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गुरुवार, 1 नवंबर 2018

इक्तेफाक- The coincidence


कैसे समझ लूं, मिलना तुमसे
महज इक्तेफाक था
इतने बडे जहाँ में
एक छत के नीचे
तेरा मेरा साथ होना
महज इक्तेफाक था
हजारों की भीड में
टकरा जाना
तेरी नजरों का मेरी नजरों से
महज इक्तेफाक था
हसी खुशी के मंजर में
अचानक से दहशतगर्दों का
विस्फोट करना
और मेरा तेरी बाहों में गिर जाना
महज इक्तेफाक था
किसी अन्जान की परवाह में
कई रातों जगना
सलामती की दुआ मांगना
मेरे जख्मों का दर्द
तेरी सीने में उतर आना
महज इक्तेफाक था
चंद दिनों पहले के अनजबियों का
अपनो से बढकर हो जाना
महज इक्तेफाक था
तुमसे मिलने से पहले 
मेरे दिल का सूना और 
तेरे दिल का वीरां होना
महज इक्तेफाक था
नही, बिल्कुल नही मान सकता मेरा दिल
कि इतना कुछ
महज इक्तेफाक था
हमे मिलना ही था,
इसलिये हम मिले थे
मगर यूं मिलना
हाँ वो , महज इक्तेफाक था

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" शनिवार 03 नवम्बर 2018 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (03-11-2018) को "भारत की सच्ची विदेशी बहू" (चर्चा अंक-3144) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

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