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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

प्रेम अनुमति पत्र..


आज एक दिन घर पर अकेले रहना, इतना मुश्किल लग रहा था कि जैसे इससे ज्यादा मुश्किल तो कुछ भी नही। निशा बिट्टू के साथ अपनी बहन की शादी में गयी थी।
तीन दिन कैसे निकल गये पता ही नही चला था, बैंक की नौकरी में मार्च का आखिरी सप्ताह तो बस फाइलों के ही नाम होता है, रात के ग्यारह बारह तो आफिस में ही बज जाते थे। कल बैंक से आते समय सोचा था कि कल तो सनडे है, देर तक सोउंगा। मगर, पाँच बजे उठने की आदत ने थोडा और और सोचते सोचते सात तक जगा ही दिया। एक कप चाय बना कर अखबार बाहर लॉन में आ गया। राजनीति में मेरी खास रुचि नही थी, और आज का सारा अखबार नेताओं के चर्चों से ही भरा था, सो थोडी देर में ही वापस् ड्राइंग रूम में आ गया। तभी मेरी नजर अपनी छोटी सी लाइब्रेरी की तरफ गयी। किसी समय किताबे पढने का बहुत शौक हुआ करता था। और उसके पहले एक ऐसा समय भी था जब मै उपन्यास पढने को बहुत बेकार सा काम समझता था। ये बात कुछ ३० - ३२ साल पहले की है, जब मैं १२वीं का विघार्थी था, हमारे हिन्दी के टीचर ने प्रेमचन्द्र जी की जीवनी पढाते समय उनके गोदान उपन्यास की बहुत प्रसंशा की थी। मेरी हिन्दी में कोई खास रुचि नही थी, मगर नीरु हिन्दी की दीवानी थी। मै और नीरु एक ही साथ पढते थे। ये जानते हुये भी कि मुझे उपन्यास पढने मे कोई दिलचस्पी नही है, उसने मेरे जन्म दिन पर मुझे गोदान भेंट में दिया। मुझे मालूम था कि यदि मै उसको ना पढता तो वो मुझसे खूब झगडा करती, पढना शुरु किया, पता नही वो उपन्यास मुझे पसन्द आया था या मै नीरु को खुश करना चाहता था, मैने उसी रात पूरा पढ लिया। फिर तो नीरू जब भी कोई उपन्यास लेती पढ कर मुझे दे देती, और कहती मैने पढ लिया है तुम आराम से पढ लेना। उसके बाद हम दोनो ने ही बी. एस. सी मे दाखिला लिया, मगर हमारा नावेल पढने के शौक कम ना हुआ, हाँ एक बात थी मै हमेशा उसका दिया नावेल ही पढता था।
उसके जाने के बाद ना फिर कोई नया नावेल खरीदा और ना पढा। ये मै आज तक नही समझ सका कि नावेल मै क्यों पढता था। बरसों से मेरी ये छोटी सी लाइब्रेरी वैसे ही है, ना कुछ कम हुआ ना ज्यादा। पुरानी यादे दिल को बहुत बेचैन करने लगी थी, सोचा कोई नावेल पढ लेती हूँ, या शायद मै खुद से ही झूठ बोल रहा था, नावेल पढते समय मुझे हमेशा ही तो ये आभास होता था कि नीरू मेरी नजरों के सामने है, और इस समय भी मन में उसको सामने देखने की प्रबल इच्छा के कारण ही नावेल पढने को मन आतुर हो उठा था। लाइब्रेरी की अलमारी का शीशा खोलते ही निगाहे गोदान पर टिक गयीं। बहुत देर तक किंकर्तव्मूढ सा गोदान को तकता रहा, अचानक ऐसा लगा जैसे धरती हिल रही है, और मै चक्कर खा कर गिर जाऊंगा, मैने जल्दी से गोदान को हाथ मे कस कर पकड लिया और कुर्सी पर लगभग गिर सा पडा। तभी मेरे हाथ से गोदान छूट कर गिर पडा, किताब के पन्ने खुल कर फड्फडा रहे थे, जैसे उसका एक एक शब्द मुझसे कह रहा हो कि तुम्हे अब मुझे पढने का कोई अधिकार नही। मेरी आंखों से बेबसी के अश्रु निकल् पडे, तभी धुंधली सी हो आयी नजर कुछ दूर पर ही पडे एक कागज पर गयी जो अभी अभी किताब से निकला था। शरीर की सारी शक्ति को यत्न पूर्वक एकत्रित करके मैने हाथ बढा कर कागज को उठाने की कोशिश करी, तभी सामने से आती कूलर की हवा ने उसे मुझसे कुछ दूर कर दिया, उस कागज में मुझे साक्षात नीरू नजर आ रही थी। उस पर लिखे शब्द मेरे कानों में नीरू के शब्द बन कर सुनाई देने लगे।
मन्नू मुझे पता है तुम मुझे बहुत प्यार करते हो, मगर जिस समाज , जिस दुनिया में हम रहते हैं वहाँ प्यार करने को गुनाह समझा जाता है, तुम एक उ्च्च कुल के ब्राहमण के एक मात्र पुत्र हो, और मै एक अछूत की कन्या। मुझसे अपने प्रेम को स्वीकर करने से पहले, तुम्हे अपने माता पिता, अपने रिश्तेदारों, समाज के ठेकेदारों से मुझसे प्रेम करने की अनुमति लानी होगी। मैं तुम्हे प्रेम करती हूँ और हमेशा करूंगी, मगर  मै अपने प्यार को गुनाह का नाम नही दे सकती। यदि तुम मुझे अपने दिल के साथ साथ अपने जीवन में भी स्थान देने की अभिलाषा रखते हो तो पहले अपने बडों के आशीर्वाद की मुहर और स्वीकृति के हस्ताक्षर इस प्रेम अनुमति पत्र पर लाने होगें। मै तभी तुम्हे मुझसे प्यार करने की अनुमति भी दूंगी और तुम्हारे दिल पर अपने प्रेम का हस्ताक्षर भी। मै तुम्हारा अपनी अन्तिम सांस तक इन्तजार कर सकती हूँ, मगर अपने ही हाथों अपने प्रेम को समाज के रखवालों के हाथों बिखरते नही देख सकती।

आज तक, ना मैं अपने प्रेम को हस्ताक्षरित करा सका और ना दिल को....................

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

क्या हो तुम........



तू ही दर्द मेरा, हमदर्द मेरा
शामें तू ही, सबेरा भी मेरा................

मिलकर ही तो, मिल पाये हम
जीवन के सुनहले रंगों से।
क्या धूप है औ छाया है क्या
जाना तेरे संग चलते चलते॥
तू ही मंजिल मेरी, रास्ता मेरा
कदम तू ही, साया भी मेरा
तू ही दर्द मेरा.................

खाली खाली से रहते थे
जब तक तुझको ना पाया था
सूने सूने से इस दिल में
उम्मीदों का घर ना बसाया था
तू धडकन मेरी, अरमान मेरा
ख्वाइश तू ही, मकसद भी मेरा
तू ही दर्द मेरा..............

सूरज चांद सितारे अम्बर
तुझसे ही रौशन होते है।
तेरी नजर के एक इशारे से
मौसम भी सुहाने होते हैं||
तू बरखा मेरी, भादौ मेरा
फागुन तू ही, अगहन भी मेरा
तू ही दर्द मेरा.............

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

वास्तविक हार... The Real Defeat









हार जाना हार नही, हार स्वीकार ना करना हार है।
हार का स्वभाव स्थायी नही होता। उसके कारणों का विश्लेषण ना करना उसे स्थिरता की तरफ ले जाता है। पर निन्दा करना एक नकारात्मक प्रक्रिया है, और उसके परिणाम भी नकारात्मक ही होते है। यदि कोई विजयी है, तो इस बात की चर्चा अवश्य होनी चाहिये, कि उसके क्या कारण थे, विजय के पीछे परिश्रम  के साथ साथ सकरात्मक सोच, सकरात्मक कर्म और सकरात्मक लक्षय अवश्य होते हैं। हार को भी सकारात्मकता से लेते हुये, स्वस्थ वातावरण और निष्पक्ष तथ्यों के साथ मूल्याकंन और विश्लेशण करके भविष्य में अपनी विजय को स्थायी बनाया जा सकता है।
पिछले तीन चार दिनों से जिस तरह से सोशल मीडिया पर लोग "आप" की जीत के विरुद्ध अपनी भावनाये प्रकट करते हुये  नकारात्मक विचार शेयर कर रहे हैं, वह विचार विमर्श किसी और ही दिशा मे ले जा रहा है

किस तरह से विचार व्यक्त किये जा रहे हैं, इसकी बानगी कुछ इस तरह से देखी जा सकती है......
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सड़क पर नेनो कार राजनीति में आप कुछ खटकती है.....
भई हम तो ठहरे धर्म और आस्था वाले प्राणी... हमें तो इस परिणाम में बहुत अच्छा संकेत दिखा है. अपने धर्म और अपनी संस्कृति में तो किसी नए काम की शुरुआत या धार्मिक अनुष्ठान में 3 को बहुत शुभ माना जाता है और 13 (6+7) को बहुत अशुभ माना जाता है. ऐसे में किसकी जीत और किसका अंत... इसके लिए प्रतीक्षा तो करनी ही होगी... 
एक अपील दिल्ली की मुफ्त्खोर जनता से, " इतना जश्न मन्नने की जरूरत नही, अभी ज्यादा जश्न मनाओगे तो मात्र उपहास का पात्र बन कर रह जाओगे, जशन तब मनाना जब आप द्वारा किये हुये वादे पूरे किये जाये, वरना ऐसा जश्न का कोई मायने नही............
एक संदेश मेरे भारतीय मित्रो के नाम
मित्रो अरविंद केजरीवाल की जीत के नशे में कुछ लोग अपनी मर्यादा भूल गये हे

अरे मेरे भारतीय भाइयो और बहनों जिस नरेन्द्र मोदीजी ने खून पसीना एक करके गुजरात एवम् देश की जनता के लिए चौमुखी विकास करके गुजरात एवम् देश को No1 बनाया क्या उस आदमी की एक छोटे से राज्य में हार से उनकी इतनी भद्दी तरीको से मजाक बनाना सही हे?
अरविंद केजरीवाल पहले भी मुख्यमंत्री बन चुके हे तब वो 49 दिन में भाग गये थे अब दोबारा असंभव से फ्री बिजली पानी wifi घर जेसे वादे करके मुख्यमंत्री तो बन गये हे पर आज की सच्चाई ये हे की पानी का पाउच भी फ्री नही मिलता हे
जब ये सच्चाई जनता समझेगी तो केजरीवाल का उन्ही के झाड़ू से सफाया कर देगी। 
अगर आप भी इस बात से सहमत हे तो इस मेसेज को इतना शेयर करे की ये मेसेज हर भारतीय के फ़ोन में पहुच जाए
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मुझे याद नही आता जब इससे पहले कभी किसी विधान सभा के परिणामों पर इतना कुछ कहा और लिखा जा रहा है, क्यों हम इस बात पर नही सोचना चाहते कि दिल्ली की जनता आखिर क्या चाहती थी,
१.अगर उसने माननीय केजरीवाल जी को दुबारा अवसर दिया तो क्यो?
२.वही जनता जिसने बीजेपी को लोकसभा में पूरी सात सीटें दी, क्यो वह बीजेपी पर दुबारा विश्वास नही कर सकी?
३.क्यों उसको बीजेपी या किसी अन्य दल के हाथों अपना भविष्य सौपनें की इच्छा नही हुयी?
४.क्या मुफ्त चीजों को बांटने के आश्वासन पहले किसी राज्य या किसी दल ने नही किये, क्या यही आधार है लोकतंत्र में विजय का?कितना काल्पनिक है ये तर्क?
५.वो क्या कारण थे कि बीजेपी ने पूर्व विधान सभा में विजयी डा. हर्ष वर्धन जी पर विश्वास ना करते हुये किरन बेदी जी मुख्यमंत्री के नामित किया?
६.क्यों जनता ने इतनी योग्य और समझदार उम्मीदवार का चुनाव नही किया?

चुनाव लोकतंत्र को स्थापित और सुदृढ बनाने की प्रक्रिया है, जनता को जिसमें पूरा हक दिया गया, कि वह अपने लिये, अपनी सोच समझ से अपनी सरकार चुने।
तो हमे हार मिले या जीत , ये विश्लेषण अवश्य ही करना होगा कि किन कारणों ने हमे सफलता या असफलता दिलायी।
ना जीत हुयी स्थायी कभी, ना हार है चिरायु
जीवन को गति देते, जीने के है, ये दो पहलू
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