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रविवार, 9 नवंबर 2014

नपुंसक.................


आफिस के लिये चाहे जितना सोचो कि समय से निकल जाऊँ, मगर रोज कुछ ना कुछ ऐसा हो ही जाता है कि घर से निकलते निकलते देर हो ही जाती है, , और उस पर ट्रैफिक से दो - चार होना। बस एक शनिवार ही होता है जब थोडा सा ट्रैफिक कम मिलता है, कारण ज्यादातर आफिस बन्द होते हैं, 
आज घर से दस मिनट पहले ही निकल गया, लगा कि आज तो समय से आफिस पहुँच ही जाऊंगा, मगर ये क्या, लगता है अभी अभी कोई एक्सीडेंट हुआ है, लोगो ने जाम लगा रख्खा है। लोग भी ना, उनके पास जाम लगाने का तो खूब समय होता है, मगर ये नही कि उस व्यक्ति को अस्पताल पहुंचा दे, ताकि किसी की जिन्दगी और बहुत से लोगों का समय बच सके। जाम में फंसी गाडी में बैठे बैठे ख्याल आया कि मै ही देख लेता हूँ कि क्या हुआ है फिर मेरे आफिस के रास्ते में अस्पताल भी पडता ही है, मै ही पहुँचा देता हूँ । उतर कर थोडा आगे बढा और एक सज्जन से पूँछा - अरे भाई साहब क्या हुआ है , बोले अरे एक नपुंसक मर गया है। तभी कानों में और भी लोगों की बाते कानों से टकराई, कोई कह रहा था - अरे अब कोई इसी की बिरादरी का आये तो उठाये इसको, कोई कह रहा था - और क्या इसको उठा कर कौन बवाल में पडे, कोई कह रहा था- अरे आज कल का तो जमाना ही नही कि किसी पचडे मे पडे और फिर इन लोगों के बीच.......
जितने लोग थे, उतनी बातें थीं
मै सोच रहा था - जो व्यक्ति हमसे कोई रिश्ता नाता ना होते हुये भी, हमेशा से हमारी खुशियों मे बिना बुलाये ही शरीक होता है , हमारे बच्चों को दुआयें देता है, हमारे सुखी जीवन के लिये ढेरों आशीष देता है, जिसके लिये हम कहते हैं कि इनकी दुआ कभी खाली नही जाती, आज मरने के बाद उसकी ये स्थिति की सडक पर लावारिश लाश की तरह पडा - अपनी बिरादरी के चार लोगों का इन्तजार कर रहा है, शायद लावारिश से भी बुरी स्थिति है इसके, लावारिश की मदद के लिये तो शायद कोई आगे आ भी जाय, या पुलिस को ही सूचना दे दे, मगर इसके लिये तो वो भी नही होने वाला कि कोई इसके साथ वाले को ही सूचना दे। नपुंसक वो नही , नपुंसक है हम,  हमारा समाज, हमारी सोच, जो जीवित को तो जाति, धर्म और लिंग में बांटती ही है, आज ऐसी सोच ने एक मृत शरीर को भी नही छोडा।
और फिर मै उस भीड को चीरते हुये, उस मत शरीर की तरफ बढ गया, उसे अन्तिम यात्रा पर ले जाने के लिये.... 

7 टिप्‍पणियां:

  1. पता नही क्यों नही लोग अपनी सोच बदलते ,
    सही कहा आपने !

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (10-11-2014) को "नौ नवंबर और वर्षगाँठ" (चर्चा मंच-1793) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. राहत इन्दोरी साब का ये शेर सटीक बैठता है ऐसे लोगों के लिए ...

    ये लोग पांव नहीं जहन से अपाहिज है,
    उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है.

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  4. सुन्दर सोच अपर्णा जी .......वाकई बहुत दुखता है दिल इस कौम के लिए .........

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  5. नपुंसक वो नही , नपुंसक है हम, हमारा समाज, हमारी सोच, जो जीवित को तो जाति, धर्म और लिंग में बांटती ही है, आज ऐसी सोच ने एक मृत शरीर को भी नही छोडा। नपुंसक वो नही , नपुंसक है हम, हमारा समाज, हमारी सोच, जो जीवित को तो जाति, धर्म और लिंग में बांटती ही है, आज ऐसी सोच ने एक मृत शरीर को भी नही छोडा।

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  6. हमारा समाज,तो तो था ही नपुंसक पर अब हमारी सोच भी नपुंसक होती जा रही है

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