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रविवार, 26 जनवरी 2014

खुला खत


काश मै अपने मन की व्यथा को कागज पर उतार पाती, पर आज तो कलम भी मेरा साथ नही दे पा रही। मै जितना खुशियों को तलाश्ती हूँ, गम उतना ही मुझसे लगाव करने लगते हैं। शायद इन गमों को मुझसे ज्यादा मोहब्बत करने वाला नही मिलता, तभी तो ये मेरा दामन नही छोडते। काश मै भी इन गमों को अपनी मोहब्बत दे पाती, यकीनन तब मुझे जरा सा भी गम ना होता। तीन साल कैसे गुजर गये पता ही नही चला, सब एक सपने सा मालूम होता है। ऐसा लगता है जैसे इन तीन सालो से मैं सो ही रही थी, उठने पर सब कुछ वैसा ही है, वही मै, वही मेरा अकेलापन। हाँ एक फर्क जरूर आया जो इस बात का अहसास कराता है कि ये बरस सो कर नही कटे, कल तक सोचने के लिये कुछ भी ना था, और आज सोचने के सिवा कुछ भी नही। याद ही नही आता कि कैसे मैने उसे अपनी जिन्दगी, अपनी खुशियों, अपने सपनों का मालिक बना दिया, और कैसे उसके हाथ की कठ्पुतली बन गयी। सच कठ्पुतली ही तो बन गयी थी। मै क्यों अपने अस्तित्व को तुममे तलाशने लगी । क्यों अपनी गिरवी रखी खुशियों को तुमसे छुडा ना सकी। कहाँ गया मेरा सम्मान, मेरा अभिमान, मेरा आत्म बल। क्यों ये लगने लगा है कि मै सिर्फ एक मशीन हूँ ।
सोच रही हूँ, आखिर क्यो ये सब लिख रही हूँ। शायद मेरे पास कोई नही जिससे कह सकूँ अपनी बात, जो समझ सके मेरे हालात। जिन्दगी को जिन्दगी की तरह जीने की एक बार फिर कोशिश करना चाहती हूँ, अपने मुकद्दर से एक बार फिर लडना चाहती हूँ, चाहती हूँ कि तकदीर भले ही कुछ नये गम दे कम से कम पुराने दर्दों की तस्वीर तो धुंधली हो जायगी।
अफसोस बस इस बात पर हो रहा है, जजबातों से लबरेज ये कागज मुझे एक चूरन की पुडिया में लिपटे हुये मिले। ये पढ कर सिर्फ एक अन्दाजा ही कर सक सकती हूँ कि लिखने वाली के पास दर्दो की कितनी बडी पोटली थी । हाँ सुकून इस बात पर कर सकती हूँ, कि वो जिन्दगी मे हारी भले ही होगी, मगर जिन्दगी से नही हारी थी, कही ना कही वो जी जरूर रही होगी।
आज पहली बार एक लेखिका होते हुये भी, इस कागज के पुर्चे मे कैद अल्फाजों और उसमे बसे जज्बातों में अपनी लिखावट की मिलावट करने का मन नही हुआ। बस पढ कर बार बार एक ही सवाल जेहन मे उभरता रहा कि लिखने वाली ने किसके लिये लिखा था, क्या ये मेरे लिये था, या जमाने के लिये या किसी के भी लिये नही सिर्फ एक जरिया था तकलीफों से मुक्ति पाने का या फिर ......................
बेपता खत जब पहुंचा मेरे पास, सोचने लगा मन , क्या मेरा उसका नाता था


4 टिप्‍पणियां:

  1. शायद ये नाता नियति ने बुना था ... संवेदनशील दिल का आत्मीय दिल से ...

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  2. मन की पीड़ा को शब्दों से अधिक थपकाने वाला नहीं मिलता है

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  3. "वो जिंदगी में हारी जरूर थी पर जिंदगी से नहीं हारी थी "

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