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रविवार, 25 मई 2014

आह



आह खाली नही जाती, 
दुआ बेअसर नही होती,
भले और बुरे वक्त की 
कोई उमर नही होती॥

वो पीते है जाम शौक से, 
बेबसों के अश्कों का
उन्हे इल्म नही, 
बर्बादियों की खबर नही होती॥

दौलत मे है बरक्कत, 
सिर्फ नेक नीयत से
वरना चाँदनी किसी दर, 
हर पहर नही होती॥

फक्र ना कर उस असबाब पर, 
जो चार दिन का है
वक्त के सिवाय , 
किसी की सदा कदर नही होती॥

वो लगा  रहे हैं कहकहे, 
महरूमों की सिसकियों पे
अन्जाने क्या जाने, 
गुनहगारों की सहर नही होती

ना हो उदास ऐ पलाश, 
देख बुलंदी तू गुनाहो की
जुर्म की तबियत पे कभी
रहमत की नजर नही होती॥


*सहर = सुबह, असबाब = सामान

11 टिप्‍पणियां:

  1. हर कतरा , हर पंक्ति बेहद प्रभावपूर्ण बन पडी है , बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति अपर्णा जी ।

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  2. सुन्दर शब्दों में व्यक्त सुन्दर भावनाएं`

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    1. दीदी, आप मेरे लिये , मेरी लेखनी के लिये सदा एक आदर्श रही है, आपसे ही हमने लिखने की कला सीखी, और कुछ लिख पाने की कोशिश कर पायी, आज जब आपने मेरी हौसला अफजायी की, तो लगा मेर लेखन को आपका आशीष मिल गया।

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  3. वो पीते है जाम शौक से,
    बेबसों के अश्कों का
    उन्हे इल्म नही,
    बर्बादियों की खबर नही होती॥

    बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति ! बधाई !

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  4. YOU EXHALE POETRY AS FLOWERS EXHALE FRAGRANCE. KEEP IT UP . NICE.

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  5. दौलत मे है बरक्कत,
    सिर्फ नेक नीयत से
    वरना चाँदनी किसी दर,
    हर पहर नही होती.......हकीक़त बयाँ करती पंक्तियाँ

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  6. जीवन के सच ,कुशलता से अभिव्यक्त कर दिए आपने !

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  7. अपने बहुत ही अच्छी तरह से और सयुक्त सब्दो को सजोया है
    बहुत खूबसूरत

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  8. फक्र ना कर उस असबाब पर,
    जो चार दिन का है
    वक्त के सिवाय ,
    किसी की सदा कदर नही होती॥
    सुन्दर भावोक्ति

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