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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

गुनाह



माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हम कल ही यहाँ से चल देंगें है, इससे तो बहुत भला है अपना इंडिया। हम आ रहे हैं माँ। कहते हुये राधिका का फोन कट चुका था। मगर अनुसुइया जी के सामने तीन महीने पहले का दृश्य एक बार फिर से घूम गया।
राधिका अनुसुइया जी की एक मात्र संतान थी, उन्हे पालन पोषण में कभी इस बात पर विचार भी नही आया कि यह पुत्र है या पुत्री। लम्बे समय से वैधव्य का दंश झेल रही अनुसुइया जी के लिये वह जीविका का सहारा थी यह कहना गलत ही था किन्तु भावनात्मक रूप से वह उस पर पूर्ण निर्भर थीं।
दो साल पहले उन्होने राधिका की शादी बहुत धूम धाम से अपने ही समाज के एक प्रतिष्ठित परिवार में की थी। उनका मानना था कि विवाह करने के लिये दो चीजों का मेल खाना बहुत जरूरी है- एक लडके लडकी की कुंडली और दूसरा – लडके लडकी का कार्यक्षेत्र। विवेक, राधिका की ही तरह पेशे से डक्टर था।
दोनो की खुश गृहस्थी को देख वह सन्तुष्ट थी। विवेक भी घर का दामाद ना होकर बेटा ही था।  कोई एक पाँच छः महीने पहले राधिका के परिचित में कोई सउदी अरब चला गया था, प्रेक्टिस करने के लिये। उस दिन से तो राधिका के सिर पर भी सउदी जाने का भूत चढ गया था। पहले तो विवेक ने उसे खूब समझाया कि हम लोग यहाँ बहुत खुश हैं, सभी अपने हैं यहाँ और फिर माँ के लिये  तुम्हारे सिवा उनका कौन हैं, वगैरह वगैरह। मगर राधिका तो जैसे अपनी ही धुन में थी। एक दिन विवेक राधिका के साथ अनुसुइया जी के घर आया, और सारी स्थिति से अवगत कराया। माँ ने भी अपनी यथाशक्ति उसको समझाने की कोशिश की मगर राधिका टस से मस ना हुयी  और बोली- माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हमे जितनी जल्दी हो यहाँ से चल देना चाहिये, विवेक हमने सारी तैयारी कर ली है और प्लीज माँ की चिन्ता तुम मत करो, मै सब कर लूंगी। और वैसे भी मैं माँ पर डिपेंड हूँ, माँ मुझ पर नही क्यो माँ ठीक कहा ना , कहते हुये उसने लाड से माँ की गोद में अपना सिर रख दिया। अनुसुइया जी ने भी प्यार से उसका माथा चूमते हुये कहा – हाँ बेटा ये बिल्कुल ठीक कह रही है। तुम लोग मेरे लिये क्यो परेशान होते हो। आज कल के जमाने में क्या मुंबई क्या सउदी सब बराबर है। अनुसुइया जी जानती थी कि उसकी पुत्री किसी भी तरह मानने वाली नही मगर वो भविष्य भी साफ साफ देख पा रहीं थीं, फिर भी उन्होने चलते समय समझाने की अपनी एक आखिरी कोशिश की थी, किन्तु शायद राधिका के कान शब्द तो सुन सकते थे मगर शब्दों के पीछे छिपे भावों को समझने के सारे दरवाजे वो बन्द कर चुकी थी।
मन ना होते हुये भी विवेक राधिका के साथ एक हफ्ते के भीतर ही सउदी चला गया। राधिका की बातें सुनसुन कर वो खुश थीं कि अच्छा हुआ उन्होने अपनी बेटी का मन नही मारा। मगर कुछ ही दिन बाद सब धीरे धीरे बदलने लगा। राधिका वहाँ पर महिलाओं की स्थिति से रोज दो चार हो रही थी। मगर खुद को समझा लेती थी कि मुझे इन सबसे क्या। मेरे पास मेरा काम है, मेरा घर है और इस सबसे बढ कर हर परिस्थिति में साथ देने वाला उसका पति विवेक है। वो अक्सर खुद ये विवेक से कहती- विवेक आप ही मेरी माँ को मना सकते थे, अगर आप साथ न देते तो तो मां      कभी आने नही देतीं।
मगर तीन दिन पहले जो हुआ उसके बाद राधिका किसी भी तरह जल्द से जल्द अपने देश आने को व्याकुल होने लगी। दरअसल, तीन दिन पहले राधिका के पास एक महिला आई थी, अपने गर्भ का पता करने। एक बार में राधिका ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो वह गिडगिडा कर बोली- आप मेरी जान बचा सकती हैं, अगर मेरे गर्भ में लडकी हुयी तो मेरे शौहर मुझे मार देंगे। उसकी बात सुन कर मेरे मन में कुछ आता इससे पहले वह बोली – अगर ये लडकी हुयी तो मैं इसे जन्म नही दूंगी। कुछ भी करके इसको दुनिया में नही आने दूंगी। मै हैरान थी कि क्या कोई माँ ऐसी भी हो सकती है? मैने उससे डॉट कर कहा – तुमको शर्म नही आती, तौबा करो, तुमको ऐसा गुनाह करने से डर नही लगता, कुछ तो अपने खुदा का खौफ करो। तुरन्त निकल जाओ यहाँ से वरना मै पुलिस को बुला दूंगी। वो रो रो कर कहने लगी – हमको पता है हम कोई गुनाह नही कर रहे, हम बेगुनाह है। मैं लगभग चीख सी पडी और उसको तुरन्त जाने को कहा। थोडी देर बाद मेरी नजर पास ही खडी एक नर्स पर पडी, ठीक से तो नही कह सकती कि वो अभी आयी थी या उसने मेरी उसकी बातें सुनी थी। रात को घर जाने से पहले वह मेरे पास आकर बोली- मैडम आप उसकी जान बचा सकती थी। मैने कहा- समीरा बी आप ये कह रही हैं ,सुना था आपने वो क्या कह रही थी। थोडी संजीदा होते हुये समीरा बोली- आप यहाँ के बारे में कितना जानती हैं, ये औरत जिसको अपना शौहर कह रही थी दरअसल वो उसका शौहर है ही नही, वो है लडकियों का सौदागर, ये दूसरे दूसरे मुल्कों से मजलूम लडकियों को जाता है, उनसे निकाह करता है, और फिर अगर लडका हुआ तो ठीक अगर लडकी हुयी तो, औरत को मार दिया और लडकी को अनाथाश्रम के रास्ते उसको अनाथ बताते हुये पहुँचा दिया बाजार। मैडम जी वो जानती थी कि अगर बेटी हुयी तो उसकी जिन्दगी में मरना तो तय है, चाहे जन्म से पहले मरे या जन्म के बाद रोज मर मर कर जिये और एक दिन फिर उसी की तरह किसी लडकी को जन्म देकर मर जाय।
रात भर मैं परेशान रही ये सोच कर कि मैने सही किया या गलत, क्या उसका औरत होना कुसूर था? क्या वो यहाँ से भाग नही सकती? क्या वो पुलिस की मदद नही ले सकती थी? बडी मुश्किल से सो पायी थी उस रात। सुबह देर से नींद खुली, विवेक अस्पताल जा चुके थे, मेरा सिर भारी हो रहा था, सोचा एक कप चाय पी लेती हूँ, चाय बना कर टेलीविजन ऑन किया, न्यूज का जो सीन मेरी आँखों के सामने था उसे देखकर हाथ में आ गयी मेज को अगर कस कर पकड ना लिया होता तो चक्कर खा कर गिर ही जाती। बीच बाजार में दो लोगों ने, पुलिस वालों की मौजूदगी में एक महिला का सरेआम कत्ल कर दिया था। न्यूज वाले बता रहे थे, उस पर अपने गर्भ में पल रही लडकी को मारने का इल्जाम था। और इसी कत्ल की उसे सजा दी गयी थी।

मेरी आँखो के सामने उसकी गिडगिडाती तस्वीर घूम रही थी जो रो रो कर रह रही थी- मैडम जी मैं बेगुनाह हूँ। तभी राधिका को माँ की याद आयी- बेटी माना अपने देश में पैसा खूब नही पर मान बहुत है। दूसरे ही पल उसके हाथ में मोबाइल था जो माँ के नम्बर को स्क्रॉल रह रहा था। 


* Image is referred from google.  and story is based on imaginations, if something match with any reality then it will be a purely coincidence.  my aim is not to heart anyone.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 16 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. मार्मिक मगर सत्‍य के करीब । सुंदर

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