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बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

मिश्रा जी .......................................


आज कई दिनों के बाद थोडी सी धूप निकली थी, पिछले पूरे एक हफ्ते से सूर्य देवता के दर्शन दुर्लभ हो गये थे। मई जून के महीनों में गर्मी जब अपने प्रचंड रूप में होती है तब बस यही लगता है कि इससे तो अच्छे सर्दी के दिन होते हैं और जब दिसम्बर जनवरी अपने पूर्ण यौवन के साथ आते हैं तब धूप की हल्की सी गर्माहट ऐसा ही आभास देती है जैसे किसी प्रियतमा को अपने प्रियतम के पत्र आने का इन्तजार हो और वो खुद ही आ जाय। मन बहुत आनन्दित हो रहा था। सोचा आज इस धूप का आनन्द लेते हुये कुछ लिखा जाय। रायपुर से दो बार मेल आ चुका था, उन्होने अपनी वार्षिक पत्रिका के लिये एक कहानी की मांग थी। पिछले वर्ष जब उनके पत्रिका के दस वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य मे आयोजित समारोह मे गया था, तब ही उन्होने कहा था , हमारे प्रत्येक वार्षिक संकलन को आपकी कहानी का सदैव इन्तजार रहेगा । मगर पिछले दिनो की सर्दी ने जैसे दिमाग में भी बर्फ जमा दी थी। कहानी क्या कोई विचार ही मन मे नही आ रहा था। कई बार सोचा अपने ही जीवन की किसी घटना को कहानीबद्ध कर देते है, मगर फिर इतनी सारी बातें एक के बाद एक याद आती जाती जैसे किसी सुदुर यात्रा में गंतव्य तक पहुँचने से पहले बहुत से छोटे बडे स्टेशनों को पार करना ही पडता है, कभी कभी कोई कोई बात जब याद आती तो अपने साथ कुछ देर के लिये ठहरने को मजबूर कर देती जैसे आगे बढने का सिगनल ना मिलने पर ट्रेन रुक जाती है ।
धर्मपत्नी जी दो बार चाय दे चुकी थी, तीसरी बार चाय मांगने पर चाय के साथ उनकी मधुर सी झिडकी का नाश्ते के रूप में मिलना तय था, सो चाय पीने की इच्छा को मन मे ही दबा लिया । तभी सामने से मिश्रा जी आते हुये दिखे,ऐसे लगा जैसे बिन मांगी मुराद पूरी हो गयी। अब तो चाय स्वयं ही आयगी जैसे घोर तप करने वाले तपस्पी के पास शिव जी आने को मजबूर हो ही जाते हैं।
मिश्रा जी जो हमेशा प्रसन्न रहने वाले व्यक्तियों मे से है, आज उनका मुख उस सूरज की तरह लग रहा था जिसे कोहरे ने घेर रखा हो, और वो उससे लड कर अपनी किरणों की आभा को संसार में फैलाने की अपनी पूरी कोशिश कर रहा हो । मैने कहा- मिश्रा जी क्या हुआ? क्यो आज खुश दिखने के लिये आपको कोशिश करनी पड रही है, बताइये तो बात क्या है?
मिश्रा जी एक कटे हुये पेड की तरह मेरे बगल में पडी हुयी कुर्सी पर बैठ गये। जो व्यक्ति कल तक साठ का होने पर भी पचास का भी नही दिखता था आज अचानक से सत्तर से कम का ना लगता था, मै सोचने लगा कि इन दस दिनों में ऐसा क्या हुआ जो इन्होने दस दिनों मे बीस वर्ष का समय पार कर लिये। मैं जानता था कि वो जिस व्यक्तित्व के मालिक है, उन्हे कोई सामान्य सी मुसीबते तो क्या कठिन बाते भी नही हिला सकती, वो ठीक उस बुजुर्ग बरगद के पेड की तरह थे, जो कितनी ही आंधी तूफानों को बडी सरलता से झेल जाता है। उनकी खामोश नजरें मेरे मन में कोतुहल और चिन्ता के ज्वार को आमंत्रित कर रहा था । कि अचानक उनके मौन नेत्रों के कोरों से एक अश्रु धार बह निकली। धीरे से मैने उनके कांधे पर हाथ रखते हुये कहा- भाई कुछ तो बताओ क्या हुआ ? तो जेब से रुमाल निकालकर आँखों को पोछते हुये बोले- अरे पहले भाभी जी से बता तो दो की एक नही दो कप चाय ले आये। फिर थोडा सा गम्भीर होते हुये बोले - नवीन तुमसे मेरे जीवन का कुछ भी तो नही छुपा, तुम तो जानते हो कि मैने या तुम्हारी भाभी कभी किसी से किसी भी चीज की आशा नही रक्खी। जो चाहा ईश्वर ने मुझे मांगने से पहले ही दे दिया। मगर आज एक ऐसे द्वंद में फंस गया हूँ जिससे निकलने का कोई रास्ता ही नही दिख रहा। अपने आप को जीवन मे पहली बार इतना बेबस और लाचार महसूस कर रहा हूँ। समझ नही आ रहा कि हम दोनो से कहाँ गलती हो गयी। हमे तो लगता था कि हम अपने दोनो बच्चो को अच्छे संस्कार दे रहे हैं। तुमतो जानते ही हो कि मेरी हैसियत से बहुत बाहर था रोहित को विदेश पढाई के लिये भेजना, मगर वो तो तुम्हारी भाभी ने जिद पकड ली कि चाहे जैसे हो उसको भेजना ही है , उसने अपने जेवरों तक का उसने लालच नही किया। फिर जब रोहित ने वही अपनी मरजी से जब शादी करने और वही रहने का निर्णय लिया तब भी हमने खुशी से और पूरे मन से उसकी बात को स्वीकार किया। उसके इस तरह शादी करने के कारण मुझे निम्मी के लिये लडका ढूंढने में कई बार दिक्कते भी आयी मगर हमने कभी ये रोहित पर जाहिर नही किया। और परसों मैने एक जगह उसका रिश्ता पक्का किया और जब रोहित को बताया कि लडके वालों ने दस लाख की डिमांड की है तो इससे पहले की मै कुछ और कहता - वो बोला पापा ये तो बहुत बडी रकम है, इतना इन्तजाम आप कैसे कर पाओगे, आप इतने सारे पैसे कि लिये बोल कर कैसे आ गये। आप प्लीज कोई और रिश्ता देखिये जो आप कर सको, और फिर अभी अपनी निम्मी की कौन सी ज्यादा उम्र हो गयी है आज कल तीस तो नारर्मल ऐज है। अब मै उससे क्या कहता कि तेरे बाप के पास बेटी की शादी तो क्या अपने क्रिया कर्म तक का भी पैसा नही। कैसे मैं निम्मी की माँ से ये कह दूँ कि अब ये रिश्ता तो क्या मै अपनी बिटिया का कन्यादान तक करने में सक्षम नही हूँ। कैसे कह दूँ निम्मी से कि उसके भाई को वो अभी तो क्या कभी बडी नही दिखने वाली या कहाँ से ढूँढ के लाऊं वो दामाद जो बिना दाम के मेरी बेटी को ब्याह ले। या कह दूँ रोहित से कि कुछ नही तो कम से कम उसे अपनी बहन की राखी का फर्ज तो निभाना ही पडेगा भले ही वो मातृ या पितृ ऋण से विमुख हो जाय। शायद मै किसी से कुछ भी नही कह सकता। और जब कुछ कह नही सकता, कर नही सकता तो फिर आखिर मैं जी ही क्यो रहा हूँ कहते कहते मिश्रा जी आकाश की ओर ऐसे तकने लगे जैसे शायद ईश्वर से भी अब उन्हे किसी जवाब की उम्मीद नही बची थी। शायद तभी तो सूरज ने भी खुद को बादलों की ओट में स्वयं को छुपा लिया था। मेरे पास भी कुछ कहने के लिये शब्द नही थे, बस यही सोच रहा था कि क्या वाकई हम लोगों ने अपने बच्चों को संस्कार देने में कोई कमी की है, या ये आज की आधुनिक प्रदूषित हवा का असर हैं! ठीक इसी समय श्रीमती जी चाय ले कर आ गयी, हम दोनो चुपचाप चाय पीने लगे, मगर अब सिर्फ चाय ही पी रहा था, क्योंकि चाय की इच्छा तो काफी पहले ही समाप्त हो गयी थी। 

4 टिप्‍पणियां:

  1. हम लोगों ने अपने बच्चों को संस्कार देने में कोई कमी की है, या ये आज की आधुनिक प्रदूषित हवा का असर हैं! ..
    नौनिहालों में संस्कार से ज्यादा आज प्रदूषित हवा का ज्यादा असर देखने को मिलता है .. ...

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति...दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@जब भी जली है बहू जली है

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