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शनिवार, 20 मई 2017

आधुनिक मानवता


ममी रोजी ने देखो आज फिर मेरी फेवरेट डॉल तोड दी कहते हुये रीना किचन में अपनी गोद में रोजी को लेते हुये आयी। रीना की बातों में शिकायत कम प्यार ज्यादा था। रोजी को भी अहसास हुआ उसने कोई नुकसान नही किया बल्कि अपनी शैतानी से रीना को खुश ही किया है  तभी बाहर से कुछ टूटने की आवाज आयी- रीना रोजी के साथ बाहर कमरे की तरफ आयी, जहाँ घर की नौकरानी की तीन वर्षीय लडकी कजरी ने मेज पर रखे ग्लास को तोड दिया था। ओह ममी ये तोड फोड तो अब रोज का ही काम बन गया है, कहते हुये गुस्से में रीना ने एक थप्पड कजरी के कोमल गालों पर दे दिया, ममी आप पता नही क्यों ये सब बर्दाश्त कर लेती हो। फिर नौकरानी की तरफ बढते हुये बोली- तुम जानती हो ये ग्लास का सेट कितने का आया था, ओह तुम कैसे जानोगी, तोडने से तो कीमत पता नही चलती न। ये तुम्हारे एक महीने की तन्ख्वाह से भी महगां है समझी। ऐसा है अब काम करने की कोई जरूरत नही। हमे सफाई के लिये नौकर चाहिये था न कि तोड फोड के लिये।
सहमी एक कोने में खडी कजरी जो कुछ देर पहले अपनी माँ के काम में हाथ बटाने की नीयत से मेज पर रखा ग्लास किचन में रखने जा रही थी, वो भी अपनी बाल बुद्धि से उस ग्लास की कीमत का मूल्य जानने की कोशिश कर रही थी। उधर उसकी रोती बिलखती माँ अपनी रोटी की मिन्नते करती रही फिर कोई आशा न देख अपने सारे दर्द को क्रोध बना कजरी को मारते हुये बोली- अरी करमजली जाने और कइसे कइसे दिन दिखाई दें तेरे कारन और फिर न जाने ऐसा ही क्या क्या कहते और कजरी को मारते हुये घर से चली गयी। 

तभी रोजी रीना की गोद से कब नीचे उतर कर चलने लगी पता ही नही चला, रीना का ध्यान तब गया जब वो टूटे ग्लास के टुकडों की तरफ बढ गयी। लगभग चीखते हुये से रीना बोली- कम रोजी कम हेयर, डोन्ट गो देयर, और रोजी अपने चारों पैरों से वापस रीना की गोद में आ गयी।

बुधवार, 17 मई 2017

वसुधैव कुटुम्बकम्- स्वप्र बनता सच



यू एस. ए. से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र हमहिन्दुस्तानीयूएसए मे ११ मई को प्रकाशित लेख को आप सबके साथ साझा करते हुये हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव कर रही हूँ। मेरी इस रचना को प्रकाशित करने के लिये प्रकाशन के संपादक श्री जय सिंह का हार्दिक धन्यवाद।




आज के समय में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो जीवन से परेशान न हो। आप सोचेंगे कि ऐसा तो हमेशा ही रहा है, कभी कोई अपने जीवन से संतुष्ट नहीं हुआ, इसमें नया क्या है? नया है, नई हैं परेशानियां। बहुत अधिक नहीं, अगर आज से 30 वर्ष पहले के सामाजिक परिवेश पर हम नजर डालें तो समाज की जो तस्वीर हमारे सामने उभर कर आती है, उसमें व्यक्ति आर्थिक परेशानियों से जूझता तो नजर आ सकता था, मगर अकेला नजर नहीं आता था। उसके साथ दिखता था उसका परिवार, उसके मित्र और उसके आस-पास के लोग। आज हमारे पास कहने को तो दो-चार सौ या किसी-किसी के पास तो इससे भी कहीं अधिक मित्र हैं, मगर परेशानियों में हम खुद को अकेला ही पाते हैं। 
पिछले वर्षों के आंकड़ों पर यदि नजर डालें तो विश्व में 1980 की तुलना में 2017 में स्त्री के साथ दुराचार के मामलों की दर में 6 गुना अधिक वृद्धि हुई है। अपहरण के मामलों में भी दोगुना वृद्धि सरकारी कागजों में दर्ज की गई है। पारिवारिक कर्लह, आत्महत्या के आंकड़ें भी कुछ इसी प्रकार से हैं। यह भी वह समस्याएं हैं जो समाज के लोगों द्वारा समाज के लोगों के लिए बनी हैं। 
यहां उपरोक्त आंकड़ें दर्शाने का उद्देश्य मात्र इन समस्याओं का सांख्यकीय विवरण देना नहीं, वरन ऐसे कारकों को उजागर करना, जिसके कारण ऐसे आंकड़ें पल्लिवत हेते हैं। व्यक्ति और समस्याओं का गठबंधन अकल्पनीय नहीं, किंतु जब समस्याएं हमारे सामाजिक ढांचे को प्रभावित करने लगें तब निश्चित रूप से चिंतन की आवश्यकता बन जाती है। 
इस गिरावट का एक प्रमुख कारक है, वह है हमारी सोच का परिवर्तन। आज हम सबसे अधिक स्वयं के लिए सोचते हैं और उस सोच में भी अधिक प्रतिशित होता है भौतिक सुख-सुविधा का अर्जन। चरित्र निर्माण के बारे में सोचना भी चाहिए या तो ऐसा विचार मन में नहीं आता या समय कम पड़ जाता है। एक परिवार में एक छत के नीचे रहने वाले चार व्यक्ति भी विचारों से एक-दूसरे के साथ नहीं रहते अपितु उनके बीच एक-दूसरे को छोटा दिखाने की अनकही सी प्रतियोगिता रहती है। आज परिवार की भी परिभाषा बदल रही है-परिवार का अर्थ है पति-पत्नी और बच्चे। पहले परिवार में पड़ोसी क्या गांव तक शामिल हुआ करते थे, यह भेद करना मुश्किल था कि कौन किसका बेटा या भतीजा है। जब रिश्ते सीमित होंगे, तो जिम्मेदारी के भाव भी सीमित होंगे और वही से मन में अपने और पराए की परिभाषा का जन्म होता है। जो अपना नहीं उसके साथ बुरा व्यवहार करने में भी कोई संकोच नहीं आता। आज हमारे लिए हम ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं जबकि पहले लोग स्वयं के बारे में सोचते न हो, यह नहीं कहा जा सकता किन्तु लोग औरों के दुख-सुख में भी मन के साथ रहा करते थे। 
एक और बात जो आज समाज में देखने को अक्सर मिल जाती है वह है जिम्मेदारी के भाव का अभाव। सिर्फ धन अर्जन करना जीवन का एकमात्र लक्ष्य नहीं बन सकता, हमें यह भी विचार करना होगा कि धन अर्जन कहीं किसी के मन को दुख देकर तो नहीं हो रहा। आज बहुत ही कम लोग हैं जो ऐसा विचार कर अपना व्यवहार सुनिश्चित करते हैं। 
दूसरा कारण है अविश्वास। आज हम सिर्फ स्वयं से अधिक किसी अन्य पर विश्वास करना लगभग विलुप्त सा होता जा रहा है। एक तरफ लोग मन संकुचित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ इस बात से दुखी भी हैं कि लोग मन में आपके साथ व्यवहार नहीं कर रहे हैं। एक तरफ हम ही जिम्मेदारियों से बच रहे हैं, दूसरी तरफ जिम्मेदारियां ही हमें परेशान कर रही हैं क्योंकि भागीदारी खत्म सी हो रही है। हम सहभागी होकर काम करने से दूर हो रहे हैं, हम एकल होने की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। हमें परेशान देखकर यदि कोई स्वयं से आकर मदद के लिए हाथ बढ़ा दे तो भी एक मन सशंकित ही रहता है कि कहीं जरूर इसका कोई स्वार्थ होगा। 
तीसरा करण है- प्रकृति से दूरी। पिछले 2-3 दशकों में जिस तरह से विकास के नाम पर शहरों ने गांवों को लीलना शुरू किया, उसका परिणाम हमारे घरों तक भी पहुंचा। अब घर के आंगन में लगे नीम की जगह लेने लगे गमलों में शौक के लिए लगाए बौनसाई। प्रकृति से जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीखा जा रहा है वो इन मल्टीस्टोरेज बिङ्क्षल्डगों की नींव में दब गया। अब न बरगद के नीचे चौपाल लगती है, जहां न जाने कितनी समस्याओं के हल निकाल लिए जाते थे न होते हैं बच्चों के खेल जो बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास करते हैं। अन्तोगत्वा परिणाम में दिखते हैं-टूटते घर, टूटते समाज। समाज में समयानुकूल परिवर्तन आवश्यक हैं, यह प्राकृतिक भी हैं, मगर अप्राकृतिक रूप से हुए परिवर्तन विकास नहीं विनाश की ओर ले जाते हैं। 
समाज की सबसे छोटी इकाई है परिवार, जब परिवार समृद्धि होंगे तो समाज निश्चित रूप से समृद्ध होगा। अभी भी समय है, हमें पुनॢवचार करना होगा, अपनी जीवन शैली को, अपनी सोच को और यथा संभव प्रयास करने होंगे। एक ऐसे समाज का निर्माण करने में जो जिसमें बसती है वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना।


शनिवार, 13 मई 2017

अतिथि देवो भवः


पिछले तीन महीने से दो चीजों की मार झेल रहा था-  बीमारी, और पैसा, एक और भी चीज है गर्मी मगर शायद उसको गिनाना उचित नही लग रहा, वरना आप लोग समझेगें की नाहक ही अपनी परेशानियां बढा चढा कर लिख रहा हूँ । मौसम की सबसे ज्यादा मार गरीब पर ही पडती है और इसे एक गरीब ही बेहतर समझ सकता है।
एक तरफ जहाँ दुनिया में सभी को छुट्टियों और खास कर इतवार का इन्तजार रहता मुझे लगता कि शनिवार के बाद यदि किसी भी तरह सम्भव हो सकता तो मै सोमवार ले आता। अरे नही नही ये ना समझिये कि मै अपनी पत्नी से तंग हूँ, सच तो यह था कि मैं घर आने वाले मेहमानों से डरता था, सभी समझते थे कि मै बहुत ठीक से रह रहा हूँ किसी को मुझसे मदद चाहिये होती थी किसी को मदद का वादा। और इधर तो जबसे मुन्ने की तबीयत क्या खराब हुयी सभी अपने को एक से ज्यादा हमदर्द बताने के लिये आते थे, मगर उनके आने से दर्द कम होता था या ज्यादा ये सिर्फ हम दो प्राणी ही जानते थे। अपनी छोटी सी कमाई से जैसे तैसे काम चला ही लेता था मगर इधर तीन महीनों से मेरी कम्पनी की हालत कुछ ठीक नही थी और क्म्पनी की इस हालात ने मेरी कमर तोड दी, ऊपर से  बच्चे की बीमारी और गर्मी। कितना सोचा था कि इस बार नया नही तो पुराने कूलर का जुगाड जरूर कर लूंगा मगर अरमान बस रात के सपने की तरह ही रहे। 
एक दिन श्रीमती जी ने कहा- सुनो मुन्ने को देखने अक्सर कोई ना कोई आया ही करता है और फिर इतनी गर्मी है तो खाली पानी देना जरा ठीक सा नही लगता, अब रोज रोज नीबू या कुछ मीठा तो लाया जा नही सकता अगर हो सके तो रूहाफ्जा की एक बोतल ला दो। 
मुझे श्रीमती जी की बात ठीक भी लगी। गाँव पास ही होने के कारण अक्सर कोई ना कोई आया ही करता था, और फिर सबके सामने गरीबी का रोना तो नही रोया जा सकता। मैने कहा ठीक है एक दो दिन में देखता हूँ ।
आज इतवार था, मगर आज उतना परेशान नही था, कारण था रूहाफ्जा की बोतल घर आ चुकी थी। अभी जैसे तैसे हम लोग खाना खा कर लेटे ही थे कि मुन्ने की दूर की बुआ यानी मेरी बहन ने दरवाजे पर लगी डोरबेल बजाने की जगह अपनी आवाज से ही काम लेना ज्यादा उचित समझा, और हमे दरवाजा खोलने से पहले ही अपने अतिथि की सूचना मिल गयी।
यहाँ मैं अपनी पत्नी के एक कौशल की तारीफ जरूर करूंगा, चाहे जितना दुखी हो या चाहे जितना सामने वाले को पसन्द ना करती हो मगर मिलती ऐसी आत्मीयता से थी बस सामने वाले के मन में यदि कही जरा सा भी जहर हो तो अमॄत बन जाय।
कोकिला दीदी हमारे गाँव के सरपंच जी की बेटी है, ना रूप गुण की राशि ना पढाई लिखाई पर सौभाग्य ऐसा की लखपति को ब्याह गयीं। हमारी श्रीमती जी किसी के धन बल पर रीझ जाय या सम्बन्ध व्यव्हार बढाये ऐसी महिला ना थी। और कोकिला दीदी के पास गर्व करने के पर्याप्त संसाधन ईश्वर ने जुटा दिये थे। सो आप उन दोनो के सम्बन्ध की मधुरता की कल्पना कर ही सकते हैं।
दो चार मिनट की वार्तालाप के बाद श्रीमती जी उठी और बोली- दीदी आपके लिये कुछ ठंडा लाती हूँ। और थोडी ही देर में वो दो ग्लास रूहाफ्जा ले कर आयी।
कोकिला दीदी मुँहफट है ये तो मै बचपन से जानता था मगर आज भी नही बदली इसका आभास नही था। ग्लास देखते ही बोली- क्या रे निखिल, तुमने अपनी बीबी को नही बताया कि तेरी दीदी को रुहाफ्जा बिल्कुल भी पसन्द नही। फिर थोडा नाटकीय अंदाज से बीते समय को याद करते हुये बोली - मुझे याद है तेरी शादी में भी टंकी का टंकी यही घोल दिया गया था, मगर चाचा तक को याद था कि उनकी बिटिया तो इसको हाथ तक नही लगा सकता तब कही से उन्होने मेरे लिये कोकाकोला की बोतल मंगायी थी।
मै उनकी बात का मतलब समझ रहा था, तुरन्त उठा और बोला- अरे दीदी, इसको बताया तो था मगर शायद बच्चे की बीमारी में याद ना रहा होगा, आप बताओ ना क्या पियोगी, वही कोकाकोला या कुछ और..। कुछ और नही तुम तो कोकाकोला ही ला दो।
बस मै अभी आया कह कर मेरा हाथ जेब में पडा जिसमें आखिरी पचास का नोट और मुन्ने की दवा का पर्चा थे। मन ही मन सोच रहा था कि यदि रूहाफ्जा पी ही लेती तो क्या बिगड जाता आखिर लोग कडवी दवाई कैसे पी जाते है फिर रूहाफ्जा इतना भी बुरा तो नही, टी वी पर भी तो एड आते हैं तभी मेरी निगाह अपनी पत्नी पर गयी जिसकी आंखों में मै साफ पढ सकता था – अतिथि देवो भवः

गुरुवार, 11 मई 2017

क्या कहिये




जो दिख रहा वो सच नही 
फिर अनदिखे को क्या कहिये 
हस रहे जख्म महफिलो में
गुमसुम खुशी को क्या कहिये

हर किसी ने हर किसी की
किस्मतों पर रश्क खाया
फिर भी आसूं हर आँख में 
तो नजरिये को क्या कहिये

दिल लगाया इसलिए कि
दिल को तो कुछ सुकून हो
दिल लगा सूकूं काफुर हुआ 
तो दिल्लगी को क्या कहिये

कुछ कर गुजरने की चाहत 
जगी तो वो नेता बन गए 
कुछ छोड, कर गुजरे वो सब
तो दिल्ली को क्या कहिये 

जीते जी वो मर गए जो
हो गये जिंदगी से खफा 
जिन्दगी फिर भी न रूठी 
तो जिंदगी को क्या कहिये

बुधवार, 10 मई 2017

छोटी नौकरी


उसे ना बहुत गोरी ही कहा जा सकता था ना ही सांवली। हाँ कद काठी ऐसी थी कि एक बार मुड कर देखे बिना रुका ना सके, और सबसे बडा उसका आकर्षण थे उसके नागिन से लम्बे सुर्ख काले बाल, जो लडकों के तो क्या लड्कियों तक के मुंह से उफ्फ निकलवा देते।
पिछले दिनों ही मेरे पडोस में रहने आयी और चंद ही दिनों में ऐसी दोस्ती हुयी कि लगता पिछले जनम में जरूर हम बहन ही रहे होंगें। एक कारण यह भी था कि जब से मेरी नौकरी का ट्रांसफर हुआ मै भी बिल्कुल अकेली ही थी।
कई साल की नौकरी में कभी हास्टल रही कभी पीजी मगर इस बार मन किया बिल्कुल अकेले रहा जाय। ऐसा नही था कि मैं अकेले किसी खास आजादी के कारण रहना चाह रही थी, मगर इतने सालों के बाहर रहने के अनुभवों में एक बात तो समझ आ गयी थी कि यदि अपनी सेहत और मन का खाना है तो अपने रसोई बनानी पडेगी, और फिर मकान लेने का एक और फायदा था कि जब चाहे घर से कोई आ जा सकता था। मगर बहुत जल्द अकेले रहने के नुकसान भी दिखने लगे, शुरु शुरु में तो खूब घर सजाया, खूब मन का बनाया, फिर धीरे धीरे ऑफिस की थकान घर तक आने लगी, और कई कई दिन मैगी और ब्रेड पर निकलने लगे।
अभी कुछ दिनों पहले जब पडोस में नैना रहने आयी तो लगा जिन्दगी अब कुछ मजे से कटने वाली है, और हुआ भी यही, यूं तो नैना उम्र में मुझसे चार पाँच साल छोटी थी मगर दो चार मुलाकातों में ही उसने साफ साफ कह दिया, हम दोस्त हैं ये दीदी वीदी हम तो नही मानने वाले, और मैने भी हंस कर उसकी दोस्ती को ही गले से लगाया।
नैना की बातों से ही पता चला कि पडोस में रहने वाले अग्रवाल जी की दूर की चचेरी बहन लगती है, और नौकरी ढूंढने के सिलसिले में यहाँ आयी है। उन दिनों मेरे ऑफिस में भी निविदा पर जगह निकली थी ये सोचकर कि शायद नैना का कुछ काम बन जाय, जब मैने उसको निकली हुयी जगह के बारे में बताया तो वो बोली- क्या तुमने भी मुझे इतना छोटा समझ लिया, ऐसी छोटी नौकरी थोडे ही करूंगी, ये ही करना होता तो अपना ही घर क्या बुरा था।
बात शायद नैना ने ठीक ही कही थी, मगर उसके कहने में जिस गर्व का मुझे अनुभव हुआ वो कुछ चुभ सा गया। कौन सा मैने उसको सारी जिन्दगी ये नौकरी करने को कहा था, मैने तो बस अपनेपन के नाते बताया ही था। खैर दिन जाते रहे, नैना को आये करीब दो महीने हो रहे थे, मगर अभी कुछ काम बन सका था। छोटी नौकरी वो करने को तैयार ना थी और बडी नौकरी उसे मिलती नही थी।
यूं तो रोज शाम को आने का उसका नियम ऐसा था जैसे सूरज का ढलना और चाँद का निकलना मगर आज जब दो दिन हुये तो मुझे चिन्ता होने लगी। सोच रही थी कितनी मूर्ख हूँ आज के मोबाइल के जमाने में भी उससे ना तो उसका नम्बर लिया ना अपना दिया। ऑफिस से काफी थकी थी सो आलस करके लेट गयी, सोचा आती ही होगी। रात भूखी ही सो गयी, सुबह फिर वही ऑफिस। आज ऑफिस में कुछ कम काम था सो दिन में कई बार नैना के बारे में ख्याल आया। सोचा शाम को आज मै ही घर जाऊंगी, मगर अचानक एक हफ्ते का ट्रेनिंग का प्रोगराम मुझे सौंप दिया गया क्योकिं जयंत (मेरे सीनियर) की वाइफ को अचानक दिल का दौरा पड गया था। इस भागमभाग में नैना कही खो सी गयी। मगर मुंबई जाने से लेकर आने तक के रास्ते भर बराबर नैना की याद आती रही। वापस सीधे ऑफिस रिपोर्ट करना था सो शाम को सीधे अग्रवाल जी के घर ही गयी, उम्मीद थी कि गेटे पर ही नैना मिल जायगी तो उसको घर लेती आउंगी, और फिर पूंछूंगी क्यो नही आयी इतने दिनों से, फिर मन में ही सोचा इतने दिन अरे आज मिला कर तीन दिन होते, सच जब किसी से रोज का ही मिलना हो तो एक एक दिन भी महीनों सा बन जाता है। डोर बेल बजायी तो अग्रवाल जी की मिसेजे ने गेट खोला, मिसेज अग्रवाल जिनकी ना तो ऐसी उमर थी कि उनको आंटी कहा जा सकता था और ना दीदी जैसी उनसे आत्मीयता कभी जुड सकी थी सो हमेशा आप से ही काम चला लेती थी। और आज तो उस आप का भी विलोप करते हुये सीधे बोली- कई दिन से नैना नही आयी, कही गयी है क्या?
मिसेज अग्रवाल ने मेरे उत्तर के प्रतियुत्तर में मुझे अन्दर आने का निमंत्रण देते हुये कहा- लगता है अभी सीधे ऑफिस से आ रही हो, देखो गरमी भी तो कितनी ज्यादा हो रही है, आओ अंदर आ जाओ। गरमी की बात सुनते ही मुझे भी अनुभव हुआ कि वाकई गरमी बहुत थी और शायद मेरे चहरे की थकन देखकर उन्हे पहले मुझे पानी देना ज्यादा जरूरी लगा होगा। एक ही सांस में पूरा ग्लास पानी पी गयी, शायद तभी उन्होने मुस्कराकर कहा- और लाऊं क्या। थोडा सा खुद पर झिझक भी हुयी, कि इतनी आतुरता से पानी पीने कि क्या जरूरत थी मगर शायद गरमी में सूखा गला नही समझ सकता था और वो सूखी मिट्टी में पडी बारिश की हर बूंद को सोखता चला गया।
खाली पानी के ग्लास को मेरे हाथ से लेकर मेज पर रखते हुये मिसेज अग्रवाल बोली- नैना अपने घर चली गयी है, चली गयी है क्या मतलब था इसका क्या अब उसको वापस नही आना था, क्या उसको नौकरी मिल गयी थी या घर में कोई समस्या आ गयी थी, कई सारे सवाल मन में ऐसे आ गये जैसे पटरी पर माल गाडी के डिब्बे पलक झपकते ही निकल जाते हैं, मगर मिसेज अग्रवाल बहुत ही संयत थी। कही मेरे सवालों को वह अन्यथा ना ले, मैने खुद को बहुत नियन्त्रित करते हुये पूंछा- चली गयी मतलब, उसको कही नौकरी मिल गयी क्या?
मन ही मन गुस्सा तो आ रहा था कि ऐसे भी कोई जाता है क्या, कम से कम मिल कर तो जाती, उसकी खुशी से मुझे बहुत खुशी होती, मगर गुस्से को मन में ही रखना उचित था। तभी मिसेज अग्रवाल ने कहा- नही नौकरी कहाँ मिली, वो तो हम सबको छोड कर जाने कहाँ चली गयी। उसका फोन उसका सामान उसकी डिग्री सब यही पडे हैं, दो तारीख की सुबह निकली थी, कह रही थी – भाभी आप सबको बहुत परेशान किया, अब नही करूंगी, आज चाहे जैसी नौकरी मिले छोटी या बडी कर लूंगी। आज पूरे तेरह दिन हो गये नैना का कही पता नही, ना कही से कोई दुर्घटना की खबर ना किसी रिश्तेदारी में। दो महीने पहले एक एक्सीडेंट में माँ बाप नही रहे थे, ये उसको अपने साथ ले आये थे, मै बेऔलाद क्या जानती थी कि मेरे नसीब में तो औलाद का सुख था ही नही।

उफ्फ कितना कुछ समेटी थी खुद में , कभी कुछ नही बताया, और मै समझती थी कि हम एक माँ से जायी बहन से हैं जिनके बीच कोई बात अकेली नही। तो क्या वो सिर्फ मुझे ही खुशी देने आयी थी। मन में सैकडों सवाल हर रात उठते हैं और दब जाते हैं। बस तब से लेकर हर शाम जब घर लौटती हूँ तो मन में एक ही आस रहती है वो कही से आ जाय, और मुझसे कहे- ऐसी छोटी नौकरी थोडे ही करूंगी। 

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

कैसे कटेगा ये पहाड सा जीवन?... Why Walking Alone


ये मेरे जीवन में पहला अवसर नही था जब मैं इस प्रश्न का उत्तर दे रही थी। अब तक तो मुझे इस प्रश्न की आदत सी हो गयी थी, कुछ लोग मेरे कार्य की प्रसंशा करने के बाद य्ह प्रश्न पूंछते थे, कुछ की बातों का आरम्भ ही इस प्रश्न से होता था। आप भी सोच रहे होंगे कि प्रश्न पूंछने की चर्चा तो इतनी कर ली किन्तु प्रश्न अभी तक नही बताया, लिखूंगी वो भी लिखूंगी उसके पहले अपने बारे में कुछ बताती हूँ- मै अपने जीवन में पैतालीस बसन्त देख चुकी हूँ, और इन पैतालीस बसन्तों के पार होने में देख चुकी हूँ जीवन के अनन्त उतार चढाव, अनुभव कर चुकी हूँ नाना प्रकार के सुख दुख, सीख चुकी हूँ जीवन को जीना। किन्तु शायद लोग मुझसे ज्यादा मेरे लिये फिक्रमंद रहते हैं, और इसीलिये अक्सर लोग पूँछ लेते हैं- मीरा जी कैसे काटेंगीं ये पहाड सा जीवन? मीरा जी कैसे काटती है आप अपना खाली समय? मीरा जी क्या अकेले घर आपको काटने को नही दौडता? वगैरह वगैरह...। बार नाकाम कोशिश करती हूँ कि मेरी मुस्कराहट ही मेरा जवाब बन जाय किन्तु हर बार मेरी निश्छल हंसी से वह मेरे उत्तर ना देने की बात को समझ नही पाते या समझना नही चाहते या उन्हे लगता है कि शायद इस अर्धप्रौढा महिला ने उनके प्रश्न को समझा नही तो वह अपने प्रश्न में और शब्दों को सम्मिलित करते हुये प्रश्न का स्वरूप इस तरह बदलते है कि प्रश्न की आत्मा पूर्णतः जीवित रहे|
जब पूर्णतः मै आस्वश्त हो जाती हूँ कि प्रश्नकृता उत्तर का भिक्षुक है तो फिर उसको निराश करके पाप की भागीदार बनने से श्रेयश्कर लगता है कि भिक्षुक को उचित भिक्षा दी जाय।
फिर उत्तर की भिक्षा के रूप में उसकी झोली में डाल देती हूँ- अपनी बेबसी, अपना दुख, अपना दुर्भाग्य और अपनी लाचारी…..। यह सब पाकर वह भिक्षुक ऐसे प्रसन्न होता है जैसे किसी भिखारी को आशा एक रुपये या दो रुपये की हो और उसे सौ या दो सौ रुपये मिल जाय।
अब भिक्षुक के मन में भाव जगता कि वह तो एक दाता है- सामने वाला तो दीन हीन कमजोर लाचार किस्मत का मारा है, फिर वह मुझे सांत्वना देकर अपने दाता होने की संतुष्टि करता है. और बुनने लगता है झूठी सहानुभूति, अपनेपन का जाल।
यकीन मानिये मुझे आज तक किसी अविवाहित पुरुष के प्रति मन में ऐसी सहानुभूति नही हुयी, शायद मेरा ह्दय इतना उदार नही। मुझे कभी ऐसी आवश्यकता महसूस नही हुयी कि किसी से भी( ना स्त्री ना पुरुष) उसकी उम्र या कमाई पूँछी जाय।
किन्तु आज मै मेरे सभी अपरिचित और परिचित प्रश्नकॄताओं से कुछ कहना भी चाहती हूँ और पूंछना भी चाहती हूँ- कहना चाहती हूँ कि क्या वास्तव में जीवन काटने वाली वस्तु है और यदि है तो क्या विवाह वो कैंची है जो जीवन काटने में मदद करती है। ईश्वर ने यह जीवन जीने के लिये दिया है ना कि काटने के लिये।
और पूँछना चाहती हूँ कि मेरे अविवाहित होने पर क्या वाकई उनका मन मेरे जीवन के प्रति चिन्तित होता है? क्यों एक अविवाहित लडकी के चाल चलन पर प्रश्न किये जाते है कभी प्रत्यक्ष रूप से कभी अप्रत्यक्ष रूप से। मैंने बहुत सारे लोगों को हमेशा शालीनता से जवाब दिया है और देती रहूंगी, किसी उत्तर भिक्षुक को निराश नही करूगीं किन्तु मुझे वापस में उनसे कुछ भी नही चाहिये- नही चाहिये छल पूर्ण आमंत्रण, नही चाहिये छदम वार्ता, नही चाहिये आभासी सहानुभूति पूर्ण व्यव्हार। आज कई सारे कटु अनुभवों के आधार पर कह सकती हूँ कि एक लडकी मुख्यतः अविवाहित लडकी समाज में अपनी योग्यता के आधार पर अपने जीवन को एक ऐसे मुकाम पर पहुँचाती है जहाँ तक शादीशुदा पुरुष सामान्यतः नही पहुंच पाते तो उसको पीछे करने का बडा ही आसान सा तरीका होना है उसके अकेलेपन के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करना। फिर सहानुभूति की सीढी चढकर उसके पतन की कोशिश करना ।
उपरोक्त शब्दों से किसी के भी मन को ढेस पहुंची हो तो हदय से क्षमाप्रार्थी हूँ। यह मात्र मीरा के जीवन के अनुभव हैं, मुझे मित्र होने के नाते उसने माध्यम बनाया, उसको ऐसा लगता है कि उसके अनुभवों को मैं शब्दों की माला में सुन्दरता और सजीवता से पिरो सकती हूँ। 
              मीरा की बात के अन्त में, मैं दो शब्दों में अपनी बात कहूंगी- मीरा एक ऐसी महिला है जो मेरे साथ साथ ना जाने कितनी स्त्रियों, पुरुषों की आदर्श है, लोग सीखते है उससे जीवन जीना, स्वच्छंद हंसी उसका ऐसा आभूषण है जो उसके व्यक्तित्व को सदैव निखारता है। मीरा एकाकी होकर भी आज सफलता के एक ऐसे मुकाम पर है जहाँ से आप उससे प्रेरणा ले सकते हैं। यदि सम्भव हो तो अब किसी भी मीरा के जीवन में उत्तर का याचक बन कर ना आइयेगा। क्योंकि निजी प्रश्नों को निजी लोग ही पूँछें तो उचित भी लगता है और शोभनीय भी। और न कीजिए चिंता मीरा के लिए क्यो कि वह जीवन जीने मे विश्वास करती है काटने मे नही । कोई भी विष प्याला देकर उससे जीने की कला का हरण नही कर सकता। स्त्री के शक्ति रूप दुर्गा की स्तुति करने वाले क्यों यह ध्यान नही करते कि स्त्री कभी भी जीवन की खुशियों के लिये पुरुष पर निर्भर नही है। 

मंगलवार, 28 मार्च 2017

माँ दुर्गे का भजन....


अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार
कोई लाया लाल चुनरिया॒॑sss - 2, कोई करे जयकार
शेरोवाली के दरबार, लगी भक्तो की कतार

दुष्ट जनों का नाश किया,
दुर्बल के कष्ट मिटाये
जो भी पुकारे भक्तिभाव से,
मइया के दर्शन पाये
खाली हाथ ना लौटा वो जोss - 2 आया माँ के द्वार
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

सिन्दूर सोहे माँ के माथे,
सजे कंठ में माला
सिंह की अम्बे करे सवारी,
लेकर बरछी भाला
मइया का है रूप निराला ss - 2, महिमा अपररम्पार
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

ब्रह्मा विष्नु महेस सभी,
करते गौरी का गान
ममता का है रूप भवानी
और शक्ति की खान
जो भी आया लेकर झोली ss - 2, उसे मिला वरदान
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

कोई लाया लाल चुनरिया॒॑sss - 2, कोई करे जयकार
शेरोवाली के दरबार, लगी भक्तो की कतार

* चित्र के लिये गूगल का आभार

रविवार, 26 मार्च 2017

समझ से सही समझ तक


मम्मी पापा तो समझते ही नही कि अब हम बच्चे नही रहे अब हम स्कूल नही कॉलेज जाते हैं, और वहाँ लोग नोटिस करते हैं कि हमने क्या पहना है, रोज रोज वही कपडे पहन कर जाने से मेरा मजाक बनता है। मम्मी आप ही कह दो ना पापा से मुझे सिर्फ दो जींस दिला दे, प्लीज मम्मी कह दोगी ना। हाँ हाँ कह दूंगी, तुम्हारे पापा का मूड देख कर, मगर मैं तेरी फर्माइशों की गारंटी नही लेती। कह कर वसुधा नाश्ता बनाने में जुट गयी और मलय अपने स्टडी रूम में चला गया।
उपरोक्त दॄश्य हर घर में यदा कदा मिल ही जाता है। जिसमें घर की सम्पूर्ण जिम्मेदारी का वहन करने वाला पिता प्रथम दॄष्टया विलेन ही नजर आता है। बच्चे मासूम उनकी फर्माइशें जायज और माँ पिता पुत्र के मध्य एक सेतु सी नजर आती है। यहाँ बहुत से पहलू विचार योग्य हैं जिनकी अनदेखी समाज में एक नये कैंसर को जन्म दे रही है। बहुत से ऐसे सवाल हैं जिनका समय पर हल मिलना आवश्यक है। बात ना सिर्फ बच्चों की फर्माइशों की है, ना उनके जिद करने की, यह तो स्वाभाविक है, किन्तु अस्वभाविक है दोनो अभिभावकों में से किसी एक के प्रति मन में उपजता अविश्वास। ये उस श्रंखला की प्रथम सीढी है जिसका अन्तिम पढाव है- कुंठा, विद्रोह, छल।
कैसे बच्चे में यह आस्वश्ति विकास करती है कि वह माता के समक्ष अपनी बात रखते हुये पिता का अनादर कर सकता है? कैसे उसकी समझ यह कहती है कि उसका पालनहार उसका पिता उसे नही समझता? कैसे वह इस विश्वास में जीने लगता है कि उसकी हर जिद जायज है और पिता उसका धुर विरोधी? कैसे एक पत्नी को अपने पति से कुछ कहने के लिये उसके अच्छे मूड को देखना पडता है? कैसे बच्चे में यह बात घर कर जाती है कि समाज में उसका सम्मान उसके रहन सहन के स्तर से होगा ना कि उसके गुणों से?
इन सभी प्रश्नों के होने का मात्र एक कारण है? हमारे पास आज समझ की कमी नही किन्तु सही समझ का सर्वथा अभाव है।
हम सभी अपने आप में समझते है कि हम सही ही सोचते समझते हैं। गलती तो सिर्फ दूसरे की है। फिर यह मै और दूसरे का चक्र चलता रहता है, हर मै दूसरा बनता है हर दूसरा मै। हर मै दूसरे को गलत और स्वयं को सही समझता है। यहाँ फिर मन में एक सवाल उठता है क्या सही समझ व्यक्ति दर व्यक्ति निर्भर करती है, क्या यह सार्वभौमिक नही, क्या यह समय और स्थान से परे नही? क्या सही वास्तव में परिवर्तनशील है?
हर वह प्रश्न जो मन से उपजता है, मन ही उसके उत्तर का स्रोत बनता है। जब हम स्वयं को खंगालते है तो अक्सर हम पाते हैं कि जैसे आचरण, जैसे विचार की हम दूसरे से अपेक्षा करते है, बहुधा हम वैसा नही कर पाते। और यह दूसरा हमसे अलग नही यह या तो मेरी पत्नी है, या भाई, या मेरा निकट सम्बन्धी या मेरा मित्र या फिर मेरा कोई परिचित। हम साथ रहते हुये भी विचारों से साथ नही हो पाते, क्योकि हम अपनी समझ से अपने जीवन को गति देते है, सही समझ की तरफ ध्यान भी नही जाता।
सही समझ का अर्थ है ऐसा विचार जो सभी के लिये एक सा हो। जो स्थान, काल और व्यक्ति से परे हो। जिसके किसी के लिये भी गलत होने की सम्भावना शून्य हो। जिसमें पूर्ण आश्वस्ति हो, विश्वास हो, अपरिवर्तित हो।
आज हम साथ रहते हुये भी साथ नही, हमारा शरीर तो साथ रहता है मगर विचार नही। हम एक दूसरे के सम्बन्धी तो बन जाते है मगर सम्बन्ध स्थापित नही कर पाते क्योकिं सम्बन्धों को रीति रिवाजों से निकट तो लाया जा सकता है मगर जोडने के लिये आवश्यक है, विचारों की विश्वसनीयता।
विश्वास बनने या करने का कार्यक्रम किसी भौतिक वस्तु के आदान प्रदान के माध्यम से नही किया जा सकता, यह बनता है सही समझ के विकास से।
एक शिशु में जब सोचने समझने की शक्ति विकसित होती है, उससे कही पहले उसका अपनी मां   के साथ विश्वास का रिश्ता प्रौढ हो चुका होता है, और पूर्ण विश्वास के साथ वो माँ का अनुकरण करते हुये अपने विकास की यात्रा को आरम्भ करता है। विश्वास की इस कडी में फिर उसका सम्बन्ध जुडता है अपने पिता फिर परिवार जनों, और फिर समाज से। धीरे धीरे सम्बन्धों के निर्वाह में साधन अपनी जगह बनाते जाते है, और इस क्रम में एक समय के अन्तराल के पश्चात सम्बन्ध भाव प्रधान न रह कर साधन प्रधान होने लगते हैं।
भाव से साधन की तरफ बढती प्राथमिकता ही वह समय है जहाँ यदि सही समझ से विचार न किया जाय तो सम्पूर्ण जीवन व्यक्ति सुख की खोज में अपना जीवन व्यतीत करने के उपरान्त यह निष्कृष निकालता है कि सुख के लिये साधन गौण थे प्राथमिक नही।
सुखी तो हम सभी होना चाहते है, सारा जीवन इसी प्रयास में निकलता भी है किन्तु सही समझ के अभाव में भाव की शून्यता होती जाती है और अथक परिश्रम के बाद भी वास्तविक सुख नही मिलता। तो क्यों ना हम कुछ समय निकाल कर स्वयं को दे और विचार करे कि कैसे सही समझ को विकसित किया जा सकता है क्योकिं सही समझ ही मात्र एक पथ है जीवन में निरन्तर सुख पाने का।
ये लेखिका के स्वतंत्र विचार हैं।

प्रकाशन के लिये आदरणीय भोलेश्वर उपमन्यु जी (हमारामैट्रो के सलाहकार सम्पादक) का बहुत बहुत आभार।

शनिवार, 18 मार्च 2017

पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे...................


पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे
भले बिछा लो शूल मार्ग में
पर नष्ट नही कर पाओगे…………………..
कठिनताओं से हाथ मिलाना
प्रिय खेल रहा है बचपन का
दुष्कर को ही लक्ष्य साधना
इक ध्येय रहा है जीवन का
तन पर प्रहार कितने कर लो
मन क्लांत नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………
उर में घातक हथियार लिये
जिव्हा पर प्रेम का अंकुर है
पुष्प से कोमल हम कहकर
रस हेतु भ्रमर सा आतुर है
तोडों या कुचलो तुम कलियां
गन्ध नष्ट नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………
विश्वास किये हम साथ चले
आघात की तुमने राह चुनी
सीता की चाह धरी मन में
ना राम की कोई बात सुनी
मै तत्पर हूँ अग्निपरीक्षा को
तुम वनवास नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हर राह में साथ निभाउंगी.................


साथी तुम मेरी नींद बनो
मै स्वप्न में तेरे आउंगी।
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी

सृष्टि में कुछ भी पूर्ण नही
बिन गंध है पुष्प अधूरा सा
दीप प्रज्जव्लित हुआ तभी
जब साथ मिला है बाती का
तुम देखो तो बन बिन्दु मेरा
मै आकार तेरा बन जाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी..............................

धरती पर लहलहायी फसल
जब अम्बर ने जल बरसाया
पूजा सबने उस चाँद को तब
जब संसर्ग चाँदनी का पाया
बनकर तो देखो तुम कल्पतरू
मै अभीष्ट भाग्य बन जाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी..................................

कुछ भय तुमको भी घेरे है
कुछ मेरा मन भी व्याकुल है
कृष्ण से बिछडी राधा हरपल
चुप सी गोकुल में आकुल है
बंशी बन छेडो तो तान कोई
नित राधा बन रास रचाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी.......................................


* Thanks to Google for Image

रविवार, 5 मार्च 2017

डिजिटल युग में दोस्ती के नये रूप................Dizitalization of Friendship


आदमी- काश मेरे पास एक दोस्त होता
जिससे कह पाता अपने मन की बात
जो समझ सकता मेरी परेशानी
सब छोडकर देता मेरा साथ
तभी बोला मन- एक के लिये आप अभी भी रोते जाते है
फिर क्या सोचकर रोज फेसबुक पर मित्र बनाये जाते है

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आदमी- आप बहुत अच्छा लिखती है,
लेखनी में आपकी सौम्यता छलकती है
यदि आपको अनुचित ना लगे
तो क्या करेगीं मेरी फ्रैड रिक्वेस्ट स्वीकार
महिला- ये मेरा सौभाग्य है
जिसे कर चुकी थी अर्पित
बीस वर्ष पहले अपना तन मन
आज प्रस्तुत है वो लेकर निवेदन

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पहले दोस्ती होती थी धरती सी
जिसमें गहराई नापी जाती थी
आज विकसित हो गयी है गगन सी
जिसमें होता है सिर्फ आंकडों का विस्तार

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आधुनिकतावाद ने किया दोस्ती पर शोध
और बताये दोस्तो के तीन प्रकार
गर्ल फ्रैंड, ब्वाय फ्रैंड और फेसबुक फ्रैंड
और इन सबको बांधा एक सूत्र में
जिसका नाम है अन्फ्रैंड

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डिजिट्ल युग की सबसे बडी देन
घर बैठे अनलिमिटेड फ्रैंड पाये
जब चाहे जिसे चाहे जब तक चाहे
मित्र बनाये दोस्ती निभाये

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हजारों ने भरपूर मित्रता निभायी
घंटे भर में सब थे मेरे साथ
लाइक कर रहे थे मेरी पोस्ट
जिसमें बताया था, हुआ है
कल रात मेरी माँ का देहान्त

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जाने कहाँ विलुप्त हुये
सुदामा और श्याम
फूल माला भोग का
नही पूजा में कोई काम
ईश्वर तो देखता है
मात्र सच्चा भाव
श्रद्धा से शेयर होता
भगवान और भक्तिभावो
सर झुकाने मुराद पाने
नही जाना ईश के द्वार पर 
कि भगवान मन्दिर मस्जिद नही
मिलते हैं अब फेसबुक वाल पर

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

पलाश के दोहे.........


सत्कर्मो की अग्नि मे, जब तपती मानुष देह |
काम क्रोध होते भस्म,  मिलती प्रभु की नेह ||


सच्चा धन बस प्रेम है, बाकी जग मे सब झूठ |

खर्च होय से बढत जाय, ना खर्च से जाय छूट ||

साथी वही जो साथ दे, रहे भले कभी साथ |
साथ से एकला तो भला, ना भला बाँह का नाग ||


वृद्ध जनों का आशीष है, सत्कर्मो का परिणाम |

श्रम बिन जामे घास ही, ना लगे बाग मे आम ||

भूल से भी हो भूल तो, बिन भूले भूल लो मान |
जलती बाती अभिमान की, बढे दिये का मान||


जब मोह घटे सामान से, और बढे परस्पर नेह |

सुख समृद्धि सम्बन्ध फिर, न तजे आपका गेह ||


मन का कहा बिन तोल ही, जो करता सारे काज |
चार दिन की हो चाँदनी, फिर लम्बी काली रात ||

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

अपने लिये


जाने कितनी रातें इस उधेड बुन में काट दी कि अपनी आज की स्थिति को अपनी नियति मान ही लूँ और परिस्थितियों से समझौता कर लूं   या फिर जिन्दगी को कम से कम उस स्थिति में तो लेकर आऊँ जहां पर उसे जिन्दगी तो कहा जा सके। लोगो के घरों के बर्तन घिसते घिसते शायद मेरे हाथो की लकीरें भी घिस चुकी थी। कभी सोचती और रोती कि आखिर मेरी तकदीर में है क्या? और जब रो कर चित्त शान्त होता तो सोचने लग जाती कि आखिर क्या लिख सकती हूँ अपनी तकदीर में?
बचपन से आज तक जो मिला उसको पूरे मन से स्वीकार किया्। काम को मैने उस तरह से लिया जैसे बच्चे खेल को लेते है। गन्दे बर्तन, झाडू, पोछा ये मेरे प्रिय खिलौने थे या बना दिये गये थे। बचपन पार कर जब जवानी कि दहलीज पर पहुंची तो उससे बहुत पहले यौवन का मौसम मेरे जीवन में एक आभासी झोके सा आकर जा चुका था। मेरे साथ की सहेलियां जब अपने भावी पति के सपने सजाती थी उस समय मैं, घर में दो वक्त की रोटी के जुगाड मे उलझी थी।
शादी मेरे जीवन के कोई त्योहार नही स्थानान्तरण की तरह आयी थी। सामान्यतः लोग कहेगें इसमे नया क्या है, शादी के बाद हर लडकी का घर बदलता है । मगर मेरे लिये ये मायके से  ससुराल जाना नही था, बदला था मेरा काम करने का घर। शादी के पहले – बिजली वाले सक्सेना जी का घर था, एक मोटे हलवाई का घर था और एक था मेरी टीचर दीदी का घर। और अब मेरे पास थे- चक्की वाले गुप्ता जी, एक वर्मा जी का घर, जिनके पागल बेटे से मुझे डर लगता था या उसे मुझसे कह नही सकती मगर रोज ही जाने से पहले सोचती थी - "हे राम वो सो रहा हो और मै काम निपटा कर निकल लूँ"। मुँह दिखायी में मुझे ये दो घर मिले थे। शायद हम जैसी लडकियों को यही मिलता होगा, शायद मेरी माँ और मेरी सास को भी यही मिला होगा, इसलिये ना मै खुश थी ना दुखी।
ना कोई बडी ख्वाइश थी ना कोई चाहत, ना जाने कहाँ से एक दिन खुद के बारे में सोच बैठी, बस यही से सब बदल गया। उस दिन मै वर्मा जी के घर से काम करके लौटी तो हाथ मे था महीने भर का पैसा और ऊपर से दिये गये १०० रुपये। कल उनके पागल बेटे का जनम दिन था, तो न्योछावर किया गया पैसा, अलाय बलाय सहित मेरे हाथ में दे दिया गया था। कहना मुश्किल था कि मै फायदे मे थी या नुकसान में। बहुत दिन से एक लिपिस्टिक का मन था सो खरीद लिया, और पूरे मन से रात में लगा कर पति के सामने आयी, इस उल्लास के साथ की आज की रात बहुत प्यार भरी होगी, मगर नही जानती थी कि पूनम की रात को एक पल मे अमावस मे बना देने की कला पति के पास होती है। आरोपो के सिलसिलो से छलनी हुये सीने को अगर कोई देख पाता तो निश्चित रूप से होठों पर लगी लाली नही हदय की पीडा का रंग नजर आता। मेरा पति जो कल तक मुझे सब कुछ समझता था , आज मुझे कितने ही अपशब्दों के अलंकारों से सजा चुका था। वो पति जिसे हर रात मैं परमेश्वर समझ कर उसके तन से शराब की आती दुर्गन्ध को भी उसका प्रसाद समझ कर माथे सजा लेती थी। मैने भी निश्चय कर लिया था कि किसी भी ऐसे प्रश्न का उत्तर नही दूँगी जिसको सुनने से मै इन्कार कर सकती हूँ, धीरे धीरे प्रश्नो की तीव्र और तीखी बौछार होती गयी और अन्ततः शब्दों के बाण जब पति देवता के लिये काफी नही रहे तो उसने प्रहार का विकल्प चुन लिया। भला कौन था यहाँ मेरी रक्षा को जब रक्षक ही भक्षक बन गया था, सो मै इसे भी प्रसाद की तरह स्वीकर करती गयी।
रो धोकर इस उम्मीद के साथ रात बीती कि हर रात का एक सबेरा होता है, शायद कल सब ठीक हो जायगा। मगर पति की कठोरता के बाद अभी शेष थी वक्त की निष्ठुरता। कितनी ही मनगढन्त कहानियां बना ली गयी थी मुझे चरित्रहीन सिद्ध करने के लिये और फिर दया का पात्र बनाते हुये मुझे घर पर रहने की अनुमति दी थी मगर पत्नी शब्द अब सिर्फ मेरी मांग मे सिन्दूर तक सीमित हो गया। पति के वक्षस्थल की नयी अधिकारिणी अब आ चुकी थी। उसको भले ही मुँह दिखायी मे दो घर मिले थे मगर उन घरों का जिम्मा मेरे ही पास आया था। मुझमें अब और शक्ति नही बची थी। स्त्री हो या पुरुष वह यही चाहता है कि उसका जीवनसाथी सदैव उसे प्रेम करे, उसके साथ रहे, विवाह का सम्बन्ध तन का कम मन का ज्यादा होता है, मन में किसी और की छाया का विचार मात्र ही उसे विचलित कर देता है। और यहाँ तो तन मन दोनो से ही मुझे पद्च्युत कर दिया गया था। अब मेरे पास दो ही रास्ते शेष थे - घर छोडूं या दुनिया। मेरे निर्णय से फर्क किसी को नही पडने वाला था। मगर, मै लाख दुख मिलने के बाद भी अपनी शाख से अलग नही होना चाहती थी।
इसी द्वन्द में जाने कितनी राते काट चुकी हूँ, हर रात सोचती हूँ कि कल भोर से पहले मै इस घर से दूर अपनी एक दुनिया बसाने की यात्रा शुरु कर दूंगी। पर मन हमेशा मेरे पैरो मे बेडिया डाल देती।

मगर आज अन्ततः, आज मैने अपनी नयी यात्रा शुरु कर दी, अपनो के बिना अपने लिये। अब ठीक किया या गलत नही जानती, बस इतना जानती हूँ किसी को दुःख नही दे रही अपने को सुखी करने के लिये..................
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