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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

अब रक्त धरा पर और नही



चाह रहा मन आज लिखना
जो बचा सके इंसानियत
एक लकीर खींचना उन दिलों में
जो पूज रहे है हैवानियत
कैसे मैं समझाऊं उनको
ये नही खुदा की चाहत
खून बहा कर नही मिली है
कभी किसी को राहत

बहुत हो चुका, अब तो छोडो
बदले की आग में जलना
गोली बारुद के ढेरों पर
अब सौदे मौत के करना
जन्मा नही तुमको माँ ने
बेगुनाहों का रक्त बहाने को
क्यों दागदार फिर करते 
तुम उसके दूध पिलाने को

याद करों उन दिन को जब
तेरे रोने पर माँ रोई थी
तुझे सुलाने की खातिर
रात सारी नही वो सोई थी
बता भला, अब कैसे सोयें वो 
जिनके नन्हों को तूने सुलाया है 
कैसे खुदा बेहरबां हो तुझ पर
बेबस ममता को तुमने रुलाया है

है वक्त अभी भी, कुछ तो सोचो
कुछ तो सच्चे काम करो
छोडो ये बन्दूक तमंचे
इंसानियत का सम्मान करों

रो रो कर कह रहा अल्लाह
अब रक्त धरा पर और नही
मत मार जालिम मासूमों को
सब मेरे बच्चे हैं कोई गैर नही

3 टिप्‍पणियां:

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