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सोमवार, 4 जून 2018

तैयारी


सुबह उठने के साथ
करने लगती हूं तैयारी
घर छोडने की
हाथ मुंह धुलते धुलते
वही उतार कर रख देते हूं
मन की थकन
जो नही मिटी सो कर भी
बैग पैक करते करते
पैक कर देती हूं
रात बीती सारी बातें
तकिये के नीचे धीरे से
धर देते हूं सारी चिन्तायें ये कह कर
शाम को फिर मिलूंगी तुमसे
तब तक तुम थोडा आराम कर लो
रसोई में टिफिन लगाते चाय बनाते
नोट करती जाती हूं
डिब्बे कनस्तरों की डिमांड
ऊपर की रैक में रखा
चाय की पत्ती का डिब्बा कहता है
याद है न शाम को मेरे लिये कुछ लाना है
वरना शाम को मुझसे न कहना
सर दर्द हो रहा है
तभी बगल में बैठा
चीनी का डिब्बा भी बोल पडता है
मै भी हूं, मुझे भी मत भूलना
सबकी बाते नोट करते करते
तैयार होकर दरवाजे से निकलते पैर
रूक जाते है
दिल कहता है
एक बार और देख तो लूं
अपने जिगर के टुकडे को
जो रो धोकर  चुका है
आया की गोद में है
और टकटकी लगाये कह रहा है मुझसे
क्यो जाती हो मां रोज यूं मुझे छोडकर
कुछ भी तो नही चाहिये मुझे
तुम्हारे दूध और गोद से सिवा
और मै उसकी बेबसी और अपनी मजबूरी को
वही दरवाजे पर रख चल देती हूं
उसकी और अपनी जरूरतें पूरी करने
की पेट ममता नही समझता
और मां के साथ पिता की भूमिका भी निभानी है
अपनी लाडले केलिए


3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, संस्कृत श्लोक का अर्थ - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-05-2018) को "वृक्ष लगाओ मित्र" (चर्चा अंक-2993) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    पर्यावरण दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  3. कोमल मार्मिक अभिव्यक्ति सत्य कहा दिल को कितना मजबूत करना पड़ता है

    उत्तर देंहटाएं

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