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रविवार, 23 जुलाई 2017

गिद्धीय नर



स्त्री को भी शायद ना पता हो
अपने उभार और ढलान का माप
मगर गिद्ध पुरुष की दॄष्टि
हमेशा नापती रहती है
अंग प्रत्यगं के बीच की दूरी
उसका क्षेत्रफल
और कभी कभी आयतन
कभी चौराहों पर
कभी कार्यस्थल पर
यहाँ तक की मन्दिर भी
आ जाते है चपेट में
ढके मुंदे तन में भी
ढूंढता रहता है
कोई खिडकी
जहाँ से दे सके उडान
अपनी वासना को
अपनी काम कल्पना में
उड कर भी
तॄप्त नही होती
कामाग्नि
चाहता है किसी भी तरह
उसे बुझाना
नही सोचता
क्या गुजरती है
स्त्री के कोमल हदय पर
जब भेदती है उसे
वक्री निगाहें
नही जानता
अपनी सोच मात्र से ही
हो चुका है पतित
और छल चुका है
अपनी अर्धागिंनी को
दिन भर की नाप जोख के बाद
जब बजाता है
घर की डोर बेल
निर्लाज्जता से
ओढ लेता है
थोडा दम्भ
झूठी थकान
झूठ्मूठ का प्यार
और दिखावटी जिम्मेदारी
क्योंकि
दरवाजे के खुलते ही
कोई कर रहा है इन्तजार
बना दिया है जिसने

उसे पति परमेश्वर
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