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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कृषक हमारी राह निहारे

आज हमारे कृषि प्रधान देश में किसानों को ही दो जून की रोटी के लाले पडे है ।वो जो सारे देश के लिय अन्न जुटाता है , क्या हमारा उसके लिये कोई फर्ज नही । मुझे आप सभी के सहयोग की जरूरत है क्योकि










माना कि अकेले पथ पथ पर चलना
थोडा मुश्किल होता है
साथ अगर मिल जाये तो
सफर आसां कुछ होता है
चिंगारी मै बन जाती हूँ
आप बस इसमें घी डालो
सारे समाज की बुराई को
इसमें आज जला डालो
गर किसान ही नही रहा तो
पेट की आग तब भडकेगी
तेरे मेरे घर की सारी
बुनियादें तब बिखरेंगी
कहाँ पे लहरायेगा तब
झंडा अपनी प्रगति का
रुक जायेगा थम जयेगा
पहिया जीवन की गति का
खोखली हो गयी नींव जो अपनी
तो कैसे बचेगी प्रतिष्ठा की इमारत
क्या आने वाली पीढी लिखेगी
अपनी ही बर्बादी की इबारत
हाथों में ले कलम की शक्ती
अपना कल हम आज संवारे
मुड कर देखे गांव फिर अपना
कृषक हमारी राह निहारें 

2 टिप्‍पणियां:

  1. किसी को गिराया ना खुद को उछाला कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे धीरे
    जहा तुम पहुचे छलांगे लगा कर मै भी पहुची
    मगर धीरे धीरे
    आपके ब्लॉग की लोकप्रियता देख कर अच्छा लगता है

    उत्तर देंहटाएं

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