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रविवार, 7 दिसंबर 2014

कुछ रंग जिन्दगी के


जाने कैसे बना देते हैं लोग
ह्र्दय भी पाषाण का
पिघलना तो दूर
एक लकीर तक नही खिंचती मनुष्यता की

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कोई बना दे यंत्र
जो पहचान सके
सच्चे और झूठे जज्बात
कि बहुत लुटा चुका
सहद्यता के मोती
चील कौंवों  में

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वो क्या समझेंगें
मेरे होने ना होने का मतलब
जिनके लिये
प्यार एक उम्र नही
 है मात्र एक पल खुशी का

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जगह भी वही
मै भी हूँ वही
दिन रात सुबह शाम
सब कुछ तो है वैसा ही
जाने क्या बदला
मैं आदम से खुदा हो गया

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जिसे फेंक दिया
किसी ने
यूं ही कुछ सोचे बिना
कुछ और नही
किसी की जिन्दगी थी,
भूख थी
किसी तडपते
पेट की।
और थी आस,
एक रात जिन्दगी में
भरपेट खा कर सोने की






5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! सभी क्षणिकाएं एक से बढ़ कर एक ! बहुत ही सुन्दर !

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  2. ब्लॉग नाम 'पलाश' बहुत पसंद आया । उसका विश्लेषण और भी सुन्दर।

    अपने स्नातकोत्तर की पढ़ाई के समय मैंने भी 'पलाश' नाम से एक भित्ति पत्रिका शुरू की थी। जो केवल सात-आठ सप्ताह तक दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट फैकल्टी में चिपका पाया था। - इस कारण इस नाम से मेरा जुड़ाव बहुत पुराना हुआ।


    सच कहा साधना जी ने आपकी सभी रचनाएँ एक से बढ़ कर एक हैं।


    प्रस्तुतकर्ती के बजाय 'प्रस्तुतकर्त्री' शब्द हो तो जँचे।


    जैसे :

    कर्ता - कर्त्री

    भर्ता - भर्त्री

    निर्माता - निर्मात्री


    [और इसमें भी 'कर्तृ' 'भर्तृ' शब्द के प्रयोग किसी और अर्थ में होते हैं, शब्दकोश देखें। ]

    उत्तर देंहटाएं

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