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सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

पलाश के दोहे.........


सत्कर्मो की अग्नि मे, जब तपती मानुष देह |
काम क्रोध होते भस्म,  मिलती प्रभु की नेह ||


सच्चा धन बस प्रेम है, बाकी जग मे सब झूठ |

खर्च होय से बढत जाय, ना खर्च से जाय छूट ||

साथी वही जो साथ दे, रहे भले कभी साथ |
साथ से एकला तो भला, ना भला बाँह का नाग ||


वृद्ध जनों का आशीष है, सत्कर्मो का परिणाम |

श्रम बिन जामे घास ही, ना लगे बाग मे आम ||

भूल से भी हो भूल तो, बिन भूले भूल लो मान |
जलती बाती अभिमान की, बढे दिये का मान||


जब मोह घटे सामान से, और बढे परस्पर नेह |

सुख समृद्धि सम्बन्ध फिर, न तजे आपका गेह ||


मन का कहा बिन तोल ही, जो करता सारे काज |
चार दिन की हो चाँदनी, फिर लम्बी काली रात ||

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 01 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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