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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

रिक्शेवाली की बेटी


वसुधा जब से स्कूल से आयी, बस रोये जा रही थी। तुलसी ने उसको चुप कराने की सारी कोशिश करके देख ली, मगर वसुधा का रोना ही नही बन्द हो रहा था। तभी तुलसी को याद आया कि वसुधा पिछले एक हफ्ते से चाकलेट की जिद कर रही थी, मगर उसकी गरीब माँ जानती थी कि एक चाकलेट के पैसों से एक वह पूरे एक हफ्ते की सब्जी ला सकती है, उस पर वो डरती भी थी कि एक बार उसकी बेटी जब चाकलेट का स्वाद जान जायगी तब वह रोज रोज जिद करेगी, मगर वसुधा को चुप करा पाने में असमर्थ तुलसी ने चाकलेट ले ही आने का निर्णय लिया, और दाल के डिब्बे में छुपाया बीस के उस नोट को निकाला जो उसने यह सोच कर रखा था कि कभी जरूरत पडने पर इससे वह अपनी बेटी के लिये दवा ला सकेगी, उस नोट से चाकलेट खरीदने को उठते हुये बोली- वसू चुप हो जा मेरी प्यारी बिटिया, चलो अच्छा आज तुम्हारी चाकलेट ले आते हैं। सिसकते हुये वसू बोली- नही हमको कुछ नही चाहिये, चाकलेट भी नही चाहिये, और फिर रोने लगी। और रोते रोते थक कर माँ की गोद में कब सो गयी। वो अबोध क्या जाने कि उसकी माँ अन्दर ही अन्दर खुद को कितना असहाय महसूस कर रही थी, हजारों सवाल मन में उठ रहे थे, आखिर उसकी सात साल की बेटी क्यों इतना रो रही है, आज नये स्कूल में उसका पहला दिन था, पहले ही दिन आखिर ऐसा क्या हो गया? फिर सोचने लगी चलो अच्छा हुआ सो गयी, उठेगी तब तक शायद बता पाय।
शाम तक बसू सोती ही रही, रग्घू जब घर आया तो उसकी आवाज से वसू जग गयी, उठते ही रग्घू से लिपट गयी- और फिर रोने लगी। तुलसी और रग्घू दोनो ही कुछ समझ नही पा रहे थे। रग्घू ने उसको गोद में उठा लिया, आसूं पोछ लाड से बोला- क्या हुआ, मेरी बिटिया रानी ने कोई सपना देखा क्या- वसू सिसकते हुये बोली- नही, फिर कुछ रुक कर बोली- पापा आज स्कूल में सब मुझे रिक्शेवाली की लडकी कह कर चिडा रहे थे, क्लास में कोई मेरे साथ वाली सीट पर नही बैठा, कोई मेरे साथ खेला भी नही, सब लडकियां कह रही थी – ये रिक्शेवाली की लडकी है, इसके पापा को हम पैसे देते है, तभी तो ये पढने स्कूल आयी है। पापा मै कल से स्कूल नही जाऊंगी।
रग्घू को समझ आ गया कि किसी ने उसे वसू के स्कूल में सुबह देख कर पहचान लिया होगा, स्कूल के किसी बच्चे के भाई या बहन को वह दूसरे स्कूल छोडता होगा। उनके लिये तो वह रिक्शेवाला ही है न कि वसू का पापा। तभी उसे याद आने लगा कि कितनी बार तुलसी ने उससे कहा था कि ऊंचे स्कूल में एडमीसन न कराओ, इत्ते बडे स्कूल में पढाने की हम लोगो की हैसियत नही है, और फिर अगर किसी तरह र पेट काट कर फीस जमा भी कर दी तब भी ऊंचे घर के बच्चों के बीच हमारी वसू दब कर रह जायगी। तुलसी समझती थी कि गरीब की लडकी को कोई सम्मान की निगाह से नही देखता, ये समाज गरीब की लडकी को नीच, चरित्रहीन और न जाने क्या क्या अपनेआप समझ लेता है। वो जानती थी कि अगर किसी तरह उसने अपनी लडकी को पढा भी लिया तो भी क्या, क्या कोई भले घर का आदमी एक रिक्शेवाले की बेटी को अपनी बहू बनायेगा। ऐसा नही था कि रग्घू इन सब बातों से अनजान था मगर उसके जीवन का एकमात्र सपना था- वसू को कलक्ट्ट्र बनाना। इसीलिये वह पढाई के साथ किसी भी तरह का समझौता करने को बिल्कुल भी तैयार न था।
रग्घू गरीब जरूर था मगर इरादों का पक्का था। अचानक रग्घू को याद आया सुबह जब वह वसू को रिक्शे से उतार रहा था, डॉक्टर श्रीवास्तव अपनी बेटी को कार से उतार रहे थे। उसने बडे प्यार से वसू को समझाया। बोला- बिटिया- लोगों की बात ठीक ही तो है- इस दुनिया में सब लोग एक दूसरे से काम लेते है और पैसा देते है ।  तुमको याद है जब तुमको बहुत बुखार आया था तब हम तुमको एक बडे डॉक्टर के पास ले गये थे। हमने उनको फीस भी दी थी, दी थी न, छोटी सी वसू ने पापा की हाँ में हाँ मिलाते हुये बोला- हाँ पापा आपने दो सौ रुपये दिये थे। रग्घू बोला – हाँ , और इन पैसों से उन्होने अपनी बेटी की स्कूल फीस दी होगी। जानती हो उनकी बेटी भी तुम्हारे ही स्कूल में पढती है।
बिटिया- ये दुनिया का चक्र ऐसे ही चलता है, हर कोई कुछ काम करता है और पैसा कमाता है। हम कुछ काम करते है तो पैसा मिलता है, ये पैसा हम किसी और को देते हैं उससे वो कोई काम करता है। अगर इस तरह किसी का बुरा मानोगी तो लोग तुमको और परेशान करेंगे।
अच्छा अब एक बात तुम बताओ- तुमको क्या मेरा रिक्शा चलाना बुरा लगता है? नही पापा, बसू ने स्पष्ट उत्तर दिया। रग्घू की आखें छलक आयी, उसे विश्वास हो रहा था कि उसकी नन्ही सी बिटिया एक दिन उसके सपने साकार करेगी।
बीस साल पहले घटी ये घटना ही वसु के जीवन को बना सकी थी। कहते हैं मन की सच्ची लगन और मेहनत कभी निष्फल नही जाते। रग्घू तुलसी और वसुधा को बरसों की मेहनत और आत्मविश्वास का परिणाम मिला था। आज के हर अखबार की हेड लाइन थी- रिक्शेवाली की बेटी बनी आई. ए. एस. टॉपर।

आज शहर का शायद ही कोई ऐसा बडा आदमी रहा होगा जिसे बसुधा को अपने घर की बहू बनाने से ऐतराज रहा हो। शायद ही कोई ऐसा हो जो वसू से बात न करना चाहता हो, आज हर कोई वसू को देख कर कह रहा था- देखो ये एक रिक्शेवाली की बेटी है मगर आज ये शब्द एक तंज नही मिसाल बन रहे थे।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 23-11-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2796 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. आभार दिलबाग भाई को
    उनकी वजह से हम ये रचना पढ़ पाए
    सादर

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