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गुरुवार, 16 जनवरी 2020

जूठा


जाडा इस बार अपने पूरे जोर पर था। पिछले तीन दिन से बारिश थी कि थमने का नाम ही न लेती थी। मगर गरीब के लिये क्या सर्दी क्या गरमी। काम न करे तो खाये क्या? बारिश में भीगने के कारण सर्दी बुधिया की हड्डियों तक जा घुसी थी। खांसती खखारती चूल्हे में रोटियां सेक रही थी, और कांपते शरीर को थोडी गरमी भी मिलती जा रही थी। वही पास में ही एक पुरानी सी बोरी में उसके कलेजे का टुकडा, करीब पाँच साल का कल्लू टूटे फूटे डिब्बों से खेल रहा था। कल्लू अचानक से बोरी पर से उठ कर माँ के पास आकर लिपट गया। 
बुधिया- क्या हुआ रे, जा खेल न जाके। तभी बुधिया की नजर कल्लू की आंखों में ठहर गई, माँ जान गई कि उसका बेटा कुछ ऐसा कहना चाह रहा है जो उसके लिये बहुत बडी बात है। लाड करते हुये बोली- क्या हुआ रे कल्लू, का कहना है बता।
कल्लू- (छोटा सा बच्चा जो कितनी देर से ये सोच रहा था कि अम्मा जाने मेरी बात को समझेगी कि नही, कल से आज तक में जाने कितनी बार वह सोच चुका था कि अम्मा से अपना सवाल पूंछ ले, पर हर बार सोचता अम्मा फिर कह देगीं क्या रे कलुआ, तू क्या फालतू बातें सोचता रहता है, इसी से उसको अपनी बात कहते झेंप हो रही थी, मगर पूंछना जरूरी भी तो था।) बडी गहन मुद्रा बनाते हुये बोला ताकि उसकी माँ उसकी बात को बहुत ध्यान से ले बोला- अम्मा पता है, कल न वो ऊंचे वाले बंगले में, अरे जिनके यहाँ सुबेरे आप सबसे पहले आप जाती हो, वो मेमसाहब न कल अपने लडके से कह रही थी कि किसी की जूठी चीज नही खाते, फिर थोडा रुक कर कुछ दुविधा जैसी मुद्रा में बोला - मगर अम्मा आप तो हमको रोज जूठा खिलाती हो।
बेचारी बुधिया को समझ नही आ रहा था कि वो कल्लू से क्या कहे, कैसे उसको समझाये। चूल्हे पर सेक रही रोटी को चूल्हे से निकाल कर, कल्लू को गोद में बिठाल ली, बालो में हाथ फिराते हुये अपनी पूरी ममता उडेलते हुये बोली- तुने कैसे समझा रे कि मै तुमको जूठा खिलाती हूँ, देख ये रोटी तेरे लिये गरमागरम बना रही हूँ न। कहाँ है ये रोटी जूठी।
कल्लू माँ की गोद से उतर कर थोडा सा तुनक कर बोला- आप झूठ बोलती हो। हमको पता है – वो मेमसाहब आपको जूठी दाल सब्जी देती है, वही तुम हमको खिलाती हो। अबसे मै भी नही खाऊंगा किसी का जूठा।
बेचारी बुधिया कैसे समझाती अपने लाल को कि किस तरह से वो दो रोटी का गुजारा कर पाती है, कहाँ से जुटाये वो अपने बेटे के लिये महंगी सब्जियां। क्या हुआ जो मेमसाहब लोगो का बचा खुचा ले आती है, और फिर मांगती तो नही, जब देतीं है तो रख लेती है। कम से कम अपने बच्चे को अच्छा खिला तो पाती है, मगर वो यह भी जानती थी कि अभी कल्लू की वो उमर नही जो इन बातों को समझ सके।थोडा धैर्य रखते हुये बोली- अच्छा रे तो तू इत्ता बडा हो गया कि माँ को झूठा बता सके, कल्लू को लगा जैसे उसने माँ से बहुत गलत बात कह दी, बेचारा रुआसा हो गया। उसकी बाल बुद्धि मे कुछ समझ न आया बस माँ की छाती से चिपक कर लाड करते हुये अपनी गलती को मिटाने लगा।
बुधिया ने भी उसको कस कर चिपका लिया, फिर माथा चूमते हुये बोली- बेटा जानता है जब भगवान ने दुनिया बनाई तो उसमें दो लोग बनाये, एक का नाम रखा अमीर और दूसरे का गरीब। जो गरीब लोग थे वो जूठा सच्चा नही देखते थे, वो सब खा लेते थे जैसे तू खा लेता है, और जो अमीर थे वो किसी का जूठा नही खाते थे, जैसे वो मेमसाहब का बेटा। फिर थोडा रुककर बोली- अच्छा कल्लू तुझे याद है मैने तुमको भगवान राम की बेर वाली कहानी सुनाई थी, जिसमे भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाये थे।
कल्लू चहक उठा- हाँ अम्मा हमको पूरी कहानी याद है। अम्मा मै भी बिल्कुल राम जैसा बनूंगा। मै सबका जूठा खा लूंगा, फिर उसके मन में एक और समझ ने जन्म ले लिया, कोतुहलबस बोला- तो अम्मा, इसका मतलब राम जी गरीब लोग थे न, बुधिया के मन की पीडा का कोई पार न था उसने कल्लू को तो समझा दिया था पर अपने आसुंओं को नही समझा पा रही थी, उसके पास कहने को कुछ न था बस इतना बोली, हां बेटा राम जी तो सबके हैं, तेरे भी हैं मेरे भी हैं। कल्लू के मन की जिज्ञासायें शान्त हो चुकी थी इसलिये उसने सिर्फ हाँ ही सुना, अब उसको लग रहा था जैसे उसने सच में बहुत छोटी से बात ही तो पूँछी थी, बेकार ही वो कल से आज तक इत्ता परेशान रहा। अब वो निश्चिन्त होकर अपने टूटे फूटे डिब्बे जो उसके लिये किसी कीमती खिलौनों से कम न थे की तरफ खेलने चल दिया।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

परिवर्तन


मनोहर भइया आज हमार जी मा बार बार रहि रहि के जाने काहे ई बिचार आ रहा है जइसन हम कउनो दगा करा है। हमका कुच्छौ समझ नही आ रहा, का सही है का गलत। अब आपै हमका रास्ता दिखाओ।
रहीम कल से राबर्ट कहलाने वाला था, गाँव में आये मिशनरी के लोगो से उसने घर की रोटियों के लिये धर्म परिवर्तन करने को हांमी तो भर दी थी, मगर अब उसकी आंखों से नींद कोसो दूर थी। मन में उथल पुथल थी, कि कल से जाने क्या क्या बदल जायगा। और अपनी इसी ऊहा पोह को शान्त करने के लिये अपने मित्र मनोहर जिसको वो अपने से भी ज्यादा मानता था, के पास आया था।
कुछ देर तक ऐसा सन्नाटा पसरा रहा कि अगर एक पत्ता भी गिरता तो उसकी आवाज भी दूर तक साफ सुनाई दे जाती। फिर उस सन्नाटे की चुप्पी को तोडते हुये मनोहर ने बहुत गम्भीर मुद्रा में रहीम से कहा- भैया हम गरीब लोगन का एक ही धरम है और वो है अपने परिवार का दुई बखत की रोटी देना। सुख सुबिधा तक तो हम सोच ही नही सकत। हमार नाम राम होय, रहीम होय या राबर्ट का फरक पडत हैं, ई सब तो अमीर लोगन की खातिर है। औ फिर हमका इक बात बताओ तुमहार नाम बदल जाय से का तुम्हार करम बदल जइहै, का तुम्हार भासा बदल जइहै, का तुम कल से इंगलिश मा गिटिर पिटिर करै लगिहो, का हमार तोहार रिशता बदल जइहै, का ई गाँव का हवा पानी बदल जइहै, का तुहार आतमा बदल जइहै | ना भइया कुच्छो ना बदली, कल भी तुम अइसै हमार साथ बैठियो, बतलइहो। बस फरक इत्तै होई कि तुम्हार घरवाली, तुम अउर तुमहार बच्चा भूखे पेट ना सोइहै। भैया हाथ मा चार पैसा आये का चाही। चाहे उई खुदा के घर से आवै, या ईशा के।
तुमका तो खुश होए का चाही कि कल से तुमका काम मिल रहा है। अब तुमहो इंसान हुई जइहो, नही तो गरीब मनई अउर कुकुर मा ज्यादा फरक नही।
अब जाओ और चैन से सो जाओ, अब तुहार दुख के दिन खतम, हाँ ई बात याद रख्खेओ हमार लिये तुम हमार रहीमै रहिहो।

बात तो सोचने की है, आखिर क्या बदल जाता है धर्म परिवर्तन से, क्या वाकई, ईश्वर, खुदा या गॉड गिनती करते होंगे, कि धरती पर कितने लोग है जो उनको मानने वाले हैं। क्या वाकई में कही सबकी अलग अलग सत्ता है, क्या गले में तुलसी की माला डाल कर कोई हिन्दू, या क्रास डाल कर कोई इसाई बन जाता है। क्या कल तक मस्जिद में सजदा करने वाला आज अपनी मुसीबत में, या अल्लाह, या खुदा की जगह ओह गॉड कह पायगा। क्या सुबह उठ कर हनुमान चालीसा पढने वाला, पाँच वक्त की नमाज अदा करते समय राम को याद नही करेगा। और अगर वो ऐसा करेगा तो क्या खुदा या भगवान उससे नाराज हो जायेंगें। हकीकत की जमीन पर क्या क्या बदलेगा धर्म परिवर्तन से.........



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