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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

प्रतिक्रिया

उस समय लोग बुद्ध को भगवान समझने लगे थे, लोग उनकी बातों को सुनते और उनके कहे अनुसार आचरण करते थे। एक गाँव में एक लकडहारा बुद्ध से ईर्ष्या रखता था, सभी से उनकी बुराई करता, और कहता सब उनकी पूजा करते हैं इसलिये वो शान्त रहते हैं मै जब चाँहू उनसे लडाई कर सकता हूँ उनको क्रोध दिला सकता हूँ।
एक दिन वह खुद को सत्य सिद्ध करने के उद्देश्य से वहाँ गया जहाँ बुद्ध रहते थे। वहाँ उसने देखा कि भगवान बुद्ध तपस्या में लीन हैं। कुछ देर तक तो वह उनकी आंखे खुलने का इन्तजार करता रहा, फिर जब उससे रहा नही गया तो वह बुद्ध के निकट गया और उनके चेहरे पर थूक दिया और फिर कुछ दूर खडा हो गया। वह सोच रहा था कि जरूर मेरे ऐसा करने से वह आंख खोलेंगे और गुस्सा करेगें तब मै उनसे लडाई करूंगा और सारे गाँव वालो को शोर से बुला कर दिखाऊंगा कि बुद्ध को भी क्रोध आता है।
कुछ देर इन्तजार करने के बाद जब बुद्ध ने आंख खोली और अपने अंगवस्त्र से थूक साफ करते हुये बोले- तुम्हे और कुछ कहना है। लकडहारा बडे आश्चर्य में पड गया क्योकि वह ऐसे व्यवहार की कल्पना भी नही कर सकता था। फिर भी लडाई करने के उद्देश्य से गुस्सा करते हुये बोला- मैने आप पर थूका है, आपको गुस्सा नही आ रहा। और आप कह रहे हो और कुछ कहना है।
बुद्ध बोले- हाँ, मैं पूँछ रहा हूँ, तुम कुछ और भी कहना चाहते हो क्या?
लकडहारा कुछ समझ नही पाया कि अब उसको क्या कहन चाहिये, बिना कुछ और कहे वहाँ से चला गया। गाँव आ कर उसने जब लोगो को यह बताया कि आज उसने बुद्ध पर थूका है तो लोगो ने उसे समझाया कि यह उसने बहुत गलत किया है, वो बहुत महान हैं, अब भगवान उसे इसकी सजा देंगें, और भी कई प्रकार से लोगो ने उसको डराया। लोगों की बातें सुनकर वह बहुत डर गया और सारी बारात वह यही सोचता रहा कि सच में उससे कुछ गलत हो गया है, मुझे जाकर माफी मांग लेनी चाहिये, वरना भगवान उसे सजा देंगें।
अगली सुबह वह बहुत जल्दी उठा और बुद्ध के पास गया। बुद्ध तपस्या में लीन थे। वह खडे होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगा। जब बहुत देर हो गयी और बुद्ध ने आँख नही खोली तो वह बुद्ध के पैरों में जा कर गिर गया, उसे अपनी गलती का अहसास था, उसकी आंखों से आँसू निकल पडे। आसुओं के आभास से बुद्ध ने नेत्र खोल दिये और बोले- तुम्हे और कुछ कहना है।
लकडहारा फिर कुछ नही समझ पाया, बोला - आपने कल भी यही कहा था, आज भी यही कह रहे हैं, मैने तो कल भी कुछ नही कहा था, आप पर थूक कर चला गया था, आज भी कुछ नही कहा, बस आपके चरणों में आकर गिर गया। मगर आपने मुझसे कुछ कहा ही नही।
बुद्ध बोले- कल तुम्हे जो भाषा आती थी तुमने उस भाषा में मुझसे बात की थी, और आज भी ऐसा ही किया। तुम मुझसे कुछ्ह कहना चाहते थे, मगर मुझे तो तुमसे कुछ भी नही कहना था।
मै तुम्हारे अनुसार अपना आचरण तय नही कर सकता कि जब तुम चाहो मेरे हदय में तुम्हारे लिये घॄणा हो, जब तुम चाहो मै तुम पर करुणा करूं।
अपने आचरण का निश्चय मैं स्वयं करूंगा, कोई अन्य नही।

सच, हम अक्सर अपने जीवन में प्रतिक्रिया करते हैं, जो जैसा हमसे चाहता है वैसा हम करते हैं। उसमें हमारा निर्णय नही होता। हमारा अपना निर्णय जब होता है तब प्रतिउत्तर होना चाहिये न कि प्रतिक्रिया।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

खाली हो


अल्बर्ट स्मिथ, अमेरिका की एक जानी मानी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर थे। एक बार अपनी क्लास में वह सत्य, ज्ञान और धर्म पर अपना व्याख्यान दे रहे थे। अचानक उन्हे रोकते हुये उनके एक विघार्थी ने कहा- सर आप जो भी कह रहे हैं उसमें भाव नही आ रहा, ऐसा लग रहा है जैसे आप सिर्फ किताबी ज्ञान दे रहे हैं। आपने कभी इसे अनुभव नही किया। कभी आप जापान के सन्त चितोस को सुनियेगा, उनकी बातों में भाव होता है, उनकी हर बात सच लगती है।
अल्बर्ट बहुत ही समझदार और धैर्य वाले व्यक्ति थे, उन्होने विधार्थी की बातों पर विचार किया, और कालेज की छुट्टियों में जापान जाकर चितोस से मिलने का निश्चय किया।
चितोस एक ऊंची पहाडी पर एकान्त में रहते थे। लोगों से उनका पता पूछते पूछते एवं दुर्गम रास्तों से होते अल्बर्ट अन्ततः चितोस की कुटिया तक आ पहुंचे। उन्होने चितोस को आवाज लगाई। दरवाजे पर एक दुर्बल व्यक्ति आया जिसका रंग कुछ काला और चेहरा चेचक के दागों से भरा था, कुल मिलाकर कहा जाय तो वह व्यक्ति पूर्णतः आकर्षणहीन था। अल्बर्ट ने कहा- मुझे चितोस से मिलना है, दरवाजे पर आये व्यक्ति ने विनम्रता से कहा- मेरा नाम ही चितोस है, कहिये मै आपके लिये क्या कर सकता हूँ। यह सुनकर अल्बर्ट को आने का पूरा उश्देश्य ही विफल लगने लगा, वह सोचने लगा क्यो यहाँ आकर समय खराब किया, भला यह बदसूरत सा दिखने वाला, कमजोर सा व्यक्ति मुझे क्या बतायेगा। फिर भी यह सोचकर की कि आ गया हूँ तो पूंछ ही लेता हूँ, अल्बर्ट ने कहा- मै अमेरिका की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र का प्रोफेसर हूँ, मेरे एक विघार्थी ने कहा कि आप जानते है कि सत्य ईश्वर और धर्म क्या है। मुझे जल्दी से बता दो और मै जाऊँ, अभी बहुत दूर वापस जाना है।
चितोस ने कहा- बताता हूँ, पहले आप अन्दर तो आइये, आप बहुत थके हुये से लग रहे है, आइये एक कप चाय पीजिये।
अल्बर्ट ने कहा- नही मै ठीक हूँ, आप बस बता दीजिये, मुझे वापस भी जाना है। मगर पुनः चितोस के आग्रह पर अल्बर्ट अन्दर चले गये, वो अनुभव करने लगे कि वाकई वो थके हैं और एक कप चाय की उन्हे बेहद जरूरत थी।
तभी चितोस चाय की केतली और कप लेकर आ गये। उन्होने अल्बर्ट को कप प्लेट पकडाई और कप में चाय डालने लगे। जब अल्बर्ट ने देखा कि चाय, कप में पूरी तरह भर चुकी है और प्लेट से बस निकलने ही वाली है तो कुछ नाराजगी से बोले- ये क्या, आप देख नही रहे कि कप भर गया है इसमें और चाय नही आ सकती।
चितोस ने कहा- आपने सही कहा,  क्या आपने यहाँ आने से पूर्व ध्यान दिया कि आप खाली नही हैं।

अल्बर्ट भी एक समझदार व्यक्ति थे, वे चितोस की बात का अर्थ समझ गये कि जब हम किसी के पास कुछ सीखने जाय तो मन मे ग्रहण करने का भाव भी होना चाहिये। अल्बर्ट उठ खडे हुये और माफी माँगते हुये बोले- मै जाता हूँ और जब खाली हो जाऊंगा तब आपके पास अपने उत्तर के लिये वापस आऊंगा। चितोस ने उन्हे प्रेमपूर्वक रोका और कहा- मित्र मेरा विश्वास कीजिये आप जब खाली हो जायेंगे, तब आपको मेरे पास आने की आवश्यकता भी नही रहेगी।

सोमवार, 31 जुलाई 2017

पागल कौन ??


एक बहुत बडे वैज्ञानिक थे। एक बार उन्होने पागलो पर शोध करने का निश्चय किया। वो नियम से तीन चार घंटे एक पागलखाने जाते और चुपचाप पागलों के व्यवहार को गौर से देखा करते।
वहाँ उन्होने गौर किया कि दो पागल, जो कभी गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर हुआ करते थे, घंटो आपस में बात किया करते थे। उनकी बातचीत में खास बात यह होती कि जब एक बोलता दूसरा चुप रहता और बडे ध्यान से दूसरे को सुनता और जब पहला चुप होता तो दूसरा बोलता और पहला चुप रह कर उसकी बात सुनता।

वैज्ञानिक को उन दोनो का व्यवहार बहुत अलग लगा। एक दिन वह उन दोनो पागलों के पास गये और बोले- प्रोफेसर साहब, आपसे एक बात पूंछनी थी - मै कई दिनों से देखता हूँ कि आप दोनो जब बात करते हैं तब एक समय में एक ही बोलत है और दूसरा बहुत ध्यान से सुनता है, कोई किसी की बात बीच में कभी नही काटता, ऐसा आप कैसे करते हैं। दोनो मुस्कराये फिर एक पागल प्रोफेसर बोले- यही तो बात करने का उसूल है कि एक बोले और दूसरा सुने इसमें आश्चर्य की क्या बात है। तब वैज्ञानिक जी बोले- नही, इसमें कुछ खास नही मगर मेरे लिये आश्चर्य की बात यह है कि दोनो के बात के विषय अलग अलग होते हैं एक हमेशा गणित की बात करता है और दूसरा हमेशा अंग्रेजी, जब आप एक दूसरे की बात समझते ही नही तो ध्यान से सुनते क्या हैं? 
अब दोनो पागल प्रोफेसर बहुत तेजी से हंसे फिर रुक कर एक ने कहा- अरे महोदय हमे पागल समझा है क्या? मुझे दुनिया में कोई दो व्यक्ति दिखा दो जो सच में एक दूसरे को सुनते हो।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

आईना- मेरा दस्तावेज


कल सुबह 
उठा था
कुछ अलसाया अलसाया सा।
प्रतिदिन की तरह
उठ चुकी थी पत्नी
शायद बनाने गयी थी चाय।
तभी नजर गयी
उस आइने पर
जो इस कमरे में
एक अरसे से
सोता जागता था
मेरे साथ।
जिसने देखा था 
खामोशी से
कदम रखते मुझे
जवानी की दहलीज पर,
जिसने भाँपे थे सबसे पहले
मुझमें हो रहे परिवर्तन,
जिसने सिखाया
खुद से नजरें मिलाना,
जिसने जगाया
मेरा सोया आत्मविश्वास,
जिसे भूल गया
वक्त के साथ।
मगर देखता रहा वो
इस उम्मीद पर
देखूंगा मै
एक दिन।
कल एक बारगी
उसे पहचान न सका
कुछ बदल सा गया था
क्योंकि
निकल आयी कुछ झुर्रियां
उसके चेहरे पर
बाल भी हो गये थे
कुछ पके अधपके से
नजरे मिलते ही
कुछ खिंचता सा गया।
ठीक उसी तरह जैसे
अठ्तीस चालीस साल पहले
खिंचा था
माया को देखकर
कितना स्वाभाविक था
वो खिंचाव
उस चुम्बकीय आकर्षण में
गति थी
मेरे जीवन की
शायद तभी
मेरे अंतःकरण में बसा
हनुमान
राम से शिवभक्त बन
करने लगा था तप
पाने को अपनी गौरा।
अचानक मुझे लगा
जैसे उसके सफेद बालों को
किसी ने रंग दिया
गोदरेज हेयर कलर से
किसी ने अदॄश्य रूप से
लगा कर एंटीरिंकल क्रीम
मिटा दी उसकी झुर्रियां
बन गया वो
मुझसा
जाने कैसे उसे देख
मेरे मन के भाव
प्रौढ से युवा हो गये
धुंधली आँखो में चढ गया
गौगल, चश्में की जगह 
कितने ही स्वर्णिम स्वप्न
तैर गये आंखों में
कुछ परेशानियां भी
उभर आयीं
सपनों को साकार करने की।
तभी महसूस हुआ
एक आत्मीय स्पर्श
जो दे रहा था सम्बल
फिर किसी कोने से
गूंजने लगी
कुछ किलकारियां
जो दे रही थी आधार
जीवन को
हाथों में आ रहा था
कोई छोटा सा हाथ।
तभी अनुभव हुआ
समाहित हो रहे हैं
ये सभी मुझमें
जो जगा रहा था
मेरी सुषुप्त चेतना
दे रहा था खाद पानी
निर्जीव हो चले वॄक्ष को
जिसमें शेष थी
आस
उगने की
नयी कोपलें
मिल गया था वापस
मुझे मेरा बीता कल
जो था
ऊर्जा से
अभिसंचित
दे रहा था प्रेरणा
अन्तिम क्षण तक
जीवन युद्ध में
संघर्ष करने की।
और तभी
बरसों से चिर परिचित
ध्वनि आयी
सुनो सुबह हो गयी है
आओ चाय साथ पीते हैं॥
चल दिया मैं
चाय की दिशा में
देकर वचन
अन्तिम श्वांस तक
साथ निभाने का
अपने अजीज दोस्त
अपने आइने को

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

गुलाबी कागज के टुकडे


वो गुलाबी कागज का टुकडा
जो, पड गया है पीला
जैसे
पड गयी है फीकी
मेरी गुलाबी चमक
वक्त के साथ ।
रखा है, आज भी सहेज कर
कुरान की आयतों में
जिसमें
अल्फाज़ नही
लिख कर दिये थे तुमने
अहसास ।
जिसमें लिखते रहे 
हम तुम 
हर लम्हा
और बनती गयी ज़िन्दगी
एक खूबसूरत ग़ज़ल ।
सच
कितना आसान हो जाता है
कुछ कहना
कुछ लिखना
अहसासों की जुबान में
जहाँ
लफ्ज़, दीवार नही बनते
न गुंजाइश रहती है
गलतफहमियों की
बस बहते जाते हैं 
एक ही रौ में
हाथों में हाथ लिये
कहते जाते हैं
सुनते रहते हैं।
नही करना पडता इन्तज़ार
कहने के लिये
चुप होने का
एक ही पल में
दोनो कहते हैं
दोनो सुनते हैं
और लिखते रहते हैं
उसी, गुलाबी कागज के टुकडे में
जो पड गया है पीला
जिसे सहेज कर रखा है
कुरान की आयतों में।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

लघुकथाः तो अब देख लेंगे।


क्लास में सभी बच्चे और टीचर भी यह जानते थे कि अंजली की आर्ट बहुत खराब है। एक दिन क्लास में टीचर ने सभी बच्चों से अपने मन की कोई भी ड्रांइग बनाने को कहा। अंजली भी बहुत मन से अपनी कॉपी पर ड्रांइग बनाने लगी। अंजली बहुत मन से ड्रांइग बना रही थी, उत्सुकतावश टीचर उसकी सीट तक ये देखने गयीं कि वो क्या बना रही है। अंजली ने कॉपी पर कुछ आढी तिरछी लाइने बना रखी थी ये देख टीचर ने उससे हतोत्सहित करने के भाव से पूंछा- ये क्या बना रही हो, अंजली ने बडी सरलता से कहा- भगवान। तब टीचर ने ऊंची आवाज में उसका मजाक बनाते हुये कहा- मगर भगवान को तो अभी तक किसी ने भी देखा नही, फिर उनका ड्रांइग कैसे बनाओगी?

अंजली ने बडी मासूमियत से उत्तर दिया- तो अब देख लेंगें। 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

साठ का इतवार


दिनो के अर्थ भी उम्र के हिसाब से बदलते रहते हैं। मुझे याद है, कभी बचपन में भी इतवार का इन्तजार करता था, अपनी युवा अवस्था में भी किया और आज जब प्रौढावस्था की तरफ बढ रहा हूँ तब भी इतवार का इन्तजार करता हूँ मगर अवस्था के साथ साथ इतवार के होने के अर्थ भी बदलते रहे। बचपन में इतवार का मतलब होता था, मास्टर जी की डांट डपट से एक दिन की मुक्ति, नाश्ते में पुन्नू हलवाई की जलेबी, और दोस्तों के साथ गली में क्रिकेट।
जैसे जैसे बडा होता गया, मास्टर साहब की डांट की जगह ऑफिस के बॉस की डांट ने ले ली, दोस्तों के बजाय जीवन में आ गये दो प्यारे से बच्चे- रिया और नवीन, और हफ्ते भर का बचा घर काम, बाजार से सब्जी सौदा लाना वगैरह वगैरह।
इधर कुछ समय से इतवार को सामान लाने के काम की जिम्मेदारी नवीन सम्भालता है, खेलने के लिये अभी पोते पोतियों का आना बाकी है सो निकल जाता हूँ कभी शर्मा जी या कभी माथुर जी के पास। हाँ डांट का सिलसिला आज तक नही टूटा, स्थाई रूप से यह कार्यभार मेरी धर्मपत्नी ने ले लिया है।
कल रात नवीन के साथ जी एस टी पर लम्बी बहस होती रही, सो सुबह नींद थोडा देर से खुली। चाय पी कर पेपर पढने बैठा तभी अस्थाना जी का फोन आ गया- बोले आ जाओ सब की महफिल जमी है बस तुम्हारी ही कमी है। अभी स्नान ध्यान भी नही हुआ था, फिर ख्याल आया आज तो इतवार है, भगवान जी भी आज सनडे मना लें इस ख्याल से कुर्ता पाजामा डाला और निकलने के क्रम में नवीन की बहू प्रीती से जो मेज टेबल पर डस्टिंग कर रही थी, थोडा ऊंची आवाज में ये सोचते हुये कहा ताकि रसोई के काम में लगी श्रीमती जी के कानों तक भी मेरी बात पंहुच जाय - बहू अस्थाना जी से मिल कर आता हूँ, और इतनी चाल से बाहर की तरफ निकला ताकि श्रीमती जी तक मेरी बात पहुंचने और उनके कुछ काम बताने के पहले मै निकलना सुनिश्चित कर सकूं। मेरे पास ऐसा करने के पीछे एक कारण भी था, अस्थाना जी की आदत थी वो ज्यादातर सबको अपने घर बुला लिया करते थे, जबकि वो घर में अकेले ही थे, दो वर्ष पहले उनकी पत्नी का देहान्त हो गया था, और उनका एकमात्र पुत्र विदेश में ही सेटल हो गया था। उनका कहना था कि सबके आने से घर में जरा देर को ही सही रौनक हो जाती है। और मेरी पत्नी जी का कहना था कि कभी उनको घर से बाहर भी निकलना चाहिये। वैसे खुद इतनी सहद्य थी कि उनकी पत्नी के स्वर्गवास के बाद से तो कभी कुछ भी अच्छा बनाती तो सबसे पहले उनका हिस्सा निकाल कर रख दिया जाता जो या तो मै देकर आता या नवीन। और जब मै कहता कि बुला लेता हूँ, देने क्या जाना तो कहती- ना, बुलाया तो कोई बहाना कर देंगे पर आयेंगे नही, बहू के आने से थोडा संकोच करने लगे हैं। जाओ देकर आओ, तभी मिलेगा खाना। तब मै, मन ही मन उसकी इस बात से खुश होता और ऊपर से झूठमूठ का गुस्सा दिखाता चला जाता।
आज बातों का सिलसिला ऐसा निकला कि एक कब बज गया पता ही नही चला, मगर अब घर जा कर मेरे बारह बजने तय थे, मुझे खयाल आया कि मै तो यहाँ समोसे और जलेबी खा चुका मगर मेरी देवी जी ने केवल चाय भर पी होंगी, खाना बन चुका होगा, बहू और बेटे को खिला कर मेरा इन्तजार हो रहा होगा। घर में कदम रखते ही सुनाई देगा- आ गये आप, अरे मुझे तो लगा आज वही रहने वाले हैं, आज चालीस साल हो गये शादी को हमेशा कहती हूँ बता तो दिया करो कब तक आओगे मगर नही ये कैसे बता दिया जाय, घर में है ना एक मूरख, करती रहे इन्तजार अपनी बला से। और सबसे बडी मुसीबत तो ये होती कि ऐसी स्थिति में मै यह निर्णय नही कर पाता कि चुप रह जाऊं या कुछ बोलूं। क्योकिं बचाव तो दोनो ही स्थितियों में नही होता। फिर भी आज मैने चुप रह जाने का निर्णय लेते हुये घर में चुपचाप कदम रखा और अखबार पढने का नाटक सा करने लगा।
मगर ये क्या, आज तो घर के किसी कोने से कोई आवाज ही नही आ रही। थोडा परेशान थोडा निश्चिन्त भी हुआ। तभी जाने कहाँ से चाय की तलब चढी। मैने कहा- अरे प्रीती बेटा एक कप चाय मिलेगी क्या? उत्तर में अन्दर कमरे से श्रीमती जी की आवाज आयी- बच्चे पिक्चर देखने गये हैं, बनाती हूँ रुको जरा ये बटन टांक लूँ। मै फिर से अखबार में खो गया मगर इस बार            सच में खबर ही पढ रहा था।

अचानक कुछ याद आया और किचन तक पहुंच गया, श्रीमती जी चाय के लिये अदरक कूट रही थी। शायद थोडी देर पहले ही वो नहा कर आयी थी, गीले बालों के जूडे से टपकता पानी इस बात की गवाही दे रहा था। मैने धीरे से किचन में कदम रखते हुये उन्हे वैसे ही पकड लिया जब पहली बार मेरा और उनका रसोई में मिलन हुआ था और उन्होने हडबडा कर कहा था – कोई आ जायगा। ये क्या आज भी उनके मुंह से यही निकला- क्या करते है कोई आ जायगा। मैने कहा- कौन आ जायगा , अभी तो आप ही कह रही थी कि बच्चे पिक्चर देखने गये है। अब तक उनको भी याद आ गया कि ये तो उन्होने अपने आदत के कारण कहा है। बनावटी गुस्से के लहजे में बोलीं- आप भी क्या साठ के होने को है, कुछ तो अपनी सफेदी का लिहाज कीजिये। और मै कुछ सोचता हुआ, मुस्करा कर वापस कमरे में आ कर अखबार पढने लगा।

थोडी देर में श्रीमती जी चाय ले कर आयीं और हाथ से अखबार लेकर मेल पर रखकर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी। हम दोनो ही चाय पीने लगे। चाय की प्याली खतम कर बोलीं- सुनिये बच्चे कह रहे थे कि राबता बढियां पिक्चर है, चलेंगें क्या? 

रविवार, 23 जुलाई 2017

गिद्धीय नर



स्त्री को भी शायद ना पता हो
अपने उभार और ढलान का माप
मगर गिद्ध पुरुष की दॄष्टि
हमेशा नापती रहती है
अंग प्रत्यगं के बीच की दूरी
उसका क्षेत्रफल
और कभी कभी आयतन
कभी चौराहों पर
कभी कार्यस्थल पर
यहाँ तक की मन्दिर भी
आ जाते है चपेट में
ढके मुंदे तन में भी
ढूंढता रहता है
कोई खिडकी
जहाँ से दे सके उडान
अपनी वासना को
अपनी काम कल्पना में
उड कर भी
तॄप्त नही होती
कामाग्नि
चाहता है किसी भी तरह
उसे बुझाना
नही सोचता
क्या गुजरती है
स्त्री के कोमल हदय पर
जब भेदती है उसे
वक्री निगाहें
नही जानता
अपनी सोच मात्र से ही
हो चुका है पतित
और छल चुका है
अपनी अर्धागिंनी को
दिन भर की नाप जोख के बाद
जब बजाता है
घर की डोर बेल
निर्लाज्जता से
ओढ लेता है
थोडा दम्भ
झूठी थकान
झूठ्मूठ का प्यार
और दिखावटी जिम्मेदारी
क्योंकि
दरवाजे के खुलते ही
कोई कर रहा है इन्तजार
बना दिया है जिसने

उसे पति परमेश्वर

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

चालीस के पार


सुनो, मेरे पीछे
लापरवाही मत करना
मुझे पता है तुम
मेरा ख्याल रख सकते हो
मगर खुद का
बिल्कुल भी नही
हाँ आजकल भूलने बहुत लगे हो
याद से आ जाना समय पर
वरना तुम्हारे लिये
फिर सबसे झूठ बोलना पडेगा
और सुनने पडेगें जीजियों से ताने
काम तो बस तुम्हारे ही पति करते है
अरे हाँ एक और बात
रख कर जा रही हूँ
तुम्हारी स्टडी टेबल पर
चंद गुलाबी पन्ने
जिसे अब नही रखते तुम
मेज की दराज में
साथ में रख रही हूँ
कुछ गुलाब की पंखुडियां
कि जानती हूँ तुम्हे अब
कैक्टस का शौक है
अच्छा, ढूँढ सको तो ढूंढ लेना
वो रेनौल्ड का पेन
जिसमें अपने नाम की सिल्प
मैने डाल रखी थी
और एक दिन चुपके से
तुमने निकाल ली थी मेरे बस्ते से
आज चालीस पार फिर से मन
सोलह का हो रहा है
कब से आ चुका है जमाना
ई मेल और व्हाट्स अप का
और मन ले जा रहा है
मुझे पुराने दौर में
मुझे पता है बहुत व्यस्त हो तुम
अपने बिजी सेड्यूल में
फिर भी कर देते हो लाइक
मेरे फेसबुक मैसेज
शाम को जब बना रही होती हूँ चाय
तुम भेज रहे होते हो
मुझे जोक्स या मैसेज
फिर तुम चाय पीते हो
और मै करती हूँ रिप्लाई
सुनो, मै नही कहती
एक दिन में पूरा लिखो
थोडा थोडा सा लिखो
ना भेजो कुछ दिन
मुझे मैसेज
ना करो मुझे लाइक
एफ बी या टिव्टर पर
अच्छा पता याद तो है ना
तुम्हे अपनी ससुराल का
कि अब नही मिलेगी तुम्हे अनीता
जिसके हाथ भेज देते थे
खत में छुपा कर ढेर सारा प्यार
फिर से बन जाओ कुछ दिन के लिये
वही मेरे पुराने चन्दर
कि मै फिर से चाहती हूँ
तकिये के नीचे तुम्हे महसूस करना   
चाहती हूँ फिर से
सबसे नजर छुपाकर तुम्हे पढना
कि कबसे नही मिला मुझे
वो मेरा प्रेमी और उसका खत


* चित्र के लिये गूगल का आभार

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

हर दौर का एक मकाम होता है..................


हर दौर की एक शख्सियत होती है
हर दौर का एक मकाम होता है

हर दौर की इक दास्तां होती है
हर दौर में कुछ नागवांर होता है
हर दौर में सौगातें मिला करती है
हर दौर बुलंद इमारतें छोड जाता है

हर दौर में मोहब्बत छुप के मिलती है
हर दौर में जमाना खिलाफ होता है
हर दौर मे शमां सिसक के जलती है
हर दौर में अवारा इश्क बागी होता है

हर दौर में जुबांने करवट लेती है
हर दौर कुछ लफ्जों से सजता है
हर दौर में शक्ल ए नज्म बदलती है
हर दौर का अपना तराना होता है

हर दौर की खट्टी मीठी यादें होती हैं
हर दौर कुछ कडवाहटें भी दे जाता है
हर दौर जब होता है बुरा लगता है
हर दौर बीत जाने पर याद आता है

हर दौर में कुछ फरमाइशें बन जाती है
हर दौर में कुछ हाथों से छूट ्जाता है
हर दौर में ख्वाइशें कमायत लाती है
हर दौर में नया हुनर ही रंग लाता है


हर दौर की एक शख्सियत होती है
हर दौर का एक मकाम होता है

बुधवार, 19 जुलाई 2017

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं.......................


कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
मुझे मुल्क से मोहब्बत नही
कि मै जुबां पर हिन्दी
दिल में उर्दू रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
मुझे मजहब का इल्म नही
कि मै अपने घर में
गीता औ कुरान रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
मुझे जीने का सऊर नही
कि मै राम औ रहमान में
कोई फर्क नही रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
बन गया हूँ मै काफिर पूरा
कि मै आंगन में अपने
बकरी औ गाय रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
न मिलेगी जन्नत मुझको
कि मै नाम औलाद का
कासिम नही कन्हाई रखता हूँ

मै भी कुछ कहता नही 
सिर्फ सुन लेता हूँ
नवाबी ढंग से जीता हूँ
पर लोगो का अदब रखता हूँ

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

मै गलत नही


जबसे घर से आयी हूँ, किसी काम में मन नही लग रहा था, पापा ने अल्टीमेटम सा दे दिया था कि इस साल के लास्ट तक शादी कर दूंगा, शादी के बाद ससुराल वाले कहे तो नौकरी करो या ना कहे तो ना करो, ये वो जाने और तुम जानो। अब हमे हमारी जिम्मेदारी से निवॄत्त होने दो। मैने कई बार कहने की कोशिश की कि अभी एक साल मुझे और दे दीजिये, मगर मुझे भी पता था कि उनका कहना पत्थर की लकीर थी। रात भर इसी उलझन में रही, सुबह आंख देर से खुली। आज काम वाली आंटी भी नही आयी, तभी याद आया आज हेड ऑफिस मीटिंग के लिये जाना है। फटाफट तैयार होकर बिना नाता किये ही निकल पडी। बस भी मिली तो एकदम भरी, मगर देर हो रही थी, सो चढ गयी।
जगह मिलने का तो सवाल ही नही था। बसों में ऐसी स्थितियां तो मलचले लडकों/ आदमियों के लिये मुह मांगी मुराद सी होती हैं। और हम लडकियां, इस सब को इगनोर करने की आदत डाल लेती हैं कि तो रोज की ही बात है कहाँ तक अपना दिमाग खराब करें, मगर मेरा तो आज आलरेडी दिमाग खराब था सो आज इगनोर करने की बजाय रिएक्ट कर दिया। क्यो धक्का दिया बोलो- कह कर मैने अपना प्रतिरोध दर्ज किया। सॉरी मैडम मगर मैने जानकर नही किया, वो पीछे से मुझे भी धक्का आया, तो आपको भी लग गया, मै गलत नही । उसने ऐसी आवाज और अभिनय के साथ कहा कि प्रथम दॄष्ट्या तो कोई भी उसको मासूम समझ ले। मगर मै धोखे में आने वाली नही थी। मैने भी बिना कुछ और सोचे एक तमाचा उसके गाल पर जड दिया। वो बोला- क्या मैडम मै आपसे आप कह कर बात कर रहा हूँ और आप बद्तमीजी कर रही हैं। उसको रोकते हुये मैने कहा- ओह अब आपको ये बद्तमीजी लगी, और आपने जो हरकत की वो क्या थी। तब तक और भी लोग जो अभी तक मूकदर्शक बने थे, उन्हे याद आया कि वे सभी लोग सुनने और देखने के साथ बोल भी सकते हैं। और फिर अन्तोगत्वा उसको बस से उतारने के बाद बस आगे बढी। जाने क्यो मन में एक अलग सी शान्ति का अहसास हुआ। अहसास हुआ कि हाँ अब भी मुझमें इतनी शक्ति है कि अपने लिये गलत होते हुये सब कुछ सहन नही कर सकती।
जैसे जैसे महीने बीत रहे थे, मुझे पिता जी की बात डराती जा रही थी कि इस साल वो मेरी शादी कर ही देंगे। कल पन्द्रह अगस्त था, और मुझे मेरी आजादी खो जाने का भय हो रहा था। ऐसा नही था कि के मै शादी नही करना चाह रही थी या कोई मेरे जीवन में था, मै बस खुद को कुछ समय देना चाह रही थी, कुछ बनना चाह रही थी, और शादी की जिम्मेदारी के लिये खुद को तैयार नही कर पा रही थी।
इस बार मेरे ऑफिस में यह तय किया गया था कि हम लोग इस बार ऐसे लोग के साथ यह दिन मनायेगें जो समाज में रह कर भी समाज से कुछ अलग से हो गये हैं/या कर दिये गये हैं। ऑफिस में तीन अलग अलग टीम बनाई गयी थी- एक टीम को जाना था अनाथालय, दूसरी को वॄद्धाश्राम और तीसरी को पागलखाने। मुझे पागलखाने वाली टीम में डाला गया था।
सुबह ऑफिस में झंडारोहण के बाद हम सब लोग अपनी अपनी टीम लेकर निकल गये। पागलखाने में एक व्यक्ति को देखकर मेरे मन में उसके लिये किसी भी प्रकार की दया या सहानुभूति का भाव नही आया। मै वहाँ के डॉक्टर के पास गयी। मुझे देखकर डॉक्टर साहब बहुत खुश हुये- बोले आज पहली बार कोई इन लोगो के साथ कोई त्योहार मनाने आया है। आप यकीन करिये मिस मधु ये लोग पागल जरूर है मगर मै पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि व्यक्ति के भावों को पूरी तरह समझ सकते हैं। आपकी टीम ने आज सच में एक बहुत अच्छे काम की पहल की है। तभी मैने डॉक्टर साहब को बीच से रोकते हुये बोला- डॉक्टर मुझे ये बताइये कि ये १२५ नम्बर वाला मरीज यहाँ कब आया?
अचानक डॉक्टर के चेहरे पर एक दर्द उभर आया- थोडा सोचते हुये बोले- जानती हो मधु ये कौन है, ये मेरे हास्पिटल का एक होनहार डॉक्टर था, एक लकडी के कारण आज इसका ये हाल हो गया।
अभी कुछ देर पहले तक मेरे मन में इस व्यक्ति के लिये ये भाव था कि भगवान के घर देर है अंधेर नही, उस दिन बस में मेरे साथ गलत कर रहा था, और आज तीन ही महीनों में ईश्वर ने यहाँ पहुंचा दिया। मगर डॉक्टर की बात के बाद मन में उसके बारे में और जानने की इच्छा हुयी। मन में बहुत सारे प्रश्न जन्म लेने लगे। कुछ प्रश्नों के उत्तर में वह भला व्यक्ति दिखने लगा, मगर फिर भी अभी तक उसको सदचरित्र मानने का मन नही हुआ। मैने थोडा बेरुखी से पूंछा- क्यों किसी ने धोखा दे दिया था क्या? वो बोले- नही, ऐसा कुछ नही हुआ था।
आज से करीब तीन महीने पहले, एक दिन शाम को ये मेरे पास आया और बोला- सर मैने आज कुछ गलत नही किया, फिर भी बिना मेरी बात सुने, मुझे गलत ठहरा दिया गया। जीवन भर मैने यही कोशिश की कि कभी कुछ गलत ना करूं। जानते है सर- आज बिना बात सुने मेरी होने वाली पत्नी भी मुझे छोडकर चली गयी। जानती हो मधू – यह उस समय इतना रो रहा था जैसे कोई बच्चा रो सकता है।
मेरे मन की कौतुहल बढती ही जा रही थी, मैने कहा – किसे बात के लिये इसको गलत ठहराया गया था।
थोडा सा सांस भरते हुये डॉक्टर बोले- बात, बात तो ऐसी कुछ भी नही थी, मगर उस बात ने इसकी जिन्दगी उजाड के रख दी। हुआ बस इतना था कि उस दिन इसकी कार खराब हो गयी थी और ये अपने मरीज को देखने बस से जा रहा था। बस में किसी लडकी ने उस पर झूठा आरोप लगा दिया कि इसने उसको परेशान करने की कोशिश की, इतना ही नही उस लडकी ने बिना इसकी बात सुने इसको थप्पड मार दिया, इसको धक्के मार कर पब्लिक ने बस से उतार दिया। इस बात ने इसको अन्दर से बहुत दुखी कर दिया। पूरा दिन ये बहुत अनमना सा दिखा, एक दो दिन बाद जब इसकी अपनी मंगेतर से बात हुयी तो इसने अपने दुखी होने का कारण बताया, वो भी इस पर विश्वास ना कर सकी, और शादी टूट गयी। शादी टूट जाने के लिये घर वालों ने भी इसके आचरण को ही दोषी माना। 
सब कुछ ये बर्दाश्त नही कर सका। जो आदमी कल तक पागलों का बेस्ट डॉक्टर हुआ करता था आज वो खुद एक पागल बन कर इलाज करा रहा है।
कुछ देर पहले मै जिस व्यक्ति के बारे में जितना बुरा सोच रही थी, उससे कही ज्यादा अब खुद की नजर में अपराधी बन गयी थी। मै ही तो जिम्मेदार थी उसको यहाँ तक पहुंचाने की। अपनी उलझनों अपने गुस्से में क्यो मै नही देख सकी थी कि हर लडका बदनीयत नही रखता। मुझे वो चेहरा याद आने लगा जब वो कह रहा था मैडम मै गलत नही।
मै कभी कल्पना भी नही कर सकती थी कि बिना पूरी बात समझे मेरा किया गया गुस्सा और गुस्से में उठे कदम से किसी की जिन्दगी में भूचाल भी आ सकता है। मगर अब क्या? क्या मुझे अब चुप रहना चाहिये, क्या मेरा मात्र अपनी गलती का अहसास करना पर्याप्त है? क्या मुझे कुछ नही करना चाहिये? क्या आज आजादी के दिन भी मुझे इसको इसके दुखों तकलीफों से आजाद करने में मदद नही करनी चाहिये?
अगले ही पल मैं निश्चय कर चुकी थी कि मुझे क्या करना है? मुझे अपनी गलती का प्रायश्चित करना ही होगा, और इस व्यक्ति को वो सब देना ही होगा जिसका वो हकदार है। मुझे अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

मै तुरन्त हास्पिटल से बाहर निकल आयी और पापा को फोन किया- पापा नमस्ते, आप मुझसे शादी करने को कह रहे थे ना, मै तैयार हूँ मगर पापा शादी अब मै अपनी मर्जी से करूंगी, मै घर आकर आपको सब कुछ बताती हूँ और यकीन मानिये पापा आप भी सब जानकर कहोगे कि मै गलत नही।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

एक सिपाही का खुला खत

कल ऑफिस पहुंची तो मिसेज कौल ने बोला- इन्द्रा तुम कल जम्मू चली जाओ, एक हफ्ते की वर्कशॉप के लिये, जाना तो मुझे था लेकिन कल ही मेरे सास ससुर घर आ गये हैं और मम्मी जी का आँख का ऑपरेशन कराना है, तो मै किसी भी हालत में नही जा सकती। मेरी जगह तुम इसे अटेंड कर आओ।
बहुत मन तो नही था, मगर कई सालों से वैष्नोदेवी जाने का सोच रही थी और जा नही पा रही थी, सोचा शायद ये माँ का ही बुलावा हो, और मिसेज कौल मेरी सीनियर से ज्यादा दोस्त थी, तो उनको ना करने का तो प्रश्न भी नही था।
इलाहाबाद से जम्मू करीब एक दिन का सफर था, और मैने इतना लम्बा सफर कभी नही किया था, सो स्टेशन पर तीन चार शिवानी जी के नॉवेल खरीद लिये, सोचा सफर ठीक कट जायगा। बहुत दिनो से कुछ अच्छा पढा भी नही था।
इन्डियन रेल तत्काल में शायद ही किसी को अपने मन की सीट देता है, कम से कम मेरा तो हमेशा ऐसा ही अनुभव रहा। मम्मी के लिये कभी भी सीट करानी होती तो मै लोअर बर्थ का प्रिफरेन्स देती हूँ मगर मिलती है अपर या मिडिल बर्थ। और अपने लिये हमेशा जब अकेले सफर करना हो तो देती हूँ अपर बर्थ और मिल जाती है लोअर बर्थ। मेरे ख्याल से तो तत्काल रिसर्वेसन फार्म से सीट च्वाइश का ऑप्शन ही हटा देना चाहिये।
खैर अब जो भी हो, सफर तो करना ही है, सोचा मिसेज कौल होती तो लोअर सीट पाकर खुश हो जाती, अपने घुटनो के दर्द के कारण तो उन्होने अपना ऑफिस फस्ट फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर पर करा लिया था।
हम दोनो ही अपने अपने वेट से परेशान थी, अक्सर वो कहती भी इन्द्रा तुम मेरा पाँच दस किलो वेट ले लो तो दोनो का भला हो जाय, और फिर जोर का ठहाका लगाती। उनकी उनमुक्त हसी से मेरा वेट भले ना बढता हो मगर रक्त संचार जरूर बढ जाता था।
अपने कम्पार्टमेंट मे गयी तो देखा मेरे और एक अंकल जी के अलावा सारे ही सहयात्री सिपाही थे, सिपाहियों के बारे में मेरे मन में आदर का भाव है किन्तु कई बार कुछ ऐसा सुना था जिससे मन मे थोडा डर भी लगा। चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गयी और अभी अभी स्टेशन पर खरीदा हुआ शिवानी जी का नॉवेल अपराजिता पढने लगी।
थोडी देर में अपर बर्थ में लेटे एक सिपाही सहयात्री ने कहा- मैडम क्या और भी नॉवेल है आपके पास? मुझे आश्चर्य हुआ- सोचने लगी क्या सिपाही लोग भी किताबें पढते है, मै तो समझती थी कि ये लोग सिर्फ बन्दूकों और बारूदों की दुनिया में रहते हैं, तभी आवाज आयी- सॉरी, आपको डिस्टर्ब किया, मुझे लगा अगर आपके पास एक्स्ट्रा बुक हो तो मै भी पढ लेता, सॉरी। मैने कहा- अरे नही नही सॉरी की क्या बात, मेरे पास और भी तीन नॉवेल है मगर है सभी शिवानी जी के, आपको पसन्द हैं शिवानी जी।
उसने कहा- पसन्द क्या मैने अभी तक उनका कोई नॉवेल नही पढा, मगर हाँ अगर आप मुझे पढने को देगीं तो शायद पसन्द भी करने लगूं। मैने हल्का सा मुस्कराते हुये, बैग में रखा चौदह फेरे निकाल कर दे दिया।
पढते पढते करीब १२ बज गये, ध्यान ही नही रहा कि कम्पार्टमेंट के बाकी लोगो को लाइट से प्राबलम भी हो रही होगी, सोचा लाइट बन्द कर सोने की कोशिश की जाय, तभी देखा अपर बर्थ मे बैठा सहयात्री कुछ लिख रहा था, मुझे देख कर बोला – थैंक्स फॉर नावेल, वाकई अच्छा है, मगर मेरा कुछ लिखने का मन करने लगा, सो मैने इसका नाम नोट कर लिया, कभी जरूर खरीदुंगा। मैने नावेल वापस लेते हुये कहा- प्लीज आप जब सोइयेगा तो लाइट ऑफ कर दीजियेगा, और मैं सोने की कोशिश करने लंगी।
सुबह मेरी नींद काफी देर से खुली वो भी चाय वाले की आवाज सुन कर। अभी तक मिडिल बर्थ वाले अंकल जी सो रहे थे, वरना शायद सीट खोलने के कारण वो मुझे जगा देते। और अब उठते ही लगने लगा, अंकल जी भी अब उठ जाए तो अच्छा हो, ठीक से बैठ कर चाय पी जाय, सोचते हुये मै वॉशरूम की तरफ बढ गयी।
वापस आयी तो देखा मिडिल बर्थ खुल चुकी थी। मै फैला हुआ कम्बल समेटने लगी तभी एक पेपर पर मेरी नजर पढी, हाथ से कुछ लिखा हुआ था, हमेशा से पढने की शौकीन रही हूँ सोचा कि शायद कोई कहानी लिखी हो, तो पढने लगी, मगर ये क्या – ये तो उस अपर बर्थ वाले का लिखा हुआ लग रहा था, शायद कल रात ये यही लिख रहा था, उसको वापस देने के इरादे से ऊपर नजर दौडाई तो बर्थ खाली थी, शायद रात में ही या सुबह उसका स्टेशन आ चुका था।
उसमे लिखे को पूरा पढने के लालच से खुद को बचा न सकी, और पढने लगी, उसमे लिखा था-
मेरी
ऐसा बहुत कुछ है जो मै कहना चाह रहा था मगर कह नही सका, ऐसा बहुत कुछ है जो मै कहना नही लिखना ही चाहता हूँ, कुछ शब्द कहने से अपना पूरा आकार लेते हैं कुछ पढने से। मेरी, मुझे तुम्हारा ये नाम तुम्हारे और हमारे सम्बन्ध की पूर्ण परिभाषा लगता है और तुम्हारा मुझे मेरे कहना मेरे जीवन को जीवन्त कर देता है।
मै घर से दूर आ कर भारत माँ की सेवा पूरे तन मन से कर पा रहा हूँ क्योकि तुमने अपना तन मन मेरे माता पिता की सेवा में लगा दिया है। मै आज तुम्हे अपने मन की बात कहता हूँ वैसे शायद कहने की जरूरत नही क्योकि तुम मुझे मुझसे भी ज्यादा जानती हो, फिर भी कहता हूँ जो तुम माँ पिता जी के लिये कर रही हो, जिस तरह से तुमने सारे रिश्तों को एक धागे मे पिरो रखा है, मै कभी नही कर सकता। मुझे ये आता ही नही। मै सीधा सीधा लड सकता हूँ गोली मार भी सकता हूँ और खा भी सकता हूँ, मगर तुम जो करती हूँ वो आसान नही। मेरे जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने में तुमने सहर्ष अपने जीवन की आहुति दी है।
अक्सर कभी बर्फ पर खडे हुये या तपती रेत पर लेटे हुये जब तुम्हारी याद यादी है यकीन मानों मौसम बदल जाता है, बर्फीली हवाओं में तुम आग बनकर और तपती रेतीली हवाओं में तुम शीतलता बन कर आ जाती हो। तुमसे यह कहना पूर्ण नही कि मै तुमको बहुत प्यार करता हूँ, तुम प्रेम की सीमाओं से परे होकर मुझे प्रेम करती हो।
जानती हो, जब तुम मेरे पैर छूती हो, उस समय मै बस यही सोचने लगता हूँ कि काश मुझमे दुनिया के रीति रिवाजों को तोड सकने की हिम्मत होती और मै अपनी देवी के पैर छू पाता। तुम कहती हो कि तुमने मुझे ईश्वर को प्रसन्न करके पाया है, मै सोचता हूँ कि मै तो कभी मन्दिर तक नही गया, फिर कैसे ईश्वर ने मेरे हाथ में संसार की सर्वश्रेष्ठ स्त्री का हाथ दे दिया। मै यकीन से कह सकता हूँ तुम्हारी की हुयी पूजा का फल तुम्हे नही मुझे मिला है।
तुमसे मुझे कभी कुछ मांगने की आवश्यकता ही नही हुयी, तुमने स्त्री के हर रूप को ओढ कर मेरा साथ दिया है। आज युद्ध के लिये जाने को अगर मै तन मन से तैयार हो सका तो यह तुम्हारे ही कारण तो है, वरना सच कहता हूँ मैने फौज की नौकरी बस ये सोच कर कर ली थी, कि यहाँ ठीक ठाक तनख्वाह मिल जायगी, और खूब सारी सुविधायें होंगी। मगर तुमने ही मुझे मेरी जिम्मेदारियों का अहसास दिलाया। आज गर्व से सिर उठा कर सिर कटाने को तैयार हूँ। मुझे नही पता कि इस युद्ध का क्या परिणाम होगा, मै सशरीर घर आऊंगा या सिर्फ शरीर आयगा, मगर इतना पता है कि मेरी आत्मा हमेशा तुम्हारे ही साथ रहेगी।
तुम इस जनम में मेरी हो और हर जनम में मेरी ही रहोगी, ये मेरा विश्वास है।
तुम्हारा
मेरे
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