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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

बेबस दिल्ली



दिल्ली - जिसे कभी दिल वालों की नगरी कहा जाता था, कब और कैसे इस शहर में बेदिल लोग आ कर रहने लगे और इस दिल्ली के दिल को इस कदर कुचल दिया कि आज दिल्ली का दिल सिसक रहा है और बेबसी से वक्त की ओर देख रहा है - कि कब इस धरती पर ऐसे पुत्र पैदा नही होंगे, जिनको जन्म देने का अफसोस उनकी माँओं को होगा ।

जरूरत आज सिर्फ ये नही कि ऐसे लोग जो इक स्त्री के दामन को दागदार करते हैं उनको क्या सजा दी जाय, जरूरत ये भी है कि उस मानसिकता को समझा जाय जो ऐसे लोगों के जेहन में पनपती हैं ।
स्त्री का पुरुष और पुरुष का स्त्री की ओर आकर्षण प्रकृति की एक सामान्य सी सौम्य सी प्रवत्ति है मगर जब इसमें विकृति आ जाती है तब यह प्रकृति के विपरीत होने लगता है। हमें इस बात पर गहन अध्ययन की आवश्यकता है कि इस सोच का अंकुर कैसे जन्म लेता है, कहाँ से इसे हवा पानी मिलता है और फिर कैसे धीरे धीरे यह बढती बढ्ती एक जहरीली बेल का रूप लेकर समाज के उस कोमल अंग को अपनी जकड में लेती है जिसके पास समाज को ना केवल जन्म देने की शक्ति है बल्कि जीवन का आधार भी है ।

हमें सोचना होगा, और जाना होगा उस काल में जिसे लोग राम राज्य कहते हैं । सूक्ष्मता से देखना होगा उस युग को, जब व्यक्ति का व्यक्तित्व मात्र धन दौलत सम्पदा या शक्ति से नही वरन आचरण से मापा जाता था । समाज में वही पूज्यनीय था जिसके लिये शुद्ध आचरण ही उसके जीवन का आधार था , और उस व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नही होता था जो पतित था ।
समाज में आखिर आज ऐसा क्या हुआ कि नारी को देवी समझे जाने वाले देश में सिर्फ उसे भोग्या ही समझा जाने लगा । जिस देश में निष्प्राण सी नदी को भी देवी तुल्य माना गया , गाय को माँ के समरूप रक्खा गया, सम्पूर्ण देश को माता कहा गया । फिर कैसे और क्यों ये परिवर्तन हो गया कि अब पिता अपनी पुत्री में भी सिर्फ एक नारी के रूप को देखने लगा । जन्म दाता, संरक्षण कर्ता ही उसे अपना ग्रास बनाने लगा ।

कमी कहाँ है ??

कमी आई है जीवन के मूल्यों में, बदल गये हैं जीवन के लक्ष्य जीवन का आधार , विचार धारा , और उसका रूप ले लिया है असंतुष्टि ने ।

हमारे लिये मुश्किल नही है समाज से ऐसे दानवों को मिटाना मगर उसके लिये किसी को तो देव बनना होगा , किसी को तो आहवाहन करना होगा एक बार फिर से उस दुर्गा का जो सर्वनाश कर दे ऐसे दैत्यों का ।

सिर्फ अखबार के पन्नों पर चन्द रोज की खबर बना कर इस समस्या का हल नही निकाला जा सकता । स्त्री को सिर्फ दिलासा दिला कर उसके दर्द को कम नही किया जा सकता ।

समाज को सोचना होगा और मानना भी होगा कि यदि स्त्री कोमल है तो यह उसकी कमजोरी नही , उसकी शक्ति है , और जब यह शक्ति प्रचंड रूप लेती है तो यह फूल से फूलन भी बन जाता है । जरा सोच कर देखिये यदि समाज में फूल से ज्यादा फूलन हो गयी तो , स्वयं को सामर्थ्य की धुरी समझने वाले पुरुष का वर्चस्व ही खतरे में पड जायगा , और परिणाम फिर चाहे कुछ भी हो , हारेगा तो जीवन की ही होगी क्योकि प्रहार भी तो जीवनदात्री पर ही किया जा रहा है

9 टिप्‍पणियां:

  1. मर्यादा से मन को अनुशासित करना सीखना होगा, प्रत्येक को।

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (22-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. iska karan aur ek matr karan hai
    ki hamari education ki disha sahi nahi hai
    vaha par hum apne snskar dene ke vajay
    kuch aur de rahe hai
    humko yahi nahi pata ki karna kiya?
    bas lage hai ki kaise karna hai?
    aur samaj main kuch aise udaharan jyada haijo
    in bure krtyon ko badaba dete hai

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  4. अपने हाथ में सिर्फ कर्म करना है , और हम यथा संभव प्रयास करते रहेंगे ! ये बेबसी ज़रूर ख़तम होगी!

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  5. इस मुद्दे पर गहन मंथन की जरूरत है।

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  6. अब शायद समय की मांग ही यही है कि फूल से फूलन बना जाय तभी कुछ होगा बहुत दिखा लिया नारी ने फूलों सा सोमय रूप जिसकी कदर न की इन सांज के टेके दारों ने अब वक्त है फूलन का रूप दिखाने का, मगर विडम्बना यह है कि इतना सब होने के बावजूद भी लोग लड़का चाहते हैं और लड़की से कतराते है। न जाने कहाँ जा रहे हैं हम ...

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  7. अब सही में खुद के आत्म मंथन का वक्त है

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  8. कहाँ गए वो स्वस्थ समाज के ठेके दार क्या यही सूरत थी उनके काल्पनिक समाज की ,आजकल ही छोटी छोटी बच्चियों की की कवितायें भी पढने को मिली ,लगा कलियाँ खिलने से पहले ही प्रदूषित वायु में मुरझाने लगी हैं पर हम माँ ही डर कर बैठ गई तो कैसे चलेगा ,वक़्त है दुर्गा रणचंडी बनने का अपनी बच्चियों को आश्वासन और हिम्मत दो उनकी ढाल हमें ही बनना है ---बहुत अच्छा लिखा है मन को झकझोर रहा है यह मुद्दा

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  9. समाज के बदलाव की दिशा शायद ठीक नहीं है ... खास कर के पुरुष को अपनी उद्दण्ता को काबू में रखना होगा ...

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