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गुरुवार, 8 जुलाई 2010

ये भी होता है

आज अनजाने में मुझसे
इक खता ऐसी हुई
चोट पहुँची अपने किसी को
आँख नम मेरी हुयी
वक्त और हालात नें
इतना बेबस मुझको किया
अपनी ऐसी जिन्दगी पे
मुझको शर्मिंदगी हुयी
 हाथ जो कल तक उठे थे
माँगने को उनकी दुआ
आज उनके कत्ल को
मजबूर ये जिन्दगी हुयी
था बसाया जो चमन
दिल से बडे अरमान से
वो ही मेरी हर खुशी की
कब्रगाह है बन गयी

4 टिप्‍पणियां:

  1. अनजाने में की गयी भूल खता नहीं होती है
    बेबसी की कहानी जफा नहीं होती है
    गर दुआओं में उठे है हाथ तो
    मेरे लिए वो दुआ ही होती है


    --

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  2. कल 20/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

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