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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

जाने कबसे


जाने कबसे इन आँखों में
तेरा ख्वाब सजाये बैठे हैं

बात करे, हम कुछ भी
तेरा जिक्र छुपाये बैठे हैं

जुल्फों की बदली में इक
सावन को बसाये बैठे हैं

हाथों की चंद लकीरों में
तेरा नाम लिखाये बैठे है

हथेली की हरी हिना में
खुशबू तेरी महकाये बैठे हैं

हर आती जाती सांसों में
तेरी आस लगाये बैठे हैं

पल पल बीत रहे लम्हों में
तेरी उम्मीद जगाये बैठे हैं

संग बिताये, चार पलों में
हम इक उम्र बिताये बैठे हैं

तनहा घनी अंधेरी रातों में
यादों के दिये जलाये बैठे हैं

क्या खबर तुझे, हम तुझमें
अपनी दुनिया बसाये बैठे हैं


6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! बहुत ही सुन्दर !
    संग बिताये, चार पलों में
    हम इक उम्र बिताये बैठे हैं !
    बहुत खूब !

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  2. संग बिताये, चार पलों में
    हम इक उम्र बिताये बैठे हैं
    बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ अपर्णा जी

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  3. दिल को छू लेनी लेनी वाली अत्यंत खूबसूरत रचना

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  4. बस चाहे वो आएँ न आएँ अपनी इस दुनिया को (बगिया को) वीरान न होने दिजिए ताकि भाव के कोयल. कविता के कूक ऐसे ही हम तक पहुँचाते रहें ।

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