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गुरुवार, 19 मार्च 2015

नेता




अक्सर ऐसा देखने में आता है, कि एक आम आदमी जब राजनीति मे कदम रखता है तो उसके मन मे कुछ अलग करने का जज्बा अपने उफान पर होता है, जैसे जैसे वो राजनीति के सागर मे कदम रखता जाता है उसे ये अहसास होने लगता है कि इसमे पलने वाले बडे बडे बेइमान मगरमच्छ उसकी सत्य और इमानदारी की छोटी सी मछली को कब निगल जायेगे ये उसको ही पता नही चलेगा, इसलिये उनसे बैर ले कर जीवन की रक्षा नही की जा सकती। फिर एक दिन यही छोटी मछली मगरमच्छ से सारी गुण सीख कब एक मगरमच्छ बन जाती है शायद उसको ही ये मालूम नही चलता..............................

सीधा सदा आम सा जन, देखिये नेता हो गया
झूठ बोलना बात बात पर जाने कैसे सीख गया
*
देश प्रेम पर, जान देने वाले को, ये क्या हो गया
देश हित मे देश बेचना, जाने कैसे सीख गया
**
सेवा करने का उद्देश्य, राह से ही भटक सा गया
वोटों का व्यापार नोट से, जाने कैसे सीख गया
***
व्रत स्त्री हित कर्म तज, हीन कर्म मे लीन हुआ
सुरा सुन्दरी का नित सेवन, जाने कैसे सीख गया
****
निश्चय बुराई के नाश का, विलुप्त कैसे हो गया
उज्ज्वल वस्त्र में काले धंधे, जाने कैसे सीख गया
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आचरण का सबक सीख, राजनीति मे कदम धरा

पूज सत्य, असत्य आचरण जाने कैसे सीख गया
******
मन्नत माँग सेवा भाव की, भ्रष्टाचार मे लीन हुआ
रिश्तों में राजनीतिक मिलावट, जाने कैसे सीख गया

5 टिप्‍पणियां:

  1. सेवा करने का उद्देश्य, राह से ही भटक सा गया
    वोटों का व्यापार नोट से, जाने कैसे सीख गया
    ***
    व्रत स्त्री हित कर्म तज, हीन कर्म मे लीन हुआ
    सुरा सुन्दरी का नित सेवन, जाने कैसे सीख गया
    राजनीती को कोयले की कोठरी कहा जाता है और उसमें घुसने वाले पर दाग न लगे , ऐसा बहुत मुश्किल है ! अगर बच के रहेगा तो राजनीती से ही बाहर हो जाएगा !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-03-2015) को "नूतनसम्वत्सर आया है" (चर्चा - 1924) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    भारतीय नववर्ष की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी रचना कुछ कहने के लिए बाध्य कर रही है. आभार आपका........................वर्तमान परिस्थिति में शायद राजनीति का अखाडा एक धर्म परीक्षा है उनके लिए जो राजनीति को भरत वंश की परंपरा का पालन करना मानते और करने की बात करते है......परन्तु यह एक कड़वा सच है कि राजनीति की गंदगी को साफ़ करके राजनीति की परिभाषा को बदलना जरुरी है और अगर ऐसा नहीं हो पाता यहाँ भी अधर्म की ही जीत हुयी तो देश के लिए दुर्भाग्य होगा.

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  4. बहुत खूब
    आपकी कलम को मंगलकामनाएं आपको !

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