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सोमवार, 3 मई 2010

जीवन से परे





ना कल तुम थे हमको समझे
ना कभी हमे अपना पाये
मेरे जाने के बाद मगर क्यों
अपनी आँखो में पानी लाये
जब तक रहे हम दुनिया में
हर पल हमको दर्द दिया
कभी ना सोचा आखिर क्यों
मुझसे मेरा सुख चैन लिया
तो आज भला क्यों याद मुझे कर
मुझको यादों में लाते हो
जीते जी हर पल मारा फिर क्यों
अब फिर से मुझको बुलाते हो
लोग नही रह पाते जग में
बस रह जाती है कुछ बातें
जो कभी नही मिट पाती हैं
वो होती हैं मीठी यादें
तेरे रोने से नही मिलेगी
मुक्ति मेरे भटके मन को
भले ही अब तू खाक बना दे
अपने माटी के इस तन को
पल पल में ही आ जाता है
जीवन का इक अन्तिम कल
और फिर हम हैं सोचते रहते
काश मिल जाते और दो पल
सुन लेते हम उनके मन की
और अपने मन की कह लेते
अपनी सारी खताओं की
उनसे माफी तो ले लेते
याद करो जब हमने तुमको
रो रो करके पुकारा था
बेबस और लाचार से थे हम
और वो वक्त तुम्हारा था
आज समय ने फिर से देखो
अपनी करवट बदली है
बुला रहे तुम रो कर हमको
और हमने नजरें फेरी है
पर अब क्या जो तुमने दिया था
वो सब तुमको लौटाया है
अब सोचो तुम बैठे बैठे
क्या खोया क्या पाया है
जग में है इन्सान वही
जो जीते हुये की कद्र करे
अपनी खातिर ही जिये ना जीवन
कुछ औरों की भी फिक्र करे

7 टिप्‍पणियां:

  1. जग में है इन्सान वही
    जो जीते हुये की कद्र करे
    अपनी खातिर ही जिये ना जीवन
    कुछ औरों की भी फिक्र करे

    बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने।

    सादर

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति.....बधाई..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सारगर्भित और संवेदनशील प्रस्तुति...बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. कल 29/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  5. जग में है इन्सान वही
    जो जीते हुये की कद्र करे
    अपनी खातिर ही जिये ना जीवन
    कुछ औरों की भी फिक्र करे

    सार्थक भाव लिए सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैंने आपकी कई रचनाएं पढ़ी ,
    ये रचना मुझे काफी अच्छी लगी |
    बेहतरीन प्रस्तुति |

    -आकाश

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