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शुक्रवार, 31 मार्च 2017

कैसे कटेगा ये पहाड सा जीवन?... Why Walking Alone


ये मेरे जीवन में पहला अवसर नही था जब मैं इस प्रश्न का उत्तर दे रही थी। अब तक तो मुझे इस प्रश्न की आदत सी हो गयी थी, कुछ लोग मेरे कार्य की प्रसंशा करने के बाद य्ह प्रश्न पूंछते थे, कुछ की बातों का आरम्भ ही इस प्रश्न से होता था। आप भी सोच रहे होंगे कि प्रश्न पूंछने की चर्चा तो इतनी कर ली किन्तु प्रश्न अभी तक नही बताया, लिखूंगी वो भी लिखूंगी उसके पहले अपने बारे में कुछ बताती हूँ- मै अपने जीवन में पैतालीस बसन्त देख चुकी हूँ, और इन पैतालीस बसन्तों के पार होने में देख चुकी हूँ जीवन के अनन्त उतार चढाव, अनुभव कर चुकी हूँ नाना प्रकार के सुख दुख, सीख चुकी हूँ जीवन को जीना। किन्तु शायद लोग मुझसे ज्यादा मेरे लिये फिक्रमंद रहते हैं, और इसीलिये अक्सर लोग पूँछ लेते हैं- मीरा जी कैसे काटेंगीं ये पहाड सा जीवन? मीरा जी कैसे काटती है आप अपना खाली समय? मीरा जी क्या अकेले घर आपको काटने को नही दौडता? वगैरह वगैरह...। बार नाकाम कोशिश करती हूँ कि मेरी मुस्कराहट ही मेरा जवाब बन जाय किन्तु हर बार मेरी निश्छल हंसी से वह मेरे उत्तर ना देने की बात को समझ नही पाते या समझना नही चाहते या उन्हे लगता है कि शायद इस अर्धप्रौढा महिला ने उनके प्रश्न को समझा नही तो वह अपने प्रश्न में और शब्दों को सम्मिलित करते हुये प्रश्न का स्वरूप इस तरह बदलते है कि प्रश्न की आत्मा पूर्णतः जीवित रहे|
जब पूर्णतः मै आस्वश्त हो जाती हूँ कि प्रश्नकृता उत्तर का भिक्षुक है तो फिर उसको निराश करके पाप की भागीदार बनने से श्रेयश्कर लगता है कि भिक्षुक को उचित भिक्षा दी जाय।
फिर उत्तर की भिक्षा के रूप में उसकी झोली में डाल देती हूँ- अपनी बेबसी, अपना दुख, अपना दुर्भाग्य और अपनी लाचारी…..। यह सब पाकर वह भिक्षुक ऐसे प्रसन्न होता है जैसे किसी भिखारी को आशा एक रुपये या दो रुपये की हो और उसे सौ या दो सौ रुपये मिल जाय।
अब भिक्षुक के मन में भाव जगता कि वह तो एक दाता है- सामने वाला तो दीन हीन कमजोर लाचार किस्मत का मारा है, फिर वह मुझे सांत्वना देकर अपने दाता होने की संतुष्टि करता है. और बुनने लगता है झूठी सहानुभूति, अपनेपन का जाल।
यकीन मानिये मुझे आज तक किसी अविवाहित पुरुष के प्रति मन में ऐसी सहानुभूति नही हुयी, शायद मेरा ह्दय इतना उदार नही। मुझे कभी ऐसी आवश्यकता महसूस नही हुयी कि किसी से भी( ना स्त्री ना पुरुष) उसकी उम्र या कमाई पूँछी जाय।
किन्तु आज मै मेरे सभी अपरिचित और परिचित प्रश्नकॄताओं से कुछ कहना भी चाहती हूँ और पूंछना भी चाहती हूँ- कहना चाहती हूँ कि क्या वास्तव में जीवन काटने वाली वस्तु है और यदि है तो क्या विवाह वो कैंची है जो जीवन काटने में मदद करती है। ईश्वर ने यह जीवन जीने के लिये दिया है ना कि काटने के लिये।
और पूँछना चाहती हूँ कि मेरे अविवाहित होने पर क्या वाकई उनका मन मेरे जीवन के प्रति चिन्तित होता है? क्यों एक अविवाहित लडकी के चाल चलन पर प्रश्न किये जाते है कभी प्रत्यक्ष रूप से कभी अप्रत्यक्ष रूप से। मैंने बहुत सारे लोगों को हमेशा शालीनता से जवाब दिया है और देती रहूंगी, किसी उत्तर भिक्षुक को निराश नही करूगीं किन्तु मुझे वापस में उनसे कुछ भी नही चाहिये- नही चाहिये छल पूर्ण आमंत्रण, नही चाहिये छदम वार्ता, नही चाहिये आभासी सहानुभूति पूर्ण व्यव्हार। आज कई सारे कटु अनुभवों के आधार पर कह सकती हूँ कि एक लडकी मुख्यतः अविवाहित लडकी समाज में अपनी योग्यता के आधार पर अपने जीवन को एक ऐसे मुकाम पर पहुँचाती है जहाँ तक शादीशुदा पुरुष सामान्यतः नही पहुंच पाते तो उसको पीछे करने का बडा ही आसान सा तरीका होना है उसके अकेलेपन के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करना। फिर सहानुभूति की सीढी चढकर उसके पतन की कोशिश करना ।
उपरोक्त शब्दों से किसी के भी मन को ढेस पहुंची हो तो हदय से क्षमाप्रार्थी हूँ। यह मात्र मीरा के जीवन के अनुभव हैं, मुझे मित्र होने के नाते उसने माध्यम बनाया, उसको ऐसा लगता है कि उसके अनुभवों को मैं शब्दों की माला में सुन्दरता और सजीवता से पिरो सकती हूँ। 
              मीरा की बात के अन्त में, मैं दो शब्दों में अपनी बात कहूंगी- मीरा एक ऐसी महिला है जो मेरे साथ साथ ना जाने कितनी स्त्रियों, पुरुषों की आदर्श है, लोग सीखते है उससे जीवन जीना, स्वच्छंद हंसी उसका ऐसा आभूषण है जो उसके व्यक्तित्व को सदैव निखारता है। मीरा एकाकी होकर भी आज सफलता के एक ऐसे मुकाम पर है जहाँ से आप उससे प्रेरणा ले सकते हैं। यदि सम्भव हो तो अब किसी भी मीरा के जीवन में उत्तर का याचक बन कर ना आइयेगा। क्योंकि निजी प्रश्नों को निजी लोग ही पूँछें तो उचित भी लगता है और शोभनीय भी। और न कीजिए चिंता मीरा के लिए क्यो कि वह जीवन जीने मे विश्वास करती है काटने मे नही । कोई भी विष प्याला देकर उससे जीने की कला का हरण नही कर सकता। स्त्री के शक्ति रूप दुर्गा की स्तुति करने वाले क्यों यह ध्यान नही करते कि स्त्री कभी भी जीवन की खुशियों के लिये पुरुष पर निर्भर नही है। 

मंगलवार, 28 मार्च 2017

माँ दुर्गे का भजन....


अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार
कोई लाया लाल चुनरिया॒॑sss - 2, कोई करे जयकार
शेरोवाली के दरबार, लगी भक्तो की कतार

दुष्ट जनों का नाश किया,
दुर्बल के कष्ट मिटाये
जो भी पुकारे भक्तिभाव से,
मइया के दर्शन पाये
खाली हाथ ना लौटा वो जोss - 2 आया माँ के द्वार
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

सिन्दूर सोहे माँ के माथे,
सजे कंठ में माला
सिंह की अम्बे करे सवारी,
लेकर बरछी भाला
मइया का है रूप निराला ss - 2, महिमा अपररम्पार
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

ब्रह्मा विष्नु महेस सभी,
करते गौरी का गान
ममता का है रूप भवानी
और शक्ति की खान
जो भी आया लेकर झोली ss - 2, उसे मिला वरदान
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

कोई लाया लाल चुनरिया॒॑sss - 2, कोई करे जयकार
शेरोवाली के दरबार, लगी भक्तो की कतार

* चित्र के लिये गूगल का आभार

रविवार, 26 मार्च 2017

समझ से सही समझ तक


मम्मी पापा तो समझते ही नही कि अब हम बच्चे नही रहे अब हम स्कूल नही कॉलेज जाते हैं, और वहाँ लोग नोटिस करते हैं कि हमने क्या पहना है, रोज रोज वही कपडे पहन कर जाने से मेरा मजाक बनता है। मम्मी आप ही कह दो ना पापा से मुझे सिर्फ दो जींस दिला दे, प्लीज मम्मी कह दोगी ना। हाँ हाँ कह दूंगी, तुम्हारे पापा का मूड देख कर, मगर मैं तेरी फर्माइशों की गारंटी नही लेती। कह कर वसुधा नाश्ता बनाने में जुट गयी और मलय अपने स्टडी रूम में चला गया।
उपरोक्त दॄश्य हर घर में यदा कदा मिल ही जाता है। जिसमें घर की सम्पूर्ण जिम्मेदारी का वहन करने वाला पिता प्रथम दॄष्टया विलेन ही नजर आता है। बच्चे मासूम उनकी फर्माइशें जायज और माँ पिता पुत्र के मध्य एक सेतु सी नजर आती है। यहाँ बहुत से पहलू विचार योग्य हैं जिनकी अनदेखी समाज में एक नये कैंसर को जन्म दे रही है। बहुत से ऐसे सवाल हैं जिनका समय पर हल मिलना आवश्यक है। बात ना सिर्फ बच्चों की फर्माइशों की है, ना उनके जिद करने की, यह तो स्वाभाविक है, किन्तु अस्वभाविक है दोनो अभिभावकों में से किसी एक के प्रति मन में उपजता अविश्वास। ये उस श्रंखला की प्रथम सीढी है जिसका अन्तिम पढाव है- कुंठा, विद्रोह, छल।
कैसे बच्चे में यह आस्वश्ति विकास करती है कि वह माता के समक्ष अपनी बात रखते हुये पिता का अनादर कर सकता है? कैसे उसकी समझ यह कहती है कि उसका पालनहार उसका पिता उसे नही समझता? कैसे वह इस विश्वास में जीने लगता है कि उसकी हर जिद जायज है और पिता उसका धुर विरोधी? कैसे एक पत्नी को अपने पति से कुछ कहने के लिये उसके अच्छे मूड को देखना पडता है? कैसे बच्चे में यह बात घर कर जाती है कि समाज में उसका सम्मान उसके रहन सहन के स्तर से होगा ना कि उसके गुणों से?
इन सभी प्रश्नों के होने का मात्र एक कारण है? हमारे पास आज समझ की कमी नही किन्तु सही समझ का सर्वथा अभाव है।
हम सभी अपने आप में समझते है कि हम सही ही सोचते समझते हैं। गलती तो सिर्फ दूसरे की है। फिर यह मै और दूसरे का चक्र चलता रहता है, हर मै दूसरा बनता है हर दूसरा मै। हर मै दूसरे को गलत और स्वयं को सही समझता है। यहाँ फिर मन में एक सवाल उठता है क्या सही समझ व्यक्ति दर व्यक्ति निर्भर करती है, क्या यह सार्वभौमिक नही, क्या यह समय और स्थान से परे नही? क्या सही वास्तव में परिवर्तनशील है?
हर वह प्रश्न जो मन से उपजता है, मन ही उसके उत्तर का स्रोत बनता है। जब हम स्वयं को खंगालते है तो अक्सर हम पाते हैं कि जैसे आचरण, जैसे विचार की हम दूसरे से अपेक्षा करते है, बहुधा हम वैसा नही कर पाते। और यह दूसरा हमसे अलग नही यह या तो मेरी पत्नी है, या भाई, या मेरा निकट सम्बन्धी या मेरा मित्र या फिर मेरा कोई परिचित। हम साथ रहते हुये भी विचारों से साथ नही हो पाते, क्योकि हम अपनी समझ से अपने जीवन को गति देते है, सही समझ की तरफ ध्यान भी नही जाता।
सही समझ का अर्थ है ऐसा विचार जो सभी के लिये एक सा हो। जो स्थान, काल और व्यक्ति से परे हो। जिसके किसी के लिये भी गलत होने की सम्भावना शून्य हो। जिसमें पूर्ण आश्वस्ति हो, विश्वास हो, अपरिवर्तित हो।
आज हम साथ रहते हुये भी साथ नही, हमारा शरीर तो साथ रहता है मगर विचार नही। हम एक दूसरे के सम्बन्धी तो बन जाते है मगर सम्बन्ध स्थापित नही कर पाते क्योकिं सम्बन्धों को रीति रिवाजों से निकट तो लाया जा सकता है मगर जोडने के लिये आवश्यक है, विचारों की विश्वसनीयता।
विश्वास बनने या करने का कार्यक्रम किसी भौतिक वस्तु के आदान प्रदान के माध्यम से नही किया जा सकता, यह बनता है सही समझ के विकास से।
एक शिशु में जब सोचने समझने की शक्ति विकसित होती है, उससे कही पहले उसका अपनी मां   के साथ विश्वास का रिश्ता प्रौढ हो चुका होता है, और पूर्ण विश्वास के साथ वो माँ का अनुकरण करते हुये अपने विकास की यात्रा को आरम्भ करता है। विश्वास की इस कडी में फिर उसका सम्बन्ध जुडता है अपने पिता फिर परिवार जनों, और फिर समाज से। धीरे धीरे सम्बन्धों के निर्वाह में साधन अपनी जगह बनाते जाते है, और इस क्रम में एक समय के अन्तराल के पश्चात सम्बन्ध भाव प्रधान न रह कर साधन प्रधान होने लगते हैं।
भाव से साधन की तरफ बढती प्राथमिकता ही वह समय है जहाँ यदि सही समझ से विचार न किया जाय तो सम्पूर्ण जीवन व्यक्ति सुख की खोज में अपना जीवन व्यतीत करने के उपरान्त यह निष्कृष निकालता है कि सुख के लिये साधन गौण थे प्राथमिक नही।
सुखी तो हम सभी होना चाहते है, सारा जीवन इसी प्रयास में निकलता भी है किन्तु सही समझ के अभाव में भाव की शून्यता होती जाती है और अथक परिश्रम के बाद भी वास्तविक सुख नही मिलता। तो क्यों ना हम कुछ समय निकाल कर स्वयं को दे और विचार करे कि कैसे सही समझ को विकसित किया जा सकता है क्योकिं सही समझ ही मात्र एक पथ है जीवन में निरन्तर सुख पाने का।
ये लेखिका के स्वतंत्र विचार हैं।

प्रकाशन के लिये आदरणीय भोलेश्वर उपमन्यु जी (हमारामैट्रो के सलाहकार सम्पादक) का बहुत बहुत आभार।

शनिवार, 18 मार्च 2017

पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे...................


पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे
भले बिछा लो शूल मार्ग में
पर नष्ट नही कर पाओगे…………………..
कठिनताओं से हाथ मिलाना
प्रिय खेल रहा है बचपन का
दुष्कर को ही लक्ष्य साधना
इक ध्येय रहा है जीवन का
तन पर प्रहार कितने कर लो
मन क्लांत नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………
उर में घातक हथियार लिये
जिव्हा पर प्रेम का अंकुर है
पुष्प से कोमल हम कहकर
रस हेतु भ्रमर सा आतुर है
तोडों या कुचलो तुम कलियां
गन्ध नष्ट नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………
विश्वास किये हम साथ चले
आघात की तुमने राह चुनी
सीता की चाह धरी मन में
ना राम की कोई बात सुनी
मै तत्पर हूँ अग्निपरीक्षा को
तुम वनवास नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हर राह में साथ निभाउंगी.................


साथी तुम मेरी नींद बनो
मै स्वप्न में तेरे आउंगी।
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी

सृष्टि में कुछ भी पूर्ण नही
बिन गंध है पुष्प अधूरा सा
दीप प्रज्जव्लित हुआ तभी
जब साथ मिला है बाती का
तुम देखो तो बन बिन्दु मेरा
मै आकार तेरा बन जाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी..............................

धरती पर लहलहायी फसल
जब अम्बर ने जल बरसाया
पूजा सबने उस चाँद को तब
जब संसर्ग चाँदनी का पाया
बनकर तो देखो तुम कल्पतरू
मै अभीष्ट भाग्य बन जाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी..................................

कुछ भय तुमको भी घेरे है
कुछ मेरा मन भी व्याकुल है
कृष्ण से बिछडी राधा हरपल
चुप सी गोकुल में आकुल है
बंशी बन छेडो तो तान कोई
नित राधा बन रास रचाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी.......................................


* Thanks to Google for Image

रविवार, 5 मार्च 2017

डिजिटल युग में दोस्ती के नये रूप................Dizitalization of Friendship


आदमी- काश मेरे पास एक दोस्त होता
जिससे कह पाता अपने मन की बात
जो समझ सकता मेरी परेशानी
सब छोडकर देता मेरा साथ
तभी बोला मन- एक के लिये आप अभी भी रोते जाते है
फिर क्या सोचकर रोज फेसबुक पर मित्र बनाये जाते है

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आदमी- आप बहुत अच्छा लिखती है,
लेखनी में आपकी सौम्यता छलकती है
यदि आपको अनुचित ना लगे
तो क्या करेगीं मेरी फ्रैड रिक्वेस्ट स्वीकार
महिला- ये मेरा सौभाग्य है
जिसे कर चुकी थी अर्पित
बीस वर्ष पहले अपना तन मन
आज प्रस्तुत है वो लेकर निवेदन

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पहले दोस्ती होती थी धरती सी
जिसमें गहराई नापी जाती थी
आज विकसित हो गयी है गगन सी
जिसमें होता है सिर्फ आंकडों का विस्तार

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आधुनिकतावाद ने किया दोस्ती पर शोध
और बताये दोस्तो के तीन प्रकार
गर्ल फ्रैंड, ब्वाय फ्रैंड और फेसबुक फ्रैंड
और इन सबको बांधा एक सूत्र में
जिसका नाम है अन्फ्रैंड

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डिजिट्ल युग की सबसे बडी देन
घर बैठे अनलिमिटेड फ्रैंड पाये
जब चाहे जिसे चाहे जब तक चाहे
मित्र बनाये दोस्ती निभाये

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हजारों ने भरपूर मित्रता निभायी
घंटे भर में सब थे मेरे साथ
लाइक कर रहे थे मेरी पोस्ट
जिसमें बताया था, हुआ है
कल रात मेरी माँ का देहान्त

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जाने कहाँ विलुप्त हुये
सुदामा और श्याम
फूल माला भोग का
नही पूजा में कोई काम
ईश्वर तो देखता है
मात्र सच्चा भाव
श्रद्धा से शेयर होता
भगवान और भक्तिभावो
सर झुकाने मुराद पाने
नही जाना ईश के द्वार पर 
कि भगवान मन्दिर मस्जिद नही
मिलते हैं अब फेसबुक वाल पर

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

पलाश के दोहे.........


सत्कर्मो की अग्नि मे, जब तपती मानुष देह |
काम क्रोध होते भस्म,  मिलती प्रभु की नेह ||


सच्चा धन बस प्रेम है, बाकी जग मे सब झूठ |

खर्च होय से बढत जाय, ना खर्च से जाय छूट ||

साथी वही जो साथ दे, रहे भले कभी साथ |
साथ से एकला तो भला, ना भला बाँह का नाग ||


वृद्ध जनों का आशीष है, सत्कर्मो का परिणाम |

श्रम बिन जामे घास ही, ना लगे बाग मे आम ||

भूल से भी हो भूल तो, बिन भूले भूल लो मान |
जलती बाती अभिमान की, बढे दिये का मान||


जब मोह घटे सामान से, और बढे परस्पर नेह |

सुख समृद्धि सम्बन्ध फिर, न तजे आपका गेह ||


मन का कहा बिन तोल ही, जो करता सारे काज |
चार दिन की हो चाँदनी, फिर लम्बी काली रात ||

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

अपने लिये


जाने कितनी रातें इस उधेड बुन में काट दी कि अपनी आज की स्थिति को अपनी नियति मान ही लूँ और परिस्थितियों से समझौता कर लूं   या फिर जिन्दगी को कम से कम उस स्थिति में तो लेकर आऊँ जहां पर उसे जिन्दगी तो कहा जा सके। लोगो के घरों के बर्तन घिसते घिसते शायद मेरे हाथो की लकीरें भी घिस चुकी थी। कभी सोचती और रोती कि आखिर मेरी तकदीर में है क्या? और जब रो कर चित्त शान्त होता तो सोचने लग जाती कि आखिर क्या लिख सकती हूँ अपनी तकदीर में?
बचपन से आज तक जो मिला उसको पूरे मन से स्वीकार किया्। काम को मैने उस तरह से लिया जैसे बच्चे खेल को लेते है। गन्दे बर्तन, झाडू, पोछा ये मेरे प्रिय खिलौने थे या बना दिये गये थे। बचपन पार कर जब जवानी कि दहलीज पर पहुंची तो उससे बहुत पहले यौवन का मौसम मेरे जीवन में एक आभासी झोके सा आकर जा चुका था। मेरे साथ की सहेलियां जब अपने भावी पति के सपने सजाती थी उस समय मैं, घर में दो वक्त की रोटी के जुगाड मे उलझी थी।
शादी मेरे जीवन के कोई त्योहार नही स्थानान्तरण की तरह आयी थी। सामान्यतः लोग कहेगें इसमे नया क्या है, शादी के बाद हर लडकी का घर बदलता है । मगर मेरे लिये ये मायके से  ससुराल जाना नही था, बदला था मेरा काम करने का घर। शादी के पहले – बिजली वाले सक्सेना जी का घर था, एक मोटे हलवाई का घर था और एक था मेरी टीचर दीदी का घर। और अब मेरे पास थे- चक्की वाले गुप्ता जी, एक वर्मा जी का घर, जिनके पागल बेटे से मुझे डर लगता था या उसे मुझसे कह नही सकती मगर रोज ही जाने से पहले सोचती थी - "हे राम वो सो रहा हो और मै काम निपटा कर निकल लूँ"। मुँह दिखायी में मुझे ये दो घर मिले थे। शायद हम जैसी लडकियों को यही मिलता होगा, शायद मेरी माँ और मेरी सास को भी यही मिला होगा, इसलिये ना मै खुश थी ना दुखी।
ना कोई बडी ख्वाइश थी ना कोई चाहत, ना जाने कहाँ से एक दिन खुद के बारे में सोच बैठी, बस यही से सब बदल गया। उस दिन मै वर्मा जी के घर से काम करके लौटी तो हाथ मे था महीने भर का पैसा और ऊपर से दिये गये १०० रुपये। कल उनके पागल बेटे का जनम दिन था, तो न्योछावर किया गया पैसा, अलाय बलाय सहित मेरे हाथ में दे दिया गया था। कहना मुश्किल था कि मै फायदे मे थी या नुकसान में। बहुत दिन से एक लिपिस्टिक का मन था सो खरीद लिया, और पूरे मन से रात में लगा कर पति के सामने आयी, इस उल्लास के साथ की आज की रात बहुत प्यार भरी होगी, मगर नही जानती थी कि पूनम की रात को एक पल मे अमावस मे बना देने की कला पति के पास होती है। आरोपो के सिलसिलो से छलनी हुये सीने को अगर कोई देख पाता तो निश्चित रूप से होठों पर लगी लाली नही हदय की पीडा का रंग नजर आता। मेरा पति जो कल तक मुझे सब कुछ समझता था , आज मुझे कितने ही अपशब्दों के अलंकारों से सजा चुका था। वो पति जिसे हर रात मैं परमेश्वर समझ कर उसके तन से शराब की आती दुर्गन्ध को भी उसका प्रसाद समझ कर माथे सजा लेती थी। मैने भी निश्चय कर लिया था कि किसी भी ऐसे प्रश्न का उत्तर नही दूँगी जिसको सुनने से मै इन्कार कर सकती हूँ, धीरे धीरे प्रश्नो की तीव्र और तीखी बौछार होती गयी और अन्ततः शब्दों के बाण जब पति देवता के लिये काफी नही रहे तो उसने प्रहार का विकल्प चुन लिया। भला कौन था यहाँ मेरी रक्षा को जब रक्षक ही भक्षक बन गया था, सो मै इसे भी प्रसाद की तरह स्वीकर करती गयी।
रो धोकर इस उम्मीद के साथ रात बीती कि हर रात का एक सबेरा होता है, शायद कल सब ठीक हो जायगा। मगर पति की कठोरता के बाद अभी शेष थी वक्त की निष्ठुरता। कितनी ही मनगढन्त कहानियां बना ली गयी थी मुझे चरित्रहीन सिद्ध करने के लिये और फिर दया का पात्र बनाते हुये मुझे घर पर रहने की अनुमति दी थी मगर पत्नी शब्द अब सिर्फ मेरी मांग मे सिन्दूर तक सीमित हो गया। पति के वक्षस्थल की नयी अधिकारिणी अब आ चुकी थी। उसको भले ही मुँह दिखायी मे दो घर मिले थे मगर उन घरों का जिम्मा मेरे ही पास आया था। मुझमें अब और शक्ति नही बची थी। स्त्री हो या पुरुष वह यही चाहता है कि उसका जीवनसाथी सदैव उसे प्रेम करे, उसके साथ रहे, विवाह का सम्बन्ध तन का कम मन का ज्यादा होता है, मन में किसी और की छाया का विचार मात्र ही उसे विचलित कर देता है। और यहाँ तो तन मन दोनो से ही मुझे पद्च्युत कर दिया गया था। अब मेरे पास दो ही रास्ते शेष थे - घर छोडूं या दुनिया। मेरे निर्णय से फर्क किसी को नही पडने वाला था। मगर, मै लाख दुख मिलने के बाद भी अपनी शाख से अलग नही होना चाहती थी।
इसी द्वन्द में जाने कितनी राते काट चुकी हूँ, हर रात सोचती हूँ कि कल भोर से पहले मै इस घर से दूर अपनी एक दुनिया बसाने की यात्रा शुरु कर दूंगी। पर मन हमेशा मेरे पैरो मे बेडिया डाल देती।

मगर आज अन्ततः, आज मैने अपनी नयी यात्रा शुरु कर दी, अपनो के बिना अपने लिये। अब ठीक किया या गलत नही जानती, बस इतना जानती हूँ किसी को दुःख नही दे रही अपने को सुखी करने के लिये..................

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

मातृभाषा की शिक्षा संस्कार में उपयोगिता एवं महत्व


मातृभाषा को समझने से पहले समझना होगा भाषा को, भाषा किसे कहते हैं? विचारों और भावनाओं को आदान प्रदान करने का माध्यम है भाषा। विचारों की अभिव्यक्ति कभी शब्दों के द्वारा की जा सकती है कभी सांकेतिक। इस प्रकार से भाषा को दो रूपों मे समझा जा सकता है। प्रकृति में भाषा का प्रयोग केवल मनुष्य मात्र ही नही करते, वरन पशु , पक्षी, यहाँ तक की नदी, झरने, हवा सभी की अपनी एक भाषा है। सुनने समझने की शक्ति रखने वाले मनुष्य शब्दो की भाषा का प्रयोग करते हैं जबकि सांकेतिक भाषा का प्रयोग वह करते हैं जिनमें समझने की तो शक्ति होती है मगर सुनने की क्षमता का अभाव होता है। बहुत सी भाषा के जानकार लोगों के अनुसार जन्म के साथ ही, एक शिशु जिस प्रथम शब्द का उच्चारण करता है वह है माँ, इससे यह समझा जा सकता है कि दुनिया की ज्यादातर हर भाषा में या तो यह शब्द उपलब्ध है या यह पूर्ण रूप से एक प्राकृतिक शब्द है। वो भाषा जिसे सुन कर व्यक्ति विचारों की अभिव्यक्ति करना सीखता है, वह उस व्यक्ति की मातृभाषा कहलाती है। इस बात से यह अभिप्राय निकलता है कि किसी भी विचार या तथ्य को सबसे अधिक सुगमता से किसी व्यक्ति को उसकी मातृभाषा में समझाया जा सकता है। भारत एक विविधताओं का देश है। यहाँ बहुत सी संस्कॄतियों का संगम है। संस्कॄति और मातॄभाषा का बहुत निकट सम्बन्ध है। संस्कॄति के आदान प्रदान में भाषा की अहम भूमिका है। भारत के संविधान में भी भाषा को बहुत आदर का स्थान प्राप्त है। संविधान मे २२ भाषाओं को स्थान दिया गया है जो देश के विभिन्न प्रदेशों में बोली जाता हैं। शिक्षा में भाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। ज्ञान का माध्यम यदि मातॄभाषा हो तो विषय को आसानी समझा जा सकता है किन्तु आज हमारे देश में मातृभाषा को किस तरह जबान से, चलन से, गायब कर अंग्रेजी को मातृभाषा बना दिये जाने की पूरी कोशिश की जा रही है।
आज यह सिध्द हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के विकास में ज्यादा सहयोगी है। अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक परिवेश से आये विघार्थियों में किसी भी विषय को समझने की क्षमता समान नहीं होती। अंग्रेजी में पढ़ाए जाने पर उनके लिये यह एक अतिरिक्त समस्या बन जाती है – विषय ज्ञान के साथ भाषा का ज्ञान। भाषा सीखना अच्छी बात है और लाभदायक भी है। भाषा हमें नये समाज और संसार से जोडती है। लेकिन मातृभाषा की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से बलपूर्वक हटा कर अन्य भाषाओं को विशेष स्थान देना निश्चित ही उचित नही।
जापान, रूस जर्मनी जैसे देश आज हम सबके लिये उदाहरण है जिन्होने भाषा की शक्ति से ही स्वयं को विश्व पटल पर स्थापित किया। अक्सर देखा जा सकता है छात्र छत्तीस नहीं समझते मगर थर्टीसिक्स बोलो तो समझ जाते हैं। नवासी और उन्यासी में तो बडे बडे लोग अक्सर सोच में पड जाते हैं। किसी भी भाषा से शब्दों का लेन देन कोई गलत नही। हिन्दी में उर्दू, फारसी, संस्कृत सहित कई लोकभाषाओं के बहुत सारे शब्द हैं जिनका बहुत से जानकार भी आज विभेद नही कर पाते उदाहरण के लिये – आवाज, शुरुआत, दौरा इत्यादि। अंग्रेजी के भी ढेरों शब्द हैं। डेली, रेलगाड़ी, रोड, टाईम शब्द हिन्दी के हो गए हैं। ई-मेल, इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटॉप, फेसबुक आदि शब्द हिन्दी में चल निकले।  धन अर्जन के लिये यदि हम दूसरे प्रान्त या देश जाते हैं तो वहाँ के लोगो के साथ सम्बन्ध पूर्वक जीने के लिये उनकी भाषा को सीखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये। लेकिन उसके लिये अपनी मातृभाषा को छोड देना किसी भी परिस्थिति में सम्मान जनक नही।
आज विश्व में मातृभाषा के महत्व को समझा गया है। शायद तभी २१ फरवरी को विश्व मातृभाषा देवस के रूप में स्थापित किया गया।  मातॄभाषा मानव से मानव को जोडने का सबसे सुगम साधन है। हमे केवल अपनी ही नही वरन सेभी की मातॄभाषा का सम्मान करना चाहिये जिससे एक सुदॄढ और स्वस्थ समाज की स्थापना की जा सके।
** चित्र के लिये गूगल का आभार 

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

गुनाह



माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हम कल ही यहाँ से चल देंगें है, इससे तो बहुत भला है अपना इंडिया। हम आ रहे हैं माँ। कहते हुये राधिका का फोन कट चुका था। मगर अनुसुइया जी के सामने तीन महीने पहले का दृश्य एक बार फिर से घूम गया।
राधिका अनुसुइया जी की एक मात्र संतान थी, उन्हे पालन पोषण में कभी इस बात पर विचार भी नही आया कि यह पुत्र है या पुत्री। लम्बे समय से वैधव्य का दंश झेल रही अनुसुइया जी के लिये वह जीविका का सहारा थी यह कहना गलत ही था किन्तु भावनात्मक रूप से वह उस पर पूर्ण निर्भर थीं।
दो साल पहले उन्होने राधिका की शादी बहुत धूम धाम से अपने ही समाज के एक प्रतिष्ठित परिवार में की थी। उनका मानना था कि विवाह करने के लिये दो चीजों का मेल खाना बहुत जरूरी है- एक लडके लडकी की कुंडली और दूसरा – लडके लडकी का कार्यक्षेत्र। विवेक, राधिका की ही तरह पेशे से डक्टर था।
दोनो की खुश गृहस्थी को देख वह सन्तुष्ट थी। विवेक भी घर का दामाद ना होकर बेटा ही था।  कोई एक पाँच छः महीने पहले राधिका के परिचित में कोई सउदी अरब चला गया था, प्रेक्टिस करने के लिये। उस दिन से तो राधिका के सिर पर भी सउदी जाने का भूत चढ गया था। पहले तो विवेक ने उसे खूब समझाया कि हम लोग यहाँ बहुत खुश हैं, सभी अपने हैं यहाँ और फिर माँ के लिये  तुम्हारे सिवा उनका कौन हैं, वगैरह वगैरह। मगर राधिका तो जैसे अपनी ही धुन में थी। एक दिन विवेक राधिका के साथ अनुसुइया जी के घर आया, और सारी स्थिति से अवगत कराया। माँ ने भी अपनी यथाशक्ति उसको समझाने की कोशिश की मगर राधिका टस से मस ना हुयी  और बोली- माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हमे जितनी जल्दी हो यहाँ से चल देना चाहिये, विवेक हमने सारी तैयारी कर ली है और प्लीज माँ की चिन्ता तुम मत करो, मै सब कर लूंगी। और वैसे भी मैं माँ पर डिपेंड हूँ, माँ मुझ पर नही क्यो माँ ठीक कहा ना , कहते हुये उसने लाड से माँ की गोद में अपना सिर रख दिया। अनुसुइया जी ने भी प्यार से उसका माथा चूमते हुये कहा – हाँ बेटा ये बिल्कुल ठीक कह रही है। तुम लोग मेरे लिये क्यो परेशान होते हो। आज कल के जमाने में क्या मुंबई क्या सउदी सब बराबर है। अनुसुइया जी जानती थी कि उसकी पुत्री किसी भी तरह मानने वाली नही मगर वो भविष्य भी साफ साफ देख पा रहीं थीं, फिर भी उन्होने चलते समय समझाने की अपनी एक आखिरी कोशिश की थी, किन्तु शायद राधिका के कान शब्द तो सुन सकते थे मगर शब्दों के पीछे छिपे भावों को समझने के सारे दरवाजे वो बन्द कर चुकी थी।
मन ना होते हुये भी विवेक राधिका के साथ एक हफ्ते के भीतर ही सउदी चला गया। राधिका की बातें सुनसुन कर वो खुश थीं कि अच्छा हुआ उन्होने अपनी बेटी का मन नही मारा। मगर कुछ ही दिन बाद सब धीरे धीरे बदलने लगा। राधिका वहाँ पर महिलाओं की स्थिति से रोज दो चार हो रही थी। मगर खुद को समझा लेती थी कि मुझे इन सबसे क्या। मेरे पास मेरा काम है, मेरा घर है और इस सबसे बढ कर हर परिस्थिति में साथ देने वाला उसका पति विवेक है। वो अक्सर खुद ये विवेक से कहती- विवेक आप ही मेरी माँ को मना सकते थे, अगर आप साथ न देते तो तो मां      कभी आने नही देतीं।
मगर तीन दिन पहले जो हुआ उसके बाद राधिका किसी भी तरह जल्द से जल्द अपने देश आने को व्याकुल होने लगी। दरअसल, तीन दिन पहले राधिका के पास एक महिला आई थी, अपने गर्भ का पता करने। एक बार में राधिका ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो वह गिडगिडा कर बोली- आप मेरी जान बचा सकती हैं, अगर मेरे गर्भ में लडकी हुयी तो मेरे शौहर मुझे मार देंगे। उसकी बात सुन कर मेरे मन में कुछ आता इससे पहले वह बोली – अगर ये लडकी हुयी तो मैं इसे जन्म नही दूंगी। कुछ भी करके इसको दुनिया में नही आने दूंगी। मै हैरान थी कि क्या कोई माँ ऐसी भी हो सकती है? मैने उससे डॉट कर कहा – तुमको शर्म नही आती, तौबा करो, तुमको ऐसा गुनाह करने से डर नही लगता, कुछ तो अपने खुदा का खौफ करो। तुरन्त निकल जाओ यहाँ से वरना मै पुलिस को बुला दूंगी। वो रो रो कर कहने लगी – हमको पता है हम कोई गुनाह नही कर रहे, हम बेगुनाह है। मैं लगभग चीख सी पडी और उसको तुरन्त जाने को कहा। थोडी देर बाद मेरी नजर पास ही खडी एक नर्स पर पडी, ठीक से तो नही कह सकती कि वो अभी आयी थी या उसने मेरी उसकी बातें सुनी थी। रात को घर जाने से पहले वह मेरे पास आकर बोली- मैडम आप उसकी जान बचा सकती थी। मैने कहा- समीरा बी आप ये कह रही हैं ,सुना था आपने वो क्या कह रही थी। थोडी संजीदा होते हुये समीरा बोली- आप यहाँ के बारे में कितना जानती हैं, ये औरत जिसको अपना शौहर कह रही थी दरअसल वो उसका शौहर है ही नही, वो है लडकियों का सौदागर, ये दूसरे दूसरे मुल्कों से मजलूम लडकियों को जाता है, उनसे निकाह करता है, और फिर अगर लडका हुआ तो ठीक अगर लडकी हुयी तो, औरत को मार दिया और लडकी को अनाथाश्रम के रास्ते उसको अनाथ बताते हुये पहुँचा दिया बाजार। मैडम जी वो जानती थी कि अगर बेटी हुयी तो उसकी जिन्दगी में मरना तो तय है, चाहे जन्म से पहले मरे या जन्म के बाद रोज मर मर कर जिये और एक दिन फिर उसी की तरह किसी लडकी को जन्म देकर मर जाय।
रात भर मैं परेशान रही ये सोच कर कि मैने सही किया या गलत, क्या उसका औरत होना कुसूर था? क्या वो यहाँ से भाग नही सकती? क्या वो पुलिस की मदद नही ले सकती थी? बडी मुश्किल से सो पायी थी उस रात। सुबह देर से नींद खुली, विवेक अस्पताल जा चुके थे, मेरा सिर भारी हो रहा था, सोचा एक कप चाय पी लेती हूँ, चाय बना कर टेलीविजन ऑन किया, न्यूज का जो सीन मेरी आँखों के सामने था उसे देखकर हाथ में आ गयी मेज को अगर कस कर पकड ना लिया होता तो चक्कर खा कर गिर ही जाती। बीच बाजार में दो लोगों ने, पुलिस वालों की मौजूदगी में एक महिला का सरेआम कत्ल कर दिया था। न्यूज वाले बता रहे थे, उस पर अपने गर्भ में पल रही लडकी को मारने का इल्जाम था। और इसी कत्ल की उसे सजा दी गयी थी।

मेरी आँखो के सामने उसकी गिडगिडाती तस्वीर घूम रही थी जो रो रो कर रह रही थी- मैडम जी मैं बेगुनाह हूँ। तभी राधिका को माँ की याद आयी- बेटी माना अपने देश में पैसा खूब नही पर मान बहुत है। दूसरे ही पल उसके हाथ में मोबाइल था जो माँ के नम्बर को स्क्रॉल रह रहा था। 


* Image is referred from google.  and story is based on imaginations, if something match with any reality then it will be a purely coincidence.  my aim is not to heart anyone.

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

बहारें फिर आयेंगी


क्या होगा कुरेदने से, स्मृतियों के पल
कुछ दबी आंधियां, तूफान बन जायेंगी

जितना भी तय करेंगें, वो बीता सफर
वापसी में तय हैं, कडवाहटें भी आयेंगी

याद ना कर उसे, जो दर्द का कारन था
आप उम्र भर उसे, माफ न कर पायेंगी

कुछ कदमों की आहटें हैं, प्रतीक्षा से परे
अतिथि सा भी उसे, स्वागत न दे पायेंगी

जीवन नही, सिर्फ स्वप्न पूर्ण करने को
कुछ बातें हमेशा ही, अधूरी रह जायेंगी

खुश रहने का तरीका, सुझाती है पलाश
पतझड को कर विदा, बहारें फिर आयेंगी

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

मेरे शब्द, मेरी कही

नही चाहत मुझे, किसी तारीफ के पुलिन्दे की
हम वो सोना हैं जो, तपती आग में निखरता है

क्या मिटाओगे उसे, जो खुद को मिटा बैठा है
हम वो मिट्टी हैं जो, बीज को फसल करता है

कठिन नही समझना मुझे, कोशिश तो करिये
हम वो पन्ना हैं जो, तेरा ही कहा लिखता है

नही लगता साथ टूटने में, पलभर का समय
हम वो रिश्ता है जो, काँच सा दिल रखता है

मेरी क्षमताओं को परखना, कुछ तो कम करिये
हम वो किनारा हैं जो, लहरों पे नजर रखता है

न खोजना मुझे गहरे सागर में, मोती की तरह
हम वो धागा है जो, मोतियों में छुपा रहता है

बहुत आसां है मुझे अपनाकर, अपना कर लेना
हम वो पानी हैं जो, हर रंग को ओढ लेता है
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