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बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

मुकद्दर तो हमारा है


अक्सर लोगों को अपनी जिन्दगी से शिकायत रहती है कि उनको ये नही मिला, उनको वो नही मिला, उनको जो मिला, वो सही नही मिला, हमारा तो नसीब ही खराब है, वगैरह वगैरह । मगर यहाँ हम एक बात कहना चाहते है, कि मुकद्दर कोई पराई चीज नही जो हमको कही से मिल जाती है, ये वो चीज है जिसे हम खुद बनाते है, हम अपनी जिन्दगी से जो चाहे वो पा सकते है, जैसा चाहे वैसी अपनी तकदीर खुद लिख सकते है, तो फिर किसी भी बुरे के लिये कोई और नही हम स्वयं ही तो दोषी होते है, प्रकृति ने हमे सब कुछ दिया है, हम जैसे कर्म करते है, हमे परिणाम भी उसी के अनुरुप मिलता है , किसी ने कहा भी है -- " बोये पेड बबूल का तो आम कहाँ से होय"
अचछे कर्मो का प्रतिफल हमे अच्छी तकदीर के रूप में मिलता अवश्य है, हो सकता है कि जो आज हम अच्छा करे उसके सुखद परिणाम तुरंत ना मिले, मगर भविष्य में अन्तोगत्वा हमे सम्पन्नता और सुख मिलता अवश्य हैं......................


सवंर जाऊँ, बिगड जाऊँ
मुकद्दर तो हमारा है
खुदी से है जहाँ अपना
बस हाथों का सहारा है

नही देती सदा ही साथ
हवायें शोख बाती का
उजाले दे, या बुझ जाये
मुकद्दर तो हमारा है ...............


नही होती सदा ही साथ
लहरें भी तो नैय्या के
लगा दे पार या डूबे
मुकद्दर तो हमारा है .................

खुशी और गम दोनो ही
खुदा के इस जहाँ मे है
मिले मुस्कान या आँसू
मुकद्दर तो हमारा है ................





8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब !
    कृपया मेरे ब्लॉग पर आये
    और फॉलो करके अपने सुझाव दे !

    उत्तर देंहटाएं
  2. Mukaddar to hamara hai bahut lajawaab prastuti ...aur saath hi iss baaat se bhi sahmati hai ki hum jo karte hain hame usi kaaa fal milta hai .... Badhaayi aapko !!

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-10-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1761 में दिया गया है
    आभार

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  4. ्जी हां आपने बिल्कुल सही कहा.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. अत्यंत उत्कॄष्ट बात कही आपने कविता के शब्द-शब्द में सच्चाई है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बंदा खुद ही अपना नसीब बनाता है ..ये बिलकुल सच्च बात है.
    जो रोना रोते है उन के लिए ये कहावत बनी है "अब पश्ताये क्या होत जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत" :)

    कृपया मेरे ब्लॉग तक भी आयें, अच्छा लगे तो ज्वाइन भी कीजिये सब थे उसकी मौत पर (ग़जल 2)

    उत्तर देंहटाएं

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