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मंगलवार, 6 जुलाई 2010

वापस बचपन पाया






एक दिवस मैं सोच रही थी
यूँ ही बैठे बैठे
जाने कहाँ छोड आयी
प्यारे बचपन को मैं
कितने प्यारे दिन थे जब
मै मिट्टी खाती थी
और थोडी हाथों में भर कर
माँ के लिये लाती थी
कभी प्यार से ले लेती थीं वो
कभी डपट देतीं थीं
अब फिर से मत खाना कह्के
मुहँ मेरा धो देती थीं
खोई हुयी थी बीते कल की
स्वर्णिम मधुर स्म्रति में
तभी लाडली दौडी आयी
कुछ मुट्टी में बन्द किये
आकर बोली माँ देखो
क्या तेरे लिये मै लायी
थोली ही मै खा कल आयी
बाकी तुमको ले आयी
जे लो मैया तुम भी काओ
कह जब उसने हाथ बढाया
खोये हुये बचपन को वापस
मैने बिटिया में पाया



 सुभद्रा कुमारी चौहान जी की कविता से प्ररित

2 टिप्‍पणियां:

  1. कई जनम के सत्कर्मो का जब मुझको वरदान मिला
    परमेश्वर से तब मैंने सीता सी बेटी मांग लिया

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  2. bahut hi achcha likha hai aapne. Main likhta nahin hoon par aapse aagrah hai ki dheere dheere bachpan ko aur likhen...

    उत्तर देंहटाएं

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