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शनिवार, 17 मई 2014

मन की चाह



जीवन की आपाधापी में
मन ढूँढ रहा सुकूं के पल
चाह रहा इक ऐसी राह
जो हो अविरल,निर्मल, निश्छल

आयाम बहुत हैं जीवन के
आराम कही मिलता ही नही
थक जाता, मन कभी-कभी
पर जरूरतें तो मिटती ही नही

अब चाहत कुछ वो करने की
ना तन टूटे, ना मन बिखरे
मिट जाये चाहे सब मेरा
जीवन अमिट मेरा निखरे

सर्वस्व समर्पित करती हूँ
जीवन के महासमर को मै
बाधायें कितनी भी मुश्किल हो
मन विजयी करना ही है

6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेरणादायक रचना पढ़वाने के लिए शुक्रिया!

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  2. सुंदर रचना ! मंगलकामनाएं आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब चाहत कुछ वो करने की
    ना तन टूटे, ना मन बिखरे
    मिट जाये चाहे सब मेरा
    जीवन अमिट मेरा निखरे

    सर्वस्व समर्पित करती हूँ
    जीवन के महासमर को मै
    बाधायें कितनी भी मुश्किल हो
    मन विजयी करना ही है
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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