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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

पत्थर की इस नगरी में


पत्थर की इस नगरी में , इक दिल का मिलना मुश्किल है ।
भीड भरे इस मंजर में, इक मन का मिलना मुश्किल है


या मेरी चाहत सही नही, या दुनिया की हमको समझ नही ।
हम ही कुछ नादां से है , या दुनिया में अब ईमां ही नही ॥

काली अमावस की रातों में , मंजिल का दिखना मुश्किल है ।
पत्थर की इस नगरी......................................................


प्यार वफा की बातें तो , हर एक जुबां पर रहती हैं  ।
पर नजरें अब दीवानों की , कुछ और कहानी कहती हैं  ॥

ऐसी मोहब्बत की लहरों में ,डूब के उबरना मुश्किल है  ।
पत्थर की इस नगरी......................................................


बरसों जिसे तलाशा है , दुनिया के उलझे मेले में ।
बच बच के निकली हूँ अक्सर, घनघोर अंधेरें रेले से ॥

सुन पाते नही जब लोग कही, खामोशी को तो सुनना मुश्किल है ।
पत्थर की इस नगरी......................................................

18 टिप्‍पणियां:

  1. हर शब्द मे जादू है!
    बहुत ही बढ़िया।

    सादर

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  2. या मेरी चाहत सही नही, या दुनिया की हमको समझ नही ।
    हम ही कुछ नादां से है , या दुनिया में अब ईमां ही नही ॥

    काली अमावस की रातों में , मंजिल का दिखना मुश्किल है ।...

    बहुत प्यारी रचना... एक बार जिसको पढ़ कर भूलना मुस्किल है...

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  3. कसमे वादे तो बनाये ही गए टूटने के लिए . पीड़ा छलक रही है हर शब्द से . सुँदर भाव प्रवण कविता .

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  4. khubsurat ehsaas jo shabd man
    ki gehraiyon se nikalte
    hain un shabdon ka
    yahi rang yahi pehchan
    hoti hai very nice....
    kabhii mera blog bhi padkar
    apne vichar rakhiyega...

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  5. बेहतरीन, हर सुबह वही ढूढ़ने के लिये ही उठते हैं।

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  6. अच्छी काव्यमय प्रस्तुति.
    साईं पर भरोसा रखिये सब मुश्किल आसान करता जायेगा वो साईं.
    ॐ साईं राम

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  7. या मेरी चाहत सही नही, या दुनिया की हमको समझ नही ।
    हम ही कुछ नादां से है , या दुनिया में अब ईमां ही नही ॥

    कमाल की भावाभिव्यक्ति .....
    शुभकामनायें !

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  8. काली अमावस की रातों में , मंजिल का दिखना मुश्किल है ।
    हर अंधेरी रात के बाद सुबह तो आती ही है। बस रात के कटने का इंतज़ार करना होता है।

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  9. या मेरी चाहत सही नही, या दुनिया की हमको समझ नही ।
    हम ही कुछ नादां से है , या दुनिया में अब ईमां ही नही ॥

    काली अमावस की रातों में , मंजिल का दिखना मुश्किल है ।
    पत्थर की इस नगरी........................................
    bahut sundar rachna hai

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  10. सच्चाई बयां करती बेहतरीन प्रस्तुति।

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  11. बहुत खुबसुरत रचना है। एक शेर याद आ रहा है

    पत्थर के खुदा पत्थर के सनम
    पत्थर के ही इसां पाए है।
    तुम शहरे मोहब्बत कहते हो
    हम जान बचा कर आए है।

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  12. बहुत देर अआपकी नज्मे और कहानी को पढ़ रहा हूँ .. कुछ अपना सा लगा है .. शब्द जैसे दिल पर दस्तक दे रहे हो.. कुछ कहने को मन नहीं है , आपकी इस नज़्म ने मन भर दिया .. बस बधाई स्वीकार किजिये.

    आभार
    विजय
    -----------
    कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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  13. ये शहर पत्थर का है यहाँ लोग भी पत्थर के हैं

    कुछ मेहरबान दिल से तो कुछ बाहेर से हैं



    इनकी सासों में भरा है एक पथरीलापन

    इनकी आखों में हंस रहा है एक नीलापन

    इनके ख्वाबों के अश्क हैं जो , वो जहर के हैं

    ये कुछ मेहरबान दिल से तो कुछ बाहेर से हैं

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  14. बहुत खूब लिखा है, सुन्दर और मर्मिक है

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और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

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