जमाने के ठेकेदारों को |
जवाब देंहटाएंऔर दामन थाम लो तो शोर मचा देते है लोग ||
बहुत खुब
लोगो की ऐसी की तैसी ,
जवाब देंहटाएंमैं तो यही मानता हू , इन को ठेंगे पर रखना चाहिए तभी ये सही रहते है .
जो इसे मानते है उन के ख्वाब कोई नही छीन सकता है
DARD SE BHARE BHAV........ACHI RACHNAA.
जवाब देंहटाएंबेशक महत्वपूर्ण विषय पर उत्तम विचार से सजी सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंpahlee vaar hee aana huaa aapke blog par bahut prabhavit huee lekhan pratibha se.
जवाब देंहटाएंsamaj kee mansikta ko bahut sahajta se aapne samne rakha....
aabhar
बहुत खूब ...
जवाब देंहटाएंलोग तो लोग हैं ये फसाना बनाने में माहिर हैं
समाज को सच का आइना दिखाती सुन्दर रचना |बहुत सुंदर|
जवाब देंहटाएंसब कुछ लूट कर भी जब जी नही भरता |
जवाब देंहटाएंपलकों में सजे ख्वाब तक जला देते है लोग||
कटु सत्य को दर्शाती एक सशक्त प्रस्तुति..
ये जो मुहब्बत है ये उनका है काम............सच है .....शब्ज पत्तो में छिपे रहते हैं चेहरे उनके पेड़ तो हमसे भी ज्यादा उदास होते हैं ....
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