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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

कुछ दीवारें



कुछ दीवारे
जब उठती हैं
तो बनते है घर
मगर होती है
कुछ ऐसी भी दीवारे
जो बना देती है
घर को मकान
जिनके खिचने से
जाती है
दरार रिश्तों में
कहने को 
घर के बाहर लगी तख्ती
होती है पहचान घर की
मगर
हर कमरे पर लगी
अनदिखी तख्ती
नही देती इजाजत
बिना संकोच 
एक कमरे से दूसरे कमरे में आने की
वो घर जो दीवारे होने पर भी था
एक अटूट
ये अनदेखी दीवारे
बना देती है
एक ही घर में
कई मकान
कई रसोईघर
और हर चूल्हा
है उत्तरदायी
सिर्फ अपने मकानमालिक की भूख का
एक ही घर में
कोई भरता है डकार
और सोता है कोई
भूखे पेट
यूं तो होते हैं
दीवारों के भी कान
मगर नही जाने देती ये
दर्द या किसी कराह को
अपने आर पार
बडी स्वामिभक्त होती हैं 
ये अनदिखी दीवारें
जरूरतों के नाम पर
खत्म किया है इन्ही
अनदिखी दीवारों ने
घरों से आंगन 
और बैठक का चलन
उखाड कर तुलसी
सज गये हैं मनीप्लांट
मकान की साजोसज्जा
नही डाल पा रही
बेजान हो गये घर ने जान
सच ये दीवारे जब उठती है
बना ही देती है
मन्दिर से घर को भी
शमशान

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज बुधवार (21-02-2018) को
    "सुधरा है परिवेश" (चर्चा अंक-2886)
    पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह अपर्णा जी ! अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना ! भौतिकतावादी इस युग की बेहद कड़वी सच्चाई ! बहुत ही सुन्दर सार्थक सशक्त अभिव्यक्ति !

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  3. बहुत ही सटीक रचना बहुत ही लाजवाब.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब ! मंगलकामनाएं आपको

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हर एक पल में ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २६ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' २६ फरवरी २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीय माड़भूषि रंगराज अयंगर जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

    अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य"

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  7. दीवारों की महिमा लिख दी ...
    बहुत ख़ूब ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह !!!!! दीवारों पर अप्रितम चिंतन !!!!!!
    सच ये दीवारे जब उठती है
    बना ही देती है
    मन्दिर से घर को भी
    शमशान--
    क्या खूब कहा आपने आदरणीय अपर्णा जी | सादर

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ही बेहतरीन शब्दों में मन के भावों की प्रस्तुति !!

    उत्तर देंहटाएं

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