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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

तने की मजबूती


बेटी हूँ मैं,

है मुझे अहसास
पिता के मान का
घर की आबरू हूँ मैं

जानती हूँ फर्क
बेटे और बेटी में
समझती हूँ चिन्ता
एक पिता की मै
और परिचित भी हूँ
समाज के चरित्र से
नही दोष नही देती
किसी को
न परिवार को न प्रथाओं को
मगर करती हूँ अब इन्कार
उन बन्धनों से
जो नही समझते
मेरी कोमल भावनायें

जो बना देते है
स्त्री को अबला का पर्याय
और कर देते है अनिवार्य
एक पुरुष का साथ
बना देते है
अबला को बेल
पुरुषरूपी तना
सगर्व लेता है भार 
बेल को पल्लवित रखने का

आजीवन वो अबला 
रहती है निर्भर
उस मजबूत तने पर
कभी करती है ब्रत, कभी पूजा
उस तने की सलामती के लिये
कि जानती है
सम्भव नही उसका जीवन
मजबूत तने के बिना
वो तो परजीवी है

कितनी आसानी से
बना दी जाती है
जीवनदायिनी ही परजीवी
तजती हूँ आज अभी से
उस मजबूत तने को
बहुत विनम्रता के साथ
कि चाहती हूँ बनाना
इक छोटी सी पहचान
समझना चाहती हूँ
निर्भरता का प्राकॄतिक सूत्र
जहाँ निर्भर हैं
वायु, जल, अग्नि
स्वतंत्र नही व्योम धरा भी
वहाँ चाहती हूँ परखना
तने की मजबूती

बुधवार, 13 सितंबर 2017

हमसाया भाग -३




हमसाया भाग १
हमसाया भाग २

गतांक से आगे
सारी रात तरह तरह के खयालों सपनों में खोते मेरी रात बीती। कब मुझे नींद आयी ये मुझे भी नही पता, मगर नींद थी इतनी गहरी कि मै ये भी भूल गया कि मै घर पर नही ट्रेन में हूँ, ट्रेन पुने स्टेशन आ चुकी थी और राधिका मुझे आवाज दे रही थी।
हडबडा कर मैं उठा और फटाफट सामान उतारने लगा तो धीरे से राधिका बोली- आप परेशान न हो, ये आखिरी स्टेशन है, नींद से अचानक से उठने के कारण शायद मै अपने सपनों से वास्तविक दुनिया में पूरी से वापस नही आ पाया था।
सामान उठाने के दौरान अहसास हुआ कि माँ बाबू जी ने कितना सारा सामान बाँध दिया था, कुली को आवाज देने ही वाला था कि विजय मामा अपने लडके यश के साथ आते दिखे।
विजय मामा हमारी छोटी चाची के सबसे छोटे भाई है। पिछले दस बारह साल से पूने आकर रहने लगे हैं, उनके तीन लडके और दो लडकियाँ है, यश उनका मंझला बेटा है । मुझसे दो चार साल की ही छोटाई या बडाई होगी। हाँ अगर माँ से पूछता तो वो तो उसका जनम साल क्या दिन तिथि तक सब बता देती। जाने कैसे माँ को सभी के जनम शादी मरण सबकी दिन तिथि याद रहती है। फला सन ७२ में चढते पूस की चतुर्दशी को हुआ था, या फला की शादी सन ७० में उतरते जेठ की एकादशी को थी। मुझे तो अपने तीनो भाइयों की बर्थ डेट  और माँ बाबू जी की शादी की सालगिरह के  अलावा आज तक कोई तारीख याद नही रह पायी । मगर हाँ अब दो और तारीखे याद रखनी होंगी- राधिका का जनमदिन और अपनी शादी की तारीख, सुना है अगर ये दोनो तारीखे अगर कोई शादीशुदा आदमी भूल जाय तो अक्सर ये लडाई झगडे का मुद्दा तक बन जाता है। सो लडाई से बेहतर है कि मै दो और तारीखे ही याद कर लूं।
अब तक मामा जी पास आ चुके थे आते ही बोले- अरे आनन्द बेटा, ज्यादा देर तो नही हुयी, दरअसल सुबह ही जीजा जी का फोन आया था कि तुम आ रहे हो, निकल तो मै तुरन्त ही पडा था मगर रास्ते में पेट्रोल भराने में जरा देर लग गयी।

मै झुक कर मामा जी के पैर छूने लगा तो उन्होने हाथ रोक लिया- बोले अरे अरे ये क्या तुम तो मेरे मान्य हो, भला मान्यों से भी कही पैर छुआये जाते हैं। इसी बीच राधिका झुक कर मामा जी के पैर छुते हुये बोली- मामा जी आशीर्वाद दीजिये कि हम लोग सुखी रहे।राधिका की बात में इतना अपनापन था कि जैसे मेरे नही वो उसके ही सगे मामा हो। शायद राधिका के इसी स्नेहभाव के कारण मामा जी उसको नही रोक सके और उसके सिर पर हाथ रखते हुये बोले- बेटा तुम दोनो खूब सुखी रहो। फिर मेरी तरफ देख कर बोले- आनन्द बहुत भाग्यवान हो जो तुम्हे ऐसी गुणवती दुल्हन मिली है, फिर यश की तरफ देखते हुये बोले-  यश बेटा भैया भाभी के पैर छुओ। उनकी इस बात ने यह तय कर दिया कि यश उमर में कुछ तो छोटा जरूर है । खैर इस सदाचार के बीच ही यश ने हमे याद दिलाया कि हम लोग प्लेटफार्म पर है और हमे घर भी चलना चाहिये। यश की इस बात पर मामा जी खूब जोर से हंस पडे और बोले हाँ हाँ चलो सामान उठाओ, आओ बहू चलो घर चले, फिर यश के साथ गाडी में सामान रखवा हम चारो मामा जी के साथ घर की तरफ चल दिये। 
क्रमशः

सोमवार, 11 सितंबर 2017

स्पर्श और स्त्री



स्पर्श
जिसमें निहित है  
निर्मांण की कल्पना
या विनाश का षणयंत्र
बराबर मात्रा में
स्पर्श
एक ऐसा इन्टरफेस
जिसमें इनपुट तो एक ही होता है
मगर बदलते रहते हैं आउट्पुट
कभी बन जाता है भक्ति
तो कभी द्या 
कभी भर जाता है मन
स्नेह के भाव से
कभी जग जाती है 
सुषुप्त प्रेम की तॄष्णा
और कभी
छटपटा जाता है मन
जल विहीन मीन सा
स्पर्श
एक ऐसी शक्ति
जिसमें जीवन भी है
और मॄत्यु जितना भय भी
जो रच सकता है प्रेम का महाकाव्य
या बन सकता है विषैला सर्प
स्पर्श
जो कभी तैरा जाता हैं
अनगिनत सपने
कभी कर देता है
 हौसलों का संचार
थके मन में
कभी बन जाता है
आशीष
और कभी देता है आहट 
किसी अवांछनीय विनाश की
स्पर्श
कभी बन जाता है
विश्वास 
जीवन पर्यन्त साथ निभाने का
कभी दे जाता है 
अहसास
जो कहता है "मै हूँ ना"
तुम बस आगे बढो
स्पर्श
एक ऐसा अक्षररहित शब्द
जो कह देता है
हर वो बात जिसे
कोटि शब्द समूहों के युग्म भी नही कह पाते
स्पर्श 
एक ऐसी पहेली
जिसे सुलझा लेती है
स्त्री
क्षण के न्यूनतम भाग जितने समय में
जान लेती है
स्पर्श करने वाले का
इतिहास
और तय कर देती है
उसका चैरित्रिक भूगोल
निश्चित कर लेती है
दूरी या निकटता
और रच देती है अध्याय
सम्बन्धों की सम्भावना या असम्भावना का

शनिवार, 9 सितंबर 2017

चंद अशरार जिन्दगी के नाम


मोहताज हों क्यूं भला किसी की पसंदगी के
जीने के लिये मुझे मेरा मुरीद होना चाहिये

संवरना निखरना नहीं मेरा किसी के लिये
आइने में मुझे सूरत मेरी बोलती चाहिये

जीना औरो के दम मुंकिन नही मेरे लिये
हौसला गिरके उठने का खुदमें मुझे चाहिये

खुशियों के किले बनाये क्यों किसी कांधे पे
मुस्कुराने के लिये बेफिर्की दिल की चाहिये

नही बढाना मुझे कद मेरा चंद ओहदों से
मेरी नजरों में मुझे मेरी अहमियत चाहिये

लोग आते है जाते है ये दस्तूर दुनिया का
शौक सफर का रखते हैं मकां नही चाहिये

बयां हो न सकेगा हाल दिल का लफ्जों से
इश्क के दरिया को सिर्फ शोख लहर चाहिये

न कर सकेंगें एहतराम मोहब्बत का जुगनू
ये वो शय है जिसे पतंगे सा जिगर चाहिये

खुशबू गुलाब की रूह तक भी बस सकती है 

सलीका कांटों को सहेजने का सिर्फ चाहिये

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

हमसाया भाग -२


गतांक १ से आगे..........

सच कहूं तो अभी तक ठीक से राधिका को देखा भी नही था, इस बात का पता तब चला जब ट्रेन गाँव से बीस तीस किलोमीटर दूर निकल आने पर मैने कहा- चाहो तो ये घूंघट कम या हटा सकती हो, गाँव से हम लोग बहुत दूर निकल आये हैं, दरअसल मुझे राधिका का ख्याल आने लगा हो ऐसा नही था, बल्कि मुझे इस बात पर शर्म सी आ रही थी कि पूरे डिब्बे में केवल राधिका ही थी जो लम्बे से घूंघट में थी, बाकी औरते सामान्य रूप से या तो सिर पर थोडा पल्लू रखे थी य वो भी नही के बराबर था। मगर हाँ जब राधिका का चेहरा दिखा तो मै उसके चहरे से अपनी नजर फेरना भूल सा गया, वो तो चाय वाले की आवाज पर बगल में बैठे अंकल टाइप व्वक्ति नें कहा- बेटा जरा चाय तो पकडा दो, ऐसा लगा जैसे मै किसी दूसरी ही दुनिया में चला गया था, मगर राधिका इस पूरे प्रकरण से बेखबर अपनी चूडियों में उलझी हुयी थी।
राधिका सच में रूप में हजारो नही लाखों में एक थी, ये मेरा ही मानना नही था, डिब्बे में बैठे लोगो की निगाहें कह रही थीं। सहसा मुझे लगा जैसे उसने घूंघट हटा कर ठीक नही किया। भली भाँति जानता था कि मैने ही उसे ऐसा करने को कहा था फिर भी अनावश्यक रूप से मुझे राधिका पर गुस्सा आने लगा। मै सोचने लगा कि मैने घूंघट उससे घूंघट कम करने या हटाने को कहा था, वो कम भी तो कर सकती थी, मगर उसने तो पूरी तरह से हटा ही दिया। क्या उसको समझ नही आ रहा कि गिद्ध जैसी नजरें उसे देख रहीं हैं। क्या इतनी नासमझ है, पिता जी ने बहुत तारीफ की थी इसकी समझदारी की।
मुझे खुद समझ नही आ रहा था कि मेरे मन में ये क्रोध क्यो आ रहा था, जिस लडकी से मेरा विवाह मेरी मर्जी के खिलाफ हुआ क्यो मुझे उससे ये अपेक्षा हो रही है वो मेरी भावनाओं का ख्याल रखे।
तभी जाने क्या हुआ- राधिका नें फिर से घूंघट कर लिया, हाँ पहले की अपेक्षा चेहरा पूरा ढका नही था, अब तक कई लोकल स्टेशन गुजर चुके थे, सो लोकल भीड का चढना उतरना भी कम हो गया था।
मेरे मन नें फिर से नयी करवट लेना शुरु किया- राधिका को देखने को मन व्याकुल होने लगा। और एक बार फिर उस पर गुस्सा आने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे बदला ले रही हो, कि इतने दिन घर पर रह कर जिससे बात करना तो दूर एक नजर उठा कर देखा भी नही, तो अब उसे मै भी देखने का कोई अधिकार नही दूंगी। बडा अजीब सा सफर था, हमसफर थे, मगर अनजाने से सहयात्री से भी ज्यादा।
उसी घूंघट की ओट में रहते हुये राधिका नें रात का खाना खाया, और सो गयी और तरह तरह के ख्यालों और सपनों में गोते खाते मेरी रात बीती। 

क्रमशः .............

बुधवार, 6 सितंबर 2017

हमसाया


अम्मा, बाबू जी से कह दो न, मै शादी नही करना चाहता, मुझे अभी बहुत कुछ करना है, आपके लिये बहू लाने को दीपक और अनुराग हैं न, एक मेरे शादी न करने से क्या फरक पड जायेगा।
मुझे नही पता था कि कब बाबू जी दफ्तर से लौट कर आ गये थे और मेरी बात सुन रहे थे, ऐनक उतार कर बोले- देखो बरखुरदार, ये शादी ना करने का भूत मुझे भी बहुत चढा था, पर जब तुम्हारी अम्मा आयी तब समझ आया कि क्या गलती करने वाले थे। और जो करना वरना है उसके लिये हम कहाँ रोकते हैं, करते रहना जो करना है, अभी हम हैं किसी बात की फिरक ना करो। बेटा, राधिका बहुत अच्छी लडकी है, धन्य हो जायगा तू, अरे ऐसी लडकियां तो नसीब से मिलती हैं। राधिका, बाबू जी के दफ्तर में काम करने वाले शुक्ला चाचा की बेटी थी, जाने क्या जादू कर दिया था शुक्ला चाचा ने कि बस बाबू जी ने धुन रट रखी थी कि राधिका उनकी ही बहू और मेरी ही पत्नी बनेगी।
मरता क्या न करता, अम्मा बाबू जी की जिद के आगे मेरी एक न चली और महाशिवरात्रि के दिन मेरे विवाह का शुभमहूर्त निकाल दिया गया।
शादी के आठ दस रोज बाद ही मैने पूने जाने का निर्णय किया, वैसे पूने जाने का कोई विशेष कारण नही था, किन्तु मै बस घर से दूर एकान्त में जाना चाहता था, जहाँ मैं संगीत को अपना पूरा ध्यान और समय दे सकूं। अम्मा जानती थी कि मुझे संगीत से बेहद लगाव है किन्तु बाबू जी वो तो इसको बिल्कुल बेकार की चीज समझते थे, और खास कर लडको के लिये। उनका मानना था कि गाना बजाना केवल लडकियों औरतों को शोभा देता है। आदमियों को तो कोई मेहनत मसक्कत या दिमाग वाले काम करने चाहिये।
पूने जाकर खाने भर का तो मै दो चार ट्यूशन करके ही कमा लूंगा, और घर से दूर रहूंगा तो रोज रोज कोई घर से आकर मेरे संगीत में बाधा नही दे सकेगा, ऐसा मेरा विचार था।
अम्मा से झूठ बोल दिया था कि पूने से नौकरी का बुलावा आया है। इतनी दूर भेजने को बाबू जी बिल्कुल राजी नही थे, मगर इस बार मैने जिद करने की ठान ली थी और फिर विवाह करके उनकी बहुप्रतीक्षित इच्छा मै पूर्ण कर ही चुका था, सो भारी मन के साथ उन्होने अनुमति दी मगर साथ में कह दिया कि बहू तुम्हारे साथ ही जायेगी। परदेश में जाने खाने पीने का कैसा इन्तजाम हो, खर्चे की तुम चिन्ता ना करो, अभी हम हैं।
मेरा हाल वैसा ही था कि आसमान से गिरे खजूर में अटके। एक बार फिर मेरे पास उनकी बात को न मानने के सिवा कोई रास्ता नही था सो राधिका के साथ पूने चल दिया।

क्रमशः 

शनिवार, 2 सितंबर 2017

तराना इश्क का............................



ऐ मोहब्बत किन लफ्जों में, मै करू तुझको बयां
दिल लगाके देखले खुद, हाल हो जाता है क्या

दिन के जैसे जागता हूँ, अब तो मै रातभर
खूबसूरत हो गया हैं जिन्दगी का ये सफर
सोचकर ही दिल में छा जाता खुशियों का समां
दिल लगाके देखले खुद, हाल हो जाता है क्या

हुस्न की मूरत नही पर सारी दुनिया से जुदा
देखते ही दिल दीवाना हो गया उस पर फिदा
कलियों सी मासूम हमदम बस लुटाती है वफा
दिल लगाके देखले खुद, हाल हो जाता है क्या

जिक्र उसका हर घडी हर बात में मैं करता हूँ
जाने उसकी धडकनों में किस तरह मैं रहता हूँ
प्यार की खुशबू से महकी मेरी शामें मेरी सबा
दिल लगाके देखले खुद, हाल हो जाता है क्या

ऐ मोहब्बत किन लफ्जों में, मै करू तुझको बयां
दिल लगाके देखले खुद, हाल हो जाता है क्या 


गुरुवार, 31 अगस्त 2017

मन की बात


जानती हूँ 
मै साधन सम्पन्न नही
न आपसी आवाज मेरी बात में
किन्तु सोचती शायद पहुंचे
आप तक मेरी बात ये
सम्भव नही और न जरूरत
कहूँ सभी से मन की बात
पर जरूरी है कह ही दूँ
उठती हदय में जो बात

हूँ बहुत छोटी
उम्र में भी अनुभवों में भी
किन्तु सौ करोड में
हूँ इक इकाई मै भी

देश को संचार तकनीक
से भी कुछ ज्यादा जरूरी
खेत को समेटेने से
उन्नति रहेगी अधूरी

हो सके तो गाँव से
गाँव न मिटने दीजिये
किसान को शहरो में
मजदूर न बनने दीजिये

हर शहर में रोटी रहे
ऐसा अपना विज्ञान हो
घर का बच्चा घर में रहे
ऐसा कुछ प्राव्धान हो

आज हर किसी घर का
एक ही बस राग है
वॄद्ध दम्पति घर में अकेला
सन्तानों का मल्टीनेशनल काम है

चार कमरो के घर
इधर वीरान हो रहे
उधर शहर बसाने को
खेत बंजर हो रहे

जाती ट्रेन टेलीफोन पर
महीने की आधी कमाई
अपने घर के सपने ने
नींद युवाओं की उठाई

नही चाहती देश मेरा
हो अमेरिका या जापान सा
हो सके तो हिन्द करो दो
सोने की चिडिया के जैसा

हर गली हर मोड पर
लोग मेरे खुशहाल हो
अपने घर से पलायन को
न मजबूर हिन्दुस्तान हो

न मजबूर हिन्दुस्तान हो

सोमवार, 28 अगस्त 2017

पाती प्रेम की


ओ प्यारे कबूतर
सुना है मैने
लोग तुम्हे कहते थे
प्रेम का दूत
जाने कितने
दिलों को तुमने मिलाया
जाने कितने
बुझे चिरागों को जलाया
आज मेरा भी
एक काम कर दे
मेरे प्रियतम को
इक संदेश दे दे
जल रहा है
मन मेरा वेदना में
जा उन्हे 
सांसें मेरी शेष दे दे
हे! नारि विज्ञान युग में
साधनो की क्या कमी
फिर लिये बैठी क्यू
नैनों में अपनी नमी
उस पर बुलाती हो
देने को प्रेम पाती
कही तुम मेरे हुनर
को तो नही हो आजमाती
न न ओ मेरे पंक्षी प्यारे
ओ मेरे दुख के साथी
तेरे सिवा सौपूं किसे
आखिर मै ये प्रेम पाती
जानती उनके सिवा न देगा
खत किसी को है यकी
जवाब की पाती लिये बिन
लौटना तेरा मुंकिन नही
तू ही बता कैसे करूं
यकी आधुनिक साधनो पर
कैसे करूं जतन वो डाले
ई-मेल पर अपनी नजर
फोन भी वो बन्द करके
गुम कहाँ जाने हुये
कल तलक जो पास
इक पल में वो अनजाने हुये
ढूंढू कैसे मै अकेली
इतने बडे जहान में
आखिर कुछ सीमायें भी तो
है मेरे विज्ञान में
तू पहुँच सकता है बस
मेरे प्रियतम के द्वार पर
ओ मेरे प्यारे पंक्षी
मुझ पर ये उपकार कर

रविवार, 27 अगस्त 2017

तडपते जज्बात


जब भी ख्याल हुआ, अब जीने में कुछ नही
जिन्दगी ने कहा, सफर ऐसे तो खतम नही
माना मिल जाते है साँप, आस्तीन के बाजारों में
न करूं यकी हमनिवालों का, ये भी तो हल नही

सुना था कानून अन्धा होता है,
सुना था धर्म आँख खोल देता है
शुक्र है जमाने में अभी सब नही बिगडा
जब धर्म हो अन्धा, कानून सच तोल देता

वो लहू बहाते है, मजहब ने नाम पर
वो घर जलाते हैं, मजहब के नाम पर
कौन कहता है, आतंकी एक कौम के लोगो को
ये सडकों पर हिंसा का नाच, क्या आतंकवाद नही

आवाज सच की धीमी ही सही
हमारी बात आज तेरी न सही
क्या रह सकेगा उस आग से बेखौफ कल भी
जब जलेगा शहर मेरी जुबां दबाने से

भूल जाओ, कि भूलने कि आदत है तुमको
क्या हुआ, कल शहर में तुम्हे क्या करना है
अच्छा किया, जो निकले नही कल घर से 
तेरे अपने बच गये, मरो का तुम्हे क्या करना है

उफ कहाँ गयी है हया, मुँह छिपाने अपना
कैसे दरिन्दों को मानते हो भगवान अपना
रोक लो खुद को, सोचो जरा रुक कर तुम
क्या जरूरी है, सीखो सब जला कर अपना

जाने क्या चाहते हैं वो, देना अपनी नस्लों को
जाने क्या डालते हैं खेतों में, अपनी फसलों को
नफरत के बीज दे रही है सियासत, बिना सब्जिडी
आग पेट की बुझाने को क्यों, किसी का घर जलाते हो

हरियाली भी बिकने लगी, इन्टरनेट की दुकान पर
इन्सानों से ज्यादा, मशीने रहने लगी मकान पर
खुशबुयें समेट रही हैं, अपने जज्बात आज कल
गुलाब खिलते नही, अब बनते है किसी बजार पर

शनिवार, 26 अगस्त 2017

ये कैसा सिलसिला है.......................



क्यो नही रुकता ये सिलसिला
सिलसिला जिसमें चले जाते है सब
धरम की आड में बिना समझे
एक अन्धेरी खोखली गली

सिलसिला जिसमें दिखता है बस
पागल पागलपन और जुनून
बहाने को खून की नदी

सिलसिला जिसमें मिटता है सच
धन बल सत्ता की तलवार पर
सिसकती रह जाती है जिन्दगी

सिलसिला जो कर रहा है संतुष्ट
भूखे वहसी भेडियों की हवस
लूट कर अस्मिता, लाचारी, तिजोरी

सिलसिला जो संकेत है विनाश का
तोड देगी किसी दिन अपना दम
जलती धरती बिलखती मनुजता

सिलसिला कोई तो रोक लो
मनुष्य के दानव बनने का
या बना ही दो, धरा को दानवग्रह

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

जाने कितने


जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें
सोच की तंग गलियों में जाने कितने रूठेंगें

कुछ लोग गले से लगायेगे
फिर खंजर दिल पे चलायेगे
बन करके सबब बर्बादी का
जख्मों पर मरहम लगायेगे
जाल बिछा् अपनेपन का, सब हौले हौले लूटेंगे
जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें

बुलंदी पर जश्न मनायेंगें
और जाम में जहर पिलायेंगें
स्वांग रचाके लव सव का
दामन में दाग लगायेंगें
गर सपने सरेआम किये, अरमान यहाँ फिर टूटेंगें
जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें

सहमे हैं कभी, कभी सिमट गये
घिनौनी नजरों से घर में भी घिरे
कभी सब खो गहरे पानी में डूबे
कभी बचने को आग में कूद गये
ऐ बदनीयत जा बदल, हम ज्वाला बन फूटेंगें
जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

उम्र- The Notion of Life


उम्र तो बस उम्र होती है
जितनी भी हो पूरी होती है

चाहे कह लो इसे अच्छी बुरी
चाहे समझो इसे छोटी बडी
इसमें जिन्दगी की उमीद होती है
उम्र तो बस उम्र होती है.......................


कोई काटता है कोई गुजारता है
कोई जीता है कोई संवारता है
सप्तसुरों से सजी सरगम होती है
उम्र तो बस उम्र होती है...........................

कौन माप सका अवधि इसकी
कौन रोक सका गति इसकी
चक्र पूर्ण कर ही नींद में खोती है
उम्र तो बस उम्र होती है........................

कोई जीता है इसे ख्वाबों में
कोई खोता है इसे यादों में
हर किसी की ये पहली प्रीत होती है
उम्र तो बस उम्र होती है.............................

न आधी, न अधूरी होती है
जितनी भी हो पूरी होती है 
उम्र तो बस उम्र होती है.........................

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

प्रतिक्रिया

उस समय लोग बुद्ध को भगवान समझने लगे थे, लोग उनकी बातों को सुनते और उनके कहे अनुसार आचरण करते थे। एक गाँव में एक लकडहारा बुद्ध से ईर्ष्या रखता था, सभी से उनकी बुराई करता, और कहता सब उनकी पूजा करते हैं इसलिये वो शान्त रहते हैं मै जब चाँहू उनसे लडाई कर सकता हूँ उनको क्रोध दिला सकता हूँ।
एक दिन वह खुद को सत्य सिद्ध करने के उद्देश्य से वहाँ गया जहाँ बुद्ध रहते थे। वहाँ उसने देखा कि भगवान बुद्ध तपस्या में लीन हैं। कुछ देर तक तो वह उनकी आंखे खुलने का इन्तजार करता रहा, फिर जब उससे रहा नही गया तो वह बुद्ध के निकट गया और उनके चेहरे पर थूक दिया और फिर कुछ दूर खडा हो गया। वह सोच रहा था कि जरूर मेरे ऐसा करने से वह आंख खोलेंगे और गुस्सा करेगें तब मै उनसे लडाई करूंगा और सारे गाँव वालो को शोर से बुला कर दिखाऊंगा कि बुद्ध को भी क्रोध आता है।
कुछ देर इन्तजार करने के बाद जब बुद्ध ने आंख खोली और अपने अंगवस्त्र से थूक साफ करते हुये बोले- तुम्हे और कुछ कहना है। लकडहारा बडे आश्चर्य में पड गया क्योकि वह ऐसे व्यवहार की कल्पना भी नही कर सकता था। फिर भी लडाई करने के उद्देश्य से गुस्सा करते हुये बोला- मैने आप पर थूका है, आपको गुस्सा नही आ रहा। और आप कह रहे हो और कुछ कहना है।
बुद्ध बोले- हाँ, मैं पूँछ रहा हूँ, तुम कुछ और भी कहना चाहते हो क्या?
लकडहारा कुछ समझ नही पाया कि अब उसको क्या कहन चाहिये, बिना कुछ और कहे वहाँ से चला गया। गाँव आ कर उसने जब लोगो को यह बताया कि आज उसने बुद्ध पर थूका है तो लोगो ने उसे समझाया कि यह उसने बहुत गलत किया है, वो बहुत महान हैं, अब भगवान उसे इसकी सजा देंगें, और भी कई प्रकार से लोगो ने उसको डराया। लोगों की बातें सुनकर वह बहुत डर गया और सारी बारात वह यही सोचता रहा कि सच में उससे कुछ गलत हो गया है, मुझे जाकर माफी मांग लेनी चाहिये, वरना भगवान उसे सजा देंगें।
अगली सुबह वह बहुत जल्दी उठा और बुद्ध के पास गया। बुद्ध तपस्या में लीन थे। वह खडे होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगा। जब बहुत देर हो गयी और बुद्ध ने आँख नही खोली तो वह बुद्ध के पैरों में जा कर गिर गया, उसे अपनी गलती का अहसास था, उसकी आंखों से आँसू निकल पडे। आसुओं के आभास से बुद्ध ने नेत्र खोल दिये और बोले- तुम्हे और कुछ कहना है।
लकडहारा फिर कुछ नही समझ पाया, बोला - आपने कल भी यही कहा था, आज भी यही कह रहे हैं, मैने तो कल भी कुछ नही कहा था, आप पर थूक कर चला गया था, आज भी कुछ नही कहा, बस आपके चरणों में आकर गिर गया। मगर आपने मुझसे कुछ कहा ही नही।
बुद्ध बोले- कल तुम्हे जो भाषा आती थी तुमने उस भाषा में मुझसे बात की थी, और आज भी ऐसा ही किया। तुम मुझसे कुछ्ह कहना चाहते थे, मगर मुझे तो तुमसे कुछ भी नही कहना था।
मै तुम्हारे अनुसार अपना आचरण तय नही कर सकता कि जब तुम चाहो मेरे हदय में तुम्हारे लिये घॄणा हो, जब तुम चाहो मै तुम पर करुणा करूं।
अपने आचरण का निश्चय मैं स्वयं करूंगा, कोई अन्य नही।

सच, हम अक्सर अपने जीवन में प्रतिक्रिया करते हैं, जो जैसा हमसे चाहता है वैसा हम करते हैं। उसमें हमारा निर्णय नही होता। हमारा अपना निर्णय जब होता है तब प्रतिउत्तर होना चाहिये न कि प्रतिक्रिया।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

खाली हो


अल्बर्ट स्मिथ, अमेरिका की एक जानी मानी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर थे। एक बार अपनी क्लास में वह सत्य, ज्ञान और धर्म पर अपना व्याख्यान दे रहे थे। अचानक उन्हे रोकते हुये उनके एक विघार्थी ने कहा- सर आप जो भी कह रहे हैं उसमें भाव नही आ रहा, ऐसा लग रहा है जैसे आप सिर्फ किताबी ज्ञान दे रहे हैं। आपने कभी इसे अनुभव नही किया। कभी आप जापान के सन्त चितोस को सुनियेगा, उनकी बातों में भाव होता है, उनकी हर बात सच लगती है।
अल्बर्ट बहुत ही समझदार और धैर्य वाले व्यक्ति थे, उन्होने विधार्थी की बातों पर विचार किया, और कालेज की छुट्टियों में जापान जाकर चितोस से मिलने का निश्चय किया।
चितोस एक ऊंची पहाडी पर एकान्त में रहते थे। लोगों से उनका पता पूछते पूछते एवं दुर्गम रास्तों से होते अल्बर्ट अन्ततः चितोस की कुटिया तक आ पहुंचे। उन्होने चितोस को आवाज लगाई। दरवाजे पर एक दुर्बल व्यक्ति आया जिसका रंग कुछ काला और चेहरा चेचक के दागों से भरा था, कुल मिलाकर कहा जाय तो वह व्यक्ति पूर्णतः आकर्षणहीन था। अल्बर्ट ने कहा- मुझे चितोस से मिलना है, दरवाजे पर आये व्यक्ति ने विनम्रता से कहा- मेरा नाम ही चितोस है, कहिये मै आपके लिये क्या कर सकता हूँ। यह सुनकर अल्बर्ट को आने का पूरा उश्देश्य ही विफल लगने लगा, वह सोचने लगा क्यो यहाँ आकर समय खराब किया, भला यह बदसूरत सा दिखने वाला, कमजोर सा व्यक्ति मुझे क्या बतायेगा। फिर भी यह सोचकर की कि आ गया हूँ तो पूंछ ही लेता हूँ, अल्बर्ट ने कहा- मै अमेरिका की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र का प्रोफेसर हूँ, मेरे एक विघार्थी ने कहा कि आप जानते है कि सत्य ईश्वर और धर्म क्या है। मुझे जल्दी से बता दो और मै जाऊँ, अभी बहुत दूर वापस जाना है।
चितोस ने कहा- बताता हूँ, पहले आप अन्दर तो आइये, आप बहुत थके हुये से लग रहे है, आइये एक कप चाय पीजिये।
अल्बर्ट ने कहा- नही मै ठीक हूँ, आप बस बता दीजिये, मुझे वापस भी जाना है। मगर पुनः चितोस के आग्रह पर अल्बर्ट अन्दर चले गये, वो अनुभव करने लगे कि वाकई वो थके हैं और एक कप चाय की उन्हे बेहद जरूरत थी।
तभी चितोस चाय की केतली और कप लेकर आ गये। उन्होने अल्बर्ट को कप प्लेट पकडाई और कप में चाय डालने लगे। जब अल्बर्ट ने देखा कि चाय, कप में पूरी तरह भर चुकी है और प्लेट से बस निकलने ही वाली है तो कुछ नाराजगी से बोले- ये क्या, आप देख नही रहे कि कप भर गया है इसमें और चाय नही आ सकती।
चितोस ने कहा- आपने सही कहा,  क्या आपने यहाँ आने से पूर्व ध्यान दिया कि आप खाली नही हैं।

अल्बर्ट भी एक समझदार व्यक्ति थे, वे चितोस की बात का अर्थ समझ गये कि जब हम किसी के पास कुछ सीखने जाय तो मन मे ग्रहण करने का भाव भी होना चाहिये। अल्बर्ट उठ खडे हुये और माफी माँगते हुये बोले- मै जाता हूँ और जब खाली हो जाऊंगा तब आपके पास अपने उत्तर के लिये वापस आऊंगा। चितोस ने उन्हे प्रेमपूर्वक रोका और कहा- मित्र मेरा विश्वास कीजिये आप जब खाली हो जायेंगे, तब आपको मेरे पास आने की आवश्यकता भी नही रहेगी।

सोमवार, 31 जुलाई 2017

पागल कौन ??


एक बहुत बडे वैज्ञानिक थे। एक बार उन्होने पागलो पर शोध करने का निश्चय किया। वो नियम से तीन चार घंटे एक पागलखाने जाते और चुपचाप पागलों के व्यवहार को गौर से देखा करते।
वहाँ उन्होने गौर किया कि दो पागल, जो कभी गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर हुआ करते थे, घंटो आपस में बात किया करते थे। उनकी बातचीत में खास बात यह होती कि जब एक बोलता दूसरा चुप रहता और बडे ध्यान से दूसरे को सुनता और जब पहला चुप होता तो दूसरा बोलता और पहला चुप रह कर उसकी बात सुनता।

वैज्ञानिक को उन दोनो का व्यवहार बहुत अलग लगा। एक दिन वह उन दोनो पागलों के पास गये और बोले- प्रोफेसर साहब, आपसे एक बात पूंछनी थी - मै कई दिनों से देखता हूँ कि आप दोनो जब बात करते हैं तब एक समय में एक ही बोलत है और दूसरा बहुत ध्यान से सुनता है, कोई किसी की बात बीच में कभी नही काटता, ऐसा आप कैसे करते हैं। दोनो मुस्कराये फिर एक पागल प्रोफेसर बोले- यही तो बात करने का उसूल है कि एक बोले और दूसरा सुने इसमें आश्चर्य की क्या बात है। तब वैज्ञानिक जी बोले- नही, इसमें कुछ खास नही मगर मेरे लिये आश्चर्य की बात यह है कि दोनो के बात के विषय अलग अलग होते हैं एक हमेशा गणित की बात करता है और दूसरा हमेशा अंग्रेजी, जब आप एक दूसरे की बात समझते ही नही तो ध्यान से सुनते क्या हैं? 
अब दोनो पागल प्रोफेसर बहुत तेजी से हंसे फिर रुक कर एक ने कहा- अरे महोदय हमे पागल समझा है क्या? मुझे दुनिया में कोई दो व्यक्ति दिखा दो जो सच में एक दूसरे को सुनते हो।
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