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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

अपना शहर ……


अजनबी शहर में अपना शहर याद आया |
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||

जब देखा गली पे बच्चों को खेलते क्रिकेट,
और फिर अपने ही शीशे के टूटने की आवाज |

अपने बचपन का सुहाना दौर याद आया,
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


मिला सब यहाँ जो मिला ना था अब तक,

इस शहर ने हर सपने को बनाया हकीकत |

हर उडान पे वो पतंग का उडाना याद आया ,
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


घूमा बहुत मैं और देखी भी बहुत दुनिया,

सपनों की नगरी से लगे बहुत से नगर |
पर अपने शहर सा  कोई भी ना शहर पाया,

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


सोचते थे प्यार लोगों से होता है जगह से नही,

समझे तब जब उससे मीलों दूर हम आ बैठे |

उसकी मोहब्बत में खुद को जकडा पाया,

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ...........

14 टिप्‍पणियां:

  1. उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||
    उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ...........दी बिलकुल सही कह रही है आप... अपना शहर तो अपना ही होता है.... कैसे भूल सकता है कोई.....

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  2. शहर की यादें ..बहुत कुछ याद दिला देती हैं ..सुन्दर प्रस्तुति

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  3. पर अपने शहर सा कोई भी ना शहर पाया,
    ये कहीं न कहीं हर किसी की अनुभूति के धरोहर हैं!

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  4. सोचते थे प्यार लोगों से होता है जगह से नही,

    समझे तब जब उससे मीलों दूर हम आ बैठे |

    उसकी मोहब्बत में खुद को जकडा पाया,

    उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


    वास्तविकता भी यही है...ऐसा ही होता है।

    सादर

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  5. मन समर्पित तन समर्पित. मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन
    समर्पित चाहता हूँ मातृ-भू तुझको अभी कुछ और भी दूँ ॥

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  6. यादों को झंकृत करती आपकी यह रचना हर याद को ताजा कर देती है ....!

    उत्तर देंहटाएं
  7. घूमा बहुत मैं और देखी भी बहुत दुनिया,

    सपनों की नगरी से लगे बहुत से नगर |
    पर अपने शहर सा कोई भी ना शहर पाया,

    उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||
    बहुत ही सुंदर हर एक की यादों को ताज़ा करती दिल को छु लेनी वाली सुंदर रचना ....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  8. बहुत कुछ पठनीय है यहाँ आपके ब्लॉग पर-. लगता है इस अंजुमन में आना होगा बार बार.। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद !

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  9. जब देखा गली पे बच्चों को खेलते क्रिकेट,
    और फिर अपने ही शीशे के टूटने की आवाज |

    अपने बचपन का सुहाना दौर याद आया,
    उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ...

    वाह ... कहाँ लौटा के ले गए आप पुराने दिनों में ... कितने कांच टूटते थे अब क्या बताएं ...

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  10. अपना घर -अपना शहर ही अपना होता है ... बहुत सुंदर रचना

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  11. समझे तब जब उससे मीलों दूर हम आ बैठे |
    यह पीड़ा शायद सबके मन में उठती है,किंतु बड़ी ही मधुर भी होती है.खूबसूरत यादें.
    कुछ इन्हीं भावों पर एक गीत यह भी
    आज अपने घर के आँगन की याद आती है

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  12. कल 25/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. बहुत सुन्दर भावनाएं संजोयीं है आपने...
    सादर बधाई

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