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गुरुवार, 6 जनवरी 2011

रुधिर


आज वो ऐसे धर्मसंकट में थी जहाँ एक तरफ उसके पति की अंतिम इच्छा थी तो दूसरी तरफ पति का ही वचन था किसे वो ज्यादा महत्व दे , बस इसी निर्णय पर पहुँच की कोशिश में वो समय के उस मोड पर पहुँच गयी जहाँ पर उसने अपने नये जीवन की नींव रक्खी थी । करीब ३० साल पहले जब वो और आकाश गर्मी की छुट्टिया बिताने नैनीताल जा रहे थे कि रास्ते में अचानक हमारी कार के सामने एक बूढी सी औरत आ गयी थी जिसकी गोद मे एक दो या तीन महीने का बच्चा था । हम कार से तुरन्त ही उतर कर उसके पास गये थे वो वृद्धा अपने जीवन की आखिरी सांस ले रही थी , हम लोग कुछ करते उससे पहले ही तो उसने उस बालक को मेरी गोद में डाल कर कहा था- बिटिया इसका मेरे सिवा कोई नही , माँ जनम देते ही चल बसी , बाप उसके गम में चल बसा । और मेरा भी समय लगता है पूरा हो रहा है । इसको आसरा दे देना , भगवान तुम लोगो को सुखी रक्खे । और देखते ही देखते उसने दम तोड दिया था । हमे कुछ समझ नही आ रहा था । हमारी शादी को पाँच साल हो गये थे मगर अब तक मेरी गोद सूनी ही थी , और आज अचानक इस तरह से मेरी गोद में एक बालक आ गया था । मैने तुरन्त ही उसको पालने का निर्णय ले लिया था । मगर आकाश चुप थे । हम उस बच्चे को लेकर घर वापस आ गये थे । पूरे रास्ते आकाश कुछ भी नही बोले थे । घर आकर भी हमे एक हफ्ता हो चुका था । मुझे लगने लगा था कि आकाश भी उस बच्चे को स्वीकार कर चुके है । अस्पताल से आज वो जल्दी लौट आये थे , मै चाय बना कर ले गयी तो बोले – विनी मै सोच रहा हूँ कि इसे किसी अनाथालय मे दे आते है , यह सुनते ही मै कुछ बोलती इससे पहले ही उन्होने कहा पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो कह कर उन्होने अपनी बात को आगे बढाया- विनी मुझे पता है तुम चाहती हो कि इस बच्चे को हम ही पाल ले , मगर ये एक दो दिन की नही पूरी जिन्दगी की बात है । आज हमारे कोई औलाद नही है इस लिये हो सकता है तुम इसे बहुत प्यार दो , मगर क्या हम अपना बच्चा होने के बाद भी इसे आज जैसा ही प्यार देंगें । क्योकि आज यह कुछ नही जानता , कल मगर इसे यह अहसास हुआ कि यह पराया है तो उस दिन मै अपने को कभी माफ नही कर पाऊँगा । आकाश मै तुमसे वादा करती हूँ मेरी ममता में कभी भेद नही आयगा । मै इसे कभी यह पता भी नही चलने दूँगी कि यह हमारा बेटा नही । मेरी इस बात के आगे आकाश ने फिर कोई विरोध नही किया था । बस मुस्कुराते हुये इतना ही कहा था-  ठीक है तो हम रुधिर के आने की बहुत बडी सी पार्टी की तैयारी करते है । अचानक ही उन्होने उस बच्चे को इतना खूबसूरत नाम भी दे दिया ।
धीरे धीरे समय बीतता गया और हम तीन से चार हुये । रुचिर और रुधिर कब बडे हो गये हमे पता ही नही चला । रुधिर अपने पापा की इच्छा को पूरी करने के लिये डाक्टर बन गया और रुचिर ने इंजीनियरिंग को चुना । रुधिर ने पापा का नर्सिगं होम पूरी तरह से संभाल लिया था । और रुचिर ने विदेश मे एक प्रतिष्ठित कम्पनी में नौकरी ज्वाइन कर ली थी । 
आज हम दोनो रुचिर को लेने एयरर्पोर्ट ही तो जा रहे थे कि हमारी गाडी का एक्सीडेंट हो गया था । देखते ही देखते सब कुछ बिखर गया था । अस्पताल में सभी डाक्टरो ने जवाब दे दिया था । कल तक जो सबकी जिन्दगी बचाने में जुटा रहता था , आज वो ही लाइलाज हो गया था । मगर रुधिर ने अभी भी आस नही छोडी थी , ना जाने किन किन डाक्टरों से लगातार वो बात कर रहा था । माँ आप पापा के पास बैठों , मै कुछ करता हूँ पापा को कुछ नही होगा । कह कर वो किसी डाक्टर के पास गया था  कि आकाश को होश आ गया , मुझे लगा अब सब ठीक हो जायगा । तभी आकाश ने अपनी टूटती हुयी आवाज में मुझसे कहा – विनी मैने कभी रुधिर और रुचिर में भेद नही किया , मगर मै चाहता हूँ कि मुझे मुखाग्नि मेरा पुत्र ही दे । और यह कहते ही आकाश तो स्वच्छंद आकाश में अनन्त यात्रा पर चले गये थे , किन्तु मुझे एक ऐसी परीक्षा में डाल दिया था जिसका हल मुझे मिल ही नही रहा था । आकाश ने हमेशा हर मोड पर साथ दिया था और आज मुझे ऐसे मोड पर छोड कर गये थे जिसके चारो तरफ अंधकार के सिवा कुछ नही था । रुधिर को उन्होने हमेशा अपने पुत्र सा ही प्यार दिया था , फिर ऐसा उन्होने क्यो कहा । 
रुधिर ने कभी आकाश की किसी भी बात का उल्लंघन नही किया था , हर इच्छा का सम्मान किया था । रुधिर ने हमेशा पुत्र का हर कर्तव्य निभाया था , फिर क्या मै उससे यह अधिकार छीन सकती थी ।कही ऐसा तो नही कि आकाश रुधिर की ही बात कह रहे थे , कही उनको यह तो नही लगा होगा कि मै शायद रुधिर को यह अधिकार ना दूँ इसलिये वो यह कह रहे थे । हाँ शायद यही बात रही होगी । जब अपने पूरे जीवन मे उन्होने कोई भेद नही किया था , और मुझसे भी ऐसा करने का वचन लिया था , तो वह ऐसा कैसे कह सकते थे । हमेशा उन्होने रुधिर को ही अपना जेष्ट पुत्र समझा था , तो अगर आज वो रुचिर की बात कर भी रहे हो तो भी उनकी ये इच्छा मुझे उनकी सारी उम्र के त्याग और रुधिर के प्रति उनके अपनत्व के सामने बहुत छोटी सी प्रतीत हुयी । भले ही रुधिर की नसों मे इनका रक्त ना बह रहा हो मगर आकाश की आदते संस्कार और सांसे उसमे ही तो बसती थी ।



11 टिप्‍पणियां:

  1. सवाल तो है..और इसका उत्तर देने की सहज बुद्दि नहीं है क्योंकि सवाल एक अंतिम इच्छा का भी है। अगर हिंदू परंपरा मन मानता है तो दिवंगत आत्मा की इच्छा को पूरी करना जरुरी है। पर परलोक जाने वाले लौकिक जगत में उलझन डाल गया है। ऐसे में धर्म क्या कहता है ये देखना होगा। हां सहजता के हिसाब से मां की जो इज्छा हो वो ही सर्वोपरी है।

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  2. पलाश जी बहुत अच्छी कहानी विशेष रूप से अंत में जो संसय उत्पन्न हुआ
    साथ ही माँ की मनोदशा का सुंदर चित्रण जिसने एक बेटे को जन्म दिया परन्तु दुसरे को उसने अपने कलेजे से लगा कर पला
    अंत क्या हुआ बताइयेगा
    नव वर्ष की आपको बहुत बहुत शुभकामनाये

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  3. अपने का मोह नहीं जाता है, अब इस द्वन्द से बाहर निकलने के लिये मुखाग्नि दोनों से ही दिलवायी जाये।

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  4. क्या ऐसा हो सकता है ? मुझे तो नहीं लगता

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  5. आदरणीय अपर्णा त्रिपाठी जी
    नमस्कार !
    ........अच्छी कहानी विशेष रूप से अंत में

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  6. इसका इससे बेहतर उपाय हो ही नही सकता कि मुखाग्नि दोनो से दिलवाई जाये जिससे दोनो की बात भी रह जाये और रुधिर को सच का कभी पता भी ना चले जैसा कि आकाश भी चाहता था।

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  7. बहुत अच्छी कहानी |बधाई
    आशा

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  8. दोस्तों
    आपनी पोस्ट सोमवार(10-1-2011) के चर्चामंच पर देखिये ..........कल वक्त नहीं मिलेगा इसलिए आज ही बता रही हूँ ...........सोमवार को चर्चामंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराएँगे तो हार्दिक ख़ुशी होगी और हमारा हौसला भी बढेगा.
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  9. Sawal ye uthta hai ki kya rudhir ke prati unka pyar sahaj na ho kar ek krtavya paalan ke roop me tha. Jisase ant samay par pita ne dil ki suni...

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  10. Kabhi kbhi log apna sab kujh dekar bhi, khien na khien ParAye ho jate hain ya UEIN khaien HAR KISI NASIB HOTA HAI!!!!!

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