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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

आखिर क्यों ?


क्यों नही मिटता मुझसे अन्तर तेरे होने और ना होने का
जबकि आज तू पास होकर भी पास नही है
जानती हूँ कल तू दूर जा कर भी दूर नही होगा
आज जो पीडा है मन में कल निश्चित ही नही होगी

क्यों नही मिटता मुझसे उम्मीदों का पन्ना
रोज नयी सुबह के साथ लिखती हूँ चंद पल
वो पल जब तू पास भी हो और साथ भी
फिर शाम ठलते ठलते काली स्याही से मिट जाती है लिखावट

क्यों नही मिटती ये जलन जो सुलगा रही है मेरे एकमात्र मन को
क्या कोई सागर नही जो तृप्त कर सके मुझे
या फिर ये प्यास इतनी बढ जाय कि प्यासे रहने का अहसास ना हो
या मिल जाय मुझे हुनर औरों की बेबसी बाँट कर प्यास बुझाने का

क्यों नही मिटती तृष्णा तेरे साथ अपना वजूद जोडने की
दिखता है मुझे कि मै ना तो उसका साया हूँ ना परछाई
मै उसके लिये सिर्फ धूप हूँ, कडी धूप, चेहरा झुलसाती धूप
जो तलाश रही है एक ऐसी शाख जो उसके तन को छाँव दे

क्यो मिटता जा रहा है मुझसे मेरी खुशियों घरौंदा
क्यो नही बना पा रही खुद को एक मजबूत दीवार
क्यों नही नयी ऊर्जा से बना लेती नया आकाश
क्यों नही उड जाती ले कर नयी आशाओं के पंख

आज सोचती हूँ क्यो थी मै ऐसी
क्यों नही पहचान सकी थी अपनी आग
आज मुझे मेरे होने पर मान भी है और थोडा सा अभिमान भी
आज मिटा कर रख दी हर वो चीज जो मुझे मिटाती थी
जला दी है वो आग जो हर घडी मुझे जलाती थी 
मिल गयी है मुझे एक नयी रश्मि नयी सुबह के साथ 
और तय करनी है मुझे मेरी मंजिल रात से पहले

7 टिप्‍पणियां:

  1. Very energetic line and nice composition......
    "मिल गयी है मुझे एक नयी रश्मि नयी सुबह के साथ
    और तय करनी है मुझे मेरी मंजिल रात से पहले"

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  2. आपकी लिखी रचना बुधवार 30 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. आशा और उम्मीद लिए ... भावपूर्ण रचना ...

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  4. आज मिटा कर रख दी हर वो चीज जो मुझे मिटाती थी
    जला दी है वो आग जो हर घडी मुझे जलाती थी
    मिल गयी है मुझे एक नयी रश्मि नयी सुबह के साथ
    और तय करनी है मुझे मेरी मंजिल रात से पहले
    .. नयी सुबह जरूर होती हैं ... बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले'
    .,...बहुत सुन्दर..

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  5. बहुत सुन्दर भाव और यथार्थ दर्शाती पंक्तियाँ

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  6. क्यों नही मिटती ये जलन जो सुलगा रही है मेरे एकमात्र मन को
    क्या कोई सागर नही जो तृप्त कर सके मुझे
    या फिर ये प्यास इतनी बढ जाय कि प्यासे रहने का अहसास ना हो
    या मिल जाय मुझे हुनर औरों की बेबसी बाँट कर प्यास बुझाने का

    क्यों नही मिटती तृष्णा तेरे साथ अपना वजूद जोडने की
    दिखता है मुझे कि मै ना तो उसका साया हूँ ना परछाई
    मै उसके लिये सिर्फ धूप हूँ, कडी धूप, चेहरा झुलसाती धूप
    जो तलाश रही है एक ऐसी शाख जो उसके तन को छाँव दे
    सुन्दर भाव

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